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	<title>आवारा हूँ... &#187; Literature</title>
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	<description>सिनेमा, साहित्य, खेल, संगीत, एक युवा शहर धड़कता है यहाँ...</description>
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		<title>बंजारा नमक लाया</title>
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		<pubDate>Sat, 06 Feb 2010 09:14:03 +0000</pubDate>
		<dc:creator>मिहिर</dc:creator>
				<category><![CDATA[Literature]]></category>
		<category><![CDATA[कविता के देस में]]></category>
		<category><![CDATA[गाँव]]></category>
		<category><![CDATA[चकमक]]></category>
		<category><![CDATA[सत्ता]]></category>

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		<description><![CDATA[
प्रभात की कविताओं की नई किताब ’बंजारा नमक लाया’ आई है.

प्रभात हमारा दोस्त है. प्रभात की कविताएं हमारी साँझी थाती हैं. हम सबके लिए ख़ास हैं. कल पुस्तक मेले में ’एकलव्य’ पर उसकी नई किताब मिली तो मैं चहक उठा. आप भी पढ़ें इन कविताओं को, इनका स्वाद लें. मैं प्रभात की उन कविताओं को [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<blockquote>
<p style="text-align: justify;"><strong>प्रभात</strong> की कविताओं की नई किताब <strong>’बंजारा नमक लाया’</strong> आई है.</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;"><strong><a href="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2010/02/IMG_26562.jpg"><img class="alignright size-full wp-image-368" title="IMG_2656" src="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2010/02/IMG_26562.jpg" alt="IMG_2656" width="306" height="501" /></a>प्रभात </strong>हमारा दोस्त है.<strong> प्रभात</strong> की कविताएं हमारी साँझी थाती हैं. हम सबके लिए ख़ास हैं. कल पुस्तक मेले में <strong>’एकलव्य’</strong> पर उसकी नई किताब मिली तो मैं चहक उठा. आप भी पढ़ें इन कविताओं को, इनका स्वाद लें. मैं <strong>प्रभात</strong> की उन कविताओं को ख़ास नोटिस करता हूँ जहाँ वह हमारे साहित्य में ’क्रूर, हत्यारे शहर’ के बरक्स गाँव की रूमानी लेकिन एकतरफ़ा बनती छवि को तोड़ते हैं. यहाँ मेरी पसंदीदा कविता <strong>’मैंने तो सदा ही मुँह की खायी तेरे गाँव में’</strong> आपके सामने है. उनका गाँव हिन्दुस्तान का जीता-जागता गाँव है, अपनी तमाम बेइंसाफ़ियों के साथ. लेकिन इससे उनका गाँव बेरंग नहीं होता, बेगंध नहीं होता. तमाम बेइंसाफ़ियों के बावजूद उसका रंग मैला नहीं होता. एक ’सत्तातंत्र’ गाँव में भी है और उसका मुकाबला भी उतना ही ज़रूरी है. <strong>प्रभात</strong> जब ’गाँव’ की बेइंसाफ़ियों पर सवाल करते हैं तो यह उस ’सत्तातंत्र’ पर सीधा सवाल है. <strong>प्रभात</strong> की कविता ’गाँव’ का पक्ष नहीं लेती, बल्कि गाँव के भीतर जाकर ’सही’ का पक्ष लेती है.</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">जैसा हमारे दोस्त <strong>प्रमोद</strong> ने भूमिका में लिखा है कि ’पानी’ <strong>प्रभात</strong> की कविता का सबसे मुख्य किरदार है. होना भी चाहिए, राजस्थान पानी का कितना इंतज़ार करता है, पानी हमारे मानस का मूल तत्व हो जैसे. और उनकी कविता ’या गाँव को बंटाढार बलमा’ मैं यहाँ न समझे जाने का जोख़िम उठाते हुए भी दे रहा हूँ, ऐसा गीत विरले ही लिखा जाता है. कितना सीधा, सटीक. फिर भी कितना गहरा.</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">एक और वजह से यह किताब ख़ास है. इस किताब में दोस्ती की मिठास है. कैसे एक दोस्त कविताएं लिखता है, दूसरा दोस्त उन कविताओं को एक बहुत ही ख़ूबसूरत किताब का रूप देता है और तीसरा दोस्त अपना लाड़ लड़ाता है एक प्यारी सी भूमिका लिख कर. मैंने बचपन में अपनी छोटी-छोटी, मिचमिचाई आँखों से इन दोस्तियों को बड़े होते देखा है. कभी ये सारे अलग-अलग व्यक्तित्व हैं, कोई चित्रकार है तो कोई मास्टर. कोई संपादक हो गया है तो कोई बड़ा अफसर. कोई किसी अख़बार में काम करती है तो कोई दिखाई ही नहीं देता कई-कई साल तक. लेकिन फिर अचानक किसी दिन ये मिलकर <strong>’वितान’</strong> हो जाते हैं. और इन्हें जोड़ने का सबसे मीठा माध्यम हैं <strong>प्रभात</strong> की कविताएं. इन सारे दोस्तों को थोड़ा सा कुरेदो और <strong>प्रभात</strong> की एक कविता निकल आती है हरेक के भीतर से.</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">आप <strong>प्रभात</strong> की कविताएं पढ़ना और सहेजना चाहें तो इस सुंदर सी किताब को <strong>विश्व पुस्तक मेले</strong> में <strong>’एकलव्य’</strong> की स्टॉल <strong>(हॉल न.12A/ स्टॉल न.188)</strong> से सिर्फ़ साठ रु. देकर ख़रीद सकते हैं. यहाँ इस किताब से मेरी पसंदीदा कविताओं के अलावा मैं <strong>प्रमोद</strong> की लिखी भूमिका भी उतार रहा हूँ.</p>
</blockquote>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: center;">
<p style="text-align: center;">
<p style="text-align: center;"><strong>ज़मीन की बटायी</strong></p>
<p style="text-align: center;">
<p style="text-align: center;">मैंने तो सदा ही मुँह की खायी तेरे गाँव में<br />
बुरी है ज़मीन की बटायी तेरे गाँव में</p>
<p style="text-align: center;">
<p style="text-align: center;">सिर्फ़ चार के खाते है सैंकड़ो बीघा ज़मीन<br />
कुछ छह-छह बीघा में हैं बाकी सारे भूमिहीन<br />
भूमिहीन हैं जो मज़दूर मज़लूम हैं<br />
ज़िन्दा हैं मगर ज़िन्दगी से महरूम हैं<br />
जीना क्या है जीना दुखदायी तेरे गाँव में<br />
बुरी है ज़मीन की बटायी तेरे गाँव में</p>
<p style="text-align: center;">
<p style="text-align: center;">ठसक रुपैये की किसी में ऎंठ लट्ठ की<br />
बड़ी पूछ बाबू तेरे गाँव में मुँहफट्ट की<br />
बड़ी पूछ उनकी जो कि छोटे काश्तकार हैं<br />
शामिल जो ज़मींदारों के संग अनाचार में<br />
चारों खण्ड गाँव घूमा पाया यही घूम के<br />
सबके हित एक से सब बैरी मज़लूम के<br />
दुखिया की नहीं सुनवायी तेरे गाँव में<br />
बुरी है ज़मीन की बटायी तेरे गाँव में<br />
ऋण लेर सेर घी छँडायौ तो पै रामजी<br />
अन्न का दो दाणा भी तो दै रै म्हारा रामजी</p>
<p style="text-align: center;">
<p style="text-align: center;">खेतों में मजूरी से भरे पूरे परिवार का<br />
पूरा नहीं पड़े है ज़माना महँगी मार का<br />
इसलिए छोड़ के बसेरा चले जाते हैं<br />
भूमिहीन उठा डाँडी-डेरा चले जाते हैं<br />
चुग्गे हेतु जैसे खग नीड़ छोड़ जाते हैं<br />
जानेवाले जाने कैसी पीर छोड़ जाते हैं<br />
परदेसी तेरी अटारी राँय-बाँय रहती है<br />
मौत के सन्नाटे जैसी साँय-साँय रहती है<br />
ऎसी ना हो किसी की रुसवायी मेरे गाँव में<br />
बुरी है ज़मीन की बटायी मेरे गाँव में</p>
<p style="text-align: center;">
<p style="text-align: center;">
<p style="text-align: center;">
<p style="text-align: center;"><strong>भाई रे</strong></p>
<p style="text-align: center;">
<p style="text-align: center;">ऋतुओं की आवाजाही रे<br />
मौसम बदलते हैं भाई रे</p>
<p style="text-align: center;">
<p style="text-align: center;">खजूरों को लू में ही<br />
पकते हुए देखा<br />
किसानों को तब मेघ<br />
तकते हुए देखा<br />
कुँओं के जल को<br />
उतरते हुए देखा<br />
गाँवों के बन को<br />
झुलसते हुए देखा<br />
खेतों को अगनी में<br />
तपते हुए देखा<br />
बर्फ़ वाले के पैरों को<br />
जलते हुए देखा<br />
गाते हुए ठंडी-मीठी बर्फ़<br />
दूध की मलाई रे<br />
मौसम बदलते हैं भाई रे</p>
<p style="text-align: center;">
<p style="text-align: center;">जहाँ से उठी थी पुकारें<br />
वहाँ पर पड़ी हैं बौछारें<br />
बैलों ने देखा<br />
भैंस-गायों ने देखा<br />
सूखें दरख़्तों की<br />
छावों ने देखा</p>
<p style="text-align: center;">
<p style="text-align: center;">नीमों बबूलों से ऊँची-ऊँची घासें<br />
ऎसी ही थी इनकी गहरी-गहरी प्यासें<br />
सूखे हुए कुँए में मरी हुई मेंढकी<br />
ज़िन्दा हुई टर-टर टर्राई रे<br />
मौसम बदलते हैं भाई रे</p>
<p style="text-align: center;">
<p style="text-align: center;">आल भीगा पाल भीगा<br />
भरा हुआ ताल भीगा<br />
आकाश पाताल भीगा<br />
पूरा एक साल भीगा<br />
बरगदों में बैठे हुए<br />
मोरों का शोर भीगा<br />
आवाज़ें आई घिघियाई रे<br />
मौसम बदलते हैं भाई रे</p>
<p style="text-align: center;">
<p style="text-align: center;">गड़रियों ने देखा<br />
किसानों ने देखा<br />
ग्वालों ने देखा<br />
ऊँट वालों ने देखा</p>
<p style="text-align: center;">
<p style="text-align: center;">बारिश की अब दूर<br />
चली गई झड़ियों को<br />
खेतों में उखड़ी<br />
पड़ी मूँगफलियों को<br />
हल्दी के रंग वाले<br />
तितली के पर वाले<br />
अरहर के फूलों को<br />
कोसों तक जंगल में<br />
ज्वार के फूलों को</p>
<p style="text-align: center;">
<p style="text-align: center;">दूध जैसे दानों से<br />
जड़े हुए देखा<br />
खड़े हुए बाजरे को<br />
पड़े हुए देखा</p>
<p style="text-align: center;">
<p style="text-align: center;">चूहों ने देखा<br />
बिलावों ने देखा<br />
साँपों ने देखा<br />
सियारों ने देखा</p>
<p style="text-align: center;">
<p style="text-align: center;">आते हुए जाड़े में<br />
हरेभरे झाड़ों की<br />
कच्ची सुगंध महमहायी रे<br />
मौसम बदलते हैं भाई रे</p>
<p style="text-align: center;">
<p style="text-align: center;">
<p style="text-align: center;">
<p style="text-align: center;"><strong>बंजारा नमक लाया</strong></p>
<p style="text-align: center;">
<p style="text-align: center;">साँभर झील से भराया<br />
भैंरु मारवाड़ी ने<br />
बंजारा नमक लाया<br />
ऊँटगाड़ी में</p>
<p style="text-align: center;">
<p style="text-align: center;">बर्फ़ जैसी चमक<br />
चाँद जैसी बनक<br />
चाँदी जैसी ठनक<br />
अजी देसी नमक<br />
देखो ऊँटगाड़ी में<br />
बंजारा नमक लाया<br />
ऊँटगाड़ी में</p>
<p style="text-align: center;">
<p style="text-align: center;">कोई रोटी करती भागी<br />
कोई दाल चढ़ाती आई<br />
कोई लीप रही थी आँगन<br />
बोली हाथ धोकर आयी<br />
लायी नाज थाळी में<br />
बंजारा नमक लाया<br />
ऊँटगाड़ी में</p>
<p style="text-align: center;">
<p style="text-align: center;">थोड़ा घर की खातिर लूँगी<br />
थोड़ा बेटी को भेजूँगी<br />
महीने भर से नमक नहीं था<br />
जिनका लिया उधारी दूँगी<br />
लेन देन की मची है धूम<br />
घर गुवाळी में<br />
बंजारा नमक लाया<br />
ऊँटगाड़ी में</p>
<p style="text-align: center;">
<p style="text-align: center;">कब हाट जाना होता<br />
कब खुला हाथ होता<br />
जानबूझ कर नमक<br />
जब ना भूल आना होता<br />
फ़ीके दिनों में नमक डाला<br />
मारवाड़ी ने<br />
बंजारा नमक लाया<br />
ऊँटगाड़ी में</p>
<p style="text-align: center;">
<p style="text-align: center;">
<p style="text-align: center;">
<p style="text-align: center;"><strong>या गाँव को बंटाढार बलमा</strong></p>
<p style="text-align: center;">
<p style="text-align: center;">याकी कबहुँ पड़े ना पार बलमा<br />
या गाँव को बंटाढार बलमा</p>
<p style="text-align: center;">
<p style="text-align: center;">इसकूल कू बनबा नाय देगौ<br />
बनती इसकूल को ढाय देगौ<br />
यामैं छँट-छँट बसे गँवार बलमा<br />
या गाँव को बंटाढार बलमा</p>
<p style="text-align: center;">
<p style="text-align: center;">या कू एक पटैलाँई ले बैठी<br />
काँई सरपंचाई ले बैठी<br />
बोटन म लुटाया घरबार बलमा<br />
या गाँव को बंटाढार बलमा</p>
<p style="text-align: center;">
<p style="text-align: center;">छोरी के बहयाव म लख देगौ<br />
छोरा के म दो लख लेगौ<br />
छोरा-छोरी कौ करै ब्यौपार बलमा<br />
या गाँव को बंटाढार बलमा</p>
<p style="text-align: center;">
<p style="text-align: center;">या की छोरी आगे तक रौवै है<br />
पढबा के दिनन कू खोवै है<br />
चूल्हा फूँकै झकमार बलमा<br />
या गाँव को बंटाढार बलमा</p>
<p style="text-align: center;">
<p style="text-align: center;">या का छोरा बिंगड़ै कोनी पढै<br />
दस्सूई सूँ आगै कोनी बढै<br />
इनकू इस्याई मिल्या संस्कार बलमा<br />
या गाँव को बंटाढार बलमा</p>
<p style="text-align: center;">
<p style="text-align: center;">पैलाँई कमाई कम होवै<br />
ऊपर सूँ कुरीति या ढोवै<br />
बात-बात म जिमावै बामण चार बलमा<br />
या गाँव को बंटाढार बलमा</p>
<p style="text-align: center;">
<p style="text-align: center;">कुटमन की काँई चलाई लै<br />
भाई कू भाई देख जलै<br />
यामै पनपै कैसे प्यार बलमा<br />
या गाँव कौ बंटाढार बलमा</p>
<p style="text-align: center;">
<p style="text-align: center;">बनती कोई बात बनन ना दे<br />
करै भीतर घात चलन ना दे<br />
यामै कैसै सधै कोई कार बलमा<br />
या गाँव को बंटाढार बलमा</p>
<p style="text-align: center;">
<p style="text-align: center;">यामै म्हारी कोई हेट नहीं<br />
दिनरात खटूँ भरै पेट नहीं<br />
या गाँव म डटूँ मैं काँई खा र बलमा<br />
या गाँव को बंटाढार बलमा</p>
<p style="text-align: center;">
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: center;">
<p style="text-align: justify;"><a href="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2010/02/IMG_26522.jpg"><img class="alignright size-full wp-image-379" title="IMG_2652" src="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2010/02/IMG_26522.jpg" alt="IMG_2652" width="247" height="430" /></a>इस किताब का नाम <strong>’बंजारा नमक लाया’</strong> नहीं होता तो क्या हो सकता था? शायद <strong>’प्रिय पानी’</strong> हो सकता था. इसका एक बड़ा हिस्सा है जो पानी की कथा कहता है, पानी को याद करता है. पानी वहाँ एक स्मृति है, पानी वहाँ जीवन है, पानी अपने आप में संगीत है. उसकी अपनी ध्वनियाँ हैं. गिरने की, बरसने की. फिर ऎसा क्या रहा होगा जो किताब का नाम सिर्फ़ एक गीत के नाम पर रख दिया गया होगा. दरअसल यह भी एक कहानी जैसा है कि कोई गीत अपनी ही किताब पर भारी पड़े. मगर गीत में यह वज़न आया कहाँ से है? तो वह आया है इसकी प्रसिद्धि से. दरअसल प्रभात का यह गीत लिखे जाने के दिन से ही इतना प्रसिद्ध हुआ है कि इसे नज़र अंदाज करना किसी भी किताब में किन्हीं भी गीतों के बीच मुश्किल होता. राजस्थान, मध्यप्रदेश, उत्तरप्रदेश के जिन-जिन इलाकों में इसे किसी ने गा दिया यह तुरंत ही वहाँ के लोगों की ज़बान पर चढ़ गया और उन्होंने इसे अपनाकर प्यार देना शुरु कर दिया. यह बात इस ओर भी संकेत करती है कि उदार बाज़ारवाद के इन दिनों में इन सभी इलाकों में कहीं ना कहीं जीवन इतना ही संघर्षमय है कि उन्हें नमक जैसी चीज़ पर लिखा गया गीत अपनी ज़रूरत महसूस होता है. इस गीत की खूबसूरती है कि इसमें एक तरफ़ तो नमक के इतने सुन्दर बिम्ब हमें मिलते हैं और दूसरी तरफ़ उसी नमक के लिए ज़िन्दगी की जद्दोज़हद पूरी जटिलता के साथ उपस्थित है.</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">इस किताब में दो-तीन तरह के मिजाज़ के गीत हैं. एक वे जो सीधे-सीधे प्रकृति की सुन्दरता को प्रगट करते हैं. दूसरे वे जो प्रतिरोध की आवाज़ बन जाते हैं, तीसरे वे जो जीवन को उसकी वास्तविकता में बहुत ही मार्मिक ढंग से कहते हैं और चौथे वे जो पारंपरिक मिथक कथाओं को लेकर एक ख़ास शैली में लिखे गए हैं. इस शैली को ’पद गायन’ की शैली कहते हैं और यह राजस्थान के माळ, जगरौटी इलाके (करौली, सवाईमाधोपुर व दौसा ज़िले) में मीणा व अन्य जातियों द्वारा गाए जाते हैं. यही कारण है कि किताब को इस शैली के प्रसिद्ध कवि एवं लोक गायक धवले को समर्पित किया गया है. किताब में दो भाषाएं हैं जो हमारी बहुभाषिक संस्कृति की बानगी हैं. कुछ गीत खड़ी बोली हिन्दी में हैं, कुछ उस माळ की भाषा में जो प्रभात की संवेदनात्मक ज़मीन है.</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">यह किताब इस बात की गवाह है कि काव्य किस भाषा में है यह महत्वपूर्ण नहीं है, महत्वपूर्ण है वह किस चेतना के साथ है. <strong>’सीता वनवास’</strong> पद की काव्य चेतना वह सारे सवाल हमारी मनुष्य सभ्यता के सामने खड़े करती है जिनकी अपेक्षा हम आज की किसी भी कविता से करना चाहेंगे. इसी तरह चाहे वह खड़ी बोली हिन्दी में लिखा <strong>’धरती राजस्थानी है’</strong> हो या माळ की भाषा में लिखा <strong>’काळी बादळी’</strong>. दोनों में ही सूखे व अकाल की विभीषिका को व्यक्त करने वाली काव्य चेतना बहुत नज़दीक की है. इस किताब से गुज़रते हुए दो-तीन तरह की अनुभूतियाँ हो सकती हैं. एक स्थिति है जब आप नई भाषा व उसमें आए प्रकृति के नए बिम्बों के काव्य रसास्वादन से कुछ खुश व समृद्ध महसूस करते हैं. दूसरी स्थिति है जब वास्तविकता के वर्णन में काव्य की मार्मिकता आपको अन्दर तक भर देती है और आप उदास महसूस करते हैं. और तीसरी स्थिति है जब आप अपने समय पर किए जा रहे सवालों में शामिल हो जाते हैं, स्थितियों के प्रतिरोध के स्वर में शामिल हो जाते हैं, और अपने भीतर बदलाव की कोशिश करने की एक ताकत महसूस करने लगते हैं.</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">जब सपनों को सच में बदलने की ज़िद की जाती है तो वे विचार या कला की शक्ल लेते हैं. यह किताब देखे गए सपनों में से कुछ का सच में बदलना है. सपनों का वह हिस्सा जिसे आप अपने दम पर पूरा करने की कोशिश भर कर सकते हैं. <strong>&#8211;प्रमोद</strong></p>
<p style="text-align: justify;"><strong><a href="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2010/02/IMG_2649small13.jpg"><img class="alignnone size-full wp-image-375" title="Book cover" src="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2010/02/IMG_2649small13.jpg" alt="Book cover" width="650" height="495" /></a></strong></p>
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		</item>
		<item>
		<title>एक फ़िल्म, एक उपन्यास और गांधीगिरी का अंत.</title>
		<link>http://mihirpandya.com/2010/01/three-idiots-vs-chetan-bhagat/</link>
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		<pubDate>Wed, 13 Jan 2010 09:23:42 +0000</pubDate>
		<dc:creator>मिहिर</dc:creator>
				<category><![CDATA[Literature]]></category>
		<category><![CDATA[films]]></category>
		<category><![CDATA[politics]]></category>
		<category><![CDATA[चेतन भगत]]></category>
		<category><![CDATA[मुद्दा]]></category>
		<category><![CDATA[राजकुमार हिरानी]]></category>
		<category><![CDATA[सत्ता]]></category>
		<category><![CDATA[सिनेमा]]></category>

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		<description><![CDATA[यूँ देखें तो मेरा राजकुमार हीरानी के सिनेमा से सीधा जुड़ाव रहा है. मेरा पहला रिसर्च थिसिस उनकी ही पिछली फ़िल्म पर था. तीन महीने दिए हैं उनकी ’गांधीगिरी’ को. &#8216;लगे रहो मुन्नाभाई&#8217; के गांधीगिरी सिखाते गांधी ’सबाल्टर्न’ के गांधी हैं. किसी रिटायर्ड आदमी को उसकी पेंशन दिलवाने का नुस्खा बताते हैं तो किसी युवा [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;"><a href="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2010/01/3-idiots.jpg"><img class="alignleft size-medium wp-image-290" title="3-idiots" src="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2010/01/3-idiots-207x300.jpg" alt="3-idiots" width="207" height="300" /></a><a href="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2010/01/fivepoint11.jpg"><img class="alignright size-medium wp-image-297" title="fivepoint1" src="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2010/01/fivepoint11-182x300.jpg" alt="fivepoint1" width="182" height="300" /></a>यूँ देखें तो मेरा <strong>राजकुमार हीरानी</strong> के सिनेमा से सीधा जुड़ाव रहा है. मेरा पहला रिसर्च थिसिस उनकी ही पिछली फ़िल्म पर था. तीन महीने दिए हैं उनकी ’गांधीगिरी’ को. &#8216;लगे रहो मुन्नाभाई&#8217; के गांधीगिरी सिखाते गांधी ’सबाल्टर्न’ के गांधी हैं. किसी रिटायर्ड आदमी को उसकी पेंशन दिलवाने का नुस्खा बताते हैं तो किसी युवा लड़की को उसका जीवन साथी चुनने में मदद करते हैं. ये ’आम आदमी’ के गांधी हैं. यहाँ ज़ोर उनके एतिहासिक व्यक्तित्व पर नहीं उनके जीवन जीने के तरीके पर है. ’गांधीगिरी’ यहीं से निकली. राजू की फ़िल्म उन्हें इतिहास के ’महावृतांतों’ की कैद से आज़ाद करवाती है. कई मायनों में मुन्नाभाई श्रृंखला की फ़िल्में जेनर डिफ़ाइनिंग फ़िल्में हैं क्योंकि वे हिन्दी सिनेमा से ते़ज़ी से गायब होते जा रहे तत्व ’स्वस्थ्य हास्य’ को सिनेमा में सफलता के साथ वापस लेकर आती हैं.</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">लेकिन कहना होगा कि यहाँ वे गलती पर हैं. और अगर मैं अब तक के उनके सिनेमा को थोड़ा भी समझ पाया हूँ तो उसी तर्क पद्धति का सहारा लेकर कहूँगा कि यहाँ मेरे लिए सिर्फ़ दो तथ्य महत्वपूर्ण हैं. एक यह कि उनकी फ़िल्म एक लेखक की किताब पर आधारित है और दूसरा यह कि उन्होंने उसी लेखक का नाम ले जाकर सबसे कोने में कहीं पटक दिया है. काग़ज़, पैसा, कितने प्रतिशत कहानी किसकी, किसने कब क्या बोला, ये सारे सवाल बाद में आते हैं. सबसे बड़ा सवाल है अच्छाई, बड़प्पन और ईमानदारी जो हमने उनकी ही रची ’गांधीगिरी’ से सीखी हैं. यह तो वे भी नहीं कह रहे कि उनकी फ़िल्म का <strong>चेतन भगत</strong> के उपन्यास से कोई लेना-देना नहीं. बाकायदा उपन्यास के अधिकार खरीदे गए हैं और कुल-मिलाकर ग्यारह लाख रु. का भुगतान भी हुआ है. तकनीकी रूप से उनपर इतनी बाध्यता थी कि वे फ़िल्म के क्रेडिट रोल में चेतन भगत का नाम दें और फ़िल्म के आखिर में उनकी किताब का नाम देकर उन्होंने उसे पूरा भी कर दिया है. लेकिन सहायकों, तकनीशियनों और स्पॉट बॉयज़ की भीड़ में कहीं (मैं तो तलाश भी नहीं पाया) चेतन का नाम छिपाकर उन्होंने अपनी ईमानदारी खो दी है.</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">“हमारी फ़िल्म एक उपन्यास पर आधारित है.” यह कहने से आपकी फ़िल्म छोटी नहीं होती है. मेरी नज़र में तो उसकी इज़्ज़त कुछ और बढ़ जाती है. विधु विनोद चोपड़ा ने चेतन भगत के सामने अभिजात जोशी को खड़ा करने की कोशिश की है और कहा है कि वे फ़िल्म के असल लेखकों का हक़ मारना चाहते हैं. यह छद्म प्रतिद्वंद्वी खड़ा करना है. चेतन भगत ने कभी भी फ़िल्म की पटकथा पर अपना हक़ नहीं जताया जिसे अभिजात जोशी और राजू हीरानी ने मिलकर काफ़ी मेहनत से तैयार किया है. ’थ्री इडियट्स’ की पटकथा इस साल आए सिनेमा की सबसे बेहतरीन और कसी हुई पटकथाओं में से एक है जिसमें हर कथा सूत्र अपने मुकम्मल अंजाम तक पहुँचता है चाहे वो एक छोटा सा फ़ाउंटन पेन ही क्यों न हो. इस कसी हुई पटकथा के लिए उन्हें भी उतना ही सम्मान मिलना चाहिए जितना ’स्लमडॉग मिलेनियर’ के पटकथा लेखक साइमन बुफॉय को ऑस्कर से नवाज़ कर दिया गया था. सवाल तो विधु विनोद चोपड़ा से पूछा जाना चाहिए जो कहानी लेखन में दो लेखकों का नाम पहले से होते ’को-राइटर’ के तौर पर अलग से फ़िल्म के टाइटल्स में नज़र आते हैं. और सवाल उन सभी निर्देशकों से पूछा जाना चाहिए जो अपनी फ़िल्म में लेखक का नाम पहले से मौजूद होते शान से अपने नाम के आगे ’लेखक और निर्देशक’ की पदवी लगाते हैं. सलीम-जावेद के हाथ में पेंट का डब्बा लेकर अपनी फ़िल्मों के पोस्टरों पर अपना ही नाम लिखते घूमने के किस्से इसी सिनेमा जगत के हैं. चेतन सिर्फ़ फ़िल्म की शुरुआत में अपनी किताब का नाम चाहते हैं. इसके अलावा वो अपनी ज़िन्दगी में कुछ भी करते हों, मुझे उससे मतलब नहीं. इस मुद्दे पर मैं उनके साथ हूँ. यहाँ सवाल व्यक्ति का नहीं, सही और गलत का है.</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">एक और बात है. एक व्यापक संदर्भ में हमारे लिए यह खतरे की घंटी है. इस प्रसंग में ’सबका फ़ायदा हुआ’ कहने वाले यह नहीं देख पा रहे हैं कि इस सारे ’मीडिया हाइप्ड’ प्रसंग के गर्भ में एक अदृश्य लेखक छिपा है. डरा, सहमा सा. वो लेखक न तो चेतन की तरह मीडिया का चहेता लेखक है और न ही उसकी भाषा इतनी ताक़तवर है कि सत्ता के बड़े प्रतिष्ठान उसकी किसी भी असहमति पर ध्यान दें. उसके पास बस उसके शब्द हैं, उसकी कहानियाँ. उसकी क़लम, उसकी रचनात्मकता जिससे वह इस बहरूपिए वर्तमान के मुखौटे की सही पहचान करता है. अपने जीवन की तमाम ऊर्जा को बाती में तेल की तरह जलाकर इस समय और समाज की उलझी जटिलताओं को अपने पाठकों के लिए थोड़ा और गम्य बनाता है. हिन्दुस्तान की क्षेत्रीय भाषाओं का यही ईमानदार लेकिन गुमनाम लेखक है जिसका इस सारे तमाशे में सबसे ज़्यादा नुकसान हुआ है.</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">यहाँ सबसे मुख्य बिन्दु यह है कि आज भी हिन्दी सिनेमा किसी किताब से, रचना से अपना नाम जोड़कर कोई खुशी, कोई गर्व नहीं महसूस करता. यहाँ तो जिस किताब का ज़िक्र है वो अंग्रेज़ी भाषा की एक बेस्टसेलर पुस्तक है. यहाँ यह हाल है तो हिन्दी और अन्य क्षेत्रीय भाषाओं के लेखकों का क्या हाल होगा जिनके नाम के साथ चेतन भगत के नाम जैसा कोई ग्लैमर भी नहीं जुड़ा है. अगर हमारे सिनेमा का अपने देश के साहित्य और कला से ऐसा और इतना ही जुड़ाव रहा तो हिन्दी सिनेमा विदेशी सिनेमा (पढ़ें हॉलीवुड) की घटिया नकल बनकर रह जाएगा जिसके पास अपना मौलिक कुछ नहीं बचेगा. अपनी ज़मीन के कला-साहित्य से जुड़ाव से सिनेमा माध्यम हमेशा समृद्ध होता है. मल्टीपलैक्स का दौर आने के बाद से मुख्यधारा का हिन्दी सिनेमा वैसे भी अपने देश के गांव-देहात से, उसके आम जनमानस से कटता जा रहा है. ऐस में उसका अपने देश के लेखन और ललित कलाओं से भी असहज संबंध खुद सिनेमा के लिए भी अच्छा नहीं है.</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">आपको ऐसी कितनी हिन्दी फ़िल्में याद हैं जिनकी शुरुआत में किसी किताब का नाम शान से लिखा आता हो? मैं ऐसी फ़िल्मों का इंतज़ार करता हूँ. राजकुमार हीरानी से मुझे इसकी उम्मीद थी. <strong>’थ्री इडियट्स’</strong> हमारे लिए वो फ़िल्म होनी थी.</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">तो क्या यह भविष्य के लिए सभी उम्मीदों का अंत है? क्या यह साहित्य सर्जक के लिए सिनेमा माध्यम में बंद होते दरवाजों में आखिरी दरवाजा था?</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">नहीं, कुछ छोटे-छोटे टिमटिमाते तारे हैं. कुछ मुख्यधारा में और कुछ हाशिए पर कहीं. एक <strong>परेश कामदार</strong> हैं जो अपनी फ़िल्म <strong>(खरगोश)</strong> के पीछे मौजूद मूल कहानी के लेखक को फ़िल्म के पहले सार्वजनिक शो पर मुख्य अतिथि की तरह ट्रीट करते हैं और उनके साथ आए तमाम दोस्तों को अपनी जेब से कॉफ़ी पिलवाते हैं. एक <strong>विशाल भारद्वाज</strong> हैं जो अपनी नई फ़िल्म <strong>(कमीने)</strong> में टाइटल्स की शुरुआत होते ही पहले किन्हीं केजतान बोए साहब का शुक्रिया अदा करते हैं जिन्होंने युगांडा की एक फ़िल्म वर्कशॉप में उन्हें पहली बार यह स्टोरी आइडिया सुनाया था.</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">जैसा राजू हीरानी ने ’लगे रहो मुन्नाभाई’ में बताया था, एक-एक गांधी हम सबके भीतर हैं. बस हमारे आँखें बंद करने की देर है.</p>
<p style="text-align: justify;">**********</p>
<p style="text-align: justify;">मूलत: <strong>’डेली न्यूज़’</strong> के <strong>’हम लोग’ </strong>में प्रकाशित. <strong>10 जनवरी 201</strong><strong>0<span style="font-weight: normal;">.</span></strong></p>
]]></content:encoded>
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		<title>समय के सिवा कोई इस लायक़ नहीं होता कि उसे किसी कहानी का हीरो बनाया जाए</title>
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		<pubDate>Sun, 18 Oct 2009 23:54:12 +0000</pubDate>
		<dc:creator>मिहिर</dc:creator>
				<category><![CDATA[Literature]]></category>
		<category><![CDATA[क्योंकि गद्य कवियों की कसौटी है]]></category>

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		<description><![CDATA[&#8220;मुझे यह उपन्यास लिखकर कोई खुशी नहीं हुई. क्योंकि आत्महत्या सभ्यता की हार है. परन्तु टोपी के सामने कोई और रास्ता नहीं था. यह टोपी मैं भी हूँ और मेरे ही जैसे और बहुत-से लोग भी हैं. हम लोगों में और टोपी में केवल एक अन्तर है. हम लोग कहीं-न-कहीं किसी-न-किसी अवसर पर ’कम्प्रोमाइज’ कर [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;"><a href="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2009/10/topi-shukla-cover1.jpg"><img class="alignleft size-medium wp-image-230" title="topi shukla cover" src="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2009/10/topi-shukla-cover1-225x300.jpg" alt="topi shukla cover" width="225" height="300" /></a>&#8220;मुझे यह उपन्यास लिखकर कोई खुशी नहीं हुई. क्योंकि आत्महत्या सभ्यता की हार है. परन्तु टोपी के सामने कोई और रास्ता नहीं था. यह टोपी मैं भी हूँ और मेरे ही जैसे और बहुत-से लोग भी हैं. हम लोगों में और टोपी में केवल एक अन्तर है. हम लोग कहीं-न-कहीं किसी-न-किसी अवसर पर ’कम्प्रोमाइज’ कर लेते हैं. और इसलिए हम लोग जी भी रहे हैं. टोपी कोई देवता या पैग़म्बर नहीं था. किन्तु उसने ’कम्प्रोमाइज’ नहीं किया. और इसलिए उसने आत्महत्या कर ली. परन्तु ’आधा गाँव’ ही की तरह यह किसी आदमी या कई आदमियों की कहानी नहीं है. यह कहानी भी समय की है. इस कहानी का हीरो भी समय है. समय के सिवा कोई इस लायक़ नहीं होता कि उसे किसी कहानी का हीरो बनाया जाए.</p>
<p style="text-align: justify;">’आधा गाँव’ में बेशुमार गालियाँ थीं. मौलाना ’टोपी शुक्ला’ में एक भी गाली नहीं है. &#8211;परन्तु शायद यह पूरा उपन्यास एक गन्दी गाली है. और मैं यह गाली डंके की चोट पर बक रहा हूँ. यह उपन्यास अश्लील है &#8212; जीवन की तरह.&#8221;<strong> &#8211;राही मासूम रज़ा.</strong></p>
<p style="text-align: center;"><strong>&#8216;टोपी शुक्ला’, राजकमल प्रकाशन,<br />
1-बी, नेताजी सुभाष मार्ग, दरियागंज,<br />
नई दिल्ली, 110002.</strong></p>
]]></content:encoded>
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		<title>&#8220;मैं खामोशी की मौत नहीं मरना चाहता!&#8221; ~पीयूष मिश्रा.</title>
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		<pubDate>Wed, 03 Jun 2009 16:37:28 +0000</pubDate>
		<dc:creator>मिहिर</dc:creator>
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		<description><![CDATA[
पीयूष मिश्रा से मेरी मुलाकात भी अनुराग कश्यप की वजह से हुई. पृथ्वी थियेटर पर अनुराग निर्मित पहला नाटक &#8216;स्केलेटन वुमन&#8217; था और पीयूष वहीं बाहर दिख गए. मैंने थोड़ा जोश में आकर पूछ लिया कि आपका इंटरव्यू कर सकता हूँ एक हिंदी ब्लॉग के लिए &#8211; साहित्य, राजनीति और संगीत पर बातें होंगी. उन्होंने [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<blockquote>
<p style="text-align: justify;"><a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Piyush_Mishra" target="_blank"><strong>पीयूष मिश्रा</strong></a> से मेरी मुलाकात भी अनुराग कश्यप की वजह से हुई. पृथ्वी थियेटर पर अनुराग निर्मित पहला नाटक &#8216;स्केलेटन वुमन&#8217; था और पीयूष वहीं बाहर दिख गए. मैंने थोड़ा जोश में आकर पूछ लिया कि आपका इंटरव्यू कर सकता हूँ एक हिंदी ब्लॉग के लिए &#8211; साहित्य, राजनीति और संगीत पर बातें होंगी. उन्होंने ज़्यादा सोचे बिना कहा &#8211; परसों आ जाओ, यहीं, मानव (कौल) का प्ले है, उससे पहले मिल लो. बातचीत बहुत लंबी नहीं हुई पर पीयूष जितना तेज़ बोलते हैं, उस हिसाब से बहुत छोटी भी नहीं रही. उनके गीतों का रेस्टलेसनेस उनके लहज़े में भी दिखा और उनके लफ्ज़ों में भी. ये तो नहीं कहा जा सकता कि वो पूरे इंटरव्यू में &#8216;पॉलिटिकली करेक्ट&#8217; रहे पर कुछ जगहों पर कोशिश ज़रूर नज़र आई. पर बातचीत का अंतिम चरण आते आते उन्होंने खुद को बह जाने दिया और थियेटर-वाले पाले से भी बात की, जबकि बाकी के ज़्यादातर सवालों में वो यही यकीन दिलाते दिखे कि अब पाला बदल चुका है.<br style="background-color: #cccccc;" /></p>
<p style="text-align: justify;">लिखित इंटरव्यू में वीडियो रिकार्डेड बातचीत के ज़रूरी सवालों का जोड़ है, पर पूरा सुनना हो तो वीडियो ही देखें. पृथ्वी थियेटर की बाकी टेबलों पर चल रही बहस और बगल में पाव-भाजी बनाते भाई साब की बदौलत कुछ जगहों पर आवाज़ साफ नहीं है. ऐसे &#8216;गुम&#8217; हो गए शब्दों का अंदाज़न एवज दे दिया है, या खाली डॉट्स लगा दिए हैं. मैं थोड़ा नरवस था, और कुछ जगहों पर शायद सवालों को सही माप में पूछ भी नहीं पाया, पर शुक्रिया पीयूष भाई का कि उन्होंने भाव भी समझा और विस्तार में जवाब भी दिया.</p>
<p style="text-align: justify;">समाँ बहुत बाँध लिया, अब लीजिए इंटरव्यू:-                                                                                           ~<strong><a href="http://en.bloguru.com/index.php?ID=02052&amp;CNT=ON" target="_blank">वरुण ग्रोवर</a></strong><strong> </strong></p>
<p style="text-align: justify;">
</blockquote>
<p>
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</p>
<p><strong>वरुण~</strong> आपका अब भी लेफ्ट विचारधारा से जुड़ाव है?</p>
<p><span style="color: #000000;"><strong>पीयूष~</strong> </span>(लेफ्टिस्ट होने का मतलब ये नहीं कि) परिवार के लिए कम्प्लीटली गैर-ज़िम्मेदार हो जाओ.</p>
<p>लेफ्ट बहुत अच्छा है एक उमर तक&#8230; उसके बाद में लेफ्ट आपको&#8230; या तो आप लेफ्टिस्ट हो जाओ&#8230; लेफ्टिस्ट वाली पार्टी में मिल जाओ&#8230; तब आप बहुत सुखी&#8230; (तब) लेफ्ट आपके जीवन का ज़रिया बन सकता है.</p>
<p>और अगर आप लेफ्ट आइडियॉलजी के मारे हो&#8230; तो प्रॉब्लम यह है कि आप देखिए कि आप किसका भला कर रहे हो? सोसाइटी का भला नहीं कर सकते, एक हद से आगे. सोसाइटी को हमारी ज़रूरत नहीं है. कभी भी नहीं थी. आज मैं पीछे मुड़ के देखता हूँ तो लगता है कि (लेफ्ट के शुरुआती दिनों में भी) ज़िंदा रहने के लिए, फ्रेश बने रहने के लिए, एक्टिव रहने के लिए (ही) किया था तब&#8230; बोलते तब भी थे की ज़माने के लिए सोसाइटी के लिए किया है.</p>
<p><strong>वरुण</strong>~ तो अब पॉलिटिक्स से आपका उतना लेना देना नहीं है?</p>
<p><strong>पीयूष~</strong> पॉलिटिक्स से लेना देना मेरा&#8230; तब भी अंडरस्टैंडिंग इतनी ही थी. मैं एक आम आदमी हूँ, एक पॉलिटिकल कॉमेंटेटर नहीं हूँ कि आज (&#8230;..) आई विल बी ए फूल टू से दैट आई नो सम थिंग! पहले भी यही था&#8230; हाँ लेकिन यह था कि जागरूक थे. एज़ पीयूष मिश्रा, एज़ अन आर्टिस्ट उतना ही कल था जितना कि आज हूँ. (अचानक से जोड़ते हैं) पॉलिटिक्स है तो गुलाल में!</p>
<p><strong>वरुण</strong>~ हाँ लेकिन जो लोग &#8216;एक्ट वन&#8217; को जानते हैं, उनका भी यह कहना है कि &#8216;एक्ट वन&#8217; में जितना उग्र-वामपंथ निकल के सामने आता था, &#8216;एक्ट वन&#8217; की एक फिलॉसफी रहती थी कि थियेटर और पॉलिटिक्स अलग नहीं हैं, दोनों एक ही चीज़ का ज़रिया हैं.</p>
<p><strong>पीयूष~</strong> ठीक है, वो &#8216;एक्ट वन&#8217; हो गया. &#8216;एक्ट वन&#8217; ने बहुत कुछ सिखाया. &#8216;एक्ट वन&#8217; (की) &#8216;सो कॉल्ड&#8217; उग्र-वामपंथी पॉलिसी ने बहुत कुछ दिया है मुझको. (लेकिन) उससे मन का चैन चला गया. &#8216;एक्ट वन&#8217; ने (जीना) सिखाया&#8230; &#8216;एक्ट वन&#8217; की जो &#8216;सो-कॉल्ड&#8217; उग्र-वामपंथी पॉलिटिक्स है, यह, मेरा ऐसा मानना है की इनमें से अधिकतर लोग जो हैं तले के नीचे मखमल के गद्दे लगाकर पैदा होते हैं. वही लोग जो हैं वामपंथ में बहुत आगे बढ़ते हैं. अदरवाइज़ कोई, कभी कभार, कुछ नशे के दौर में आ गया. (कोई) मारा गया सिवान में! अब सिवान कहाँ पर है, लोगों से पूछ रहे हैं…सफ़दर हाशमी मारा जाता है, तहलका मच जाता है, ट्रस्ट बन जाते हैं, ना मालूम कौन कौन, (जो) जानता नहीं है सफ़दर को, वो जुड़ जाता है और वहाँ पर मंडी हाउस में&#8230; फोटो छप रहे हैं, यह है, वो है&#8230; सहमत! चंद्रशेखर को याद करने के लिए पहले तो नक़्शे में सिवान को देखना पड़ेगा, है कहाँ सिवान? कौन सा सिवान? कैसा सिवान?  कौन सा चंद्रशेखर? सफ़दर के नाम से जुड़ने के लिए ऐसे लोग आ जाते हैं जो जानते नहीं थे सफ़दर को&#8230; सफ़दर का काम, सफ़दर का काम&#8230; क्या है सफदर का काम? मैं उनकी (सफ़दर की) इन्सल्ट नहीं कर रहा&#8230; ऐसे ऐसे काम कर के गए हैं की कुछ कहने की&#8230; खामोशी की मौत मरे हैं. मैं खामोशी की मौत नहीं मरना चाहता! थियेटर वाले की जवानी बहुत खूबसूरत हो सकती है, थियेटर वाले का बुढ़ापा, हिन्दुस्तान में कम से कम, मैं नहीं समझता कि कोई अच्छी संभावना है.</p>
<p>अधिकतर लोग सीनाइल (सठिया) हो जाते हैं. अचीवमेंट के तौर पर क्या? कुछ तारीखें, कुछ बहुत बढ़िया इश्यूस भी आ गये&#8230; कर तो लिया यार&#8230; अब कब तक जाओगे चाटोगे उसको? चार साल पहले जब मैं दिल्ली जाया करता था तो मेरा मोह छूटता नहीं था, मैं जाया करता था वहाँ पर जहाँ मैं रिहर्सल करता था&#8230; शक्ति स्कूल या विवेकानंद. ज़िंदगी बदल गई यार, दैट टाइम इज़ गॉन! अच्छा टाइम था, बहुत कुछ सिखाया है, बहुत कुछ दिया है, इस तरह मोह नहीं पालना चाहिए.</p>
<p><strong>वरुण</strong>~ एन. के. शर्मा जी अभी भी वहीं हैं, उनके साथ के लोग एक-एक कर के यहाँ आते रहे, मनोज बाजपाई, दीपक डोबरियाल&#8230; उनका क्या व्यू है, थियेटर से निकलकर आप लोग सिनिमा में आ रहे हैं?</p>
<p><strong>पीयूष~</strong> एन. के. शर्मा जी का व्यू अब आप एन. के. शर्मा से ही पूछो. उनका ना तो मैं स्पोक्स मैन हूँ&#8230; उनसे ही पूछो!</p>
<p><strong>वरुण</strong>~ बॉम्बे में एक ऑरा है उनको लेकर&#8230; वो लोगों (एक्टर्स) को बनाते हैं.</p>
<p><strong>पीयूष~</strong> टॉक टू हिम&#8230; टॉक टू हिम!</p>
<p><strong>वरुण</strong>~ आप खुद को पहले कवि मानते हैं या एक्टर?</p>
<p><strong>पीयूष~</strong> ऐसा कुछ नहीं है.</p>
<p><strong>वरुण</strong>~ बॉम्बे में आप खुद को आउट-साइडर मानते हैं?</p>
<p><strong>पीयूष~</strong> कैसे मानूँगा? मेरी जगह है यह. मेरा बच्चा यहाँ पैदा हुआ है. कैसे मानूँगा मैं? (इसके अलावा भी काफी कुछ कहा था इस बारे में, वीडियो में सुन सकते हैं.)</p>
<p><strong>वरुण</strong>~ लेकिन आउटसाइडर इन द सेन्स, मैं प्रोफेशनली आउटसाइडर की बात कर रहा हूँ. जिसमें थियेटर वालों को हमेशा थोड़ा सा सौतेला व्यवहार दिया जाता है यहाँ पर.</p>
<p><strong>पीयूष~</strong> नहीं नहीं. उल्टा है भाई! थियेटर वालों को बल्कि&#8230;</p>
<p><strong>वरुण</strong>~ स्टार सिस्टम ने कभी थियेटर वालों को वो इज़्ज़त नहीं दी&#8230;</p>
<p><strong>पीयूष~</strong> हाँ&#8230; स्टार सिस्टम अलग बात है. स्टार सिस्टम की जो ज़रूरत है वो&#8230; थियेटर वालों को मालूम ही नहीं कि बुनियादी ढाँचा कैसे होता है. मैं तो बड़ा सोचता था कि खूबसूरत बंदे थियेटर पैदा क्यूँ नहीं कर पाया. मैं समझ ही नहीं पाया आज तक! थियेटर वाले होते हैं, मेरे जैसी शकल सूरत होती है उनकी टेढ़ी-मेढ़ी सी.</p>
<p>लेकिन ऐसा कुछ नहीं है&#8230; आज&#8230; नसीर हैं, ओम पुरी हैं&#8230; पंकज कपूर&#8230; दे आर रेकग्नाइज़्ड, अनुपम खेर हैं&#8230;</p>
<p><strong>वरुण</strong>~ नहीं वह बात है कि उनको इज़्ज़त ज़रूर मिलती है लेकिन उनको इज़्ज़त दे कर पेडेस्टल पे रख दिया जाता है लेकिन उससे आगे बढ़ने की कभी भी शायद&#8230;</p>
<p><strong>पीयूष~</strong> आगे बढ़ने की सबकी अपनी अपनी क़ाबिलियत है. और जितना आगे बढ़ना था, जितना सोच के नहीं आए थे उससे आगे बढ़े ये लोग. पैसे से लेकर नाम तक. इससे बेहतर क्या लोगे आप.</p>
<p><strong>वरुण</strong>~ पुराने दिनों के बारे में, ख़ास कर के ‘एन ईवनिंग विद पीयूष मिश्रा’ होता था&#8230;</p>
<p><strong>पीयूष~</strong> तीन प्लेज़ थे एक-एक घंटे के. पहला ’दूसरी दुनिया’ था निर्मल वर्मा साब का, दूसरा ’वॉटेवर हैपंड टू बेट्टी लेमन’ (अरनॉल्ड वास्कर का), तीसरा विजयदान देथा का ‘दुविधा’. तब पैसे नहीं थे, प्लेटफॉर्म था नहीं&#8230; आउट ऑफ रेस्टलेसनेस किया था. वह फॉर्म बन गया भई की नया फॉर्म बनाया है. फॉर्म-वार्म कुछ नहीं था. &#8216;एक्ट वन&#8217; मैंने जब छोड़ा था &#8216;95 में, ऑलमोस्ट मुझे लगा था की मैं ख़तम हो गया. &#8216;एक्ट वन&#8217; वाज़ मोर लाइक ए फैमिली. और वहाँ से निकलने के बाद यह नई चीज़ आई.</p>
<p><strong>व</strong><strong>रुण</strong>~ (असली सवाल पर आते हुए) मेरे लिए ज़्यादा फैसिनेटिंग यह था कि उसकी ब्रान्डिंग, सेलिंग पॉइंट था आपका नाम. 1996 में दिल्ली में आपके नाम से प्ले चल रहा था, कहानियों के नाम से या लेखक के नाम से या नाटक के नाम से नहीं, आपके नाम से परफॉर्मेन्स हो रही थी. बॉम्बे ने अब जा कर रेकग्नाइज़ किया है&#8230;</p>
<p><strong>पीयूष~</strong> &#8216;झूम बराबर झूम&#8217; में काम किया, वो चल नहीं पाई. &#8216;मक़बूल&#8217; में काम किया, उसका ज़्यादा श्रेय पंकज कपूर और इरफ़ान को मिला&#8230; वो भी अच्छे एक्टर हैं&#8230; पर पता नहीं कुछ कारणों से, &#8216;मक़बूल&#8217; में बहुत तारीफ़ के बावजूद रेकग्निशन नहीं मिला. &#8216;आजा नच ले&#8217; में काम किया, उसका लास्ट का ओपेरा लिखा&#8230; ऐसा हुआ कि बस यह फिल्म (गुलाल) बड़ी ब्लेसिंग बन कर आई मुझ पर. जितना काम था, सब एक साथ निकालो. लोग रेस्पेक्ट करते थे&#8230; जानते थे भाई यह हैं पीयूष मिश्रा. लेकिन ऐसा कुछ हो जाएगा, यह नहीं सोचा था.</p>
<p><strong>वरुण</strong>~ गुलाल की बात करें तो&#8230; उसमें यह दुनिया अगर मिल भी जाए है, बिस्मिल की नज़्म है, कुछ पुराने गानों में भी री-इंटरप्रेटेशन किया है. इस सब के बीच आप मौलिकता किसे मानते हैं?</p>
<p><strong>पीयूष~ </strong>एक लाइन ली है&#8230; एक लाइन के बाद तो हमने सारा का सारा री-क्रियेट किया है. जितनी यह बातें हैं&#8230; वो आज की जेनरेशन की ज़ुबान बदल चुकी है. और आप उन्हें दोष भी नहीं दे सकते. अब नहीं है तो नहीं है, क्या करें. लेकिन उसी का सब-टेक्स्ट आज की जेनरेशन को आप कम्यूनिकेट करना चाहें, कि कहा बिस्मिल ने था&#8230; ऐसा कुछ कहा था – कम्यूनिकेशन के लिए फिर प्यूरिस्ट होने की ज़रूरत नहीं है आपको कि बहुत ऐसी बात करें कि नहीं यार जैसा लिखा गया है वैसा. और ऐसा नहीं है की उनको मीनिंग दिया गया है. नहीं – यह नई ही पोयट्री है.</p>
<p><strong>वरुण</strong>~ फिर भी, मौलिकता का जो सवाल है, फिल्म इंडस्ट्री में बार बार उठता है. संगीत को लेकर, कहानियों को लेकर, उसपर आपका क्या टेक है?</p>
<p><strong>पीयूष~</strong> मालूम नहीं&#8230; इंस्पिरेशन के नाम पर यहाँ पूरा टीप देते हैं. सारा का सारा, पूरा मार लेते हैं.</p>
<p><strong>वरुण</strong>~ आपके ही नाटक ‘गगन दमामा बाज्यो’ को &#8216;लेजेंड ऑफ भगत सिंह&#8217; बनाया गया. वहाँ मौलिकता को लेकर दूसरी तरह का डिबेट था.</p>
<p><strong>पीयूष~</strong> वहाँ पर जो है की फिर यू हैव टू बी रियल प्रोफेशनल. बॉम्बे का प्रोफेशनल! कैसे एग्रीमेंट होता है&#8230; मुझे उस वक़्त कुछ नहीं मालूम था. उस वक़्त मैं कर लिया करता था. हाँ भाई, चलो, आपके लिए कर रहे हैं मतलब आपके लिए कर रहे हैं. वहाँ फिर धंधे का सवाल है.</p>
<p><strong>वरुण</strong>~ &#8216;ब्लैक फ्राइडे&#8217; के गाने भी आपके ही थे. उनको उतना रेकग्निशन नहीं मिला जितना गुलाल को मिला.</p>
<p><strong>पीयूष~</strong> हूँ&#8230; हूँ&#8230; नहीं इंडियन ओशियन का वह गाना तो बहुत हिट है. उनका करियर बेस्ट है अभी तक का गाना. (&#8217;अरे रुक जा रे बँदे&#8217;)&#8230; लाइव कॉन्सर्ट करते हैं&#8230; उन्हीं के हिसाब से, दैट्स देयर ग्रेटेस्ट हिट! लेकिन अगर &#8216;ब्लैक फ्राइडे&#8217; सुपरहिट हो जाती, मालूम पड़ता पीयूष मिश्रा ने लिखा है गाना तो&#8230; सिनेमा के चलने से बहुत बहुत फ़र्क पड़ता है. हम थियेटर वालों को थोड़ी हार मान लेनी चाहिए की सिनेमा का मुक़ाबला नहीं कर सकते. वो तब तक नहीं होगा जब तक कि यहाँ (थियेटर की) इंडस्ट्री नहीं होगी. और इंडस्ट्री यहाँ पर होने का बहुत&#8230; यह देश इतना ज़्यादा हिन्दीवादी है ना&#8230; गतिशील ही नहीं है. यहाँ पर ट्रेडीशन ने सारी गति को रोक कर रख दिया है. हिन्दी-प्रयोग! पता नहीं क्या होता है हिन्दी प्रयोग? जो पसंद आ रहा है वो करो ना. हिन्दी नाटक&#8230; भाष्य हिन्दी का होना चाहिए, अरे हिन्दी भाष्य में कोई नहीं लिख रहा है नाटक यार. कोई ले दे के एक हिन्दी का नाटक आ जाता है तो लोग-बाग पागल हो जाता है की हिन्दी का नाटक आ गया! अब उन्हें नाटक से अधिक हिन्दी का नाटक चाहिए. लैंग्वेज के प्रति इतने ज़्यादा मुग्ध हैं&#8230; मैने जितने प्लेज़ लिखे उनमें से एक हिन्दी का नहीं था, सब हिन्दुस्तानी प्लेज़ थे.</p>
<p>एकेडमीशियन और थियेटर करने वालों में कोई फ़र्क नहीं (रह गया) है. जितने बड़े बड़े थियेटर के नाम हैं, सब एकेडमीशियन हैं. करने वाले बंदे ही अलग हैं. करने वाले बंदों को बहुत ही हेय दृष्टि से देखा जाता है. &#8220;यह नाटक कर रहा है&#8230; लेकिन वी नो ऑल अबाउट नाट्य-शास्त्र!&#8221; अरे जाओ, पढ़ाओ बच्चों को&#8230;</p>
<p><strong>वरुण</strong>~ लेकिन आपका मानना है कि बॉम्बे में थियेटर चल रहा है&#8230; दिल्ली के मुक़ाबले.</p>
<p><strong>पीयूष~ </strong>दिल्ली में लुप्त हो गया है. दिल्ली में बाबू-शाही की क्रांति के तहत आया था थियेटर. (नकल उतारते हुए) &#8220;नाटक में क्या होना चाहिए – जज़्बा होना चाहिए! जज़्बा कैसा? लेफ्ट का होना चाहिए.&#8221; एक्सपेरिमेंटेशन भी पता नहीं कैसा! यहाँ पर देखो, यह अभी भी चल रहा है – मानव (कौल) ने लिखा है यह प्ले (पार्क)&#8230; प्लेराइटिंग कर रहे हैं हिन्दी में और अच्छी-खासी हिन्दी है. कितना सारा नया काम हो रहा है यहाँ पर. और कमर्शियल थियेटर क्या है? ये कमर्शियल थियेटर नहीं है क्या&#8230; डेढ़ सौ रु. का टिकट ख़रीद रहा हूँ मैं यहाँ पर, कल मेरी बीवी देख रही है दो सौ रु. के टिकट में&#8230; दो सौ में तो मैं मल्टीप्लैक्स में नहीं देखूँ&#8230; सौ से आगे की वहाँ टिकट होती है तो मैं हार मान लेता हूँ कि नहीं जाऊँगा मैं लेकिन मैं देख रहा हूँ यहाँ. और इट्स ए वंडरफुल प्ले. हिन्दी का प्ले हैं, हिन्दी भाष्य का प्ले है, और क्या चाहिये आपको?</p>
<p>वहाँ पर होते (दिल्ली में) तो वो हिन्दी नाट्य.. हिन्दी नाट्य&#8230; क्या होता है ये हिन्दी नाट्य? भगवान जाने&#8230; ये बुढ़ापा चरमरा गया हिन्दुस्तान का&#8230; गाली देने की इच्छा होती है.</p>
<p><strong>वरुण~ </strong>फिर क्या इसमें एन.एस.डी. का दोष है?</p>
<p><strong>पीयूष~</strong> एन.एस.डी. का दोष (क्यों?)&#8230; एन.एन.डी. में तो अधिकतर बाहर के प्ले होते हैं.</p>
<p><strong>वरुण~</strong> लेकिन भारत में ऐसे दो-तीन ही तो इंस्टीट्यूट हैं जहाँ थियेटर पढ़ाया जाता है, सिखाया जाता है.</p>
<p><strong>पीयूष~</strong> वो एक अलग से लॉबी है जिनको लगता है कि हिन्दी प्लेज़ होने चाहिए. हिन्दी प्लेज़ से रेवोल्यूशन आयेगा. ये एक बहुत बड़ी एंटी-अलकाजी लॉबी है.. अलकाजी अगर नहीं होते और इसके बजाय कोई हिन्दी वाला होता वहाँ पर तो बात कुछ और ही होती (कहने वाले). उस बन्दे ने सम्भाला इतने दिनों तक, उस बन्दे ने हिन्दुस्तान के थियेटर को दिशा दी. अगर वो नहीं होता तो शांति से बैठकर प्ले कैसे लिखते हैं हमें नहीं मालूम पड़ता. हम तो चटाइयों वाले बन्दे थे. हमारी औकात वही थी और हम वही रहते&#8230; उस बन्दे ने हमें सिखाया कि खांसी आ जाए तो एक्सक्यूज़ मी कह देना चाहिये, माफ़ कीजियेगा, या बाहर चले जाओ. इतने बेवकूफ़ हैं हिन्दी भाषी और विशेषकर जो हमसे ऊपरवाली जनरेशन के हैं वो सिफ़र हैं यहाँ से (दिमाग़ की ओर इशारा). ख़ाली व्यंग्य करना आता है, टीका-टिप्पणी करना आता है&#8230; अगर ऐसा होता तो ऐसे हो जाता&#8230; ऐसा होता तो ऐसे हो जाता&#8230; जो हुआ है उस व्यक्ति को उसका श्रेय नहीं दे रहे हैं. अलकाजी साहब अगर नहीं होते तो नुकसान में थियेटर ही होता. अभी तक पारसी थियेटर ही होता रहता. सूखे-बासे नाटक होते रहते. वो नाटक के नाम पे हमको करना पड़ता. ही वाज़ दि पर्सन हू इंट्रोड्यूस्ड थियेटर इन इंडिया.</p>
<p><strong>वरुण~ </strong>आजकल मीडिया की जो भाषा है, न्यूज़ में भी हिन्दी और इंग्लिश मिक्स होता है.</p>
<p><strong>पीयूष~</strong> कहाँ तक बचाओगे यार? शास्त्रीय संगीत बचा क्या आज की तारीख़ में? कहाँ तक बचाओगे आप? कब तक? शुभा मुदगल को इल्ज़ाम दे दिया कि आप कुमार गंधर्व से पढ़ी और उसके बाद आप दूसरा किस्म का म्यूज़िक&#8230; कहाँ तक बचाओगे आप? ज़माना बदल रहा है, बदलेगा. ये परिवर्तन सब बहुत ही ज़रूरी अंग हैं दुनिया का. इसको बदलने दो. ज़्यादा गाँठ बाँधकर बैठोगे तो फिर वही गाँव के गाँव-देहात में बँधकर बैठना पड़ेगा कि चौपाल के आस-पास आपके किस्से सुनते रहेंगे लोग-बाग. उसके आगे कोई आपकी बात नहीं सुनेगा.</p>
<p>आज का संप्रेषण अलग है, आज की भाषा अलग है. बॉम्बे को देखकर लगता है कि भाषा&#8230; बॉम्बे के, साउथ बॉम्बे के किसी लौंडे से अब आप अपेक्षा करें कि वो उर्दू समझता हो या हिन्दी समझता हो&#8230; ’यो’ वाला लौंडा है वो, ऐसे ही बड़ा हुआ है तो आप उसको इल्ज़ाम क्यों देते हैं? आप सम्भाल कर रखिये. यहाँ पर बहुत सारे लोग हैं जिन्होंने अपनी भाषा सम्भालकर रखी है&#8230; मानव कौल अभी तक हिन्दी में लिख रहा है और क्या हिन्दी है उसकी&#8230; कोई टूटी-फूटी हिन्दी नहीं है. तो किसने कहा. आप बिगड़ने देना चाहते हैं तो आपकी भाषा बिगड़ जाएगी, जिस चीज़ से आपको मोह है उसे आप सम्भालकर रखेंगे. लेकिन उसमें झंडा उठाने की ज़रूरत नहीं है कि मैं वो हूँ&#8230; कि सबको ये करना चाहिए. जिसकी जो मर्ज़ी है वो करने दो ना यार. क्यों डेविड धवन को कोसो कि आप ऐसी फ़िल्म क्यों बनाते हैं, क्यों अनुराग को&#8230; अनुराग कश्यप की पिक्चरें भी लोगों को अच्छी नहीं लगतीं. ऐसा नहीं है कि हर बन्दा ऐसी पिक्चर को पसन्द ही करेगा. लेकिन ठीक है, हर बन्दे को अपनी-अपनी गलतियों के हिसाब से जीने का हक़ है.</p>
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		<title>नौकर की कमीज पढ़ते हुए&#8230;</title>
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		<pubDate>Wed, 08 Apr 2009 17:40:11 +0000</pubDate>
		<dc:creator>मिहिर</dc:creator>
				<category><![CDATA[Literature]]></category>
		<category><![CDATA[अकेलापन]]></category>
		<category><![CDATA[क्योंकि गद्य कवियों की कसौटी है]]></category>
		<category><![CDATA[पहचान]]></category>
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		<description><![CDATA[
विनोद कुमार शुक्ल का ’नौकर की कमीज’ पढ़ते हुए&#8230;
यदि मैं किसी काम से बाहर जाऊँ, जैसे पान खाने, तो यह घर से खास बाहर निकलना नहीं था. क्योंकि मुझे वापस लौटकर आना था. और इस बात की पूरी कोशिश करके कि काम पूरा हो, यानी पान खाकर. घर बाहर जाने के लिए उतना नहीं होता [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: center;">
<p style="text-align: center;"><strong>विनोद कुमार शुक्ल का ’नौकर की कमीज’ पढ़ते हुए&#8230;</strong></p>
<p>यदि मैं किसी काम से बाहर जाऊँ, जैसे पान खाने, तो यह घर से खास बाहर निकलना नहीं था. क्योंकि मुझे वापस लौटकर आना था. और इस बात की पूरी कोशिश करके कि काम पूरा हो, यानी पान खाकर. घर बाहर जाने के लिए उतना नहीं होता जितना लौटने के लिए होता है.</p>
<p>मेरी आवाज़ में बहुत कमज़ोरी थी. उदाहरण के लिए एक ऐसे बीमार आदमी की कमज़ोरी जिसे बिस्तर से सहारा देकर उठाया जाता है. कई दिनों से उसे भूख नहीं लगी. चटपटी सब्जी खाने की उसकी बहुत इच्छा होती है. पर सब्जी कोई बनाता नहीं. जो भी वह खाता है, उल्टी हो जाती है. पानी पीता है. कराहता रहता है. डाक्टर को पूरी उम्मीद है कि वह बच जाएगा. इसलिए घर के लोग खुश हैं. और जितनी तकलीफ़ बीमार को है, उतना दुख उन लोगों को नहीं है, ऐसा बीमार सोचता है. जब वह अपनी तकलीफ़ की बात करता है तो उसकी पत्नी उसकी तकलीफ़ को यह कहकर कम कर देती है कि डाक्टर ने कहा है उसे कुछ नहीं होगा. जब वह कहता है कि अब वह मर जायेगा, तब उसकी माँ उसका माथा सहलाती हुई कहती है कि घबराओ नहीं, डाक्टर ने कहा है सब ठीक हो जाएगा. उसे प्यास लगती है, तो पत्नी कटोरी में दूध लेकर आती है. मजबूरी में थोड़ा दूध पी लेता है. तभी उसे कै करने की इच्छा होती है. उससे मिलने के लिए उसके दफ़्तर के लोग आते हैं. कमज़ोरी में वह किसी से बात नहीं कर सकता. गले तक चादर ओढ़े वह पड़ा रहता है. उसके बदले उसकी माँ और पत्नी मिलनेवालों से बात करती हैं. लोगों के पूछने कि पहले की तबियत कैसी है, दोनों में से कोई कहेगा कि डाक्टर ने कहा कि सब ठीक हो जाएगा. गुस्से में वह पत्नी को गाली देना चाहता है. माँ से बात करना नहीं चाहता. पर कमज़ोरी के कारण वह शांत रहता है. मरता नहीं, थककर सो जाता है.</p>
<p>हमेशा-हमेशा के लिए मैदान छोड़ने की मेरी इच्छा कभी नहीं हुई. मैं ज्यादा देर तक न तो घर से बाहर रह सकता था और न घर के अंदर. फिर भी मेरी मन:स्थिति ऐसी थी जिसमें मैं अनंत काल तक घर लौटना नहीं चाहता था. पर जब भी लौटूँ, पत्नी को उसी तरह भरी बाल्टी लिए हुए, माँ को चावल पछोरते हुए पाना चाहता था. यानी अनंतकाल के बाद भी हर चीज को बिलकुल अभी जैसी &#8212; जैसे इस घर को, गिरे हुए गिलास को, पर खपरों में लगे मकड़ी के जालों को नहीं. और उस मक्खी को भी नहीं जो मेरी पत्नी के पैर में बार-बार आकर बैठ रही थी. चाहता था कि अनंतकाल से लौटने के बाद दोनों खुश मिलें. पत्नी की आँख के नीचे जो काले धब्बे हैं, वे न हों. घर की लिपाई-पुताई हो जाए तो और भी अच्छा है.</p>
<p>किसी दिन पच्चीसों बार ऐसा होता था कि बस दु:ख ही दु:ख है. उसी दिन या दूसरे दिन कुछ ऐसी बातें भी होती थीं जिससे दु:ख नहीं होता था. कभी-कभी बहुत खुशी की बात भी होती थी. दु:ख को घटाकर महसूस करने की ताकत मुझमें नहीं थी. मैं ऐसे नाप का गिलास बन गया था कि थोड़ी तकलीफ़ में भी दु:ख से भर जाता और ज्यादा तकलीफ़ में भी यही होता. ऐसी अकलमंदी नहीं थी कि एक लकीर को बिना मिटाए छोटी करने के लिए तरीका बड़ी लकीर खींचने का है. ऐसी अकलमंदी किस काम की कि हर आनेवाला दु:ख पहले से बड़ा होता चला जाए और बीते दु:ख का संतोष हो कि बड़ा नहीं था.</p>
<p>जिंदगी के हर क्षण से पच्चीसों लाल चीटियाँ चिपकी रहती थीं, शायद पसीना इसका कारण हो. लेकिन उनको सहने की आदत पड़ गई थी. जिस क्षण से चींटी अलग होती वह क्षण भी चींटी के साथ-साथ मरकर नीचे गिर जाता. यदि एकबारगी कोई गर्दन काटने के लिए आए तो जान बचाने के लिए जी-जान से लड़ाई होती. इसलिए एकदम से गर्दन काटने कोई नहीं आता. पीढ़ियों से गर्दन धीरे-धीरे कटती है. इसलिए खास तकलीफ़ नहीं होती और गरीबी पैदाइशी रहती है. गर्दन को हिलगाए हुए सब लोग अपना काम जारी रखते हैं &#8212; यानी गर्दन कटवाने का काम.</p>
<p>मेरा वेतन एक कटघरा था, जिसे तोड़ना मेरे बस में नहीं था. यह कटघरा मुझमें कमीज की तरह फ़िट था. और मैं अपनी पूरी ताकत से कमजोर होने की हद तक अपना वेतन पा रहा था. इस कटघरे में सुराख कर मैं सिनेमा देखता था, या स्वप्न. हफ़्ते-भर बाद ही मेरी फ़िल्म देखने की इच्छा हो जाती थी. फ़िल्में और लोगों की तरह मुझमें भी जीने का विश्वास बढ़ाती थीं. यह जीना यथास्थिति में जीने का था. रिक्शेवाले से एक करोड़पति की लड़की की शादी हो सकती थी तो रिक्शावाला इसी संतोष से रिक्शा चलाता रहेगा. अमीर लड़की से गरीब लड़के के प्रेम को देखकर गरीबों को कुछ वैसा ही सुख मिलता था जो अपनी चारपाई या जमीन पर सोने से ज्यादा, बढ़िया गद्देदार पलंग के नीचे झाडू लगाने में नौकर को मिलता होगा. खाना बनानेवाला नौकर ज्यादा खाना बनाएगा ताकि खाना बचे. परंतु विज्ञान से गरीबों को खास लाभ नहीं मिला था. मालकिन बचा हुआ खाना रेफ्रीजरेटर में रख देगी. नौकर को कभी-न-कभी कुछ जरूर मिलेगा क्योंकि रेफ्रीजरेटर में रखे-रखे बहुत दिनों का सामान खराब हो जाता है. ज्यादातर आदमी का स्वाद मिठाई के ढेर से थोड़ी मिठाई चुराकर चख लेने का स्वाद था. आदमी के विचार तेजी से बदल रहे थे. लेकिन उतनी ही तेजी से रद्दीपन इकट्ठा हो रहा था. रदीपन देर तक ताजा रहेगा. अच्छाई तुरंत सड़ जाती थी.</p>
<p>देवांगन बाबू 5 फुट 2 इंच के थे. उनकी ड्रार में एक डायरी थी, उसमें ऊँचाई की जगह उन्होंने 5 फुट 2 इंच लिखा था. वजन में 58 किलो लिखा था. स्कूटर, कार के नंबर की जगह साइकिल का नंबर था. ड्राइविंग लाइसेंस नंबर की जगह उनके दो लड़कों का नाम था- मदनलाल देवांगन और सोहनलाल देवांगन. टेलीफोन नंबर की जगह वल्द रामचरन देवांगन, ग्राम डोंगरगाँव था. रेडियो लाइसेंस नंबर की जगह उन्होंने रेडियो लाइसेंस का नंबर ही लिखा था. सेफ डिपाजिट व्हाल्ट की जगह उन्होंने लिखा था&#8211; हरे रंग की पेटी.</p>
<p>अपने बस में करने और अपना खरीदा गुलाम बनाने के तरीके बदल गए थे. सड़क के किनारे कोई आदमी थका हुआ सुस्ताने खड़ा रहेगा तो एक रौबदार आदमी आएगा और समझाते हुए कहेगा कि यह तुम्हारे खड़े होने लायक जगह नहीं है. वह सोचेगा जगह खड़े होने लायक क्यों नहीं है. रौबदार आदमी इशारा करके बतलाएगा कि वहाँ खड़े रहो जहाँ उसकी मोटरकार है. फिर बहुत आत्मीयता से कंधे पर हाथ रखकर उस जगह तक ले जाएगा. फिर कहेगा कि खड़े-खड़े मोटरकार ताकते रहो, वह अभी खरीदी करके आता है और आजकल पलक झपकते चोरी हो जाती है. मोटरकार कोई न ले जाए पर उस पर जमी धूल पर बदमाश लड़के उँगली से अश्लील गालियाँ लिख देते हैं. मालूम पड़ता नहीं. मोटर के साथ-साथ गंदी गालियाँ घर तक पहुँच जाती हैं जिस पर घर में लड़के, लड़की, नौकर, पत्नी सबकी नज़र पड़ती है. यह हरकत सभी मोटरकार के साथ होती है. फिर भी शंका तो होती है कि उसके साथ क्यों? कोई उससे ज़रूर चिढ़ा हुआ है जो सामने नहीं आना चाहता. छुपकर वार करने की फिराक में है. तब वह पूरी ईमानदारी से मानवता के आधार पर, जो उसे परंपरा से मिले थे, टकटकी बाँधे मोटरकार को ताकता रहेगा. यहाँ तक कि ताकते-ताकते थक जाएगा. तब उसे गृहस्थी के बहुत से ज़रूरी काम याद आएँगे. वह परेशान होकर चहल-कदमी करने लगेगा. चलकदमी करते-करते फिर थक जाएगा और सुस्ताते हुए मोटरकार ताकता रहेगा; आखिर में वह देखेगा कि मोटरकारवाला कब का मोटरकार लेकर चला गया. मोटरकार का नम्बर उसे याद नहीं रहेगा. पर मोटर के पीछे धूल में लिखी गालियाँ उसे याद रहेंगी.</p>
<p>मिट्टी के तेल की उधारी पाकर मैं बहुत संतुष्ट था. सही माने में सभी संतुष्ट थे. भिखारी को भीख मिल जाती थी. बेईमानी के साथ-साथ धर्म के काम भी बढ़ते थे. क्योंकि बेईमानी की कमाई से धर्म-पुण्य का काम होता था.</p>
<p>घर का खर्च कम नहीं होता था. फालतू खर्च क्या है, जिसमें कटौती की जाए, यह बहुत दिनों तक समझ में नहीं आया. बाद में भिखमंगे को रोटी देना एक फालतू खर्च समझ में आया. तब यह रोटी घर में उपयोग होने लगी. -खर्च पूरा न बैठने के कारण दया और उदारता कम हो जाती है, यह बात समझ में जल्दी आती थी. उदारता और दया का सीधा-सीधा संबंध रुपए से है. सिर पर हाथ फिरा देना न तो उदारता होती है, न दया. बस सिर पर हाथ फिराना होता है.</p>
<p>बड़े-बड़े बँगलों के सामने रास्ता चलती गायों के पानी पीने के लिए एक-एक टाँका बना था. गर्मियों मे सेठ मारवाड़ियों के लड़के प्याऊ खोलकर बैठ जाते थे. रेलवे स्टेशन में यात्रियों को ठंडा पानी पिलाने के लिए रेलगाड़ी के समय लड़के मोटरकार में बैठकर आते. यात्रियों को पानी पिलाकर पसीना पोंछते हुए घर लौट जाते थे. दोनों हाथ हिलाते चलते थे, एक हाथ से बईमानी और दूसरे हाथ से धर्म, सामाजिक और राजनैतिक कार्य इत्यादि.</p>
<p>गरीब एक स्तर के होते हुए भी एक जैसे इकट्ठे नहीं होते जैसे पचास आदमी को काटकर पचास आदमी बना देना. यदि पचास हैं तो इसका मतलब सिर्फ़ पचास, एक और फिर गिनती गिनो इक्यावन.</p>
<p>&#8220;मैं अपनी कमीज नौकर को कभी देना नहीं चाहूँगा. जो मैं पहनता हूँ उसे नौकर पहने, यह मुझे पसन्द नहीं है. मैं घर का बचा-कुचा खाना भी नौकरों को देने का हिमायती नहीं हूँ. जो स्वाद हमें मालूम है, उनको कभी नहीं मालूम होना चाहिए. अगर यह हुआ तो उनमें असंतोष फैलेगा. बाद में हम लोगों की तकलीफ़ें बढ़ जाएँगी. खाना उनको वैसा ही दो, जैसा वे खाते हैं. जैसा हम खाते हैं, वैसा बचा हुआ भी मत दो. ये पेट भरते हैं, चाहे आधा या चौथाई. स्वाद से इनको कोई मतलब नहीं. सड़क के किनारे चाट खाने वाले, चाट खाकर जो फैंकते हैं, यह मुझे गुस्सा दिलाता है. इसी के कारण आवारा गरीब लड़के पत्ते चाटकर जादुई स्वाद का पता लगा लेते हैं, जिससे चोरी, गुंडागर्दी और हक माँगनेवाली झंझटें बढ़ी हैं. स्वाद हम लोगों को संतोष नहीं दे सका तो इनको क्या देगा? अगर ये स्वाद के चक्कर में पड़ गए तो अपनी जान बचानी मुश्किल होगी.&#8221;</p>
<p>मैं अधिक देर तक नौकर की कमीज पहने हुए नहीं रह सकता था. इससे छुटकारा पाना चाहता था. कमीज से मुझे पेन्ट की गंध आ रही थी. साहब के बंगले की खिड़की-दरवाजों में अभी हाल में पेन्ट किया गया था. मैंने अपने हाथों को सूँघकर देखा, उससे भी नए पेन्ट की गंध आ रही थी. क्या मुझे भी पेन्ट किया गया है?</p>
<p>बड़े बाबू के दो लड़के और तीन लड़कियाँ थीं. एक लड़का साल भर हो गया, घर से भाग गया था. पत्नी तीन-चार साल से नहीं थी. उन्हें अपने लड़के के मिलने की उम्मीद रोज़ रहती थी. जब वह भीड़ में होते तो यह उम्मीद बढ़ जाती थी. इसलिए यदि सब्जी खरीदने गए तो खरीदते-खरीदते भीड़ में नज़र से अपने लड़के को ढूँढते. जब पिक्चर देखने जाते तो खेल खत्म होने के बाद एक तरफ़ खड़े होकर भीड़ की तरफ़ देखते रहते. सड़क पर जहाँ दस-पन्द्रह आदमी दिखाई देते तो वहाँ लड़के को ढूँढने का मन होता और एक ढूँढ़ती नज़र डालकर आगे बढ़ जाते. आते-जाते लोगों पर भी उनकी निगाह ढूँढ़ लेने की होती. किसी परिचित को भी देखेंगे, जैसे वे एकदम से मुझे संतू बाबू नहीं देखेंगे, पहले देखेंगे कि मैं उनका लड़का नहीं हूँ, फिर मुझे संतू बाबू देखेंगे.</p>
<p>छुट्टी मुझे एक ऐसी फुर्सत लगती है जिसमें एक आदमी अपना ही तमाशा देखता है.</p>
<p>कितना सुख था !</p>
<p style="text-align: center;"><strong>&#8216;नौकर की कमीज’, लेखक- विनोद कुमार शुक्ल<br />
दूसरी आवृत्ति 2006, राजकमल प्रकाशन,<br />
1-बी, नेताजी सुभाष मार्ग, नई दिल्ली-110002</strong></p>
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		<title>बीत चुके हैं अब युग शहरों के</title>
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		<pubDate>Thu, 26 Feb 2009 21:13:05 +0000</pubDate>
		<dc:creator>मिहिर</dc:creator>
				<category><![CDATA[Literature]]></category>
		<category><![CDATA[कविता के देस में]]></category>
		<category><![CDATA[रिल्के]]></category>
		<category><![CDATA[शहर]]></category>

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		<description><![CDATA[पिछले दिनों अपने शोध के सिलसिले में फ़िल्म दर फ़िल्म दिल्ली शहर की संरचना को परखते हुए रिल्के की कविताओं से मुलाकात हुई. साहित्य अकादेमी से प्रकाशित अपने अनुवाद में अनामिका उन्हें ’औरतों की मेज़ का कवि’ कहती हैं. यहाँ दर्ज कविता अब मेरे शोध प्रबंध का हिस्सा है. रिल्के का सौ साल पुराना शहरीकरण [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<blockquote><p>पिछले दिनों अपने शोध के सिलसिले में फ़िल्म दर फ़िल्म दिल्ली शहर की संरचना को परखते हुए <strong><a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Rainer_Maria_Rilke" target="_blank">रिल्के </a></strong>की कविताओं से मुलाकात हुई. साहित्य अकादेमी से प्रकाशित अपने अनुवाद में अनामिका उन्हें ’औरतों की मेज़ का कवि’ कहती हैं. यहाँ दर्ज कविता अब मेरे शोध प्रबंध का हिस्सा है. रिल्के का सौ साल पुराना शहरीकरण का यूरोपीय अनुभव आज हमारे लिए आईने सरीख़ा है. क्या मैं ठीक देख रहा हूँ&#8230; रिल्के भी इस यांत्रिक होते जा रहे अनुभव के ताप को उदास बच्चे और अकेली स्त्री के बिम्ब के माध्यम से ही क्यों पकड़ते हैं? क्या यह सच नहीं कि एक अमानवीय होते जा रहे शहर का वार सबसे पहले आबादी के पीछे छूटे हुए हिस्से पर ही पड़ता है&#8230;</p></blockquote>
<p style="text-align: left;"><strong><br />
</strong></p>
<p style="text-align: center;"><strong>&#8216;बीत चुके हैं अब युग शहरों के’</strong></p>
<p style="text-align: center;">और महान शहर, ऎ ईश्वर, वे क्या हैं?<br />
विघटित और छूटी हुई जगहें.<br />
जिस शहर को जानता हूँ मैं -<br />
वह दीखता है -<br />
आग से भागते हुए पशुओं-सा.<br />
आश्रय<br />
आश्रय नहीं रहा.<br />
बीत चुके हैं अब युग शहरों के.<br />
स्त्री-पुरुष वहाँ रहते हैं आक्रांत<br />
अंधेरे कमरों में -<br />
मानवीय उपक्रम से डरे हुए,<br />
साल-भर के बछड़ो के झुंड से भी<br />
कुछ ज़्यादा ही भयभीत.<br />
अब भी आँखें खोलती है और भरती है साँस<br />
तुम्हारी धरती -<br />
पर उनको अहसास नहीं रहा धरती की साँसों का.<br />
खिड़की पर ही बिता देता है बच्चा बचपन के साल,<br />
छाया वहाँ भी बनाती है एक समान कोण हर रोज़.<br />
उसे समझ ही नहीं आता कि सारे जंगली गुलाब<br />
उसे ही पुकारते हैं हरदम- खुली-खुली जगहों,<br />
खुशियों और हवाओं के दिन तक.<br />
धीरे-धीरे एक दिन वह भी बन जाता है उदास बच्चा.</p>
<p style="text-align: center;">युवतियाँ खिलती हैं ऊर्ध्वमुखी -<br />
अज्ञात की ओर.<br />
बचपन की शांति मचलती है मन में तब चाहत-सी<br />
हालाँकि जिसकी भी ख़ातिर मचलती है -<br />
वह इस दुनिया में नहीं होता.<br />
काँपता है बदन उसका -<br />
जब वे ख़ुद को मूँदती हैं फिर एक बार.<br />
माँ बनने के वे सब निराश साल<br />
तो गुज़र जाते हैं &#8211; अँधियारे फ़्लैटों में.<br />
रात-दर-रात नहीं जगती कामना कोई भी<br />
और वे रोती रहती हैं.<br />
ठंडे बरस गुज़रते हैं &#8211; अशक्त,<br />
बिना किसी असल युद्ध के.<br />
अँधेरे कमरे में,<br />
करती है इंतज़ार<br />
उनकी मृत्युशय्या,<br />
और फिर वे चाहती हैं<br />
घीरे-धीरे उसमें धँसना, बहुत देर लगाती हैं मरने में,<br />
जैसे कि ज़ंजीरों में हों वे<br />
और उन्हें मरना हो -<br />
दूसरों पर निर्भर -<br />
जैसे भिखारी.</p>
<p style="text-align: center;"><strong>~रिल्के.</strong> कविता का हिन्दी में अनुवाद <strong>अनामिका</strong> द्वारा किया गया है.</p>
]]></content:encoded>
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		<item>
		<title>&#8216;आप उसे फोन करें&#8217;: बद्री नारायण</title>
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		<pubDate>Wed, 01 Oct 2008 11:37:54 +0000</pubDate>
		<dc:creator>मिहिर</dc:creator>
				<category><![CDATA[Literature]]></category>
		<category><![CDATA[कविता के देस में]]></category>

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		<description><![CDATA[बद्री नारायण की कविताएं मेरे जीवन में एक घटना की तरह आती हैं. मैं उन्हें व्यवस्थित रूप से नहीं पढ़ता. वे आती हैं, अनिश्चितता और तनाव के क्षणों में वे एक छोटी सी उदास खुशी की तरह आती हैं. अचानक, जैसे हृषिकेश मुखर्जी की &#8216;बावर्ची&#8217; में रघु भैया आते हैं. भूले हुए गीत को याद [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<blockquote><p><strong>बद्री नारायण</strong> की कविताएं मेरे जीवन में एक घटना की तरह आती हैं. मैं उन्हें व्यवस्थित रूप से नहीं पढ़ता. वे आती हैं, अनिश्चितता और तनाव के क्षणों में वे एक छोटी सी उदास खुशी की तरह आती हैं. अचानक, जैसे हृषिकेश मुखर्जी की &#8216;बावर्ची&#8217; में रघु भैया आते हैं. भूले हुए गीत को याद दिलाने. और वे मेरा कैनवास बड़ा कर देती हैं.</p>
<p><strong>बद्री नारायण</strong> की कविताओं पर मरा जा सकता है. अक्सर उनकी प्रेम-कविताएं डायरी में या किसी रजिस्टर के सबसे पिछले पन्ने पर हू-ब-हू उतार ली जाती हैं और फ़िर किसी दर्जन भर पन्ने वाली, लाल स्याही से लिखी चिट्ठी के तीसरे पन्ने पर बैठकर वे एक पते से दूसरे पते की अक्षांश- देशान्तरों में फ़ैली यात्राएं करती हैं. उनकी कविता <strong>&#8216;प्रेम-पत्र&#8217;</strong> मेरी एक पुरानी डायरी के हरे रंग के पन्ने में आज भी दर्ज है.</p></blockquote>
<p>*****</p>
<p><strong>आप उसे फोन करें</strong></p>
<p>&#8220;आप उसे फोन करें<br />
तो कोई ज़रूरी नहीं कि<br />
उसका फोन खाली हो<br />
हो सकता है उस वक्त<br />
वह चाँद से बतिया रही हो<br />
या तारों को फोन लगा रही हो</p>
<p>वह थोड़ा धीरे बोल रही है<br />
सम्भव है इस वक्त वह किसी भौंरे से<br />
कह रही हो अपना संदेश<br />
हो सकता है वह लम्बी, बहुत लम्बी बातों में<br />
मशगूल हो<br />
हो सकता है<br />
एक कटा पेड़<br />
कटने पर होने वाले अपने<br />
दुखों का उससे कर रहा हो बयान</p>
<p>बाणों से विंधा पखेरू<br />
मरने के पूर्व उससे अपनी अंतिम<br />
बात कह रहा हो</p>
<p>आप फोन करें तो हो सकता है<br />
एक मोहक गीत आपको थोड़ी देर<br />
चकमा दे और थोड़ी देर बाद<br />
नेटवर्क बिजी बताने लगे<br />
यह भी हो सकता है एक छली<br />
उसके मोबाइल पर फेंक रहा हो<br />
छल का पासा</p>
<p>पर यह भी हो सकता है कि एक फूल<br />
उससे कांटे से होने वाली<br />
अपनी रोज रोज की लड़ाई के<br />
बारे में बतिया रहा हो<br />
या कि रामगिरी पर्वत से<br />
चल कोई हवा<br />
उसके फोन से होकर आ रही हो<br />
याकि चातक, चकवा, चकोर उसे<br />
बार बार फोन कर रहे हों</p>
<p>यह भी सम्भव है कि<br />
कोई गृहणी रोटी बनाते वक़्त भी<br />
उससे बातें करने का लोभ संवरण<br />
न कर पाये<br />
और आपके फोन से उसका फोन टकराये<br />
आपका फोन कट जाये</p>
<p>हो सकता है उसका फोन<br />
आपसे ज़्यादा<br />
उस बच्चे के लिए ज़रूरी हो<br />
जो उसके साथ हंस हंस<br />
मलय नील में बदल जाना चाहता हो<br />
वह गा रही हो किसी साहिल का गीत<br />
या हो सकता है कोई साहिल उसके<br />
फोन पर, गा रहा हो<br />
उसके लिए प्रेमगीत</p>
<p>या कि कोई पपीहा<br />
कर रहा हो उसके फोन पर<br />
पीऊ पीऊ<br />
आप फोन करें तो कोई ज़रूरी<br />
नहीं कि<br />
उसका फोन खाली हो.&#8221;</p>
<p><strong>~बद्री नारायण.<br />
</strong><a href="http://www.tadbhav.com/"><strong>&#8216;तद्भव-18&#8242;</strong></a><strong> से साभार.</strong></p>
<p>*****</p>
]]></content:encoded>
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		<title>ऊधो मोहि ब्रज बिसरत नाहीं</title>
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		<pubDate>Fri, 05 Sep 2008 10:37:06 +0000</pubDate>
		<dc:creator>मिहिर</dc:creator>
				<category><![CDATA[Literature]]></category>
		<category><![CDATA[Memoir]]></category>
		<category><![CDATA[अकेलापन]]></category>
		<category><![CDATA[दिल्ली]]></category>
		<category><![CDATA[पहचान]]></category>
		<category><![CDATA[राजेंद्र यादव]]></category>
		<category><![CDATA[शहर]]></category>

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		<description><![CDATA[मेरे दोस्त समझ जायेंगे कि मैं आजकल &#8216;घर&#8217; को इतना क्यों याद करता हूँ. &#8216;घर&#8217; के छूटने का अहसास बहुत तीखा है. दोस्त मेरे भीतर कुछ अजीब से संशय देखते हैं. ठीक ठीक वजह तो मुझे भी नहीं मालूम लेकिन बहुत दिनों बाद यह एक ऐसा दौर है कि मेरे डर अचानक सामने बैठे दोस्त [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<blockquote><p><em>मेरे दोस्त समझ जायेंगे कि मैं आजकल &#8216;घर&#8217; को इतना क्यों याद करता हूँ. &#8216;घर&#8217; के छूटने का अहसास बहुत तीखा है. दोस्त मेरे भीतर कुछ अजीब से संशय देखते हैं. ठीक ठीक वजह तो मुझे भी नहीं मालूम लेकिन बहुत दिनों बाद यह एक ऐसा दौर है कि मेरे डर अचानक सामने बैठे दोस्त को दिख जाते हैं. मेरी चिट्ठियाँ राह भटक जाती हैं. लेकिन मुझे भरोसा है कि इस वक्त वो आयेंगे और मुझे संभाल लेंगे. वो जहाँ कहीं भी हैं, सोचेंगे और उनका सोचना ही काफ़ी है. डर हैं, और डर किस मन में नहीं होते लेकिन मैं सपने देखना नहीं छोडूंगा. सपनों में उन्हें देखना नहीं छोडूंगा. एक कुतुबनुमा मेरे पास भी है&#8230;</em></p></blockquote>
<p><img class="alignright" style="float: right;" src="http://tbn1.google.com/images?q=tbn:2HnxjxCChyu_XM:http://www.photofloue.net/blog/wp-content/uploads/2007/05/filename.jpg" alt="" width="125" height="91" />&#8220;हम सबका एक &#8216;घर&#8217; होता है. बहुत प्यारा, संपूर्ण, सुरक्षित और स्वस्तिदायक&#8230; फिर हम &#8216;बड़े&#8217; होते हैं और घर &#8216;छोटा&#8217; होता जाता है, छूट जाता है. ज़िंदगीभर हम उसी की तलाश में भटकते रहते हैं. कभी सोच में, कभी सपनों में, कभी रचनाओं में, भौतिक उपलब्धियों में, प्रशस्तियों में, विद्रोह और समझौतों में, कभी निष्क्रियाताओं में तो कभी कर्म की दुनिया में&#8230; मगर उम्र का, स्थान का, विश्वासों का, मूल्य और मान्यताओं का, भावनाओं और सुरक्षाओं का वह घर हमें कभी नहीं मिलता. लौटकर जाएँ तो भी पीछे छूटा हुआ न तो घर वही रह जाता है, न हम&#8230; जो कुछ मिलता है वह &#8216;अपना घर&#8217; नहीं होता और हम सोचते हैं : कहीं कोई घर होता भी है? इस सच्चाई का सामना करने से भी हम डरते हैं कि कहीं ऐसा तो नहीं है कि सचमुच कोई घर हो ही नहीं और हम एक भ्रम को जीते रहे हों&#8230; क्या है यह &#8216;घर&#8217; का भ्रम जो हमेशा खींचता रहता है? यह भी तो तय करना मुश्किल है कि घर की तलाश आगे की ओर है या पीछे की ओर? यह स्मृति है या स्वप्न? विज़न या नास्टेल्जिया? या फैलकर बेहतर दुनिया के लिए आस्था? कभी भी अधूरी छूट जाने के लिए अभिशप्त एक अंतहीन यात्रा ही क्या हमारी नियति है? उपलब्धियों के नाम पर कुछ पड़ाव, कुछ नखलिस्तान&#8230; चंद तसवीरें&#8230; अनेक पात्रों के नाम से की जानेवाली कुछ आत्म-स्वीकृतियां.</p>
<p>कभी कभी मैं सोचता हूँ कि क्या दुनिया की सारी सभ्यताएँ और संस्कृतियाँ उन्हीं लोगों ने तो नहीं रचीं जो विस्थापित थे और पीछे छूटे घर की याद में निरंतर वर्तमान और भविष्य की रचना करते रहे? हमें ऐसे वर्तमान में फेंक दिया गया है जो लगातार हमें भविष्य में धकेल रहा है ओर हर &#8216;है&#8217; को अनुक्षण अतीत बना रहा है. इस प्रक्रिया में हम अपने &#8216;अब&#8217; को सिर्फ़ &#8216;था&#8217; में बदलते जाने के निमित्तभर नहीं हैं? जो &#8216;था&#8217; वो कभी नहीं &#8216;होगा&#8217;, मगर हम उसे ही याद करेंगे, यानी उस स्मृति के किसी न किसी अंश को अपना सपना बनाते रहेंगे&#8230; वर्तमान और भविष्य चाहे जितने समृद्ध, संपन्न और महान बन जाएँ, मगर हमें हमेशा लगेगा कि जो बात पीछे थी वो आज नहीं है. होगी भी नहीं. शव पर चढ़े या सिंहासन पर, गले में हों या शीश पर, फूल तो हम पीछे छूटे हुए किसी पेड़ के ही हैं. हम आज जहाँ हैं वहाँ के हैं नहीं, बिलोंग कहीं और करते हैं. -कहाँ, यह भी हमें पता नहीं. एक भटका हुआ बच्चा जिसे अपने घर-बार, माँ-बाप किसी का नाम पता मालूम नहीं. मगर रोता उन्हीं के लिए है और हम समझाते हैं कि जहाँ हम उसे ले जा रहे हैं वहीं उसके घर-बार, माँ-बाप सभी हैं. इस झूठ की रचना या पीछे छूटे हुए को वापस दे देने के आश्वासन का नाम ही सभ्यता-संस्कृति नहीं है? तब फ़िर हम क्या ऐसे शाश्वत-शिशु ही हैं जो हर कहीं, हर किसी में अपना घर देखता है. बहुत कुछ बनाता और तोड़ता है और हर समय जानता रहता है कि यह उसका घर नहीं है.</p>
<p><img class="alignleft" style="float: left;" src="http://farm3.static.flickr.com/2152/2023586442_ee026b9e8b.jpg?v=0" alt="" width="280" height="180" />कहते हैं आदमी हर क्षण अपने पीछे छूटे हुए किसी &#8216;स्वर्ग&#8217; में लौटना चाहता है जहाँ वह सुरक्षित और सुखी था. व्यक्तिगत स्तर पर माँ के गर्भ में लौटने की ललक है. छूटा हुआ असली &#8216;घर&#8217; तो वही था. मगर वह यह भी जानता है कि वहाँ या किसी भी स्वर्ग में वह कभी नहीं लौटेगा. उसे अपना स्वर्ग ख़ुद बनाना पड़ता है. इकबाल की तरह या स्वर्ग से निष्कासित नहुष की तरह; किसी विश्वामित्र के मंत्रों पर सवार होकर&#8230; हमारी उस बैचनी को समझकर न जाने कितने विश्वमित्रों ने हमें &#8216;घर&#8217; या स्वर्ग देने के आश्वासन दिए हैं, सपने दिखाए हैं और वहाँ जाकर हमने पाया है कि न तो वह हमारा घर है, न वायदे का स्वर्ग. इस विश्वासघात से क्षुब्ध हम स्वयं उस घर और स्वर्ग को तोड़ते हैं. फ़िर से नए सपने के निर्माण के लिए. कितना थका देनेवाला, लेकिन कितना अनिवार्य है यह सिलसिला. हर बार किसी पैगम्बर, किसी गुरु या अवतार के दिए हुए सपनों का हिस्सा बनने की छलना, वहाँ पहुँचकर फ़िर एक नए नरक में पहुँचने का अहसास और फ़िर एक नए अवतार की प्रतीक्षा. फ़िर इस दुष्चक्र में धर्म, राजनीति या विज्ञान, तकनीक के नए-नए सम्प्रदायों को बनाते चले जाना, जो इसमें बाधक हैं उन्हें हटाते या समाप्त करते चले जाना ताकि अपने सपने को साकार किया जा सके. यानि सब मिलाकर हमेशा एक उम्मीद, संक्रमण, और यात्रा में बने रहने की नियति&#8230; युग-युग धावित यात्री. किंतु पहुँचना उस सीमा तक जिसके आगे राह नहीं&#8230; चरैवेति&#8230; चरैवेति&#8230;&#8221;</p>
<p><strong>राजेंद्र यादव. &#8220;अभी दिल्ली दूर है&#8221; की भूमिका से.</strong></p>
]]></content:encoded>
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		<title>मोहनदास</title>
		<link>http://mihirpandya.com/2008/07/%e0%a4%ae%e0%a5%8b%e0%a4%b9%e0%a4%a8%e0%a4%a6%e0%a4%be%e0%a4%b8/</link>
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		<pubDate>Fri, 18 Jul 2008 00:12:15 +0000</pubDate>
		<dc:creator>मिहिर</dc:creator>
				<category><![CDATA[Literature]]></category>
		<category><![CDATA[films]]></category>
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		<category><![CDATA[Osian's]]></category>
		<category><![CDATA[उदय प्रकाश]]></category>
		<category><![CDATA[गजानन माधव मुक्तिबोध]]></category>
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		<category><![CDATA[मोहनदास]]></category>
		<category><![CDATA[सत्ता]]></category>
		<category><![CDATA[सिनेमा]]></category>
		<category><![CDATA[हरिशंकर परसाई]]></category>
		<category><![CDATA[हिन्दी कहानी]]></category>

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		<description><![CDATA[विचित्र प्रोसेशन,
गंभीर क्विक मार्च &#8230;
कलाबत्तूवाली काली ज़रीदार ड्रेस पहने
चमकदार बैंड-दल-
अस्थि-रूप, यकृत-स्वरूप,उदर-आकृति
आँतों के जालों-से उलझे हुए, बाजे वे दमकते हैं भयंकर
गंभीर गीत-स्वन-तरंगें
ध्वनियों के आवर्त मँडराते पथ पर.
बैंड के लोगों के चेहरे
मिलते हैं मेरे देखे हुओं से,
लगता है उनमें कई प्रतिष्ठित पत्रकार
इसी नगर के ! !
बड़े-बड़े नाम अरे, कैसे शामिल हो गए इस बैंड-दल में ! !
उनके [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<blockquote><p>विचित्र प्रोसेशन,<br />
गंभीर क्विक मार्च &#8230;<br />
कलाबत्तूवाली काली ज़रीदार ड्रेस पहने<br />
चमकदार बैंड-दल-<br />
अस्थि-रूप, यकृत-स्वरूप,उदर-आकृति<br />
आँतों के जालों-से उलझे हुए, बाजे वे दमकते हैं भयंकर<br />
गंभीर गीत-स्वन-तरंगें<br />
ध्वनियों के आवर्त मँडराते पथ पर.<br />
बैंड के लोगों के चेहरे<br />
मिलते हैं मेरे देखे हुओं से,<br />
लगता है उनमें कई प्रतिष्ठित पत्रकार<br />
इसी नगर के ! !<br />
बड़े-बड़े नाम अरे, कैसे शामिल हो गए इस बैंड-दल में ! !<br />
उनके पीछे चल रहा<br />
संगीन-नोकों का चमकता जंगल,<br />
चल रही पदचाप, तालबद्ध दीर्घ पाँत<br />
टैंक-दल, मोर्टार, आर्टिलरी, सन्नद्ध,<br />
धीरे-धीरे बढ़ रहा जुलूस भयावना,<br />
सैनिकों के पथराये चेहरे<br />
चिढ़े हुए, झुलसे हुए, बिगड़े हुए गहरे !<br />
शायद, मैंने उन्हें पहले कहीं तो भी देखा था.<br />
शायद, उनमें मेरे कई परिचित ! !<br />
उनके पीछे यह क्या ! !<br />
कैवेलरी ! !<br />
काले-काले घोड़ों पर खाकी मिलिट्री ड्रेस,<br />
चेहरे का आधा भाग सिंदूरी गेरुआ<br />
आधा भाग कोलतारी भैरव,<br />
भयानक ! !<br />
हाथों में चमचमाती सीधी खड़ी तलवार<br />
आबदार ! !<br />
कंधे से कमर तक कारतूसी बैल्ट है तिरछा.<br />
कमर में, चमड़े के कवर में पिस्तौल,<br />
रोषभरी एकाग्र दृष्टि में धार है,<br />
कर्नल, ब्रिगेडियर, जनरल, मार्शल<br />
कई और सेनापति सेनाध्यक्ष<br />
चेहरे वे मेरे जाने-बूझे-से लगते,<br />
उनके चित्र समाचार-पत्रों में छपे थे,<br />
उनके लेख देखे थे,<br />
यहाँ तक कि कवितायेँ पढ़ी थीं<br />
भई वाह !<br />
उनमें कई प्रकांड आलोचक, विचारक, जगमगाते कविगण<br />
मंत्री भी, उद्योगपति भी और विद्वान्<br />
यहाँ तक कि शहर का हत्यारा कुख्यात<br />
डोमाजी उस्ताद<br />
बनता है बलबन<br />
हाय, हाय ! !<br />
यहाँ ये दीखते हैं भूत-पिशाच-काय.<br />
भीतर का राक्षसी स्वार्थ अब<br />
साफ़ उभर आया है,<br />
छुपे हुए उद्देश्य<br />
यहाँ निखर आए हैं,</p>
<p>यह शोभा-यात्रा है किसी मृत्यु-दल की.</p></blockquote>
<p><strong><a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Gajanan_Madhav_Muktibodh" target="_blank">गजानन माधव मुक्तिबोध</a> की कविता <em>&#8216;अंधेरे में&#8217;</em> का अंश.</strong></p>
<p>मैं सिरीफोर्ट जाते हुए <a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Sansad_Bhavan" target="_blank">संसद</a> के बाहर से गुज़रता हूँ. आज देखा वहाँ बड़ा जमावड़ा लगा है. चैनल बाहर से लाइव ख़बरें दे रहे हैं.<br />
हिंदुस्तान के प्रजातंत्र की सबसे बड़ी मंडी आजकल सजी है. मोलभाव जारी हैं. खरीद-फ़रोख्त चल रही है. भाव तय हो रहे हैं. रात न्यूज़ देखते हुए उबकाई सी आती है. मुझे संसद भवन को देखकर <a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Harishankar_Parsai" target="_blank">हरिशंकर परसाई</a> का &#8216;अकाल उत्सव&#8217; याद आता है, <em></em></p>
<blockquote><p><em>&#8220;अब ये भूखे क्या खाएं? भाग्य विधाताओं और जीवन के थोक ठेकेदारों की नाक खा गए. वे सब भाग गए. अब क्या खाएं? आख़िर वे विधानसभा और संसद की इमारतों के पत्थर और इंटें काट-काटकर खाने लगे.&#8221;</em></p></blockquote>
<p><a href="http://cinefan.osians.com/filmdetails.aspx?id=181" target="_blank"><img class="alignleft" style="float: left;" src="http://bp0.blogger.com/_6jhvqaVJsXw/RyMMtoghtfI/AAAAAAAAAHI/dnW14hIk3As/S226/Mohandas+Kannada.jpg" alt="" width="146" height="226" />मोहनदास</a> को लगता है. जो जितना ऊपर बैठा है लगता है वो उतना ही बड़ा बेईमान है. क्या सब नकली हैं? डुप्लीकेट? सारी व्यवस्था ही ढह गई है. जीता जागता हाड़-मांस का इंसान किसी काम का नहीं. इस दुनिया में कागज़ की लड़ाई लड़ी जाती है. न्याय व्यवस्था की आंखों पर पट्टी बंधी है. उसके हाथ बंधे हैं. मोहनदास के पास पैसा नहीं, पहुँच नहीं. वो मोहनदास नहीं, कोई और अब मोहनदास है. कुछ समझ नहीं आ रहा है. डर सा लगता है. क्या कोई रास्ता है? मुक्तिबोध ने जब <em>अंधेरे में</em> लिखी तब आपातकाल सालों दूर था. लेकिन उन्होनें आनेवाले समय की डरावनी पदचाप सुन ली थी. <em>ब्रह्मराक्षस</em> साक्षात् उनके सामने था. यूँ ही तकरीबन चार साल पुरानी कहानी <a href="http://timesofindia.indiatimes.com/India_Buzz/Bollywood_is_becoming_suffocating/articleshow/3157560.cms" target="_blank">मोहनदास</a> को आज 17 जुलाई 2008 को पहली बार देखते हुए मुझे ऐसा लगा कि आज ही वो दिन था जो तय किया गया था इस मुलाक़ात के लिए. आज जब पहली बार मुझे संसद भवन के बाहर से निकलते हुए एक अजीब सी गंध आई. सत्ता की तीखी दुर्गन्ध. गूंजते से शब्द, 20 करोड़, 25 करोड़, 30 करोड़&#8230; आज जब मुझे संसद भवन के बाहर से निकलते हुए पहली बार उबकाई सी आई.</p>
<p>एक ईमानदार पाठक ही नहीं एक ईमानदार दर्शक की हैसियत से भी यह तो कहना होगा कि फ़िल्म कुछ कमज़ोर थी. ईमानदार राय यह है कि कहानी से जो सहूलियतें ली गयीं दरअसल वो ही फ़िल्म को कमज़ोर बनाती हैं. शुरुआत में मीडिया दर्शन के नामपर बहुत सारे स्टीरियोटाइप किरदार गढे गए. एक बड़ी राय यह भी थी कि कलाकारों का चयन ठीक नहीं हुआ है. खासकर <a href="http://cinefan.osians.com/filmdetails.aspx?id=178" target="_blank">कबूतर</a> जैसी अपने परिवेश में इतनी रची बसी फ़िल्म देखने के बाद दर्शकों की यह राय लाज़मी थी. फ़िर भी एक बार मोहनदास की कहानी शुरू होने के बाद फ़िल्म अपना तनाव बनाकर रखती है. साफ़ है कि कहानी की अपनी ताक़त इतनी है कि वो फ़िल्म को अपने पैरों पर खड़ा रखती है. अनिल यादव जैसे किरदार कमाल की कास्टिंग और काम का उदाहरण हैं लेकिन ऐसे उदाहरण फ़िल्म में कुछ एक ही हैं. मोहनदास के रोल के लिए ही मैं अभी हाथों-हाथ 2-3 ज़्यादा अच्छे नाम सुझा सकता हूँ. फ़िल्म कस्बे के चित्रण में जहाँ खरी उतरी है वहीँ उसका गाँव कुछ &#8216;बनाया-बनाया&#8217; सा लगता है. बोली अभी-अभी सीखी सी. कस्बे के बीच से बार-बार गुज़रती कोयले की गाडियाँ याद रहती हैं, कुछ कहती हैं. फ़िल्म कहानी के मुख्य संकेत नहीं छोड़ती है. बार बार यश मालवीय और वी. के. सोनकिया  की कवितायें बात को आगे बढाती हैं. <a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Bertolt_Brecht" target="_blank">ब्रेख्त</a> आते हैं. <a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Gajanan_Madhav_Muktibodh" target="_blank">मुक्तिबोध</a> आते हैं. मोहनदास के माँ-बाप पुतलीबाई और काबादास सतगुरु <a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Kabir" target="_blank">कबीर</a> को याद करते हैं. कबीर जो एक ऐसी <a href="http://uday-prakash.blogspot.com/2007_12_04_archive.html" target="_blank">भाषा</a> में कविता कहते थे जिसमें लिखता हुआ हर ईमानदार कवि पागल हो जाता है. हो सकता है कि मैं कहानी के प्रति कुछ पक्षपाती हो जाऊं. <a href="http://uday-prakash.blogspot.com/" target="_blank">उदय प्रकाश</a> को सहेजने वालों के साथ ऐसा हो जाता है. लेकिन फ़िल्म के शुरूआती आधे घंटे से मेरे वो दोस्त भी असंतुष्ट थे जिन्होनें कहानी नहीं पढ़ी है. शायद <a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Sonali_Kulkarni" target="_blank">सोनाली कुलकर्णी</a> के साथ थोड़ा कम वक्त और उससे मिली थोड़ी कम लम्बाई ज़्यादा कारगर रहे.</p>
<p>कहानी की बड़ी बात यह थी कि उसमें आप एक विलेन को नहीं पकड़ पाते. अँधेरा है. डर है. पूरी व्यवस्था का पतन है. कहानी के बीच-बीच कोष्ठकों में पूरी दुनिया में घट रही घटनाएँ हैं. बुश हैं, लादेन हैं, गिरते ट्विन टावर हैं. मेरा यह कहना नहीं है कि यह सब फ़िल्म में होता. मुझे बस यह लगता है कि काश कहानी की तरह फ़िल्म भी कुछ व्यक्तियों को विलेन बनाकर पेश करने की बजाए सिस्टम के ध्वंसावशेष दिखा पाती. <a href="http://www.imdb.com/name/nm0839820/" target="_blank">सुशांत सिंह</a> और उसके पिता के रोल में <a href="http://www.imdb.com/name/nm0592782/" target="_blank">अखिलेन्द्र मिश्रा</a> अपनी पुरानी फिल्मी इमेज ढो रहे हैं. यह फ़िल्म को कमज़ोर बनाता है. लेकिन इस सबके बावजूद मैं फ़िल्म से इसलिए खुश हूँ कि वो कहानी का काफ़ी कुछ बचा लेती है. अंत में,</p>
<p>क्या सिनेमा के लिए यह ज़रूरी है कि तमाम अंधेरों के बावजूद भी आख़िर में वह एक उम्मीद की किरण के साथ ख़त्म हो? क्या एक कला माध्यम को सकारात्मक होने के लिए आशावादी होना ज़रूरी है? क्या हर मोहनदास के अंत में एक पत्थर उछाले जाने से ही समाज बदलेगा? क्या एक बंद दरवाज़े के साथ हुआ मोहनदास का अंत ज़्यादा बड़ी शुरुआत नहीं है? फ़िल्म जिन <a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Safdar_Hashmi" target="_blank">सफ़दरों</a>, <a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Shanmughan_Manjunath" target="_blank">मंजुनाथों</a> और <a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Satyendra_Dubey" target="_blank">सत्येंद्रों</a> को याद करती है शायद उनका नाम ही था जो तमाम दबावों के बावजूद फ़िल्म का अंत नहीं बदला गया. और ब्रेख्त को दोहराती फ़िल्म से हमें यही उम्मीद करनी चाहिए कि वह सिनेमा के भीतर क्रांति की बात करने के बजाए उन अंधेरों की बात करे जो हमारे समय को घेर रहे हैं.</p>
<p><a href="http://timesofindia.indiatimes.com/India_Buzz/Bollywood_is_becoming_suffocating/articleshow/3157560.cms" target="_blank">मज़हर कामरान</a> से बार-बार यह पूछा गया कि आख़िर क्यों उनका <a href="http://timesofindia.indiatimes.com/India_Buzz/Bollywood_is_becoming_suffocating/articleshow/3157560.cms" target="_blank">मोहनदास</a> अपनी लड़ाई लड़ना छोड़ देता है? आख़िर क्यों फ़िल्म इतने निराशाजनक नोट पर ख़त्म हो जाती है? क्या उन्हें फ़िल्म की माँग को समझते हुए <a href="http://uday-prakash.blogspot.com/" target="_blank">उदय प्रकाश</a> की कहानी का अंत बदल देने का ख्याल नहीं आया? बहुत से दर्शक जो उदय की कहानी से अनजान थे वो निर्देशक से फ़िल्म के अंत में एक उम्मीद की किरण चाहते थे. एक उछाला जाता पत्थर शायद <a href="http://www.imdb.com/title/tt0071145/" target="_blank">अंकुर</a> की तरह या एक रोपा जाता पौधा शायद <a href="http://www.imdb.com/title/tt0405508/" target="_blank">रंग दे बसंती</a> की तरह. पता नहीं <a href="http://uday-prakash.blogspot.com/" target="_blank">उदय प्रकाश</a> इस सब में कहाँ थे? वो होते तो बहुत से दर्शक उनसे भी यही सवाल करते. और मुझे मालूम है कि उनका जवाब क्या होता&#8230; मैं यही चाहता था कि आप सब मुझे इस अंत के लिए कोसें. कहें कि यह अंत गलत है. मोहनदास को एक आखिरी पत्थर उछालना चाहिए. अब भी इस सत्ता तंत्र के पार एक सवेरा है जो उसका इंतज़ार करता है. आप सब ये कहें और मेरी कहानी शायद तब पूरी हो. एक-एक मोहनदास आप सबको इस हॉल से बाहर निकलने के बाद मिलेगा. आप उसे यही बात कहें. मेरी कहानी में तो उसने दरवाज़ा बंद कर लिया लेकिन हो सकता है कि आपकी कहानी में ऐसा ना हो. अगर हम एक भी कहानी ऐसी रच पाये जहाँ मोहनदास को उसकी पहचान वापिस मिल जाती है और वो आख़िर में दरवाज़ा बंद नहीं करता तो मेरा कहानी कहना पूरा हुआ. आप इस कहानी पर अविश्वास करें क्योंकि अगर सिनेमा में बंद हुआ दरवाज़ा असल जिंदगी में ऐसा एक भी दरवाज़ा खोल पाये तो मैं उस बंद दरवाज़े के साथ हूँ.</p>
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		<title>कितने शहरों में कितनी बार</title>
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		<pubDate>Mon, 14 Apr 2008 22:42:00 +0000</pubDate>
		<dc:creator>मिहिर</dc:creator>
				<category><![CDATA[Literature]]></category>
		<category><![CDATA[फ़िराक गोरखपुरी]]></category>

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फिराक साहब की विनोदप्रियता और मुंहफटपन के कई किस्से अनिता और शशि को जुबानी याद थे. दोनों उनसे मिलने जाती रहती थीं. अनिता ने ही बताया कि एक बार फिराक साहब के घर में चोर घुस आया. फिराक साब और अनिता दोनों बैंक रोड पर विश्वविद्यालय के मकानों में रहते थे. ऐसा लगता था उन [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p><a href="http://bp1.blogger.com/_oWd-c4uUHz4/SAPYVR1LwZI/AAAAAAAAAEY/cb01YPAdLds/s1600-h/firaq-gorakhpuri.jpg"><img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5189229055736267154" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; CURSOR: hand" src="http://bp1.blogger.com/_oWd-c4uUHz4/SAPYVR1LwZI/AAAAAAAAAEY/cb01YPAdLds/s320/firaq-gorakhpuri.jpg" border="0" alt="" /></a></p>
<div>
<blockquote><p>फिराक साहब की विनोदप्रियता और मुंहफटपन के कई किस्से अनिता और शशि को जुबानी याद थे. दोनों उनसे मिलने जाती रहती थीं. अनिता ने ही बताया कि एक बार फिराक साहब के घर में चोर घुस आया. फिराक साब और अनिता दोनों बैंक रोड पर विश्वविद्यालय के मकानों में रहते थे. ऐसा लगता था उन मकानों की बनावट चोरों की सहूलियत के लिए ही हुयी थी, वहां आएदिन चोरियाँ होतीं. फिराक साब को रात में ठीक से नींद नहीं आती थी. आहट से वे जाग गये. चोर इस जगार के लिए तैयार नहीं था. उसने अपने साफे में से चाकू निकाल कर फिराक के आगे घुमाया. फिराक बोले, &#8220;तुम चोरी करने आये हो या कत्ल करने. पहले मेरी बात सुन लो.&#8221;<br />
चोर ने कहा, &#8220;फालतू बात नहीं, माल कहाँ रखा है?&#8221;<br />
फिराक बोले, &#8220;पहले चक्कू तो हटाओ, तभी तो बताऊंगा.&#8221;<br />
फ़िर उन्होंने अपने नौकर पन्ना को आवाज़ दी, &#8220;अरे भई पन्ना उठो, देखो मेहमान आये हैं, चाय वाय बनाओ.&#8221;<br />
पन्ना नींद में बड़बडाता हुआ उठा, &#8220;ये न सोते हैं न सोने देते हैं.&#8221;<br />
चोर अब तक काफी शर्मिंदा हो चुका था. घर में एक की जगह दो आदमियों को देखकर उसका हौसला भी पस्त हो गया. वह जाने को हुआ तो फिराक ने कहा, &#8221; दिन निकाल जाए तब जाना, आधी रात में कहाँ हलकान होगे.&#8221; चोर को चाय पिलाई गई. फिराक जायज़ा लेने लगे कि इस काम में कितनी कमाई हो जाती है, बाल बच्चों का गुज़ारा होता है कि नहीं. पुलिस कितना हिस्सा लेती है और अब तक कै बार पकड़े गये.<br />
चोर आया था पिछवाड़े से लेकिन फिराक साहब ने उसे सामने के दरवाजे से रवाना किया यह कहते हुए, &#8220;अब जान पहचान हो गई है भई आते जाते रहा करो.&#8221;</p></blockquote>
<p><strong>-ममता कालिया. &#8220;कितने शहरों में कितनी बार&#8221; अन्तिम किश्त से. <a href="http://www.tadbhav.com/">तद्भव</a>17. जनवरी 2008.</strong></div>
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