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	<title>आवारा हूँ... &#187; Memoir</title>
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	<description>सिनेमा, साहित्य, खेल, संगीत, एक युवा शहर धड़कता है यहाँ...</description>
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		<title>फ़िराक के शहर में सिनेमा का मेला : गोरखपुर फ़िल्म उत्सव</title>
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		<pubDate>Sun, 12 Apr 2009 11:57:16 +0000</pubDate>
		<dc:creator>मिहिर</dc:creator>
				<category><![CDATA[Memoir]]></category>
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		<category><![CDATA[अरुंधति रॉय]]></category>
		<category><![CDATA[नया सिनेमा]]></category>
		<category><![CDATA[सत्ता]]></category>
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		<description><![CDATA[&#8220;हो जिन्हें शक, वो करें और खुदाओं की तलाश,
हम तो इंसान को दुनिया का खुदा कहते हैं.&#8221; -फ़िराक़ गोरखपुरी.
गोरखपुर फ़िल्म महोत्सव इस बरस अपने चौथे साल में प्रवेश कर रहा था. ’प्रतिरोध का सिनेमा’ की थीम लेकर शुरु हुआ यह सिनेमा का मेला अब सिर्फ़ सार्थक सिनेमा के प्रदर्शन तक ही सीमित नहीं रह गया [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<blockquote><p>&#8220;हो जिन्हें शक, वो करें और खुदाओं की तलाश,<br />
हम तो इंसान को दुनिया का खुदा कहते हैं.&#8221; -<strong>फ़िराक़ गोरखपुरी</strong>.</p></blockquote>
<p><a href="http://www.gorakhpurfilmfestival.blogspot.com/" target="_blank"><img class="alignright" style="float: right;" src="http://4.bp.blogspot.com/_KFBmC2bQHS4/SZNL4--DHRI/AAAAAAAAANg/6GL2hylamNs/s400/GFF4+289%282%29.jpg" alt="" width="400" height="300" /><strong>गोरखपुर फ़िल्म महोत्सव</strong></a> इस बरस अपने चौथे साल में प्रवेश कर रहा था. <strong>’प्रतिरोध का सिनेमा’</strong> की थीम लेकर शुरु हुआ यह सिनेमा का मेला अब सिर्फ़ सार्थक सिनेमा के प्रदर्शन तक ही सीमित नहीं रह गया है बल्कि प्रकाशन से लेकर फ़िल्मों के वितरण तक इसके दायरे तेज़ी से फ़ैल रहे हैं. <strong>गोरखपुर फ़िल्म सोसायटी</strong> द्वारा पहले प्रकाशन के रूप में विश्व सिनेमा के दस महानतम फ़िल्मकारों पर केन्द्रित ’<strong>पहली किताब</strong>’ का प्रकाशन इस उत्सव की उल्लेखनीय घटना थी. इस किताब में <strong>अब्बास किआरुस्तमी, अकीरा कुरोसावा, इल्माज़ गुने, इंगमार बर्गमैन, बिमल राय, चार्ली चैप्लिन</strong> और <strong>दि सिका</strong> जैसे फ़िल्मकारों पर महत्वपूर्ण लेख संकलित हैं.</p>
<p>गोरखपुर फ़िल्म सोसायटी अब वृत्तचित्रों के वितरण का काम भी कर रही है और स्मारिका के अनुसार पन्द्रह से ज़्यादा फ़िल्मों के वितरण के अधिकार अब इसके पास हैं. इनमें <strong>संजय काक</strong> की ’<strong>जश्न-ए-आज़ादी</strong>’ और ’<strong>पानी पे लिखा</strong>’, <strong>यूसुफ़ सईद की</strong> ’<strong>ख्याल दर्पण</strong>’, <strong>मेघनाथ</strong> और <strong>बीजू टोप्पो</strong> की ’<strong>लोहा गरम है</strong>’ जैसी फ़िल्में शामिल हैं. लेकिन मेरे लिए इस पहली गोरखपुर यात्रा में सबसे महत्वपूर्ण यह देखना था कि गोरखपुर जैसे राजनैतिक रूप से ’हायपरएक्टिव’ और उग्र हिन्दुत्ववादी राजनीति के गढ़ बनते जा रहे शहर में यह प्रतिरोध के सिनेमा का मेला शहर के सार्वजनिक जीवन में किस तरह का बदलाव ला रहा है. बेशक अब यह पूरे पूर्वांचल में अपनी तरह का अकेला फ़िल्म समारोह बनकर उभरा है लेकिन क्या यह इलाके के सांस्कृतिक पटल पर किसी प्रकार का हस्तक्षेप कर पाया है?</p>
<p>इस बार उत्सव में मुख्य वक्तव्य <a href="http://www.outlookindia.com/author.asp?name=Arundhati+Roy" target="_blank"><strong>अरुंधति राय</strong></a> का था. समारोह की थीम <strong>’अमेरिकी साम्राज्यवाद से मुक्ति के नाम’</strong> थी और दुनिया-भर से तमाम जनसंघर्षों से जुड़ी फ़िल्में समारोह में दिखाई जानी थीं. अरुंधति अपने वक्तव्य को लेकर कुछ दुविधा में थीं. वे चाहती थीं कि उनका वक्तव्य एकतरफ़ा संवाद न होकर दुतरफ़ा हो और यह चर्चा बातचीत की शक्ल में आगे बढ़े. उनकी इच्छा अपनी बताने से ज़्यादा लोगों के मन की बात जानने में थी. शायद वे समझना चाहती थीं कि लोगों के मन में क्या चल रहा है. वैसे शहर में आते ही स्थानीय मीडिया ने उन्हें घेरने की कोशिश शुरु कर दी थी और उन्हें लेकर मीडिया का यह पागलपन पूरे उद्घाटन सत्र में जारी रहा. मैंने उनसे पूछा कि क्या वे इस ’सेलिब्रिटी’ के पीछे पागल मीडिया और लोगों के बीच अपने असल पाठक को पहचान पाती हैं? और उन्होंने विश्वास के साथ कहा : हाँ.</p>
<p>बी.बी.सी. से आये मिर्ज़ा बेग ऐसे ही असल पाठक थे जिनसे अरुंधति काफ़ी देर तक बात करती रहीं. अरुंधति ने मगहर के रास्ते में आपसी बातचीत के दौरान कहा था, &#8220;इन पुरस्कारों से मिली प्रसिद्धि की चकाचौंध को मैंने नहीं चुना था लेकिन अपनी जिन्दगी के लिये मैंने जिन चीजों को चुना है उन्हें मैं इस प्रसिद्धि की वजह से खोने से इनकार करती हूँ.&#8221; अगले दिन हिन्दुस्तान दैनिक में छपे उनके साक्षात्कार का शीर्षक था, &#8220;मैं सच नहीं लिखूँगी तो मर जाऊँगी.&#8221; इस तमाम चकाचौंध के बावजूद अरुंधति ने अपनी बात कही और लोगों के सवालों से ये साफ़ था कि बात उन तक पहुँची है. अरुंधति ने कहा कि आज साम्राज्यवाद का अमेरिकी मॉडल हार रहा है. ओबामा जैसे उनके लिए आपातकालीन स्थिति के पायलट बनकर आये हैं. लेकिन यह लड़ाई का अंत नहीं है. इशारा था उन नए रूपों की ओर जिनका भेस धरकर साम्राज्यवाद वापस आयेगा, शायद हमारे ही भीतर से. हमें उन रूपों की पहचान करनी होगी. शायद यह लड़ाई का अगला चरण है जो ज़्यादा जटिल है. वे हमारे प्रतिरोध के मंच भी हड़प लेना चाहते हैं. ऐसे में प्रतिरोध का हर छोटा रूप बहुत महत्वपूर्ण हो जाता है. गोरखपुर का यह फ़िल्म उत्सव ऐसा ही मंच है और इसलिये एक महत्वपूर्ण कोशिश है.</p>
<p>उत्सव स्थल इसबार विश्वविद्यालय के प्रांगण से निकलकर शहर के बीचों-बीच आ गया था. पूरा शहर जहाँ भाजपा की आगामी 15 फ़रवरी को होनेवाली ’राष्ट्र रक्षा रैली’ के पोस्टरों और बैनरों से अटा पड़ा था वहीं इस सबके बीच शहर के मुख्य चौराहे पर समारोह स्थल पर लगा फ़ेस्टिवल का विशाल बैनर आते-जाते लोगों मे अजब उत्सुक़्ता जगा रहा था. मैंने कई लोगों को रुक-रुक कर उत्सव परिसर में घूमते और किताबें, फ़िल्में, कविता पोस्टर पढ़ते देखा. हमारी दोस्त भाषा एक सुबह उठकर अखबार की तलाश में कुछ दूर निकलीं तो उन्होंने अखबार की दुकान पर सुबह के जमावड़े में भी समारोह की चर्चा होते सुनी. शहर उत्सुक़्ता से देख रहा है, धीरे-धीरे शहर उत्सव से जुड़ रहा है. यह बात समारोह के आयोजक <strong>संजय जोशी</strong> और <strong>मनोज सिंह</strong> के लिए सबसे खास है.</p>
<p>मनोज कहते हैं, &#8220;2006 में समारोह की शुरुआत का विचार इस इलाके के ठहरे हुए सांस्कृतिक परिदृश्य में पत्थर मारने सरीख़ा था. लेकिन हमारा उद्देश्य सिर्फ़ यही नहीं. हम चाहते हैं कि संवाद का माहौल बने. फ़िल्म समारोह के ज़रिए हम ऐसा प्रगतिशील आन्दोलन खड़ा करना चाहते हैं जो इस प्रदेश के राजनैतिक परिदृश्य में भी अपनी दखल बनाये.&#8221; शायद अभी उसमें वक़्त है लेकिन उत्सव से जुड़े लोग इस बात को लेकर निश्चिंत हो सकते हैं कि वे सही दिशा में आगे बढ़ रहे हैं.</p>
<p><strong>बीजू टोप्पो</strong> जो अपनी फ़िल्म ’<strong>लोहा गरम है</strong>’ के साथ समारोह में मौजूद थे, का कहना था, &#8220;मेरे लिए यह समारोह सिर्फ़ अपनी फ़िल्म एक बड़े समूह को दिखाने का माध्यम भर नहीं. मैं खुद यहाँ दुनिया भर के जन आन्दोलनों से जुड़ी फ़िल्में देख पाता हूँ और उनसे अपनी लड़ाई को जोड़कर देख पाता हूँ जो और कहीं संभव नहीं. इस बार भी ब्रिटिश निर्देशक <strong>गिब्बी जोबेल</strong> की ब्राज़ील के भूमि-सुधार आन्दोलन पर बनी फ़िल्म ’<strong>एम.एस.टी.</strong>’ समारोह का मुख्य आकर्षण थी और मैंने, बीजू ने और हम जैसे बहुत से दर्शकों ने इस फ़िल्म के माध्यम से ब्राज़ील में राष्ट्रपति लूला के शासनकाल के बारे में बहुत सी नई जानकारियाँ पाईं. गिब्बी खुद समारोह में मौजूद थे और पूरे समारोह में उनकी आम लोगों से जुड़ने की कोशिश, हिन्दी सीखने की कोशिश के हम सब गवाह बने! फिर समारोह में ’<strong>वर्किंग मैन्स डैथ</strong>’ जैसी हार्ड हिटिंग फ़िल्म भी थी जिसे मैं इस समारोह की सबसे बेहतरीन फ़िल्मों में शुमार करता हूँ. इसबार समारोह <strong>इल्माज़ गुने</strong> की फ़िल्मों का रेट्रोस्पेक्टिव लेकर आया था और अपने ही देश में प्रतिबंधित इस मार्मिक फ़िल्मकार की ’<strong>योल</strong>’ और ’<strong>उमत</strong>’ जैसी फ़िल्में यहाँ दिखाई गईं और पसंद की गईं.</p>
<p><img class="alignright size-medium wp-image-42" style="float: right;" title="Gorakhpur Film Festival" src="http://www.mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2009/04/ggf-194x300.jpg" alt="" width="194" height="300" />प्रतिरोध कितना रचनात्मक हो सकता है इसका सबसे बेहतर उदाहरण था <a href="http://gorakhpurfilmfestival.blogspot.com/2009/02/blog-post_10.html" target="_blank"><strong>’जूता तो खाना ही था’</strong></a> शीर्षक आधारित कविता प्रदर्शनी. इराक में पत्रकार मुंतज़र अलजैदी की बुश को जूता मारने की बहादुराना कार्यवाही पर देश भर से साथियों ने कवितायें लिखकर भेजीं थीं जिन्हें समारोह के मौके पर एक प्रदर्शनी के तौर पर सजाया गया था. यहाँ मैं <strong>मृत्युंजय</strong> की कविता का एक अंश आपके सामने पेश कर रहा हूँ,</p>
<blockquote><p>&#8220;यह जूता है प्रजातंत्र का, नया नवेला चमड़ा,<br />
ठाने बैठा अमरीका से नव प्रतिरोधी रगड़ा.<br />
तेल-लुटइया, जंग-करइया, अब तो नाथ-नथाना ही था,<br />
व्हाइट हाउस के गब्बर-गोरे जूता तो खाना ही था!.&#8221;</p></blockquote>
<p>तो यह उत्सव सिर्फ़ सिनेमा तक सीमित नहीं. अमेरिका के साम्राज्यवाद से दुनिया भर में ज़ारी लड़ाई और उड़ीसा के गाँव-देहातों मे चल रहे जनसंघर्ष यहाँ आकर एक पहचान पाते हैं. मुझे अफ़सोस रहा कि आखिरी दिन मैं अपनी ट्रेन का वक़्त हो जाने की वजह से <strong>अशोक भौमिक</strong> द्वारा <strong>युद्ध विरोधी चित्रकला पर व्याख्यान</strong> नहीं सुन पाया. लेकिन अब मुझे पता है कि जिनके लिये वो व्याख्यान था वे लोग धीरे-धीरे आ रहे हैं, सुन रहे हैं, सोच रहे हैं. गोरखपुर धीरे-धीरे ही सही लेकिन यहाँ से निकली आवाज़ें सुन रहा है. उग्र धार्मिक पहचान वाला यह शहर अब अपने शायर फ़िराक की तरह इंसानों में खुदा देखने लगा है.</p>
<p><strong>मूलत: ’द पब्लिक एजेंडा’ के 18 मार्च 2009 अंक में प्रकाशित रपट.</strong></p>
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		<title>हम बड़े हुए, शहर बदल गए&#8230;</title>
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		<pubDate>Wed, 05 Nov 2008 10:04:17 +0000</pubDate>
		<dc:creator>मिहिर</dc:creator>
				<category><![CDATA[Memoir]]></category>
		<category><![CDATA[cricket]]></category>
		<category><![CDATA[अकेलापन]]></category>
		<category><![CDATA[अनिल कुंबले]]></category>
		<category><![CDATA[पहचान]]></category>

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		<description><![CDATA[तुम अपने अकेलेपन की कहानियाँ कहो. तुम अपने डर को बयान करो. तुम अपने दुःख को किस्सों में गढ़ कर पेश करो. दुनिया यूँ सुनेगी जैसे ये उनकी ही कहानी है. हर लेखक हरबार अपनी ही कहानी कहता है. कथा और इतर-कथा तो बस बात कहने के अलग अलग रूप हैं. कहानी तो इस रूप [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<blockquote><p><img class="alignright" style="float: right;" src="http://pratilipi.in/wp-content/uploads/2008/10/bio-pic-varun-150x150.jpg" alt="" width="100" height="100" /><img class="alignleft" style="float: left;" src="http://img2.orkut.com/images/milieu/1202650053/1202675342753/2076248/Z39qbxp.jpg?sig=4ovux1" alt="" width="80" height="110" />तुम अपने अकेलेपन की कहानियाँ कहो. तुम अपने डर को बयान करो. तुम अपने दुःख को किस्सों में गढ़ कर पेश करो. दुनिया यूँ सुनेगी जैसे ये उनकी ही कहानी है. हर लेखक हरबार अपनी ही कहानी कहता है. कथा और इतर-कथा तो बस बात कहने के अलग अलग रूप हैं. कहानी तो इस रूप के भीतर कहीं छुपी है. अपना microcosm खोजो और फिर देखो इस भरमाती दुनिया को. ये बातें करती है.</p>
<p><a href="http://en.bloguru.com/index.php?ID=02052&amp;CNT=ON">वरुण</a> और मेरे लिए बहुत से मामलों में &#8216;एक-सा संगीत&#8217; है. हम दुनिया को देखने के लिए एक चश्मे का इस्तेमाल करते हैं शायद. क्रिकेट, सिनेमा और राजनीति.. हमारे लिए एक complex society को समझने का जरिया बनते हैं.  एक दूसरे की scrapbook में लिखकर अपनी उलझनें सुलझाना हमारा पुराना शगल है! वैसे भी Orkut  हमारे लिए ख़ास है क्योंकि हमारी मुलाकात यहीं हुई थी. वरुण के लेखन का मैं तब से फैन रहा हूँ जब वो<a href="http://en.wikipedia.org/wiki/The_Great_Indian_Comedy_Show"> &#8216;ग्रेट इंडियन कॉमेडी शो&#8217; </a>लिखा करता था. हाल ही में उसमे अपनी पहली हिन्दी कहानी के प्रकाशन के साथ हिन्दी साहित्य जगत में भी धमाकेदार एंट्री ली है. आप <a href="http://pratilipi.in/2008/10/danube-ke-patthar-varun/">&#8216;डेन्यूब के पत्थर&#8217;</a> में ना जाने कितनी समकालीन परिस्थितियों की गूँज सुन सकते हैं.</p>
<p><a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Anil_Kumble">अनिल कुंबले</a> के जाने से शायद हम दोनों अनमने से थे और ऐसे में ये Orkut की skrapbook वार्ता आई. आज पढ़ा तो मुझे लगा कि एक लेख लिखने से ज़्यादा खूबसूरत ख़याल इसे blog पर डाल देना होगा. कुंबले हमारे जीवन में क्या जगह रखता था इसे देखना ज़रूरी है.</p></blockquote>
<p><img class="alignright" style="float: right;" src="http://www.dancewithshadows.com/ipl/wp-content/uploads/2008/03/anil-kumble.jpg" alt="" width="100" height="120" /><strong>मिहिर:~</strong> अरे यार.. मेरे हीरो ने आज यूँ अचानक अलविदा कह दिया. कुछ अच्छा नहीं लग रहा है&#8230;<br />
मालूम था कि एक दिन ये होगा लेकिन क्या करुँ यार.. मैं कुंबले के बिना जिंदगी की कल्पना नहीं कर सकता&#8230;<br />
He is my childhood hero. my first cricket memory coincides with his first coming-of-age performance. 1993 Hero cup final where he took 6-12&#8230; is there a life after kumble&#8230;?</p>
<p><strong>वरुण:~</strong> यार&#8230;सच में&#8230; दोपहर से बड़ा ख़ाली-ख़ाली लग रहा है. कुंबले को जाना था, यह कब से मालूम था&#8230; लेकिन फिर भी, एक्सेप्ट करना मुश्किल ही होता है. मुझे भी हीरो कप का वो फाइनल हमेशा याद रहेगा. शायद दिवाली के एक-दो दिन बाद ही था&#8230; हमारे पास बहुत सारे पटाखे बचे हुए थे और हमने जम के फोड़े थे. कुंबले उस दिन ख़ुदा लग रहा था&#8230; और हमेशा ही लगा है जब उसकी फ्लिपर्स लोअर-आर्डर बल्लेबाजों को खड़े-खड़े उड़ा देती हैं.</p>
<p>एक बार साउथ अफ्रीका में शायद 89 रन भी बनाए थे और उस दिन मुझे बड़ा बुरा लगा था कि सेंचुरी नहीं हुई.</p>
<p><img class="alignright" style="float: right;" src="http://www.funmunch.com/celebrities/athletes/anil_kumble/enlarge/anil_kumble_09.jpg" alt="" width="100" height="130" />आज अचानक से यह ख़याल आया कि जब सचिन भी चला जायेगा और राहुल भी&#8230; तब हम क्रिकेट क्यूँ देखेंगे? शायद उनके साथ साथ हमें भी रिटायर हो जाना चाहिए. हम भी बूढे हो चले हैं शायद. ऐसा ही होता है &#8211; एक आइकन के गुज़र जाने से साथ में वो era, उस era की values/memories/motivations सब गुज़र जाती हैं. अपनी गुज़रती उम्र का एहसास करा जाती हैं.</p>
<p>यह बात वैसे हर दौर के लोग बोलते होंगे&#8230; (और बोलते हैं, यह जानते हुए भी, मैं कहूँगा) कि क्रिकेट अब वैसा नहीं रहा. और कुछ दिन बाद इस बात का भरम भी खत्म हो जायेगा &#8211; जब हम सचिन, राहुल, लक्ष्मण को भी अलविदा कह देंगे.</p>
<p>एक मज़ेदार बात याद आई. जब दुनिया में शायद किसी ने भी कुंबले का नाम &#8216;जम्बो&#8217; नहीं रखा था, तब भी मैं और मेरा छोटा भाई उसे &#8216;हाथी&#8217; ही बोलते थे. उसके बड़े पैरों की वजह से नहीं (जो कि शायद उसके निकनेम की असली वजह है) बल्कि इसलिए कि बॉलिंग एक्शन के वक्त उसके हाथ किसी हाथी की सूंड जैसे लहराते थे&#8230; मानो हाथी नारियल उठा के नमस्कार कर रहा हो.</p>
<p>फिर बाद में जब हमें पता चला कि टीम ने उसका नाम जम्बो रख दिया है तो हमें बड़ी खुशी हुई&#8230;</p>
<p><strong>मिहिर:~</strong> अगर मुझे सही याद है तो 88.. उसी पारी में अज़हर ने सेंचुरी बनायी थी और कुंबले ने उसके साथ एक लम्बी पार्टनरशिप की थी. अज़हर के आउट होते ही मुझे डर लगा था कि देखना अब कुंबले की सेंचुरी रह जायेगी और वही हुआ था. 90s की क्रिकेट तो मुझे (हमें!) ज़बानी रटी हुई है!</p>
<p><img class="alignright" style="float: right;" src="http://bp0.blogger.com/_MuOF0Z25zBA/R4em8fE-oeI/AAAAAAAAASg/iibVMSFZ6sM/s400/Anil+Kumble+Wallpaper.jpg" alt="" width="150" height="100" />एक दौर था जब मैं कुंबले के एक-एक विकेट को गिना करता था. मैं उसकी ही वजह से स्पिनर बना (अपनी गली क्रिकेट का ऑफ़ कोर्स!) और उसके होने से मुझे दुनिया कुछ ज्यादा आसान लगती थी. क्लास में बिना होमवर्क किए जाने के डर से कुंबले की बॉलिंग निजात दिलाती थी. संजय जी की डांट से कुंबले बचाता था (मुझे ऐसा लगता था). एक self-confidence आता था मेरे भीतर जो ये अनिल कुंबले नाम का शक़्स देता था. चाहे कुछ हो जाए.. चाहे मैच में स्कोर 200-1 हो लेकिन इसकी बॉलिंग में फर्क नहीं देखा कभी&#8230;</p>
<p>कभी कभी लगता है कि ये दौर आज नही ख़त्म हुआ है, ये दौर तो बहुत पहले जा चुका. लेकिन एक भरम हम बनाकर रखते हैं जैसा तुमने कहा. आज वो टूट गया&#8230;</p>
<p>टाईटन कप.. सहारा कप.. Independence cup.. टाईटन कप में कुंबले और श्रीनाथ की वो लास्ट पार्टनरशिप याद है! उस मैच में सचिन को मैन-ऑफ़-दी-मैच मिला था लेकिन बाद में सचिन ने कहा था कि मैं तो मैच को बिना जिताए आउट होकर आ गया था, मैच तो इन दोनों ने जिताया है. मैन-ऑफ़-दी-मैच तो इन्हें मिलना चाहिए. और सबने कहा था, मैच बंगलौर में था ना.. आख़िर शहर के लड़के ही स्टार बने हैं! और फिर वो फाइनल.. क्या दिन थे यार!</p>
<p>आज लगता है मैं बड़ा हो गया यार. बचपन ख़त्म हुआ&#8230;</p>
<p><img class="alignright" style="float: right;" src="http://www.hinduonnet.com/thehindu/2006/03/12/images/2006031203591901.jpg" alt="" width="100" height="160" /><strong>वरुण:~</strong> हाँ&#8230;मैं बचपन में बहुत मोटा था और तेज़ बॉलिंग तो कर ही नहीं सकता था. ऐसे वक्त में मुझे मेरा हीरो मिल गया था &#8211; कुंबले. दो लम्बी डींगें भरो, हाथ को हवा में ऊँचा ले जाओ, और गेंद छोड़ते समय ऊँगली से हल्का सा झटका या ट्विस्ट दो&#8230;लेग-स्पिन नहीं तो ऑफ़-स्पिन तो हो ही जाती थी.</p>
<p>और गेंद करने से पहले, हाथ में गेंद को घुमाते हुए उछालना&#8230; उस वक्त लगता था हम भी कुंबले हैं. लगता था बैट्समैन अब हमसे भी डर रहा होगा. मुझे आज तक हाथ में वैसे गेंद घुमाने का शौक है&#8230; और एक अजीब सा confidence आता है अपने अन्दर.</p>
<p>और सही कहते हो- वो वाला दौर कब का जा चुका. हम बस उसके illusion में जी रहे हैं&#8230; और वो भी टूटता जाता है.</p>
]]></content:encoded>
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		<title>ऊधो मोहि ब्रज बिसरत नाहीं</title>
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		<pubDate>Fri, 05 Sep 2008 10:37:06 +0000</pubDate>
		<dc:creator>मिहिर</dc:creator>
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		<description><![CDATA[मेरे दोस्त समझ जायेंगे कि मैं आजकल &#8216;घर&#8217; को इतना क्यों याद करता हूँ. &#8216;घर&#8217; के छूटने का अहसास बहुत तीखा है. दोस्त मेरे भीतर कुछ अजीब से संशय देखते हैं. ठीक ठीक वजह तो मुझे भी नहीं मालूम लेकिन बहुत दिनों बाद यह एक ऐसा दौर है कि मेरे डर अचानक सामने बैठे दोस्त [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<blockquote><p><em>मेरे दोस्त समझ जायेंगे कि मैं आजकल &#8216;घर&#8217; को इतना क्यों याद करता हूँ. &#8216;घर&#8217; के छूटने का अहसास बहुत तीखा है. दोस्त मेरे भीतर कुछ अजीब से संशय देखते हैं. ठीक ठीक वजह तो मुझे भी नहीं मालूम लेकिन बहुत दिनों बाद यह एक ऐसा दौर है कि मेरे डर अचानक सामने बैठे दोस्त को दिख जाते हैं. मेरी चिट्ठियाँ राह भटक जाती हैं. लेकिन मुझे भरोसा है कि इस वक्त वो आयेंगे और मुझे संभाल लेंगे. वो जहाँ कहीं भी हैं, सोचेंगे और उनका सोचना ही काफ़ी है. डर हैं, और डर किस मन में नहीं होते लेकिन मैं सपने देखना नहीं छोडूंगा. सपनों में उन्हें देखना नहीं छोडूंगा. एक कुतुबनुमा मेरे पास भी है&#8230;</em></p></blockquote>
<p><img class="alignright" style="float: right;" src="http://tbn1.google.com/images?q=tbn:2HnxjxCChyu_XM:http://www.photofloue.net/blog/wp-content/uploads/2007/05/filename.jpg" alt="" width="125" height="91" />&#8220;हम सबका एक &#8216;घर&#8217; होता है. बहुत प्यारा, संपूर्ण, सुरक्षित और स्वस्तिदायक&#8230; फिर हम &#8216;बड़े&#8217; होते हैं और घर &#8216;छोटा&#8217; होता जाता है, छूट जाता है. ज़िंदगीभर हम उसी की तलाश में भटकते रहते हैं. कभी सोच में, कभी सपनों में, कभी रचनाओं में, भौतिक उपलब्धियों में, प्रशस्तियों में, विद्रोह और समझौतों में, कभी निष्क्रियाताओं में तो कभी कर्म की दुनिया में&#8230; मगर उम्र का, स्थान का, विश्वासों का, मूल्य और मान्यताओं का, भावनाओं और सुरक्षाओं का वह घर हमें कभी नहीं मिलता. लौटकर जाएँ तो भी पीछे छूटा हुआ न तो घर वही रह जाता है, न हम&#8230; जो कुछ मिलता है वह &#8216;अपना घर&#8217; नहीं होता और हम सोचते हैं : कहीं कोई घर होता भी है? इस सच्चाई का सामना करने से भी हम डरते हैं कि कहीं ऐसा तो नहीं है कि सचमुच कोई घर हो ही नहीं और हम एक भ्रम को जीते रहे हों&#8230; क्या है यह &#8216;घर&#8217; का भ्रम जो हमेशा खींचता रहता है? यह भी तो तय करना मुश्किल है कि घर की तलाश आगे की ओर है या पीछे की ओर? यह स्मृति है या स्वप्न? विज़न या नास्टेल्जिया? या फैलकर बेहतर दुनिया के लिए आस्था? कभी भी अधूरी छूट जाने के लिए अभिशप्त एक अंतहीन यात्रा ही क्या हमारी नियति है? उपलब्धियों के नाम पर कुछ पड़ाव, कुछ नखलिस्तान&#8230; चंद तसवीरें&#8230; अनेक पात्रों के नाम से की जानेवाली कुछ आत्म-स्वीकृतियां.</p>
<p>कभी कभी मैं सोचता हूँ कि क्या दुनिया की सारी सभ्यताएँ और संस्कृतियाँ उन्हीं लोगों ने तो नहीं रचीं जो विस्थापित थे और पीछे छूटे घर की याद में निरंतर वर्तमान और भविष्य की रचना करते रहे? हमें ऐसे वर्तमान में फेंक दिया गया है जो लगातार हमें भविष्य में धकेल रहा है ओर हर &#8216;है&#8217; को अनुक्षण अतीत बना रहा है. इस प्रक्रिया में हम अपने &#8216;अब&#8217; को सिर्फ़ &#8216;था&#8217; में बदलते जाने के निमित्तभर नहीं हैं? जो &#8216;था&#8217; वो कभी नहीं &#8216;होगा&#8217;, मगर हम उसे ही याद करेंगे, यानी उस स्मृति के किसी न किसी अंश को अपना सपना बनाते रहेंगे&#8230; वर्तमान और भविष्य चाहे जितने समृद्ध, संपन्न और महान बन जाएँ, मगर हमें हमेशा लगेगा कि जो बात पीछे थी वो आज नहीं है. होगी भी नहीं. शव पर चढ़े या सिंहासन पर, गले में हों या शीश पर, फूल तो हम पीछे छूटे हुए किसी पेड़ के ही हैं. हम आज जहाँ हैं वहाँ के हैं नहीं, बिलोंग कहीं और करते हैं. -कहाँ, यह भी हमें पता नहीं. एक भटका हुआ बच्चा जिसे अपने घर-बार, माँ-बाप किसी का नाम पता मालूम नहीं. मगर रोता उन्हीं के लिए है और हम समझाते हैं कि जहाँ हम उसे ले जा रहे हैं वहीं उसके घर-बार, माँ-बाप सभी हैं. इस झूठ की रचना या पीछे छूटे हुए को वापस दे देने के आश्वासन का नाम ही सभ्यता-संस्कृति नहीं है? तब फ़िर हम क्या ऐसे शाश्वत-शिशु ही हैं जो हर कहीं, हर किसी में अपना घर देखता है. बहुत कुछ बनाता और तोड़ता है और हर समय जानता रहता है कि यह उसका घर नहीं है.</p>
<p><img class="alignleft" style="float: left;" src="http://farm3.static.flickr.com/2152/2023586442_ee026b9e8b.jpg?v=0" alt="" width="280" height="180" />कहते हैं आदमी हर क्षण अपने पीछे छूटे हुए किसी &#8216;स्वर्ग&#8217; में लौटना चाहता है जहाँ वह सुरक्षित और सुखी था. व्यक्तिगत स्तर पर माँ के गर्भ में लौटने की ललक है. छूटा हुआ असली &#8216;घर&#8217; तो वही था. मगर वह यह भी जानता है कि वहाँ या किसी भी स्वर्ग में वह कभी नहीं लौटेगा. उसे अपना स्वर्ग ख़ुद बनाना पड़ता है. इकबाल की तरह या स्वर्ग से निष्कासित नहुष की तरह; किसी विश्वामित्र के मंत्रों पर सवार होकर&#8230; हमारी उस बैचनी को समझकर न जाने कितने विश्वमित्रों ने हमें &#8216;घर&#8217; या स्वर्ग देने के आश्वासन दिए हैं, सपने दिखाए हैं और वहाँ जाकर हमने पाया है कि न तो वह हमारा घर है, न वायदे का स्वर्ग. इस विश्वासघात से क्षुब्ध हम स्वयं उस घर और स्वर्ग को तोड़ते हैं. फ़िर से नए सपने के निर्माण के लिए. कितना थका देनेवाला, लेकिन कितना अनिवार्य है यह सिलसिला. हर बार किसी पैगम्बर, किसी गुरु या अवतार के दिए हुए सपनों का हिस्सा बनने की छलना, वहाँ पहुँचकर फ़िर एक नए नरक में पहुँचने का अहसास और फ़िर एक नए अवतार की प्रतीक्षा. फ़िर इस दुष्चक्र में धर्म, राजनीति या विज्ञान, तकनीक के नए-नए सम्प्रदायों को बनाते चले जाना, जो इसमें बाधक हैं उन्हें हटाते या समाप्त करते चले जाना ताकि अपने सपने को साकार किया जा सके. यानि सब मिलाकर हमेशा एक उम्मीद, संक्रमण, और यात्रा में बने रहने की नियति&#8230; युग-युग धावित यात्री. किंतु पहुँचना उस सीमा तक जिसके आगे राह नहीं&#8230; चरैवेति&#8230; चरैवेति&#8230;&#8221;</p>
<p><strong>राजेंद्र यादव. &#8220;अभी दिल्ली दूर है&#8221; की भूमिका से.</strong></p>
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		<title>मैं दिन भर रहमान के गाने सुनता था और वो रात भर.</title>
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		<pubDate>Tue, 12 Aug 2008 11:35:31 +0000</pubDate>
		<dc:creator>मिहिर</dc:creator>
				<category><![CDATA[Memoir]]></category>
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		<category><![CDATA[सिनेमा]]></category>

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		<description><![CDATA[यह कहानी उन लड़कों की है जो &#8216;शहर&#8217; नामक किसी विचार से दूर बड़े हुए. इसमें संगीत है, घरों में आते नए टेप रिकॉर्डर हैं, बारिश का पानी है, डब्ड फिल्में हैं, नब्बे के दशक में बड़े होते बच्चों की टोली है. कुछ हमारे डर हैं और कुछ आशाएं हैं. कुछ है जो हम सबमें [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<blockquote><p><em>यह कहानी उन लड़कों की है जो &#8216;शहर&#8217; नामक किसी विचार से दूर बड़े हुए. इसमें संगीत है, घरों में आते नए टेप रिकॉर्डर हैं, बारिश का पानी है, डब्ड फिल्में हैं, नब्बे के दशक में बड़े होते बच्चों की टोली है. कुछ हमारे डर हैं और कुछ आशाएं हैं. कुछ है जो हम सबमें एकसा है. मुझमें और विशाल में एकसा है. आज जब मैं लौटकर अपने बचपन को देखता हूँ तो मुझे एक &#8216;रहस्यमयी-सा&#8217; अहसास होता है. जैसे बाबू देवकीनंदन खत्री की &#8216;चंद्रकांता&#8217; पढ़नी शुरू कर दी हो. हमारे बचपन और शहर के इस अलगाव का हमारे व्यक्तित्वों पर असर है. बाद में हर दोस्त इस विचार से अपनी तरह से जूझा है. बचपन किसी &#8216;राबिन्सन क्रूसो&#8217; की तरह टापू पर बिताया गया समय है. और अब हम उस टापू को साथ लेकर अपने-अपने &#8216;शहरों&#8217; में घूमते हैं. कुछ परिचित से, कुछ बेमतलब.</em></p>
<p><em>सुशील ने मुझे &#8216;चकमक&#8217; के लिए <a href="http://en.wikipedia.org/wiki/A._R._Rahman" target="_blank">ए. आर. रहमान </a>पर कुछ लिखने को कहा था. और मैं रहमान पर जो लिख पाया वो ये है. यह सुशील की तारीफ ही है कि चकमक में आकर अब मेरी यह अनसुलझी कहानी हजारों बच्चों के पास पहुँचेगी. शुक्रिया सुशील.</em></p></blockquote>
<p><a href="http://en.wikipedia.org/wiki/A._R._Rahman" target="_blank">ए. आर. रहमान</a> हमारे दौर के <a href="http://en.wikipedia.org/wiki/R_D_Burman" target="_blank">आर. डी. बर्मन</a> हैं. जब हिन्दी सिनेमा ने पंचम को खोया तो लगा था कि एक दौर ख़त्म हो गया है. उनकी <img class="alignright" style="float: right;" src="http://tbn0.google.com/images?q=tbn:V4Jxsun6sO1-JM:http://www.oakparkjournal.com/stories2004/rahman-2004.jpg" alt="" width="114" height="117" />आखिरी फ़िल्म का गीत &#8216;एक लड़की को देखा तो ऐसा लगा&#8217; अपने भीतर उस दौर की तमाम खूबसूरती समेटे था तो एक दूसरे गीत &#8216;रूठ न जाना&#8217; में वही शरारत थी जो आर. डी. के संगीत की ख़ास पहचान थी. लगा पंचम के संगीत की अठखेलियाँ और शरारत अब लौटकर नहीं आयेंगे. लेकिन तभी दक्षिण भारत से आई एक डब्ड फ़िल्म <a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Roja" target="_blank">&#8216;रोज़ा&#8217;</a> के गीत &#8216;छोटी सी आशा&#8217; ने हमें चमत्कृत कर दिया. इस गीत में वही बदमाशी और भोलापन एकसाथ मौजूद था जो हम अबतक पंचम के संगीत में सुनते आए थे. ए. आर. रहमान के साथ हमें हमारा खोया हुआ पंचम वापिस मिल गया.</p>
<p>मैं अपने बचपन के दिनों में रहमान के संगीत वाली हर फ़िल्म की ऑडियो कैसेट ज़िद करके ख़रीदा करता था. यह वो समय था जब हमारे घर में नया-नया टेप रिकॉर्डर आया था. हम उसमें अपनी आवाज़ें रिकॉर्ड कर सुनते थे और वो हमें किसी और की आवाज़ें लगती थीं. हम कभी भी अपनी आवाज़ नहीं पहचान पाते थे. और हम उसमें रहमान के गाने सुनते थे. मेरा दोस्त विशाल सांगा बहुत अच्छा डाँस करता था और रहमान की धुनों पर वो एक ख़ास तरह का ब्रेक डाँस करता था जो सिर्फ़ उसे ही आता था. हम दोस्त एक दूसरे के जन्मदिन का बेसब्री से इंतज़ार करते और हर जन्मदिन की पार्टी का सबसे ख़ास आइटम होता विशाल का ब्रेक डाँस. हर बार हम विशाल से कहते कि वो हमें अपना डाँस दिखाए. पहले तो वो आनाकानी करता लेकिन हमारे मनाने पर मान जाता. हम कमरे के सारे खिड़की/दरवाज़े बंद कर लेते. हमें ये बिल्कुल पसंद नहीं था कि कोई और हमें देखे. मैं टेप रिकॉर्डर ऑन करता और कमरे में रहमान का &#8216;हम्मा-हम्मा&#8217; गूंजने लगता. विशाल अपना ब्रेक डाँस शुरू करता और हम बैठकर उसे निहारते. हमें लगता कि वो एकदम &#8216;प्रभुदेवा स्टाइल&#8217; में डाँस करता है. हम भी उसके जैसा डाँस करना चाहते थे. कभी-कभी वो हमें भी उस ब्रेक डाँस का कोई ख़ास स्टेप सिखा देता और हम उसे सीखकर एकदम खुश हो जाते. थोड़ी ही देर में हम सारे दोस्त खड़े हो जाते और सब एकसाथ नाचने लगते. विशाल भी कहता कि जब सब एकसाथ डाँस करते हैं तो उसे सबसे ज़्यादा मज़ा आता है.</p>
<p>विशाल को भी गानों का बहुत शौक था. खासकर रहमान के गानों का. उसके पास एक वाकमैन था जिसे कान में लगाकर वो रात-रात भर गाने सुना करता था. मैं जब भी कोई नई कैसेट लेकर आता तो वो रातभर के लिए उसे मुझसे माँगकर ले जाता था. और रहमान की कैसेट तो छोड़ता ही नहीं. दिन में मैं रहमान के गाने सुनता और रात में विशाल. उसे हिन्दी ठीक से बोलनी नहीं आती थी. वो अटक अटक कर हिन्दी बोलता और बीच बीच में शब्द भूल जाता था. मेरे नए जूते देखकर कहता, &#8220;छुटकू तेरे ये तो दूसरों के ये से बहुत अच्छे हैं!&#8221; मुझे &#8216;ये&#8217; सुनकर बहुत मज़ा आता था और मैं अपने घर आकर सबको ये बात बताता. लेकिन वो संगीत में जीनियस था. मेरी और उसकी पसंद कितनी मिलती थी. <a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Dil_Se" target="_blank">&#8216;दिल से&#8217;</a> के एक-एक गीत को वो हजारों बार सुनता था. मुझे कहता था, &#8220;पता है छुटकू, ये रहमान की आदत ही ख़राब है. जाने क्या-क्या करता है. अब बताओ, गाने की शूटिंग ट्रेन पर होनी है तो पूरे गाने में ताल की जगह ट्रेन की आवाज़ को ही पिरो दिया. पूरे गाने में ऐसी बीट जैसे कोई लम्बी ट्रेन किसी ऊंचे पुल पर से गुज़र रही हो! कमाल है इसका भी हाँ.&#8221; हम दोनों रहमान के दीवाने थे. याद है ना.. मैं दिन भर रहमान के गाने सुनता था और वो रात भर. मैं घर पर माँ से कहता. &#8220;पता है माँ, मेरे तीनों दोस्त इंजिनियर बनेंगे. गौरव और रोहित तो सादा इंजिनियर बनेंगे और विशाल बनेगा म्युज़िक इंजिनियर!&#8221;</p>
<p><img class="alignleft" style="float: left;" src="http://www.oakparkjournal.com/stories2004/rahman-heaven-earth-2004.jpg" alt="" width="200" height="180" />अब तो कई साल हुए विशाल से मुलाकर हुए. मैं दिल्ली आगे की पढ़ाई के लिए आ गया हूँ और विशाल ने कर्नाटक में अपनी हेंडलूम फैक्ट्री शुरू कर दी है. लेकिन आज भी जब मैं कहीं रेडियो पर &#8216;हम्मा-हम्मा&#8217; सुनता हूँ तो मेरे पाँव में थिरकन होने लगती है और उस वक़्त मुझे विशाल की बहुत याद आती है. और इसीलिए रहमान हमारे दौर के आर. डी. हैं. सबका चहेता. सबसे चहेता.</p>
<p>रहमान को मालूम है कि हम आधे से ज़्यादा पानी के बने हैं. पानी की आवाज़ सबसे मधुर आवाज़ होती है. इसीलिए वो बार-बार अपने गीतों में इस आवाज़ को पिरो देते हैं. <a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Saathiya" target="_blank">&#8216;साथिया&#8217;</a> में उछालते पानी का अंदाज़ हो या <a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Lagaan" target="_blank">&#8216;लगान&#8217;</a> में गरजते बादलों की आवाज़. <a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Taal_(film)" target="_blank">&#8216;ताल&#8217;</a> में बूँद-बूँद टपकते पानी की थिरकन हो या <a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Roja" target="_blank">&#8216;रोजा&#8217;</a> में बहते झरने की कलकल. रहमान की सबसे पसंदीदा धुनें सीधा प्रकृति से निकलकर आती हैं. वो नए वाद्ययंत्रों के इस्तेमाल में माहिर हैं और नए गायकों को मौका देने में सबसे आगे. &#8216;दिल से&#8217; के लिए उन्होंने Dobro गिटार का उपयोग किया तो &#8216;मुस्तफा-मुस्तफा&#8217; गीत के लिए Blues गिटार का. अपने गीत &#8216;टेलीफोन-टेलीफोन&#8217; के लिए उन्होंने अरबी वाद्य Ooud का प्रयोग किया.  चित्रा, हेमा सरदेसाई, मुर्तजा, मधुश्री से लेकर नरेश aiyer और मोहित चौहान तक रहमान ने हमेशा नए और उभरते गायकों को मौका दिया है. उनका संगीत लातिन अमेरिका के संगीत को हिन्दुस्तानी संगीत से और पाश्चात्य संगीत को दक्षिण भारतीय संगीत से जोड़ता है. और उनके बहुत से गीतों पर सूफि़याना प्रभाव साफ़  नज़र आता है. <a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Dil_Se" target="_blank">&#8216;दिल से&#8217;</a> के गीतों में ये सूफि़याना प्रभाव ही था जिसने उसे रहमान का और हमारे दौर का सबसे खूबसूरत अल्बम बनाया है. ये प्रेम की तड़प को उस हद तक ले जाना है कि वो प्रार्थना में उठा हाथ बन जाए. <a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Lagaan" target="_blank">&#8216;लगान&#8217;</a> में वे लोकसंगीत को अपनी प्रेरणा बनाते हैं और &#8216;घनन घनन&#8217; तथा &#8216;मितवा&#8217; में ढोल का खूब उपयोग मिलता है. &#8216;राधा कैसे न जले&#8217; में लोकजीवन से जुड़ी मितकथाओं का और धुन में बांसुरी का बहुत अच्छा उपयोग है. <a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Swades" target="_blank">&#8216;स्वदेस&#8217;</a> की धुन में स्वागत में बजने वाली धुनों का इस्तेमाल एकदम मौके के माफ़िक है. रहमान के लिए धुनों में नयापन कभी समस्या नहीं रहा. पूरी दुनिया सामने पड़ी है. हर फूल-पत्ती में आवाज़ छुपी है. बस दिल से सुननेवाला चाहिए.</p>
<p><strong><a href="http://eklavya.in/go/" target="_blank">एकलव्य</a> की बाल-विज्ञान पत्रिका &#8216;चकमक&#8217; के अगस्त 2008 अंक में प्रकाशित.</strong></p>
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		<title>विम्बलडन में बजता संगीत</title>
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		<pubDate>Mon, 07 Jul 2008 21:54:40 +0000</pubDate>
		<dc:creator>मिहिर</dc:creator>
				<category><![CDATA[Memoir]]></category>
		<category><![CDATA[Uncategorized]]></category>
		<category><![CDATA[टेनिस]]></category>
		<category><![CDATA[राफ़ेल नडाल]]></category>
		<category><![CDATA[रोज़र फेडरर]]></category>

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		<description><![CDATA[
टेनिस का महानतम मैच देखा अभी. और उगते सूरज को सलाम किया. फ़िर उगते सूरज से सुना कि बादशाह अभी भी फेडरर ही है. हारने के बावजूद मुझे उसके वो शॉट्स हमेशा याद रहेंगे जो उसने चैम्पियनशिप पॉइंट बचाने के लिए खेले थे. कुछ अदभुत ही था&#8230; मैच में रह रहकर बारिश हो रही थी [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<blockquote><p><img style="vertical-align: baseline;" src="http://jwadeg.files.wordpress.com/2007/05/federer-nadal.jpg" alt="" width="540" height="250" /></p></blockquote>
<p>टेनिस का महानतम मैच देखा अभी. और उगते <a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Rafael_Nadal" target="_blank">सूरज</a> को सलाम किया. फ़िर उगते सूरज से सुना कि बादशाह अभी भी <a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Roger_Federer" target="_blank">फेडरर</a> ही है. हारने के बावजूद मुझे उसके वो शॉट्स हमेशा याद रहेंगे जो उसने चैम्पियनशिप पॉइंट बचाने के लिए खेले थे. कुछ अदभुत ही था&#8230; मैच में रह रहकर बारिश हो रही थी और इस बाधा के आने पर विजय अमृतराज और एलन विल्किंस कुछ देर तो बोलते थे और फ़िर एक पुराने मैच के साथ हमें छोड़ जाते थे. <a href="http://en.wikipedia.org/wiki/John_McEnroe" target="_blank">जॉन मैकेनरो</a> और <a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Bj%C3%B6rn_Borg" target="_blank">ब्योन बोर्ग</a> के बीच खेला गया वो <a href="http://en.wikipedia.org/wiki/John_McEnroe#Famous_battles_with_Bj.C3.B6rn_Borg_.281980-81.29" target="_blank">फाइनल</a> मैच. 1980. बारिश बार-बार रूकती थी और फ़िर अचानक एक पुराना टाई-ब्रेकर बदलकर लाइव मैच बन जाता था. क्या इतिहास अपने आप को दोहराता है? लेकिन वहाँ तो ब्योन &#8216;आइस मैन&#8217; बोर्ग जॉन &#8216;यू कैन नॉट बी सीरियस&#8217; मैकेनरो से जीत गया था. चौथे सेट के एक लम्बे चले टाई ब्रेकर में मैकेनरो ने भी तो पांच मैच पॉइंट बचाए थे. लेकिन वो आखिरी सेट में एक पुराने धुरंधर की सर्विस ब्रेक नहीं कर पाया था. याद आया.. वहाँ उगता सूरज हार गया था. यहाँ कुछ बदला तो है. लेकिन याद रहे, बादशाह बोर्ग की तरह अभी हमेशा के लिए नहीं गया है. कहकर गया है.. मेरा इंतज़ार करना, मैं वापिस आउँगा.</p>
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		<title>सचिन नामक मिथक की खोज उर्फ़ सुनहरे गरुड़ की तलाश में.</title>
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		<pubDate>Fri, 30 May 2008 02:34:00 +0000</pubDate>
		<dc:creator>मिहिर</dc:creator>
				<category><![CDATA[Memoir]]></category>
		<category><![CDATA[cricket]]></category>
		<category><![CDATA[IPL]]></category>
		<category><![CDATA[सचिन]]></category>

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सचिन हमारी आदत में शुमार हैं. रविकांत मुझसे पूछते हैं कि क्या सचिन एक मिथक हैं? हमारे तमाम भगवान मिथकों की ही पैदाइश हैं. क्रिकेट हमारा धर्म है और सचिन हमारे भगवान. यह सराय में शाम की चाय का वक्त है. रविकांत और संजय बताते हैं कि वे चौबीस तारीख़ को फिरोजशाह कोटला में IPL [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p><a href="http://bp1.blogger.com/_oWd-c4uUHz4/SD_05sF-duI/AAAAAAAAAEo/BU6lxK3NTfo/s1600-h/best_86312a.jpg" onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}"><img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5206148966189528802" style="margin: 0pt 10px 10px 0pt; float: left; cursor: pointer;" src="http://bp1.blogger.com/_oWd-c4uUHz4/SD_05sF-duI/AAAAAAAAAEo/BU6lxK3NTfo/s320/best_86312a.jpg" border="0" alt="" /></a><br />
<a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Sachin_Tendulkar"><span><span>सचिन</span></span></a> हमारी <span>आदत</span> में शुमार हैं. रविकांत मुझसे पूछते हैं कि क्या सचिन एक मिथक हैं? हमारे तमाम भगवान मिथकों की ही पैदाइश हैं. क्रिकेट हमारा धर्म है और सचिन हमारे भगवान. यह सराय में शाम की चाय का वक्त है. रविकांत और <span>संजय</span> बताते हैं कि वे चौबीस तारीख़ को फिरोजशाह कोटला में <a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Indian_Premier_League">IPL</a> का मैच देखने जा रहे हैं. रविकांत चाहते हैं कि मुम्बई आज मोहाली से हार जाए. यह दिल्ली के सेमी में <span><span><span>पहुँच</span></span></span>ने के लिए ज़रूरी है. दिल्ली नए खिलाड़ियों की टीम है और उसे सेमी में होना ही चाहिए. आशीष को सहवाग का उजड्डपन पसंद नहीं है. संजय जानना चाहते हैं कि क्या मैदान में सेलफोन ले जाना मना है? मैं <span>उन्हें</span> बताता हूँ कि मैं भी जयपुर में छब्बीस तारीख़ को होनेवाला आखिरी मैच देखने की कोशिश करूंगा. यह राजस्थान और मुम्बई के बीच है. चाय के प्याले और बारिश के शोर के बीच हम सचिन को बल्लेबाज़ी करते देखते हैं. रविकांत मुझसे पूछते हैं कि क्या सचिन एक खिलाड़ी नहीं मिथक का नाम है? वे चौबीस तारीख़ को दिल्ली-मुम्बई मैच देखने जा रहे हैं और मैं छब्बीस तारीख़ को राजस्थान-मुम्बई. चाय के प्याले और बारिश के शोर के बीच मैं अपने आप से पूछता हूँ&#8230;</p>
<p>कहते हैं सचिन अपने बोर्ड एग्जाम्स में सिर्फ़ 6 अंकों से मैच हार गए थे. उनका तमाम क्रिकेटीय जीवन इसी अधूरे 6 रन की भर<span><span><span>पाई</span></span></span> है. क्रिकेट के आदि पुरूष <a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Donald_Bradman"><span>डॉन</span> <span>ब्रेडमैन</span></a> से उनके अवतार में यही मूल अंतर है. सचिन क्रिकेट के एकदिवसीय युग की पैदाइश हैं. डॉन के पूरे टेस्ट जीवन में छक्कों की संख्या का कुल जोड़ इकाई में है. उनका अवतार अपनी एक पारी में इससे अधिक छक्के मारता है. सचिन हमें ऊपर खड़े होकर नीचे देखने का मौका देते हैं. शिखर पर होने का अहसास. सर्वश्रेष्ठ होने का अहसास.</p>
<p>सचिन टेस्ट क्रिकेट के सबसे महान बल्लेबाज़ नहीं हैं. <a href="http://www.cricinfo.com/almanack/almanack-splash.html"><span>विज्डन</span></a> ने <a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Wisden_Cricketers_of_the_Century">सदी का महानतम क्रिकेटर</a> चुनते हुए उन्हें बारहवें स्थान पर रखा था. एकदिवसीय के महानतम बल्लेबाज़ ने भारत को कभी विश्वकप नहीं जिताया है. वे एक असफल कप्तान रहे और उनके नाम लगातार पांच टेस्ट हार का रिकॉर्ड दर्ज है. माना जाता है कि उनकी तकनीक अचूक नहीं है और वह बांयें हाथ के स्विंग गेंदबाजों के सामने परेशानी महसूस करते हैं. उनके बैट और पैड के बीच में गैप रह जाता है और इसीलिए उनके आउट होने के तरीकों में बोल्ड और IBW का प्रतिशत सामान्य से ज़्यादा है. तो आख़िर यह सचिन का मिथक है क्या?</p>
<p><a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Shahrukh_Khan"><span>शाहरुख़</span></a> और सचिन वैश्वीकरण की नई राह पकड़ते भारत का प्रतिनिधि चेहरा हैं. यह 1992 विश्वकप से पहले की बात है. <a href="http://en.wikipedia.org/wiki/India_Today">&#8216;इंडिया टुडे&#8217;</a>, जिसकी खामियाँ और खूबियाँ उसे भारतीय मध्यवर्ग की प्रतिनिधि पत्रिका बनाती हैं, को आनेवाले विश्वकप की तैयारी में क्रिकेट पर कवर स्टोरी करनी थी. उसने इस कवर स्टोरी के लिए खेल के बजाए इस खेल<a href="http://bp1.blogger.com/_oWd-c4uUHz4/SD_1MsF-dvI/AAAAAAAAAEw/a2FaJutmT8Q/s1600-h/tendulkarchildhoodyoung.jpg" onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}"><img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5206149292607043314" style="margin: 0pt 10px 10px 0pt; float: left; cursor: pointer; width: 130px; height: 202px;" src="http://bp1.blogger.com/_oWd-c4uUHz4/SD_1MsF-dvI/AAAAAAAAAEw/a2FaJutmT8Q/s320/tendulkarchildhoodyoung.jpg" border="0" alt="" /></a> के एक नए उभरते सितारे को चुना. गौर कीजिये यह उस दौर की बात है जब सचिन ने अपना पहला एकदिवसीय शतक भी नहीं बनाया था. एक ऐसी कहानी जिसमें कुछ भी नकारात्मक नहीं हो. भीतर स<span><span><span>चिन</span></span></span> के बचपन की लंबे घुंघराले बालों वाली मशहूर तस्वीर थी. वो बचपन में जॉन मैकैनरो का फैन था और उन्हीं की तरह हाथ में पट्टा बाँधता था. उसे दोस्तों के साथ कार में तेज़ संगीत बजाते हुए लांग ड्राइव पर जाना पसंद है. यह सचिन के मिथकीकरण की शुरुआत है. एक बड़ा और सफ़ल खिलाड़ी जिसके पास अरबों की दौलत है लेकिन जिसके लिए आज भी सबसे कीमती वो तेरह एक रूपये के सिक्के हैं जो उसने अपने गुरु रमाकांत अचरेकर से पूरा दिन बिना आउट हुए बल्लेबाज़ी करने पर इनाम में पाए थे. एक मराठी कवि का बेटा जो अचानक मायानगरी <a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Mumbai">मुम्बई </a>का, जवान होती नई पीढ़ी और उसके अनंत ऊँचाइयों में पंख पसारकर उड़ते सपनों का, नई करवट लेते देश का प्रतीक बन जाता है. और यह सिर्फ़ युवा पीढ़ी की बात नहीं है. जैसा मुकुल केसवन उनके आगमन को यादकर लिखते हैं कि बत्तीस साल की उमर में उस सोलह साल के लड़के के माध्यम से मैं वो उन्मुक्त जवानी फ़िर जीना चाहता था जो मैंने अपने जीवन में नहीं पाई.</p>
<p>सचिन की बल्लेबाज़ी में उन्मुक्तता रही है. उनकी महानतम एकदिवसीय पारियाँ इसी बेधड़क बल्लेबाज़ी का नमूना हैं. हिंसक तूफ़ान जो रास्ते में आनेवाली तमाम चीजों को नष्ट कर देता है. 1998 में आस्ट्रेलिया के विरुद्ध शारजाह में उनके बेहतरीन शतक के दौरान तो वास्तव में रेत का तूफ़ान आया था. लेकिन बाद में देखने वालों ने माना कि सचिन के बल्ले से निकले तूफ़ान के मुकाबले वो तूफ़ा<span><span><span>न</span></span></span> फ़ीका था. यही वह श्रृंखला है जिसके बाद रिची बेनो ने उन्हें विश्व का सर्वश्रेष्ठ बल्लेबाज़ कहा था. यहाँ तक आते-आते सचिन नामक मिथक स्थापित होने लगता है. लेकिन सचिन नामक यह मिथक उनकी बल्लेबाज़ी की उन्मुक्तता में नहीं है. वह उनके व्यक्तित्व की साधारणता में छिपा है. उनके समकालीन महान<a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Brian_Lara"> <span>ब्रायन</span> <span>लारा</span></a> अपने घर में बैट की शक्ल का स्विमिंग पूल बनवाते हैं. सचिन सफलता के बाद भी लंबे समय तक अपना पुराना साहित्य सहवास सोसायटी का घर नहीं छोड़ते. एक और समकालीन महान <a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Shane_Warne"><span>शेन</span> <span>वॉर्न</span></a> की तरह उनके व्यक्तिगत जीवन में कुछ भी मसालेदार और विवादास्पद नहीं है. वे एक आदर्श नायक हैं. मर्यादा पुरुषोत्तम राम की तरह. लेकिन जब वह बल्लेबाज़ी करने मैदान पर आते हैं तो कृष्ण की तरह लीलाएं दिखाते हैं. शेन वॉर्न का कहना है कि सचिन उनके सपनों में आते हैं और उ<span><span><span>नकी</span></span></span> गेंदों पर आगे बढ़कर छक्के लगाते हैं.</p>
<p>सचिन नब्बे के दशक <span><span><span>के</span></span></span> हिंदुस्तान की सबसे सुपरहिट फ़िल्म हैं. इसमें ड्रामा है, इमोशन है, ट्रेजेडी है, संगीत है और सबसे बढ़कर &#8216;फीलगुड&#8217; है. एक बेटा है जो पिता की मौत के ठीक बाद अपने कर्मक्षेत्र में वापिस आता है और अपना कर्तव्य बख़ूबी पूरा <a href="http://bp0.blogger.com/_oWd-c4uUHz4/SD_9kcF-dwI/AAAAAAAAAE4/fuE4d7MJb00/s1600-h/2281831206_d29335bbeb_m.jpg" onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}"><img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5206158496721958658" style="margin: 0pt 10px 10px 0pt; float: left; cursor: pointer;" src="http://bp0.blogger.com/_oWd-c4uUHz4/SD_9kcF-dwI/AAAAAAAAAE4/fuE4d7MJb00/s320/2281831206_d29335bbeb_m.jpg" border="0" alt="" /></a><span><span><span>करता</span></span></span> है. एक दोस्त है जो सफलता की बुलंदियों पर पहुँचकर भी अपने <a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Vinod_Kambli">दोस्त </a>को नहीं भूलता और उसकी नाकामयाबी <span>की</span> टीस सदा  अपने दिल में रखता है. एक ऐसा आदर्श नायक है जो मैच फिक्सिंग के दलदल से भी बेदाग़ बाहर निकल <span><span><span>आता</span></span></span> है. नब्बे का दशक भारतीय मध्यवर्ग के लिए अकल्पित सफलता का दौर तो है लेकिन अनियंत्रित विलासिता का नहीं. सचिन इसका प्रतिनिधि चेहरा बनते हैं. और हमेशा की तरह एक सफलता की गाथा को मिथक में तब्दील कर उसके पीछे हजारों बरबाद जिंदगियों की <span><span><span>कहानी</span></span></span> को दफ़नाया जाता है.</p>
<p>सचिन मेरे सामने हैं. पहली बार आंखों के सामने, साक्षात्! मैं उन्हें खेलते देखता हूँ. वे थके से लगते हैं. वे लगातार अपनी ऊर्जा बचा रहे हैं. उस आनेवाले रन के लिए जो उन्हें फ़ुर्ती से दौड़ना होगा. अबतक वे एक हज़ार से ज़्यादा दिन की अन्तरराष्ट्रीय क्रिकेट खेल चुके हैं. अगले साल उन्हें इस दुनिया में बीस साल पूरे हो जायेंगे. और फ़िर अचानक वे शेन वाटसन का कैच लपकने को एक अविश्वसनीय सी छलाँग लगाते हैं और बच्चों की तरह खुशी से उछल पड़ते हैं. मिथक फ़िर से जी उठता है.</p>
<p>सचिन की टीम मैच हार जाती है. जैसे ऊपर बैठकर कोई इस <a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Indian_Premier_League">IPL</a> की स्क्रिप्ट लिख रहा है. चारों पुराने सेनानायकों द्रविड़, सचिन, गाँगुली और लक्ष्मण की सेनाएँ सेमीफाइनल से बाहर हैं. इक्कीसवीं सदी ने अपने नए मिथक गढ़ने शुरू कर दिए हैं और इसका <a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Mahendra_Singh_Dhoni">नायक</a> मुम्बई से नहीं राँची से आता है. यह बल्लेबाज़ी ही नहीं जीवन में भी उन्मुक्तता का ज़माना है और इस दौर के नायक घर में बन रहे स्विमिंग पूल, पार्टियों में दोस्तों से झड़प और फिल्मी तारिकाओं से इश्क के चर्चों की वजह से सुर्खियाँ बटोरते हैं. राँची के इस नए नायक के लिए सर्वश्रेष्ठ होना महत्त्वपूर्ण नहीं है, जीतना महत्त्वपूर्ण है.</p>
<p>सितारा बुझकर ब्लैक होल में बदल जाने से पहले कुछ समय तक तेज़ रौशनी देता है. सचिन के प्रसंशकों का मानना है कि वो आँखें चौंधिया देने वाली चमक अभी आनी बाकी है. लेकिन मिथकों को पहले से जानने वाले लोगों को पता है कि देवताओं की मौत हमेशा साधारण होती है. कृष्ण भी एक बहेलिये के तीर से मारे गए थे. एक अनजान बहेलिये के शब्दभेदी बाण से मारा जाना हर भगवान् की और जलते-जलते अंत में बुझकर ब्लैक होल में बदल जाना हर सितारे की आखि़री नियति है.</p>
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		<title>जब वी मेट : &#8216;किस्सा-ऐ-कसप&#8217;</title>
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		<pubDate>Sun, 02 Mar 2008 23:19:00 +0000</pubDate>
		<dc:creator>मिहिर</dc:creator>
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		<category><![CDATA[films]]></category>
		<category><![CDATA[फ़िल्म समीक्षा]]></category>
		<category><![CDATA[सिनेमा]]></category>

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आज फ़िल्मफेयर देखते हुए लगा कि यह पुरानी पोस्ट (13 नवम्बर) जो मैंने अपने ब्लॉग कबाड़ में डाल दी थी पोस्ट कर दी जानी चाहिए. आख़िर &#8216;गीत&#8217; को एक के बाद एक पुरस्कार मिल रहे हैं! अब तो यह मुझ अकेले की तमन्ना का बयान नहीं. इससे identify करने वाले बहुत हैं. पढ़िये एक नितांत [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p><a href="http://bp2.blogger.com/_oWd-c4uUHz4/R8tmNFHNyGI/AAAAAAAAAEI/xGuh-RmhGAo/s1600-h/5CCFD410.jpg" onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}"><img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5173340971861919842" style="margin: 0pt 10px 10px 0pt; float: left; cursor: pointer;" src="http://bp2.blogger.com/_oWd-c4uUHz4/R8tmNFHNyGI/AAAAAAAAAEI/xGuh-RmhGAo/s320/5CCFD410.jpg" border="0" alt="" /></a></p>
<div><span style="font-family: arial;">आज</span><span style="font-family: arial;"> </span><span style="font-family: arial;">फ़िल्मफेयर</span><span style="font-family: arial;"> </span><span style="font-family: arial;">देखते</span><span style="font-family: arial;"> </span><span style="font-family: arial;">हुए</span><span style="font-family: arial;"> </span><span style="font-family: arial;">लगा</span><span style="font-family: arial;"> </span><span style="font-family: arial;">कि</span><span style="font-family: arial;"> </span><span style="font-family: arial;">यह</span><span style="font-family: arial;"> </span><span style="font-family: arial;">पुरानी</span><span style="font-family: arial;"> </span><span style="font-family: arial;">पोस्ट</span><span style="font-family: arial;"> (13 नवम्बर) </span><span style="font-family: arial;">जो</span><span style="font-family: arial;"> </span><span style="font-family: arial;">मैंने</span><span style="font-family: arial;"> </span><span style="font-family: arial;">अपने</span> ब्लॉग <span style="font-family: arial;">कबाड़</span><span style="font-family: arial;"> </span><span style="font-family: arial;">में</span><span style="font-family: arial;"> </span><span style="font-family: arial;">डाल</span><span style="font-family: arial;"> </span><span style="font-family: arial;">दी</span><span style="font-family: arial;"> </span><span style="font-family: arial;">थी</span><span style="font-family: arial;"> </span><span style="font-family: arial;">पोस्ट</span><span style="font-family: arial;"> </span><span style="font-family: arial;">कर</span><span style="font-family: arial;"> </span><span style="font-family: arial;">दी</span><span style="font-family: arial;"> </span><span style="font-family: arial;">जानी</span><span style="font-family: arial;"> </span><span style="font-family: arial;">चाहिए</span><span style="font-family: arial;">. </span><span style="font-family: arial;">आख़िर</span><span style="font-family: arial;"> </span><em style="font-family: arial;">&#8216;गीत&#8217;</em><span style="font-family: arial;"> </span><span style="font-family: arial;">को</span><span style="font-family: arial;"> </span><span style="font-family: arial;">एक</span> <span style="font-family: arial;">के</span><span style="font-family: arial;"> </span><span style="font-family: arial;">बाद</span><span style="font-family: arial;"> </span><span style="font-family: arial;">एक</span><span style="font-family: arial;"> </span><span style="font-family: arial;">पुरस्कार</span><span style="font-family: arial;"> </span><span style="font-family: arial;">मिल</span><span style="font-family: arial;"> </span><span style="font-family: arial;">रहे</span><span style="font-family: arial;"> </span><span style="font-family: arial;">हैं</span><span style="font-family: arial;">! </span><span style="font-family: arial;">अब</span><span style="font-family: arial;"> </span><span style="font-family: arial;">तो</span><span style="font-family: arial;"> </span><span style="font-family: arial;">यह</span><span style="font-family: arial;"> </span><span style="font-family: arial;">मुझ</span><span style="font-family: arial;"> </span><span style="font-family: arial;">अकेले</span><span style="font-family: arial;"> </span><span style="font-family: arial;">की</span><span style="font-family: arial;"> </span><span style="font-family: arial;">तमन्ना</span> <span style="font-family: arial;">का</span><span style="font-family: arial;"> </span><span style="font-family: arial;">बयान</span><span style="font-family: arial;"> </span><span style="font-family: arial;">नहीं</span><span style="font-family: arial;">. </span><span style="font-family: arial;">इससे</span><span style="font-family: arial;"> identify </span><span style="font-family: arial;">करने</span><span style="font-family: arial;"> </span><span style="font-family: arial;">वाले</span><span style="font-family: arial;"> </span><span style="font-family: arial;">बहुत</span><span style="font-family: arial;"> </span><span style="font-family: arial;">हैं</span><span style="font-family: arial;">. </span><span style="font-family: arial;">पढ़िये</span><span style="font-family: arial;"> </span><span style="font-family: arial;">एक</span><span style="font-family: arial;"> </span><span style="font-family: arial;">नितांत</span> <span style="font-family: arial;">निजी</span><span style="font-family: arial;"> </span><span style="font-family: arial;">टिप्पणी</span><span style="font-family: arial;"> </span><span style="font-family: arial;">और</span><span style="font-family: arial;"> </span><span style="font-family: arial;">उसके</span><span style="font-family: arial;"> </span><span style="font-family: arial;">बाद</span><span style="font-family: arial;"> </span><span style="font-family: arial;">इम्तियाज़</span><span style="font-family: arial;"> </span><span style="font-family: arial;">अली</span><span style="font-family: arial;"> </span><span style="font-family: arial;">होने</span><span style="font-family: arial;"> </span><span style="font-family: arial;">का</span><span style="font-family: arial;"> </span><span style="font-family: arial;">अर्थ</span><span style="font-family: arial;"> </span><span style="font-family: arial;">तलाशती</span> <span style="font-family: arial;">ये</span><span style="font-family: arial;"> </span><a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Jab_We_Met"><em style="font-family: arial;">&#8216;जब वी मेट&#8217;</em></a><span style="font-family: arial;"> </span><span style="font-family: arial;">की</span><span style="font-family: arial;"> </span><span style="font-style: italic; font-family: arial;">कसपिया</span><span style="font-family: arial;"> </span><span style="font-family: arial;">व्याख्या</span><span style="font-family: arial;">..!</span></div>
<p><span>&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;</span></p>
<div><span></p>
<blockquote><p><span style="font-family: georgia;">&#8220;दिल्ली</span><span style="font-family: georgia;"> </span><span style="font-family: georgia;">शहर</span><span style="font-family: georgia;"> </span><span style="font-family: georgia;">एक</span><span style="font-family: georgia;"> </span><span style="font-family: georgia;">परेशान</span><span style="font-family: georgia;"> </span><span style="font-family: georgia;">सा</span><span style="font-family: georgia;"> </span><span style="font-family: georgia;">ठिकाना</span><span style="font-family: georgia;"> </span><span style="font-family: georgia;">है</span><span style="font-family: georgia;"> </span><span style="font-family: georgia;">जो</span><span style="font-family: georgia;"> </span><span style="font-family: georgia;">सुकून</span><span style="font-family: georgia;"> </span><span style="font-family: georgia;">से</span><span style="font-family: georgia;"> </span><span style="font-family: georgia;">कोसों</span><span style="font-family: georgia;"> </span><span style="font-family: georgia;">दूर</span><span style="font-family: georgia;"> </span><span style="font-family: georgia;">है</span><span style="font-family: georgia;">. </span><span style="font-family: georgia;">दोस्त</span><span style="font-family: georgia;"> </span><span style="font-family: georgia;">भी</span><span style="font-family: georgia;"> </span><span style="font-family: georgia;">पास</span><span style="font-family: georgia;"> </span><span style="font-family: georgia;">नहीं</span><span style="font-family: georgia;">, </span><span style="font-family: georgia;">ना</span><span style="font-family: georgia;"> </span><span style="font-family: georgia;">सितारे</span><span style="font-family: georgia;">&#8230; </span><span style="font-family: georgia;">सब</span><span style="font-family: georgia;"> </span><span style="font-family: georgia;">एक</span><span style="font-family: georgia;"> </span><span style="font-family: georgia;">फासले</span><span style="font-family: georgia;"> </span><span style="font-family: georgia;">पर</span><span style="font-family: georgia;"> </span><span style="font-family: georgia;">रह</span><span style="font-family: georgia;"> </span><span style="font-family: georgia;">गया</span><span style="font-family: georgia;"> </span><span style="font-family: georgia;">है</span><span style="font-family: georgia;">. </span><span style="font-family: georgia;">कमरे</span><span style="font-family: georgia;"> </span><span style="font-family: georgia;">में</span><span style="font-family: georgia;"> </span><span style="font-family: georgia;">अकेले</span><span style="font-family: georgia;"> &#8216;</span><span style="font-family: georgia;">सारे</span><span style="font-family: georgia;"> </span><span style="font-family: georgia;">सुखन</span><span style="font-family: georgia;"> </span><span style="font-family: georgia;">हमारे</span><span style="font-family: georgia;">&#8216; </span><span style="font-family: georgia;">दोहराता</span><span style="font-family: georgia;"> </span><span style="font-family: georgia;">मैं</span><span style="font-family: georgia;"> </span><span style="font-family: georgia;">तनहा</span><span style="font-family: georgia;"> </span><span style="font-family: georgia;">हूँ</span><span style="font-family: georgia;">&#8230; </span><span style="font-family: georgia;">ना</span><span style="font-family: georgia;">, </span><span style="font-family: georgia;">अब</span><span style="font-family: georgia;"> </span><span style="font-family: georgia;">मैं</span><span style="font-family: georgia;"> </span><span style="font-family: georgia;">और</span><span style="font-family: georgia;"> </span><span style="font-family: georgia;">सलाह</span><span style="font-family: georgia;"> </span><span style="font-family: georgia;">नहीं</span><span style="font-family: georgia;"> </span><span style="font-family: georgia;">दे</span><span style="font-family: georgia;"> </span><span style="font-family: georgia;">सकता</span><span style="font-family: georgia;">. </span><span style="font-family: georgia;">अब</span><span style="font-family: georgia;"> </span><span style="font-family: georgia;">रंग</span><span style="font-family: georgia;"> </span><span style="font-family: georgia;">चाहिए</span><span style="font-family: georgia;">. </span><span style="font-family: georgia;">अब</span><span style="font-family: georgia;"> </span><span style="font-family: georgia;">दूसरों</span><span style="font-family: georgia;"> </span><span style="font-family: georgia;">की</span><span style="font-family: georgia;"> </span><span style="font-family: georgia;">प्रेम</span><span style="font-family: georgia;"> </span><span style="font-family: georgia;">कहानियाँ</span><span style="font-family: georgia;"> </span><span style="font-family: georgia;">सुनना</span><span style="font-family: georgia;"> </span><span style="font-family: georgia;">और</span><span style="font-family: georgia;"> </span><span style="font-family: georgia;">हल</span><span style="font-family: georgia;"> </span><span style="font-family: georgia;">तलाशना</span><span style="font-family: georgia;"> </span><span style="font-family: georgia;">काफी</span><span style="font-family: georgia;"> </span><span style="font-family: georgia;">हुआ</span><span style="font-family: georgia;">. </span><span style="font-family: georgia;">हाँ</span><span style="font-family: georgia;">.. </span><span style="font-family: georgia;">मुझे</span><span style="font-family: georgia;"> </span><span style="font-family: georgia;">संगीत</span><span style="font-family: georgia;"> </span><span style="font-family: georgia;">कुछ</span><span style="font-family: georgia;"> </span><span style="font-family: georgia;">अधूरा</span><span style="font-family: georgia;"> </span><span style="font-family: georgia;">सा</span><span style="font-family: georgia;"> </span><span style="font-family: georgia;">लग</span><span style="font-family: georgia;"> </span><span style="font-family: georgia;">रहा</span><span style="font-family: georgia;"> </span><span style="font-family: georgia;">है</span><span style="font-family: georgia;">. </span><span style="font-family: georgia;">धुन</span><span style="font-family: georgia;"> </span><span style="font-family: georgia;">तबतक</span><span style="font-family: georgia;"> </span><span style="font-family: georgia;">अधूरी</span><span style="font-family: georgia;"> </span><span style="font-family: georgia;">है</span><span style="font-family: georgia;"> </span><span style="font-family: georgia;">जबतक</span><span style="font-family: georgia;"> </span><span style="font-family: georgia;">उसे</span><span style="font-family: georgia;"> </span><span style="font-family: georgia;">बोल</span><span style="font-family: georgia;"> </span><span style="font-family: georgia;">न</span><span style="font-family: georgia;"> </span><span style="font-family: georgia;">मिलें</span><span style="font-family: georgia;">. </span><span style="font-family: georgia;">हाँ</span><span style="font-family: georgia;">.. </span><span style="font-family: georgia;">मेरा</span><span style="font-family: georgia;"> </span><span style="font-family: georgia;">तराना</span><span style="font-family: georgia;"> </span><span style="font-family: georgia;">अधूरा</span><span style="font-family: georgia;"> </span><span style="font-family: georgia;">है</span><span style="font-family: georgia;">. </span><span style="font-family: georgia;">हाँ</span><span style="font-family: georgia;">.. </span><span style="font-family: georgia;">अब</span><span style="font-family: georgia;"> </span><span style="font-family: georgia;">मुझे</span><span><br />
=&#8221;font-family: georgia;&#8221;&gt; </span><span style="font-family: georgia;">मेरी</span><span style="font-family: georgia;"> </span><span style="font-family: georgia;">जिन्दगी</span><span style="font-family: georgia;"> </span><span style="font-family: georgia;">में</span><span style="font-family: georgia;"> </span><span style="font-family: georgia;">एक</span><span style="font-family: georgia;"> </span><span style="font-style: italic; font-family: georgia;">गीत</span><span style="font-family: georgia;"> </span><span style="font-family: georgia;">चाहिए</span><span style="font-family: georgia;">..&#8221;</span></p></blockquote>
<p></span></div>
<p><span>&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;..</span></p>
<div style="font-family: georgia;">क्या आपने कभी किसी कहानी से प्रेम किया है? पूरी शिद्दत से किसी कविता को चाहा है? किसी उपन्यास को दिल से लगाकर रातें काटी हैं? <span style="font-weight: bold;">एक</span><span style="font-weight: bold;"> </span><span style="font-weight: bold;">प्रेम</span><span style="font-weight: bold;"> </span><span style="font-weight: bold;">कहानी</span><span style="font-weight: bold;">&#8230; </span><span style="font-weight: bold;">साधारण</span><span style="font-weight: bold;"> </span><span style="font-weight: bold;">सी</span><span style="font-weight: bold;">&#8230; </span><span style="font-weight: bold;">एक</span><span style="font-weight: bold;"> </span><span style="font-weight: bold;">लड़का</span><span style="font-weight: bold;">, </span><span style="font-weight: bold;">एक</span><span style="font-weight: bold;"> </span><span style="font-weight: bold;">लड़की</span><span style="font-weight: bold;"> </span><span style="font-weight: bold;">और</span><span style="font-weight: bold;"> </span><span style="font-weight: bold;">बहुत</span><span style="font-weight: bold;"> </span><span style="font-weight: bold;">सारे</span><span style="font-weight: bold;"> </span><span style="font-weight: bold;">संशय</span> <span style="font-weight: bold;">वाली</span><span style="font-weight: bold;">.</span> क्या कभी आप पर ऐसी छायी है कि उसका जादू आपके हर काम को अपने आगोश में ले ले? आप जब भी कोई नयी कहानी सुनाने बैठें, वही प्रेम कहानी रूप बदलकर आपकी जुबाँ पर आ जाए?<strong></strong></p>
<p><strong>इम्तियाज़ अली</strong> ने एक प्रेम कहानी से ऐसा ही घनघोर प्रेम किया है. पहले एक टेलीफिल्म (स्टार के लिए &#8216;बेस्टसेलर&#8217; में). फ़िर <span style="font-weight: bold;">अभय</span><span style="font-weight: bold;"> </span><span style="font-weight: bold;">देओल</span><span style="font-weight: bold;">- </span><span style="font-weight: bold;">आयशा</span><span style="font-weight: bold;"> </span><span style="font-weight: bold;">टाकिया</span><span style="font-weight: bold;"> </span>के साथ पहली फ़िल्म &#8216;<strong>सोचा ना था&#8217;</strong>. उसके बाद <strong>&#8216;आहिस्ता-आहिस्ता&#8217;</strong> जो उस पुरानी टेलीफिल्म का ही रीमेक थी (इम्तियाज़ ने कहानी/स्क्रीनप्ले किया था). और अब <strong>&#8216;जब वी मेट&#8217;</strong> आई है, उनकी दूसरी फ़िल्म. <span style="font-weight: bold;">शाहिद</span><span style="font-weight: bold;">-</span><span style="font-weight: bold;">करीना</span><span style="font-weight: bold;"> </span>के साथ. एक ही प्रेम कहानी रूप बदल-बदलकर&#8230; एक साधारण सी प्रेम कहानी, जिसमें एक लड़का है, एक लड़की है लेकिन &#8220;love at first sight&#8221; नहीं है. (तीनो फिल्में इसका उदाहरण हैं). शुरुआत में तो लड़के या लड़की को प्रेम भी किसी और से है (आप &#8216;सोचा ना था&#8217; की कैरेल, &#8216;आहिस्ता-आहिस्ता&#8217; के धीरज और &#8216;जब वी मेट&#8217; के अंशुमान को याद कर सकते हैं.) और फिर एक सफर है साथ&#8230; कभी गोवा, कभी दिल्ली और कभी रतलाम से भटिंडा तक! जिन्दगी का सफर.. कभी कंटीले रास्ते, कभी सुहानी पगडंडियाँ. याद <span>आता</span> है <span style="font-weight: bold;">गोपी</span><span style="font-weight: bold;">-</span><span style="font-weight: bold;">कृष्ण</span><span style="font-weight: bold;">/</span><span style="font-weight: bold;">राधा</span><span style="font-weight: bold;">-</span><span style="font-weight: bold;">कृष्ण</span><span style="font-weight: bold;"> </span><span style="font-weight: bold;">प्रेम</span><span style="font-weight: bold;"> </span>जिसको <span style="font-weight: bold;">सूरदास</span> ने<span style="font-weight: bold;"> </span><span style="font-weight: bold;">साहचर्य</span><span style="font-weight: bold;"> </span><span style="font-weight: bold;">का</span><span style="font-weight: bold;"> </span><span style="font-weight: bold;">प्रेम</span> बनाकर प्रस्तुत किया. यह पहली नज़र का प्यार नहीं, यह तो रोज की दिनचर्या में पलता-बढ़ता है. रोज की अटखेलियाँ इसे सहलाती है. चुहल बात को आगे बढाती है और <span style="font-weight: bold;">पता</span><span style="font-weight: bold;"> </span><span style="font-weight: bold;">ही</span><span style="font-weight: bold;"> </span><span style="font-weight: bold;">नहीं</span><span style="font-weight: bold;"> </span><span style="font-weight: bold;">चलता</span><span style="font-weight: bold;"> </span><span style="font-weight: bold;">कि</span><span style="font-weight: bold;"> </span><span style="font-weight: bold;">कब</span><span style="font-weight: bold;"> </span><span style="font-weight: bold;">प्यार</span><span style="font-weight: bold;"> </span><span style="font-weight: bold;">हो</span><span style="font-weight: bold;"> </span><span style="font-weight: bold;">जाता</span><span style="font-weight: bold;"> </span><span style="font-weight: bold;">है</span><span style="font-weight: bold;">.</span></p>
<p>और फ़िर हमेशा.. एक <em><strong>भाग जाने का सुर्रा</strong></em> है! संशय मूल थीम है और कहानी हमेशा <em><strong>&#8216;या की&#8217;</strong></em> टोन बनाए रखती है. यह <em>&#8216;कसपिया&#8217;</em> संशय है जो &#8216;ये प्यार है या ये प्यार है&#8217; से उपजता है. अतार्किकता हावी रहती है और कहानी हमेशा <em>&#8220;जब आप प्यार में होते हो तो कुछ सही-ग़लत नहीं होता&#8221;</em> जैसे &#8216;वेद-वाक्य&#8217; देती चलती है. मैं शर्त लगाकर कह सकता हूँ कि इम्तियाज़ अपने तकिये के सिरहाने <strong>&#8216;कसप&#8217;</strong> रखकर सोते होंगे!</p>
<p>ये तो थी इम्तियाज़ की प्रेम कहानी एक प्रेम-कहानी से उधार! और अब अपनी और फ़िल्म की बात. तो मुझे <span style="font-style: italic;">गीत</span> से प्यार हो गया. ऊपर का कथन टाइम-पास बकवास नहीं एक स्वीकारोक्ति था. और <span style="font-style: italic;">गीत</span> है ही ऐसी की कोई भी उसपर मर मिटे! करने से पहले सोचा नहीं, जो सोचा वो कभी किया नहीं..<span style="font-weight: bold;"> that&#8217;s geet for U!</span> कुछ कमाल के संवाद नज़र हैं&#8230; नायिका नायक को कहती है, <em>&#8220;तुम मेरी बहन के साथ भाग जाओ.&#8221;</em> या <em>&#8220;मैं अपनी फेवरेट हूँ!&#8221;.</em> तमाम बातों के बावजूद नायिका का भिड़ जाने का अंदाज.. याद रहेगा. तो प्रेम कहानियो के सुखद अंत तलाशना बंद कर <em style="font-weight: bold;">&#8216;जब वी मेट&#8217;</em><span style="font-weight: bold;"> </span>को इस  नज़रिये से परखें. खासकर <span style="font-weight: bold;">इम्तियाज़</span> द्वारा बनाये इसी <span style="font-weight: bold;">प्रेम</span><span style="font-weight: bold;"> </span><span style="font-weight: bold;">कहानी</span> के अन्य रूपों के सामने रखकर <em style="font-weight: bold;">जब वी मेट</em><span style="font-weight: bold;"> </span>का अर्थ करें. नए अर्थ अपने आप खुलने लगेंगे.</div>
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		<title>अच्छर मन को छरै बहुरि अच्छर ही भावै</title>
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		<pubDate>Tue, 19 Feb 2008 22:22:00 +0000</pubDate>
		<dc:creator>मिहिर</dc:creator>
				<category><![CDATA[Literature]]></category>
		<category><![CDATA[Memoir]]></category>

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		<description><![CDATA[ रवीश ने अपने ब्लॉग पर यह चर्चा शुरू की है कि किसने पुस्तक मेले से क्या खरीदा यह शेयर किया जाए. तो मुझे लगा कि &#8216;सनद रहे और वक्त ज़रूरत काम आए&#8217; की परम्परा पर चलते हुए मुझे भी यह &#8216;पुण्य कर्म&#8217; कर ही देना चाहिए! मेरे लिए यह तीसरा पुस्तक मेला था. दिल्ली [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p><a href="http://bp2.blogger.com/_oWd-c4uUHz4/R7tS57LyKWI/AAAAAAAAADc/-sTj0ahv2Aw/s1600-h/books.jpg"><img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5168816152430913890" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; CURSOR: hand" src="http://bp2.blogger.com/_oWd-c4uUHz4/R7tS57LyKWI/AAAAAAAAADc/-sTj0ahv2Aw/s200/books.jpg" border="0" alt="" /></a> <span>रवीश</span> ने अपने ब्लॉग पर यह चर्चा शुरू की है कि किसने पुस्तक मेले से क्या खरीदा यह शेयर किया जाए. तो मुझे लगा कि &#8216;सनद रहे और वक्त ज़रूरत काम आए&#8217; की परम्परा पर चलते हुए मुझे भी यह &#8216;पुण्य कर्म&#8217; कर ही देना चाहिए! मेरे लिए यह तीसरा पुस्तक मेला था. दिल्ली आने के बाद दूसरा. पहली बार जब दादा,भाभी के साथ दिल्ली पुस्तक मेले में आया था उन दिनों उदयपुर में बी. ए. में पढ़ा करता था. दूसरा मेला मेरे दिल्ली रहते हुआ और तब से मैं दादा,भाभी के लिए दिल्ली में होस्ट हूँ. अब मैं कह सकता हूँ कि मैंने अपने 22 साल के जीवन में चार क्रिकेट वर्ल्डकप और तीन विश्व पुस्तकमेले देखे हैं.</p>
<div><strong>Delhi Metropolitan:The Meking of an Unlikely City. Ranjana Sengupta. Penguin Books.</strong></div>
<div>पिछले दिनों अपने सेमिनार के सिलसिले में मैंने <em>&#8216;खोंसला का घोसला&#8217;</em> में मध्यवर्ग, शहरीकरण और लिविंग स्पेस की संरचना पर काम किया. यह फ़िल्म दिल्ली को अपना आधार शहर बनाती है और इस शहर की बदलती सत्ता संरचना का एक कमाल का पाठ रचती है. एक पंक्ति में कहूं तो यह फ़िल्म एक मध्यमवर्गीय व्यक्ति की &#8216;यमुना पार&#8217; या &#8216;पुरानी दिल्ली/ दिल्ली 6&#8242; से निकलकर &#8216;साऊथ दिल्ली&#8217; वाला बनने की तमन्ना का मुकम्मल बयान है. तमाम चिन्ह इस पाठ से निकलते हैं जिनमें से कुछ को मैंने अपने पर्चे में पकड़ने की कोशिश की. तो स्वाभाविक था कि मेले में दिल्ली पर आया एक नया अध्ययन देखकर मेरा मन मचल जाए. और दादा ने कहते ही किताब दिलवा दी.</div>
<div><strong>Anna Karenina. Lev Tolstoy. Raduga Publications.</strong></div>
<div>हाँ मैंने अभी तक अन्ना केरेनिना नहीं पढ़ी है. लेकिन इसे खरीदने का केवल यही कारण नहीं था. करीब तीन साल पहले मैंने अपना पहला लेख (प्रकाशित) जो लिखा था उसका विषय बचपन में पढ़ी रूसी कहानियों की याद था. दोस्त कहते हैं कि बहुत nostalgic लेख था. शायद वो सही कहते हैं. आज भी मुझे पुराने <em>प्रगति प्रकाशन/ रादुगा प्रकाशन</em> से एक लगाव सा है. वो मुझे मेरा बचपन याद दिलाते हैं जो बहुत खूबसूरत था. (तब नहीं लगता था, आज लगता है.) तो मैं ना केवल अन्ना कैरेनिना पढ़ना चाहता था बल्कि उसे उसी पुराने रूसी अनुवाद वाले कलेवर में पढ़ना चाहता था. किस्मत कि वो मुझे PPH पर आसानी से मिल गया.</div>
<div><strong>साफ माथे का समाज. अनुपम मिश्र. पेंग्विन बुक्स.</strong></div>
<div>अनुपम मिश्र की <em>&#8216;आज भी खरे हैं तालाब&#8217;</em> एक चर्चित किताब रही है. मैंने इनके बारे में तब ज़्यादा जाना जब मैं MA में गाँधी पर बनी फिल्मों पर एक शोध कर रहा था. हालांकि अभी भी पढ़ा नहीं है लेकिन दादा का कहना है कि मुझे इन्हें पढ़ना चाहिए. और फ़िर जीतू भैया की वजह से हमें पेंग्विन पर ख़ास डिस्काउंट भी मिल रहा था. तो ऐसे में यह खरीद बिल्कुल मुफ़ीद रही!</div>
<div><strong>A Roland Barthes Reader. Edi. Susan Sontag. Vintage.</strong></div>
<div>सेमिनार पेपर के लिए संरचनावाद पढ़ा (द्वितीयक स्रोत से) और फ़िर लिखा. संदर्भ पर विवाद हो गया. और मैं मूल देखते ही ले आया. अब मूल पढने की कोशिश करूँगा और सामने वाले को विवाद का कोई मौका ही नहीं दूंगा. वैसे भी मुझे आजकल संरचनावादियों में रोलां बार्थ सबसे ज़्यादा आकर्षित कर रहे हैं.</div>
<div><strong>अम्बेडकर साहित्य. सभी गौतम बुक सेंटर से प्रकाशित</strong>&#8230;</div>
<div><strong>हिन्दू धर्मं की रिडल.</strong></div>
<div><strong>अछूत कौन और कैसे.</strong></div>
<div><strong>जाति भेद का उच्छेद.</strong></div>
<div><strong>शूद्रों की खोज.</strong></div>
<div><strong>बुद्ध और उनका धम्म.</strong></div>
<div>इसमें अब क्या शक है के अम्बेडकर को पढ़ना बहुत ज़रूरी है. चाहता तो था कि पूरा समग्र खरीद लिया जाए लेकिन अभी इतने से ही संतोष कर लिया है. दादा भी ले जाना चाहता था. लेकिन अभी पहले मुझे मिल गया है.</div>
<div><strong>A World To Win. Essays on Communist Manifesto. Leftword.</strong></div>
<div>लेफ्टवर्ड वाले आधी कीमत पर बेच रहे थे. केवल चालीस रूपये!</div>
<div>याद के लिए:- यह किताब<br />
कभी मैंने पापा को गिफ्ट की थी.</div>
<div><strong>निबंधों की दुनिया. विजयदेव नारायण साही. वाणी प्रकाशन.</strong></div>
<div>दोस्तों हिन्दी में M.Phil. कर रहा हूँ. पढ़ना पढता है सारा कुछ. अब तो पर्चे नज़दीक आ रहे हैं.</div>
<div><strong>Fantasies of a Bollywood Love Thief. Stephen Alter. Harper Collins.</strong></div>
<div>मेरी सबसे पसंदीदा ख़रीद. यह किताब &#8216;<em>ओमकारा</em>&#8216; के बनने के दौरान लिखी गई है लेकिन इसमें हिन्दुस्तानी सिनेमा से जुड़े और कई मज़ेदार किस्से भी हैं. रविकांत ने इसका ज़िक्र कर तिल्ली लगाई थी सबसे पहले. उसका ही नतीजा है यह ख़रीद.</div>
<div><strong>हाँ, मैंने जिंदगी जी है. पाब्लो नेरुदा. अनुवादक मनीषा तनेजा. कांफ्लुएंस इंटरनेशनल.</strong></div>
<div>पाब्लो नेरुदा की आत्मकथा का सीधा स्पेनिश से हिन्दी अनुवाद. मनीषा का किया मर्ख्वेज़ का अनुवाद <em>&#8216;एकाकीपन के सौ साल&#8217; </em>आपने पिछले दिनों देखा होगा. मैंने उस उपन्यास का सौम्या सुरभि गुप्ता वाला अनुवाद पढ़ा था. तो मैं मनीषा तनेजा का किया यह पहला अनुवाद पढूँगा. देखें इसका नंबर कब आता है.</div>
<div><strong>सिनेमा के शिखर. प्रदीप तिवारी. संवाद प्रकाशन.</strong></div>
<div>विश्व सिनेमा के चर्चित फिल्मकारों के जीवन और सृजन पर लेख हैं. मुझे एक परिचयात्मक जानकारी मिलने की उम्मीद है.</div>
<div><strong>अपनी धरती, अपना आकाश. विजय शर्मा. संवाद प्रकाशन.</strong></div>
<div>एक और परिचयात्मक किताब. नोबल विजेताओं के जीवन/विचार/रचना पर केंद्रित.</div>
<div><strong>हंसने वाला कुत्ता. सत्यजित राय. प्रकाशन विभाग.</strong></div>
<div>सत्यजित राय बचपन से मेरे प्रिय कहानीकार रहे हैं. उनकी कहानियाँ जब भी कहीं हिन्दी में मिल जाएं, मैं नहीं छोड़ता. और जो दोस्त आजकल <em>&#8216;तारे ज़मीन पर&#8217;</em> देखकर बौराए हुए हैं उन्हें मेरी सलाह है कि सत्यजित राय की कहानी <em>&#8216;सदानंद की छोटी दुनिया&#8217;</em> एकबार ढूंढकर/खोजकर/तलाशकर ज़रूर पढ़ें.</div>
<div>जो ख़रीदा था और उसमें से जो उदयपुर जाने से बच गया, मेरे पास रह गया वो सब बता दिया है. अब यह मत पूछियेगा कि क्या पढ़ा? कितना पढ़ा? कब पढ़ा? 2007 में शुरू किया उपन्यास <em>&#8216;काइट रनर&#8217;</em> तो अभी तक जारी है. अब और क्या कहूँ. फ़िर भी उम्मीद है और उम्मीद पर ही दुनिया कायम है! सलाम!</div>
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		<title>बात निकलेगी तो फिर दूर तलक जायेगी</title>
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		<pubDate>Fri, 01 Feb 2008 10:17:00 +0000</pubDate>
		<dc:creator>मिहिर</dc:creator>
				<category><![CDATA[Literature]]></category>
		<category><![CDATA[Memoir]]></category>

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मीडियानगर 03 पर बातचीत

फ़रवरी की शाम छ: बजे,
ऑक्सफ़र्ड बुक स्टोर, कनॉट प्लेस, दिल्ली.
फिज़ाओं में क्या था:- वक्ताओं के पीछे एक नारंगी रंग की दीवार थी जिसपर बहुत सारे शब्द बिखरे हुए थे. ये मुझे &#8216;तारे ज़मीन पर&#8217; के शुरूआती दृश्य की याद दिला रहा था जिसमें हमारा कुल-ज़मा लिखा पढ़ा सब कुछ एकसाथ बरसता सा [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p><a href="http://bp3.blogger.com/_oWd-c4uUHz4/R6OSVy3zC-I/AAAAAAAAADU/EhhwNM8VWds/s1600-h/medianagar03.jpg"><img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5162130501027433442" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; CURSOR: hand" src="http://bp3.blogger.com/_oWd-c4uUHz4/R6OSVy3zC-I/AAAAAAAAADU/EhhwNM8VWds/s200/medianagar03.jpg" border="0" alt="" /></a></p>
<div><strong>मीडियानगर 03 पर बातचीत<br />
</strong></div>
<div><strong>फ़रवरी की शाम छ: बजे,</strong></div>
<div><strong>ऑक्सफ़र्ड बुक स्टोर, कनॉट प्लेस, दिल्ली.</strong></p>
<p><strong>फिज़ाओं में क्या था:-</strong> वक्ताओं के पीछे एक नारंगी रंग की दीवार थी जिसपर बहुत सारे शब्द बिखरे हुए थे. ये मुझे &#8216;तारे ज़मीन पर&#8217; के शुरूआती दृश्य की याद दिला रहा था जिसमें हमारा कुल-ज़मा लिखा पढ़ा सब कुछ एकसाथ बरसता सा लगता है. हाँ, बीच में बड़े-बड़े अक्षरों में लिखा था vernacular. कई बार ये बेतरतीब चुनाव की प्रणाली भी कितने अर्थ व्यंजित करने लगती है ना. वैसे मानने वाले ये भी मान सकते हैं कि वो &#8216;vernacular&#8217; वहाँ यूं ही नहीं था. क्योंकि हर बेतरतीब नमूने के पीछे एक नजरिया होता है.<br />
पार्श्व में बार-बार NDTV के नये शाहकार &#8216;रामायण&#8217; की ध्वनि &#8220;जय श्री राम&#8221; गूँज उठती थी और सामने बैठे NDTV के अविनाश सिर्फ़ अपनी मौजूदगी से ही एक कमाल का विरोधाभास पैदा कर रहे थे. अब जब किसी संवाद का माहौल ही ऐसा कोलाजनुमा हो गया हो तो बातचीत को तो उस तरफ़ जाना ही हुआ!</p>
<p><strong>बात-चीत:-</strong> अनुवाद पर हुई बातों को ज़रा देर के लिए छोड़ दें तो आनंद प्रधान की बातों से निकली बात ही आगे बढ़ती गई. बात ठीक थी और सवाल भी कि &#8220;आज का हमारा मीडिया आखिर जा कहाँ रहा है?&#8221; लेकिन मुझे बार बार लगता रहा कि जो छोटी पहलकदमियाँ इसके बरक्स खड़ी होंगी उनपर बात होती तो कैसा होता. लेकिन इस &#8216;यूं होता तो क्या होता&#8217; का अब क्या जवाब&#8230;<br />
जैसे ये भी एक सवाल है कि हमें वहाँ ये बात करने की बजाए कि mainstream media क्या और क्यों छाप रहा है ये बात करनी चाहिए थी कि medianagar में क्या छपा? सीधा कहूँ तो हमें ज़रूर पहले दोनों वक्ताओं राहुल और देबश्री के लिखे पर बात करनी चाहिए थी जो हमनें नहीं की. &#8216;मल्लिका सेहरावत&#8217; और &#8216;राखी सावंत&#8217; के कारनामों को सिनेमा की ख़बर कहकर दिखाते मीडिया को देबश्री का मुम्बई सिनेमा पर किया काम जवाब हो सकता है. या कम से कम एक विकल्प तो हो ही सकता है. तो उसपर बात करनी तो रह ही गयी. और मैं भी बात ना करने वालों में से एक था तो ये इल्जाम मुझपर भी है. उम्मीद है कि आगे होने वाली बातचीत इस मुद्दे को साध लेंगी.</p>
<p><strong>ठोस:-</strong> संजीव के तरकश में कई पैने तीर थे जो उन्होंने चलाये. मुझे जो बात सबसे ज्यादा सोचने वाली लगी उसका ज़िक्र कर रहा हूँ. इसलिए भी कि इसका ठीक जवाब मुझे भी नहीं मालूम. उन्होंने कहा कि पूरे अंक की भाषा का स्वाद एक जैसा है. ये मानते हुए कि ये स्वाद बहुत स्वादिष्ट है ये भी मानना पड़ेगा कि एकरसता कभी अच्छी नहीं लगती. उनका कहना था कि ऐसा लगता है जैसे सारा अनुवाद एक ही व्यक्ति ने कर दिया हो. अब मैं इस बहस में नहीं जा रहा कि उनका ये आकलन medianagar के बारे में कितना सही है. मेरा सवाल ज्यादा बड़ा है जो और दिमागों में भी आया होगा. हर पत्रिका समय के साथ अपना एक ख़ास कलेवर/एक ख़ास आकार लेती है. यही उसकी पहचान बनाता है. अब पहला सवाल तो ये है कि क्या भाषा भी इस पहचान का एक हिस्सा है? और दूसरा ये कि इसका एक ख़ास स्वरूप में ढलकर पत्रिका की पहचान बनना ज्यादा ठीक है या भाषागत वैविध्य ज्यादा ज़रूरी है? इस सवाल को यूं देखिये कि क्या &#8216;पहल&#8217; &#8216;तद्भव&#8217; &#8216;हंस&#8217; में भी भाषागत एकरसता दिखती है? और अगर हाँ तो वो क्यों और कितनी ठीक है?</p>
<p><strong>दिल की बात:-</strong> मेरे लिए तो वो एक निजी कोलाज था. मेरे दो भूतपूर्व गुरु मुझे मेरे &#8216;रंग दे बसंती&#8217; ( अर्थात &#8216;क्या करें, क्या ना करें&#8217; वाले दिन) दिनों की याद दिला रहे थे. आनंद प्रधान IIMC में बीते एक महीने की और देवेन्द्र चौबे JNU की जागती रातों की याद ताज़ा कर गए. और इस तस्वीर को मुकम्मल करने अचानक पीछे खड़ा आदित्य राज कौल दिखा (शायद किताब ख़रीदने आया था) और उसके तुरंत बाद राहुल ने बोलते हुए शिवम्</div>
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		<title>प्रेम के पक्ष में&#8230;</title>
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		<pubDate>Sat, 24 Nov 2007 02:47:00 +0000</pubDate>
		<dc:creator>मिहिर</dc:creator>
				<category><![CDATA[Literature]]></category>
		<category><![CDATA[Memoir]]></category>
		<category><![CDATA[politics]]></category>

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		<description><![CDATA[साल 1986. राजीव गाँधी ने ये दाँव खेला था. मुस्लिम कट्टरपंथियों को फायदा पहुँचाने के लिये शाहबानो केस में फैसला पलटा गया और हिंदु कट्टरपंथियों को अयोध्या में ताला खोल चुप कराया गया. कुछ दोस्त शाहबानो केस को मुस्लिम तुष्टीकरण कहते हैं और ये भूल जाते हैं कि आधी मुस्लिम आबादी उन महिलाओं की है [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p><strong>साल 1986.</strong> राजीव गाँधी ने ये दाँव खेला था. मुस्लिम कट्टरपंथियों को फायदा पहुँचाने के लिये शाहबानो केस में फैसला पलटा गया और हिंदु कट्टरपंथियों को अयोध्या में ताला खोल चुप कराया गया. कुछ दोस्त शाहबानो केस को मुस्लिम तुष्टीकरण कहते हैं और ये भूल जाते हैं कि आधी मुस्लिम आबादी उन महिलाओं की है जिनका हक़ छीना गया. और सच शायद यही है. हर समुदाय में वो महिला ही तो है जो हर बार इस प्रकार के &#8216;तुष्टीकरण&#8217; के नतीजे भुगतती है.<br />
<strong>……</strong><br />
<strong>साल 2007.</strong> प. बंगाल में CPM की सरकार आलोचना के घेरे में है. नंदीग्राम में जो हुआ और जो हो रहा है वह हमारी आँखें खोलने के लिये काफ़ी है. हम सभी जो अपने आपको मार्क्सवाद से किसी ना किसी तरह जुडा पाते हैं. लेकिन कुछ और भी है जिसे यूँ नहीं छोड़ा जा सकता…<br />
पहले नंदीग्राम और फ़िर रिज़वान का मामला, कहा गया कि CPM का &#8216;मुस्लिम वोट बैंक&#8217; टूट रहा है. और फ़िर कल कलकत्ता में हुई हिंसा.. और आज रात मैं TV पर देख रहा हूँ कि तस्लीमा को रातोंरात कलकत्ता छोडना पडा है. शायद हिंसा की आशंका.. शायद सरकार की सलाह पर.. पता नहीं. एक बार फ़िर एक महिला ने &#8216;तुष्टीकरण&#8217; का नतीजा भुगता है. शायद अब CPM का &#8216;मुस्लिम वोट बैंक&#8217; बच जाये&#8230;<br />
मैं व्यक्तिगत रूप से तसलीमा के लेखन का प्रशंसक नहीं रहा हूँ. लेकिन &#8220;हमारे समाज में हर व्यक्ति को अपनी बात कहने का हक़ है&#8221; इसके पक्ष में जम के खडा हूँ. और अपनी तरह से जीने का हक़ है चाहे वो सबको रास आये या न आये. और हमारे समाज को इतना संवेदनशील तो होना ही चाहिये कि वो तसलीमा को भी उतनी ही जगह (space) दे जितना मुझे मिली है. और ये लडाई उसी <strong><em>&#8216;Room for one&#8217;s own&#8217; </em></strong>के लिये है.<br />
<strong>……</strong><br />
तसलीमा का कलकत्ता से जाना सिर्फ एक घटना भर नहीं है. ये एक प्रेमी-प्रेमिका का बिछुडना है. तसलीमा ने कलकत्ता से प्रेम किया है. वो उसके लिये तड्पी हैं, उसे उलाहना दिया है, उससे रूठी हैं, उसे मनाया भी है. वो उन्हें अपने घर की याद जो दिलाता है. बीता बचपन, गुज़रा साथी, छूटा दोस्त…<br />
पढिये ये कविता &#8216;कलकत्ता इस बार&#8230;&#8217; जो उन्होंनें हार्वर्ड विश्वविद्यालय में रहते हुये लिखी थी. भूमिका में वे लिखती हैं, <em>&#8220;चार्ल्स नदी के पार, केम्ब्रिज के चारों तरफ़ जब बर्फ़ ही बर्फ़ बिछी होती है और मेरी शीतार्त देह जमकर, लगभग पथराई होती है, मैं आधे सच और आधे सपने से, कोई प्रेमी निकाल लेती हूँ और अपने प्यार को तपिश देती हूँ, अपने को ज़िन्दा रखती हूँ. इस तरह समूचे मौसम की नि:संगता में, मैं अपने को फिर ज़िन्दा कर लेती हूँ.&#8221;<br />
</em><br />
आज इस कविता की प्रासंगिकता अचानक बढ गयी है&#8230;</p>
<p><em><strong>कलकता इस बार&#8230;</strong><br />
इस बार कलकता ने मुझे काफी कुछ दिया,<br />
लानत-मलामत; ताने-फिकरे,<br />
छि: छि:, धिक्कार,<br />
निषेधाञा<br />
चूना-कालिख, जूतम्-पजार<br />
लेकिन कलकत्ते ने दिया है मुझे गुपचुप और भी बहुत कुछ,<br />
जयिता की छलछलायी-पनीली आँखें<br />
रीता-पारमीता की मुग्धता<br />
विराट एक आसमान, सौंपा विराटी ने<br />
2 नम्बर, रवीन्द्र-पथ के घर का खुला बरामदा,<br />
आसमान नहीं तो और क्या है?<br />
कलकत्ते ने भर दी हैं मेरी सुबहें, लाल-सुर्ख गुलाबों से,<br />
मेरी शामों की उन्मुक्त वेणी, छितरा दी हवा में.<br />
हौले से छू लिया मेरी शामों का चिबुक,<br />
इस बार कलकत्ते ने मुझे प्यार किया खूब-खूब.<br />
सबको दिखा-दिखाकर, चार ही दिनों में चुम्बन लिए चार करोड्.<br />
कभी-कभी कलकत्ता बन जाता है, बिल्कुल सगी माँ जैसा,<br />
प्यार करता है, लेकिन नहीं कहता, एक भी बार,<br />
कि वह प्यार करता है.<br />
चूँकि करता है प्यार, शायद इसीलिये रटती रहती हूँ-कलकत्ता! कलकत्ता!<br />
अब अगर न भी करे प्यार, भले दुरदुराकर भगा दे<br />
तब भी कलकत्ता का आँचल थामे, खडी रहूँगी, बेअदब लड्की की तरह!<br />
अगर धकियाकर हटा भी दे, तो भी मेरे कदम नहीं होंगे टस से मस!<br />
क्यों?<br />
प्यार करना क्या अकेले वही जानता है, मैं नही?<br />
</em><strong></strong><br />
<strong>-तसलीमा नसरीन<br />
&#8216;कुछ पल साथ रहो&#8230;&#8217; से (<br />
अनुवाद- सुशील गुप्ता)</strong></p>
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