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	<title>आवारा हूँ... &#187; films</title>
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	<description>सिनेमा, साहित्य, खेल, संगीत, एक युवा शहर धड़कता है यहाँ...</description>
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		<title>सिनेमा के सौ बरस</title>
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		<pubDate>Sun, 22 Apr 2012 05:10:17 +0000</pubDate>
		<dc:creator>मिहिर</dc:creator>
				<category><![CDATA[films]]></category>
		<category><![CDATA[नवभारत टाइम्स]]></category>
		<category><![CDATA[सिनेमा]]></category>

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हिन्दी सिनेमा आधुनिक भारत का सबसे प्यारा बच्चा है. उसमें आपको खिलखिलाकर हंसाने की क्षमता है तो गहरे प्यार से निकली एक पल में रुला देने वाली कुव्वत भी. और आनेवाली मई में हम इसके जन्म के सौवें साल में प्रवेश कर जायेंगे. दादासाहेब फ़ालके से दिबाकर बनर्जी तक, कैसा रहा यह सफ़र. आईये देखें [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<blockquote>
<p style="text-align: justify;">हिन्दी सिनेमा आधुनिक भारत का सबसे प्यारा बच्चा है. उसमें आपको खिलखिलाकर हंसाने की क्षमता है तो गहरे प्यार से निकली एक पल में रुला देने वाली कुव्वत भी. और आनेवाली मई में हम इसके जन्म के सौवें साल में प्रवेश कर जायेंगे. दादासाहेब फ़ालके से दिबाकर बनर्जी तक, कैसा रहा यह सफ़र. आईये देखें एक नज़र&#8230;</p>
</blockquote>
<p><strong><br />
</strong></p>
<p style="text-align: justify;"><strong>1913 – 22</strong></p>
<p style="text-align: justify;">धुंडीराज गोविन्द फ़ालके. उनके पैर में चकरी थी. जे जे स्कूल ऑफ़ आर्ट का पढ़ा, राजा रवि वर्मा का शिष्य. पहली बार सिनेमा देखा तो हक्का-बक्का. फ़िल्म थी ’द लाइफ़ ऑफ़ क्राइस्ट’. तय कर लिया कि ऐसी फ़िल्म हमें भी बनानी है. और उसके अथक संघर्ष का नतीजा था ’राजा हरिश्चंद्र’ जिसका पहली बार तीन मई उन्नीस सौ तेरह में बम्बई के कोरोनेशन थियेटर में प्रदर्शन हुआ. पूरा तेईस दिन चली राजा हरिश्चन्द्र जो उन दिनों का रिकॉर्ड था. सिनेमा ने हिन्दुस्तानियों का मन मोह लिया था.</p>
<p style="text-align: justify;">शुरुआती सिनेमा धार्मिक पृष्ठभूमि का था और उस पर पारसी थियेटर का गहरा प्रभाव था. जमशेद जी मदन, धीरेन गांगुली तथा नितिन बोस इस दौर के अन्य फ़िल्मकार थे. यह वो दौर था जब सिनेमा को सभ्य लोगों का काम नहीं समझा जाता था और स्त्रियों को फ़िल्मों में काम करने की इजाज़त नहीं होती थी.</p>
<p style="text-align: justify;">उल्लेखनीय फ़िल्में:- <strong><a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Raja_Harishchandra" target="_blank">राजा हरिश्चन्द्र</a></strong>, <strong>लंका दहन</strong>, <strong>बिलेत फ़ेरात</strong></p>
<p style="text-align: justify;"><strong><br />
</strong></p>
<p style="text-align: justify;"><strong>1923 – 32</strong></p>
<p style="text-align: justify;"><a href="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2012/04/Alam_Ara_poster_1931.jpg"><img class="alignright size-full wp-image-1057" title="Alam_Ara_poster,_1931" src="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2012/04/Alam_Ara_poster_1931.jpg" alt="Alam_Ara_poster,_1931" width="201" height="252" /></a>सामाजिक मुद्दे सिनेमा में आने लगे थे. और बड़े व्यापारियों को इसमें व्यावसायिक सफ़लता की गुंजाइश दिखने लगी थी. सिनेमा का शास्त्र पलट रहा था. चित्रकार परिवार से आए बाबूराव पेंटर, धीरेन गांगुली और चंदूलाल शाह इस दौर के बड़े फ़िल्मकार हुए. दशक खत्म होते न होते सिनेमा में आवाज़ आई और अर्देशिर ईरानी के निर्देशन में नायक राजकुमार और बंजारन नायिका की प्रेम कहानी ’आलम आरा’ आई. पारसी थियेटर की मैलोड्रामा शैली से प्रभावित ’आलम आरा’ में सात गीत थे और यहीं से हिन्दी सिनेमा और गीतों का अटूट नाता शुरु हुआ जो आज तक बेरोकटोक जारी है. इसी दौर में व्ही. शांताराम ने ’माया मच्छिंद्रा’, ’अयोध्या का राजा’ और ’चन्द्रसेना’ जैसी फ़िल्में बनाईं.</p>
<p style="text-align: justify;">उल्लेखनीय फ़िल्में:- <strong>महारथी कर्ण</strong>, <strong>नल दमयन्ती</strong>, <strong><a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Alam_Ara" target="_blank">आलम आरा</a></strong></p>
<p style="text-align: justify;"><strong><br />
</strong></p>
<p style="text-align: justify;"><strong>1933 – 42</strong></p>
<p style="text-align: justify;">यह हिन्दी सिनेमा का स्टूडियो एरा है. मुख्य रूप से तीन बड़े स्टूडियो इस दौर में सक्रिय रहे, वीरेन्द्रनाथ सरकार द्वारा स्थापित ’न्यू थियेटर्स’, चार भागीदारों (शांताराम, दामले, फ़त्तेलाल, धायबर) द्वारा स्थापित ’प्रभात’ स्टूडियो तथा हिमांशु राय का ’बॉम्बे टाकीज़’. यहीं न्यू थियेटर्स की उर्वर ज़मीन से निकले प्रथमेश चन्द्र बरुआ का नाम उल्लेखनीय है जिन्होंने 1935 में शरतचन्द्र के उपन्यास पर ’देवदास’ फ़िल्म बनाकर सिनेमा को उसकी सबसे चहेती प्रेम और बिछोह की कथा दी. कुंदनलाल सहगल उस दौर का सितारा थे और उनकी गायकी भविष्य की पीढ़ियों के लिए सदा उजला रास्ता बनी रही. देविका रानी सितारा नायिका थीं और उनका दामन थामे अशोक कुमार सिनेमा में आए.</p>
<p style="text-align: justify;">सोहराब मोदी की ’सिकन्दर’ ऐतिहासिक पृष्ठभूमि की फ़िल्मों में मील का पत्थर थी तो महबूब ख़ान ने 1940 में वो ’औरत’ बनाई जिसे आगे चलकर हिन्दी सिनेमा की सबसे महान फ़िल्म (मदर इंडिया) की माँ बनना था. यह दौर गुलामी का था लेकिन सिनेमा धार्मिक कथाओं का दामन छोड़ अब सामाजिक मुद्दों का रुख़ करने लगा था.</p>
<p style="text-align: justify;">उल्लेखनीय फ़िल्में:- <strong><a href="http://www.imdb.com/title/tt0024964/" target="_blank">चंडीदास</a></strong>,<strong><a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Devdas_(1936_film)" target="_blank"> देवदास</a></strong>, <strong><a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Achhut_Kanya" target="_blank">अछूत कन्या</a></strong></p>
<p style="text-align: justify;"><strong><br />
</strong><br />
<strong>1943 – 52</strong></p>
<p style="text-align: justify;">अशोक कुमार इस दौर के बड़े नायक थे और उन्होंने इस दौर में ’हुमायूँ’, ’किस्मत’ और ’महल’ जैसी भव्य फ़िल्में दीं. यही समय था जब हिन्दोस्तान के इतिहास की आज़ादी और बंटवारे जैसी बड़ी घटनाएं हुईं, लेकिन उस दौर के सिनेमा में इनकी प्रत्यक्ष गूंज कम ही सुनाई देती है. 1947 में ’जुगनू’ की सफ़लता के साथ दिलीप कुमार सिनेमा में आए और 1948 में ’आग’ के साथ शोमैन राज कपूर ने अपनी निर्देशकीय पारी की शुरुआत की. 1949 में महबूब ख़ान ने इन दोनों सितारों को लेकर ’अन्दाज़’ बनाई, नायिका थीं नर्गिस.</p>
<p style="text-align: justify;">’आवारा’ के साथ हिन्दी सिनेमा को राज कपूर में अपना चार्ली चैप्लिन मिल गया. शैलेन्द्र के लिखे और मुकेश के गाए गीतों की लोकप्रियता सात समन्दर पार रूस में जा पहुँची. राष्ट्र द्वारा देखा गया समाजवाद का स्वप्न सिनेमा का स्वप्न भी बन गया.</p>
<p style="text-align: justify;">उल्लेखनीय फ़िल्में:- <strong><a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Kismet_(1943_film)" target="_blank">किस्मत</a></strong>,<strong><a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Mahal_(1949_film)" target="_blank"> महल</a></strong>, <strong><a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Awaara" target="_blank">आवारा</a></strong></p>
<p style="text-align: justify;"><strong><br />
</strong></p>
<p style="text-align: justify;"><strong>1953 – 62</strong></p>
<p style="text-align: justify;"><a href="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2012/04/nehru_dilip_raj_kapoor_dev_anand.jpg"><img class="alignleft size-medium wp-image-1059" title="nehru_dilip_raj_kapoor_dev_anand" src="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2012/04/nehru_dilip_raj_kapoor_dev_anand-300x202.jpg" alt="nehru_dilip_raj_kapoor_dev_anand" width="300" height="202" /></a>नवस्वतंत्र देश और नई आकांक्षाएं. मुल्क़ को अपना नायक मिला जवाहरलाल नेहरू में और जैसे राष्ट्र ने समाजवाद का दामन पकड़ा, सिनेमा ने भी. राज कपूर की फ़िल्मों में उनकी नीतियों का अक्स गहरा था. ’साथी हाथ बढ़ाना’ हिन्दी सिनेमा के सुनहरे दशक की टेक बना. कहानियों के केन्द्र में शहरी सर्वहारा था और उसकी आँखों में आधुनिकता के दिखाए सपने थे. ’दो बीघा ज़मीन’ का शंभू महतो कलकत्ता की तपती सड़कों पर नंगे पैरों रिक्शागाड़ी खींचता शहर की यंत्रणाओं और सामन्ती-पूंजीवादी व्यवस्था के गठजोड़ को हमारे सामने लाया. महबूब ख़ान की ’मदर इंडिया’ में दुनिया ने भारत का समतावादी समाज का स्वप्न देखा. एक स्त्री के स्वाभिमान में एक मुल्क़ की उन्नति की दास्ताँ एकाकार हो गई.</p>
<p style="text-align: justify;">यहीं थे गुरुदत्त. एकाकी आवाज़ की तरह, तत्कालीन समाज और सिनेमा की ईमानदार आलोचना रचते. यह दशक था मुग़ल-ए-आज़म का. मधुबाला की अनन्य सुन्दरता का और दिलीप कुमार के अप्रतिम अभिनय का. सिनेमाई संगीत भी उन दिनों सुनहरा था. नौशाद ने ’ए मोहब्बत ज़िन्दाबाद’ में मोहम्मद रफ़ी के साथ सौ गायकों को कोरस में गवाया था. देवानंद के सिनेमा में शहरी आधुनिकता का मोह था तो राज कपूर ’जिस देश में गंगा बहती है’ और दिलीप कुमार ’नया दौर’ जैसी फ़िल्मों के साथ वही आधुनिकता का स्वप्न गाँव-देहातों तक पहुंचा रहे थे.</p>
<p style="text-align: justify;">उल्लेखनीय फ़िल्में :<strong><a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Do_Bigha_Zamin" target="_blank"> दो बीघा ज़मीन</a></strong>, <strong><a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Mother_India" target="_blank">मदर इंडिया</a></strong>, <strong><a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Mughl-e-Azam" target="_blank">मुग़ल-ए-आज़म</a></strong></p>
<p style="text-align: justify;"><strong><br />
</strong></p>
<p style="text-align: justify;"><strong>1963 – 72</strong></p>
<p style="text-align: justify;">तरुण भारत ने युद्ध देखे. अपने नायक जवाहरलाल की मृत्यु देखी और यथार्थ से पलायन में मोहभंग और असंतोष के शुरुआती चिह्न दिखने लगे. चेतन आनंद की ’हक़ीकत’ युद्ध का एकाकीपन साथ लाई तो मनोज कुमार की फ़िल्मों (शहीद, उपकार, पूरब और पश्चिम) में सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के भिन्न आयाम दिखे.</p>
<p style="text-align: justify;">हिन्दी सिनेमा घूम-घूमकर दुनिया देख रहा था. ’जंगली’ में शम्मी कपूर की याहू के साथ नई पीढ़ी परम्पराओं की जकड़ से आज़ाद हो जाना चाहती थी. ’आओ ट्विस्ट करें’ की पदचाप में पश्चिमी चाल की आधुनिकताएं सिनेमा में दिखने लगीं. लेकिन एक अन्तरद्वंद्व भी था, आस्था और तर्क में, जो ’गाइड’ जैसी फ़िल्म में गहरे उभरकर सामने आया. राजेश खन्ना 1965 में फ़िल्मफ़ेयर की टैलेन्ट हंट में जीते थे. उनके साथ सिनेमा ने पहली बार ’आम आदमी’ को सुपरस्टार बनते हुए देखा. वही थे ऋषिकेश मुखर्जी के ज़िन्दादिल ’आनंद’. और यहीं ’बाबू मोशाए’ ने अपनी उपस्थिति दर्ज कराई. अपनी पहली फ़िल्म ’सात हिन्दुस्तानी’ में वे एक बेचैन शायर थे, लेकिन उनके गुस्से को विहंगम आयाम अगले दशक में मिलना था, और उसकी वजह बनने थे दो जोड़ीदार पटकथाकार.</p>
<p style="text-align: justify;">उल्लेखनीय फ़िल्में:- <strong><a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Guide_(film)" target="_blank">गाइड</a></strong>, <strong><a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Teesri_Manzil" target="_blank">तीसरी मंज़िल</a></strong>, <strong><a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Bhuvan_Shome" target="_blank">भुवन शोम</a></strong></p>
<p style="text-align: justify;"><strong><br />
</strong></p>
<p style="text-align: justify;"><strong>1973 – 82</strong></p>
<p style="text-align: justify;"><a href="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2012/04/amitabh_bachchan_deewar.jpg"><img class="alignright size-full wp-image-1063" title="amitabh_bachchan_deewar" src="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2012/04/amitabh_bachchan_deewar.jpg" alt="amitabh_bachchan_deewar" width="305" height="151" /></a>कहते हैं कि सफ़लता के शुरुआती दिनों में ’सलीम-जावेद’ खुद पेंट का डिब्बा हाथ में लेकर अपनी फ़िल्मों के पोस्टरों पर अपना नाम लिखा करते थे. यही थे जिन्होंने एक सत्तालोलुप और भ्रष्ट समाज के प्रति आम इंसान के विद्रोह को सिनेमा में जीवंत कर दिया. ’एंग्री यंग मैन’ का जन्म समाज में दहकते नक्सलबाड़ी के अंगारों पर हुआ था और अमिताभ बच्चन के रूप में हिन्दी सिनेमा ने सदी के महानायक को पाया. इस दशक का रोमांस भिन्न था. वो लैंप बुझाती जया भादुड़ी और माउथऑर्गन बनाते अमिताभ के अधूरे प्रेम में था. क्या दिन थे वो, अमिताभ दिन में ’शोले’ की शूटिंग किया करते और मुम्बई की जागती रातों में ’दीवार’ का क्लाइमैक्स फ़िल्माया जाता.</p>
<p style="text-align: justify;">लेकिन इसी दशक में समांतर सिनेमा ने अपना स्वतंत्र रास्ता तलाशा. श्याम बेनेगल की ’अंकुर’ के साथ शुरु हुआ सफ़र नसीरुद्दीन शाह, ओम पुरी, स्मिता पाटिल, शबाना आज़मी जैसे कलाकारों को हिन्दी सिनेमा में लेकर आया. 1975 में स्थापित हुई संस्था NFDC ने इसमें सबसे महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. खुद अमिताभ ने ऋषिकेश मुखर्जी की फ़िल्मों में अपने अभिनय के भिन्न आयाम दिखाए. गुलज़ार, बासु चटर्जी और ऋषिदा की फ़िल्में इस मोहभंग के दौर में उम्मीद का नवरस घोलती रहीं.</p>
<p style="text-align: justify;">उल्लेखनीय फ़िल्में:-<strong><a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Deewar_(1975_film)" target="_blank"> दीवार</a></strong>,<strong><a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Sholay" target="_blank"> शोले</a></strong>, <strong><a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Bhumika:_The_Role" target="_blank">भूमिका</a></strong></p>
<p style="text-align: justify;"><strong><br />
</strong></p>
<p style="text-align: justify;"><strong>1983 – 92</strong></p>
<p style="text-align: justify;"><a href="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2012/04/JBDY-mahabharata1.jpg"><img class="alignleft size-full wp-image-1061" title="JBDY mahabharata1" src="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2012/04/JBDY-mahabharata1.jpg" alt="JBDY mahabharata1" width="295" height="150" /></a>यह मुख्यधारा हिन्दी सिनेमा का रीतिकाल है. सत्तर के दशक के आक्रोश के प्रतीक ’एंग्री यंग मैन’ के रचयिता सलीम-जावेद की जोड़ी बिखर चुकी थी और सदी के महानायक अमिताभ का सितारा अब बुझ रहा था. इस दौरान उनके खाते में ’मर्द’, ’शहंशाह’ और ’जादूगर’ जैसी भौंडी फ़िल्में हैं. बीच के कुछ साल अनिल कपूर ने सर्वोच्च स्टारडम देखा और ’तेज़ाब’, ’परिन्दा’, ’काला बाज़ार’ जैसी फ़िल्मों के साथ आधुनिक शहर की अंधेरी गुफ़ाएं सिनेमा में आने लगीं.</p>
<p style="text-align: justify;">लेकिन इस पतन का एक दूसरा पहलू भी था. यह हिन्दी सिनेमा की समांतर धारा का काल भी था. ’जाने भी दो यारों’ ने समाजसत्ता की स्याह हक़ीक़त, ’अर्धसत्य’ ने सड़ चुके सिस्टम के भीतर होने की यंत्रणा और ’सलाम बॉम्बे’ ने शहर के हाशिए को किसी मैग्नीफ़ाइंग ग्लास से देखा.</p>
<p style="text-align: justify;">लेकिन दशक बीतने न बीतते हिन्दी सिनेमा ने फिर पलटा खाया. भिन्न परिवारों और पृष्ठभूमियों से आए तीन ख़ान लड़के हिन्दी सिनेमा में युवता और प्रेम वापस लौटा लाए. ’कयामत से कयामत तक’ के साथ पूरी पीढ़ी जवान हुई और ’मैनें प्यार किया’ युवा दोस्तियों की पैरोकार बनी.</p>
<p style="text-align: justify;">उल्लेखनीय फ़िल्में:- <strong><a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Mr._India" target="_blank">मिस्टर इंडिया</a></strong>, <strong><a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Ardh_Satya" target="_blank">अर्धसत्य</a></strong>, <strong><a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Maine_Pyar_Kiya" target="_blank">मैनें प्यार किया</a></strong></p>
<p style="text-align: justify;"><strong><br />
</strong></p>
<p style="text-align: justify;"><strong>1993 – 02</strong></p>
<p style="text-align: justify;">हिन्दुस्तान बहुत तेज़ी से बदल रहा था. उदारीकरण ने देश के बाज़ारों को बदला और बाज़ार ने सिनेमा को. हिन्दी सिनेमा अचानक विदेशों में बसे भारतीयों को नज़र में ऊपर रखने लगा. राजश्री की ’हम आपके हैं कौन’ में बसा संयुक्त परिवार के प्रति मोह तथा आदित्य चोपड़ा की ’दिलवाले दुल्हनियाँ ले जायेंगे’ का भारत की यादों में तड़पता एनआरआई उस दौर के सिनेमा के बदलते दर्शक की पहचान करवाते थे. और यहीं आए शाहरुख़ ख़ान. एक ओर ’डर’, ’बाज़ीगर’ और ’अंजाम’ के हिंस्र प्रतिनायक की भूमिका में, वहीं दूसरी ओर ’कभी हाँ, कभी ना’, ’राजू बन गया जेंटलमैन’ और ’चमत्कार’ जैसी फ़िल्मों में बगल के मोहल्ले में रहनेवाले उस खिलंदड़ लड़के से दिखते. अन्य समयों के सर्वोच्च महानायकों दिलीप कुमार, राजेश खन्ना, अमिताभ बच्चन की तरह वे भी सिनेमा के लिए ’आउटसाइडर’ थे, और वंशानुगत पात्रताओं को सबसे ऊपर रखने वाले हिन्दी फ़िल्मोद्योग के लिए जैसे यही काव्यात्मक न्याय था.</p>
<p style="text-align: justify;">नई सदी में सिनेमा का नया दौर आया. रामगोपाल वर्मा ने इसका ढंग बदला तो मणि रत्नम ने इसकी चाल. ’दिल चाहता है’ और ’सत्या’ जैसी फ़िल्में अपने दौर की कल्ट क्लासिक बनीं और उन्होंने अपने आगे सिनेमा की नई धाराएं शुरु कीं.</p>
<p style="text-align: justify;">उल्लेखनीय फ़िल्में:- <strong><a href="http://en.wikipedia.org/wiki/DDLJ" target="_blank">दिलवाले दुल्हनिया ले जायेंगे</a></strong>, <strong><a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Satya_(film)" target="_blank">सत्या</a></strong>, <strong><a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Dil_Chahta_Hai" target="_blank">दिल चाहता है</a></strong></p>
<p style="text-align: justify;"><strong><br />
</strong></p>
<p style="text-align: justify;"><strong>2003 – 12</strong></p>
<p style="text-align: justify;"><a href="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2012/04/maqbool-pankaj-kapoor11.jpg"><img class="alignright size-full wp-image-1070" title="maqbool pankaj kapoor1" src="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2012/04/maqbool-pankaj-kapoor11.jpg" alt="maqbool pankaj kapoor1" width="270" height="148" /></a>सत्ता का संतुलन बदल रहा था. फ़िल्म बनाना अब ’फ़ैमिली बिज़नस’ नहीं रह गया था. इस दौर के फ़िल्मकार मायानगरी के लिए आउटसाइडर थे. वे गोरखपुर से आए थे या मेरठ से, जमशेदपुर से आए थे या नागपुर से, और उन्होंने अपनी कंचन प्रतिभा के बलबूते इस उद्योग में पैठ बनाई. तकनीक ने सिनेमा को ज़्यादा सहज बनाया और सिनेमा को बड़े परदे से निकालकर आम आदमी के ड्राइंगरूम में ले आई. इसी बीच मल्टीप्लैक्स आए और उनके साथ सिनेमा का दर्शक बदला, विषय भी बदले. अब सिनेमा में गाँव नहीं थे. यह स्याह शहरों की कथाएं थीं जिन्हें ’ब्लैक फ़्राइडे’ में अनुराग कश्यप ने, ’मकबूल’ में विशाल भारद्वाज ने और ’हज़ारों ख्वाहिशें ऐसी’ में सुधीर मिश्रा ने बड़े अदब से सुनाया.</p>
<p style="text-align: justify;">ऋतिक, रणबीर समकालीन समय के नायक हुए और सलमान और आमिर ने नए समय में पुन: स्टारडम का शिखर देखा. लेकिन इनकी सफ़लताओं के पीछे हमेशा कोई राजकुमार हिरानी, अभिनव कश्यप, इम्तियाज़ अली रहे जिनके काम की ईमानदारी इन महानायकों की सफ़लताओं में बोलता रही.</p>
<p style="text-align: justify;">उल्लेखनीय फ़िल्में:-<strong><a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Black_Friday_(2004_film)" target="_blank"> ब्लैक फ़्राइडे</a></strong>, <strong><a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Rang_De_Basanti" target="_blank">रंग दे बसंती</a></strong>, <strong><a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Three_Idiots" target="_blank">थ्री ईडियट्स</a></strong></p>
<p style="text-align: justify;">_____</p>
<p>&#8220;बिरजू, मैं बेटा दे सकती हूँ, लाज नहीं दे सकती.&#8221; <strong>(मदर इंडिया)</strong></p>
<p>&#8220;शहंशाहों के इंसाफ़ और ज़ुल्म में किस कदर कम फ़र्क होता है.&#8221; <strong>(मुग़ल-ए-आज़म)</strong></p>
<p>&#8220;जाओ पहले उस आदमी का साइन लेकर आओ&#8230;&#8221; <strong>(दीवार)</strong></p>
<p>&#8220;आज खुश तो बहुत होगे तुम&#8230;&#8221; <strong>(दीवार)</strong></p>
<p>&#8220;मेरे पास माँ है.&#8221; <strong>(दीवार)</strong></p>
<p>&#8220;डावर सेठ, मैं आज भी फ़ैंके हुए पैसे नहीं उठाता.&#8221; <strong>(दीवार)</strong></p>
<p>&#8220;चिनाय सेठ, जिनके अपने घर शीशे के हों, वो दूसरों पर पत्थर नहीं फेंका करते.&#8221; <strong>(वक़्त)</strong></p>
<p>&#8220;कौन कमबख़्त है जो बर्दाश्त करने के लिए पीता है&#8230;&#8221; <strong>(देवदास)</strong></p>
<p>&#8220;आपके पांव देखे. बहुत हसीन हैं. इन्हें ज़मीन पर मत रखियेगा. मैले हो जायेंगे.&#8221; <strong>(पाकीज़ा)</strong></p>
<p>&#8220;ज़िन्दगी बड़ी होनी चाहिए, लम्बी नहीं.&#8221; <strong>(आनंद)</strong></p>
<p>&#8220;बाबू मोशाय. ज़िन्दगी और मौत ऊपरवाले के हाथ है जहाँपनाह, जिसे न आप बदल सकते हैं, न मैं. हम सब तो रंगमंच की कठपुतलियाँ हैं जिनकी डोर ऊपरवाले के हाथों में है.&#8221; <strong>(आनंद)</strong></p>
<p>&#8220;ये हाथ हमको दे दे ठाकुर.&#8221; <strong>(शोले)</strong></p>
<p>&#8220;हम जहाँ खड़े होते हैं, लाइन वहीं से शुरु होती है.&#8221; <strong>(कालिया)</strong></p>
<p>&#8220;तुम अपुन को दस दस मारा. अपुन तुम को सिरिफ़ दो मारा. पन सॉलिड मारा कि नहीं?&#8221; <strong>(अमर, अकबर, एंथोनी)</strong></p>
<p>&#8220;शांत गदाधारी भीम, शांत!&#8221; <strong>(जाने भी दो यारों)</strong></p>
<p>&#8220;मुगैम्बो खुश हुआ.&#8221; <strong>(मिस्टर इंडिया)</strong></p>
<p>&#8220;दोस्ती की है&#8230; निभानी तो पड़ेगी.&#8221; <strong>(मैंने प्यार किया)</strong></p>
<p>&#8220;तेजा मैं हूँ, मार्क इधर है.&#8221; <strong>(अंदाज़ अपना अपना)</strong></p>
<p>&#8220;कभी कभी कुछ जीतने के लिए कुछ हारना भी पड़ता है. और हारकर जीतने वाले को बाज़ीगर कहते हैं.&#8221; <strong>(बाज़ीगर)</strong></p>
<p>&#8220;हर टीम में सिर्फ़ एक ही गुंडा हो सकता है, और इस टीम का गुंडा मैं हूँ.&#8221; <strong>(चक दे इंडिया)</strong></p>
<p>&#8220;मैं अपनी फ़ेवरिट हूँ.&#8221; <strong>(जब वी मेट)</strong></p>
<p style="text-align: justify;"><strong>**********</strong></p>
<p style="text-align: justify;">इस आलेख का संशोधित संस्करण आज, रविवार बाईस अप्रैल के <strong>नवभारत टाइम्स</strong> में संपादकीय  पृष्ठ पर प्रकाशित हुआ |</p>
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		<title>जब राज्य अपने हाथ वापस खींच लेता है : पान सिंह तोमर</title>
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		<pubDate>Wed, 28 Mar 2012 21:48:49 +0000</pubDate>
		<dc:creator>मिहिर</dc:creator>
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“हम तो एथलीट हते, धावक. इंटरनेशनल. अरे हमसे ऐसी का गलती है गई, का गलती है गई कि तैनें हमसे हमारो खेल को मैदान छीन लेओ. और ते लोगों ने हमारे हाथ में जे पकड़ा दी. अब हम भग रए चम्बल का बीहड़ में. जा बात को जवाब को दैगो, जा बात को जवाब को [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<blockquote>
<p style="text-align: justify;"><em>“हम तो एथलीट हते, धावक. इंटरनेशनल. अरे हमसे ऐसी का गलती है गई, का गलती है गई कि तैनें हमसे हमारो खेल को मैदान छीन लेओ. और ते लोगों ने हमारे हाथ में जे पकड़ा दी. अब हम भग रए चम्बल का बीहड़ में. जा बात को जवाब को दैगो, जा बात को जवाब को दैगो?”</em></p>
</blockquote>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;"><strong><br />
’पान सिंह तोमर’</strong> अपने दद्दा से जवाब माँग रहा है. इरफ़ान ख़ान की गुरु-गम्भीर आवाज़ पूरे सिनेमा हाल में गूंज रही है. मैं उनकी बोलती आँखें पढ़ने की कोशिश करता हूँ. लेकिन मुझे उनमें बदला नहीं दिखाई देता. नहीं, ’बदला’ इस कहानी का मूल कथ्य नहीं. पीछे से उसकी टोली के और जवान आते हैं और अचानक विपक्षी सेनानायक की जीवनलीला समाप्त कर दी जाती है. पान सिंह को झटका लगता है. वो बुलन्द आवाज़ में चीख रहा है,<em> “हमारो जवाब पूरो ना भयो.”</em></p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;"><a href="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2012/03/Paan-Singh-Tomar.jpg"><img class="alignleft size-medium wp-image-1040" title="Paan-Singh-Tomar" src="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2012/03/Paan-Singh-Tomar-207x300.jpg" alt="Paan-Singh-Tomar" width="207" height="300" /></a>अचानक सिनेमा हाल की सार्वजनिकता गायब हो जाती है और पान सिंह की यह पुकार सीधे किसी फ़्लैश की तरह आँखों के पोरों में आ गड़ती है. हाँ, इस कथा में ’दद्दा’ मुख्य विलेन नहीं, गौण किरदार हैं. दरअसल यह कथा सीधे बीहड़ के किसान पान सिंह तोमर की भी नहीं, वह तो इस कथा को कहने का इंसानी ज़रिया बने हैं. यह कथा है उस महान संस्था की जिसके<em> ’संगे-संगे’ </em>पान सिंह तोमर की कहानी शुरु होती है और अगले पैंतीस साल किसी समांतर कथा सी चलती है. भारतीय राज्य, नेहरूवियन आधुनिकता को धारण करने वाली वो एजेंसी जिसके सहारे आधुनिकता का यह वादा समुदायगत पहचानों को सर्वोपरि रखने वाले हिन्दुस्तानी नागरिक के जीवन-जगत में पहुँचाया गया, यह उसके द्वारा दिखाए गए ध्वस्त सपनों की कथा है. उन मृगतृष्णाओं की कथा जिनके भुलावे में आकर पान सिंह तोमर का, सफ़लताओं की गाथा बना शुरुआती जीवन हमेशा के लिए पल्टी खा जाता है.</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">यह अस्सी के दशक की शुरुआत है. गौर कीजिए, स्थानीय पत्रकार (सदा मुख्य सूचियों से बाहर रहे, गज़ब के अभिनेता ब्रिजेन्द्र काला) पूछता है सूबेदार से डकैत बने पान सिंह से,<em> “बन्दूक आपने पहली बार कब उठाई?”</em> और पान सिंह का जवाब है,<em> “अंगरेज़ भगे इस मुल्क से. बस उसके बाद. पन्डित जी परधानमंत्री बन गए, और नवभारत के निर्माण के संगे-संगे हमओ भी निर्माण शुउ भओ.” </em>गौर कीजिए, अपने पहले ही संवाद में पान सिंह इस आधुनिकता के पितामह का ना सिर्फ़ नाम लेता है, उनके दिखाए स्वप्न ’नवभारत’ के साथ अपनी गहरी समानता भी स्थापित करता है.</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">पश्चिमी आधुनिकता की नकल पर तैयार किया ख़ास भारतीय आधुनिकता का मॉडल, जिसमें मिलावटी रसायन के तौर पर यहाँ की सामन्ती व्यवस्था चली आती है. यह अर्ध सामन्ती – अर्ध पूंजीवादी राष्ट्र-राज्य संस्था की कथा है जिसकी बदलती तस्वीर ’पान सिंह तोमर’ में हर चरण पर नज़र आती है. मुख्य नायक खुद पान सिंह तोमर इसी पुरानी सामन्ती व्यवस्था से निकलकर आया है और आप उसके शुरुआती संवादों में समुदायगत पहचानों के लिए वफ़ादारियाँ साफ़ पढ़ सकते हैं. अफ़सर द्वारा पूछे जाने पर कि क्या देश के लिए जान दे सकते हो, उसका जवाब है,<em> “हा साब, ले भी सकते हैं. देस-ज़मीन तो हमारी माँ होती है. माँ पे कोई उँगली उठाए तो का फिर चुप बैठेंगे?” </em>और यहीं उसके जवाबों में आप नवस्वतंत्र देश के नागरिकों की उन शुरुआती उलझनों को भी पढ़ सकते हैं जो राज्य संस्था, उसके अधिकार क्षेत्र और उसकी भूमिका को ठीक से समझ पाने में अभी तक परेशानी महसूस कर रहे थे. पूछा जाता है पान सिंह से कि क्या वो सरकार में विश्वास रखता है, और उसका दो टूक जवाब है,<em> “ना साब. सरकार तो चोर है. जेई वास्ते तो हम सरकार की नौकरी न कर फ़ौज की नौकरी में आए हैं.”</em></p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">स्पष्ट है कि पान सिंह के लिए राज्य द्वारा स्थापित किए जा रहे आधुनिकता के इस विचार की आहट नई है. लेकिन यह विचार सुहावना भी है. अपने समय और समाज के किसी प्रतिनिधि उदाहरण की तरह वो जल्द ही इसकी गिरफ़्त में आ जाता है. और इसी वजह से आप उसके विचारों और समझदारी में परिवर्तन देखते हैं. यह पान सिंह का सफ़र है,<em> “हमारे यहाँ गाली के जवाब में गोली चल जाती है कोच सरजी” </em>से शुरु होकर यह उस मुकाम तक जाता है जहाँ गाँव में विपक्ष से लेकर अपने पक्ष वाले भी उसका बन्दूक न उठाने और बार-बार कार्यवाही के लिए पुलिस के पास भागे चले जाने का मज़ाक उड़ा रहे हैं. अपने-आप में यह पूरा बदलाव युगान्तकारी है. और फ़िल्म के इस मुकाम तक यह उस नागरिक की कथा है जो आया तो हिन्दुस्तान के देहात की पुरातन सामन्ती व्यवस्था से निकलकर है, लेकिन जिसको आधुनिकता के विचार ने अपने मोहपाश में बाँध लिया है. जिसका आधुनिक ’राज्य’ की संस्था द्वारा अपने नागरिक से किए वादे में यकीन है. वह उससे उम्मीद करता है और व्यवस्था की स्थापना का हक सिर्फ़ उसे देता है.</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">विचारक <strong><a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Ashis_Nandy" target="_blank">आशिस नंदी</a></strong> भारतीय राष्ट्र-राज्य संस्था पर बात करते हुए लिखते हैं, “स्वाधीनता के पश्चात उभरे अभिजात्य वर्ग की राज्य संबंधी अवधारणा राजनीतिक रूप से ’विकसित’ समाजों में प्रचलित अवधारणा से उधार ली गई थी. चूंकि हमारा अभिजात्य वर्ग राज्य के इस विचार में निहित समस्याओं से अनभिज्ञ नहीं था, इसलिए उसने भारत की तथाकथित अभागी और आदम विविधताओं के साथ समझौता करके थोड़ा मिलावटी विचार विकसित किया.” यही वो मिलावटी विचार है जहाँ आधुनिकता के संध्याकाल में वही पुराना सामन्ती ढांचा फिर से सर उठाता है और ठीक यहीं किसी गठबंधन के तहत राज्य अपने हाथ वापस खींच लेता है.</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">इसीलिए, फ़िल्म में सबसे निर्णायक क्षण वो है जहाँ पान सिंह के बुलावे पर गाँव आया कलेक्टर यह कहकर वापस लौट जाता है,<em> “देखो, ये है चम्बल का खून. अपने आप निपटो.” </em>यह आधुनिकता द्वारा दिखाए उस सपने की मौत है जिसके सहारे नवस्वतंत्र देश के नागरिक पुरातन व्यवस्था की गैर-बराबरियों के चंगुल से निकल जाने का मार्ग तलाश रहे थे. फिर आप राज्य की एक दूसरी महत्वपूर्ण संस्था ’पुलिस’ को भी ठीक इसी तरह पीछे हटता पाते हैं. यहीं हिन्दुस्तानी राष्ट्र-राज्य संस्था और उसके द्वारा निर्मित ख़ास आधुनिकता के मॉडल का वो पेंच खुलकर सामने आता है जिसके सहारे मध्यकालीन समाज की तमाम गैर-बराबरियाँ इस नवीन व्यवस्था में ठाठ से घुसी चली आती हैं. पहले यह सामाजिक वफ़ादारियों को राज्य के प्रति वफ़ादारी में बदलने के लिए स्थापित गैर-बराबरीपूर्ण व्यवस्थाओं का अपने फ़ायदे में भरपूर इस्तेमाल करता है और इसीलिए बाद में उन्हें कभी नकार नहीं पाता. जाति जैसे सवाल इसमें प्रमुख हैं. नेहरूवियन आधुनिकता में मौजूद यह फ़ांक ही जाति व्यवस्था को कहीं गहरे पुन:स्थापित करती है. पान सिंह की उम्मीद राज्य रूपी संस्था और उसके द्वारा किए आधुनिकता के वादे से सदा बनी रहती है. वह खुद बन्दूक उठाता है लेकिन अपने बेटे को कभी उस रास्ते पर नहीं आने देता. वह दिल से चाहता है कि राज्य का यह आधुनिक सपना जिये. लेकिन राज्य उसके सामने कोई और विकल्प नहीं छोड़ता.</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">यह ऐतिहासिक रूप से भी सच्चाई के करीब है. अगर आप फ़िल्म में देखें तो यह अस्सी के दशक तक कहानी का वो हिस्सा सुनाती है जिसमें अगड़ी जाति के लोग ज़मीन पर कब्ज़े के लिए लड़ रहे हैं और राज्य संस्था इसे पारिवारिक अदावत घोषित कर इसे सुलझाने से अपने हाथ खींच लेती है. दरअसल आधुनिक राज्य संस्था ने स्थानीय स्तर पर उन सामन्ती शक़्तियों से समझौता कर लिया था जिनके खिलाफ़ उसे लड़ना चाहिए था. यह नवस्वतंत्र मुल्क़ में शासन स्थापित करने और अपनी वैधता स्थापित करने का एक आसान रास्ता था. ऐसे में ज़रूरत पड़ने पर भी वह उनकी गैरबराबरियों के खिलाफ़ कभी बोली नहीं. बन्दूक उठाने वाले यहीं से पैदा होते हैं. वे आधुनिक राज्य द्वारा किए उन वादों के भग्नावशेषों पर खड़े हैं जिनमें समता और समानता की स्थापना और समाज से तमाम गैर-बराबर पुरातन व्यवस्थाओं को खदेड़ दिए जाने की बातें थीं.</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">जय अर्जुन सिंह फ़िल्म पर <a href="http://jaiarjun.blogspot.in/2012/03/loneliness-of-long-distance-baaghi.html" target="_blank"><strong>अपने आलेख में</strong></a> इस बात का उल्लेख करते हैं कि फ़िल्म के अन्त में आया नर्गिस की मौत की खबर वाला संदर्भ इसे कल्ट फ़िल्म ’मदर इंडिया’ से जोड़ता है और यह उन नेहरूवियन आदर्शों की मौत है जिनकी प्रतिनिधि फ़िल्म हिन्दी सिनेमा इतिहास में ’मदर इंडिया’ है. मुझे यहाँ उन्नीस सौ सड़सठ में आई मनोज कुमार की <strong><a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Upkar" target="_blank">’उपकार’</a></strong> याद आती है. एक सेना का जवान जो किसान भी है, ठीक पान सिंह की तरह, और जिसकी सामुदायिक वफ़ादारियाँ इस आधुनिक राष्ट्र राज्य के मिलावटी विचार के साथ एकाकार हो जाती हैं. तिग्मांशु धूलिया की ’पान सिंह तोमर’ इस आदर्श राज्य व्यवस्था की स्थापना वाली भौड़ी ’उपकार’ की पर्फ़ेक्ट एंटी-थिसिस है. यहाँ भी एक सेना का जवान है, जो मूलत: किसान है, लेकिन आधुनिकता का महास्वप्न अब एक छलावा भर है. इस जवान-किसान की भी वफ़ादारी में कोई कमी नहीं, उसने देश के लिए सोने के तमगे जीते हैं. लेकिन देखिए, वह पूछने पर मजबूर हो जाता है कि,<em> “देश के लिए फ़ालतू भागे हम?” </em>अन्त में वह व्यवस्था द्वारा बहिष्कृत समाज के हाशिए पर खड़ा है और उसके हाथ में बन्दूक थमा दी गई है. वह जवाब मांग रहा है कि उसके हाथ में थमाई गई इस बन्दूक के लिए ज़िम्मेदार कौन है, और कौन उन्हें सज़ा देगा?</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">गौर करने की बात है कि ’पान सिंह तोमर’ में मारे जाने वाले गुर्जर हैं जिनका स्थान सामाजिक पदक्रम में अगड़ी जातियों से नीचे आता है. और यह तीस-पैंतीस साल पुरानी बात है. आज यही गुर्जर राजस्थान में अपने हक की जायज़-नाजायज़ मांग करते निरन्तर आन्दोलनरत हैं. और इस जाति व्यवस्था के आधुनिकता के बीच भी काम करने का सबसे अच्छा उदाहरण खुद फ़िल्म में ही देखा जा सकता है. वहाँ देखिए जहाँ इंस्पेक्टर (सदा सर्वोत्कृष्ठ ज़ाकिर हुसैन) गोपी के ससुराल मिलने आए हैं. यह सामाजिक पदक्रम में नीचे खड़ा परिवार है. पुलिसिया थानेदार का उद्देश्य पान सिंह तोमर के गिरोह की टोह लेना है और वह कहते हैं,<em> “जात पात कछू न होत कक्का. इंसान-इंसान के काम आनो चहिए. और जिसके हाथ के खाए हुवे थे धरम भरष्ट हो जावे, ऐसे धरम को तो भरष्ट ही हो जानो चहिए.” </em>वे पानी पीने को भी मंगाते हैं. गौर कीजिए कि तमाम सूचनाएं निकलवा लेने के बाद किस चालाकी से वह बिना उनके घर का पानी पिये ही निकल जाते हैं. यही दोहरे मुखौटे वाला आधुनिक भारतीय राज्य का असल चेहरा है.</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;"><a href="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2012/03/Paan-Singh-Tomar-Image-580.jpg"><img class="alignleft size-medium wp-image-1045" title="Paan-Singh-Tomar-Image-580" src="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2012/03/Paan-Singh-Tomar-Image-580-300x199.jpg" alt="Paan-Singh-Tomar-Image-580" width="300" height="199" /></a>ज़िला टोंक अपने देश में कहाँ है, ठीक-ठीक जानने के लिए शायद आप में से बहुत को आज भी नक्शे की ज़रूरत पड़े. और क्योंकि मैं उन्हीं के गृह ज़िले से आता हूँ, इसलिए अच्छी तरह जानता हूँ कि चम्बल की ही एक सहायक नदी ’बनास’ के सहारे बसा होने के बावजूद टोंक की स्थानीय बोली बीहड़ की भाषा से कितनी अलग है. और इसीलिए इरफ़ान के जिस खूबी से उस लहज़े को अपनाया है, मेरे मन में उनके भीतर के कलाकार की इज़्ज़त और बढ़ गई है. जिस तरह वे पर्लियामेंट, मिलिट्री, स्पोर्ट्स जैसे ख़ास शब्दों के उच्चारण में एकदम माफ़िक अक्षर पर विराम लेते हैं और ठीक जगह पर बलाघात देते हैं, भरतपुर-भिंड-मुरैना-ग्वालियर की समूची चम्बल बैल्ट जैसे परदे पर जी उठती है. वे दौड़ते हैं और उनका दौड़ना घटना न रहकर जल्द ही किसी बिम्ब में बदल जाता है. बीहड़ में विपक्षी को पकड़ने के लिए भागते हुए जंगल में सामने आई बाधा कैसे स्टीपलचेज़ धावक को उसका मासूम लड़कपन याद दिलाती है, देखिए.</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">इस तमाम विमर्श से अलग ’पान सिंह तोमर’ कविता की हद को छूने वाली फ़िल्म है. पहली बार मैं सुनता हूँ जब कोच सर कहते हैं,<em> “ओये तू पाणी पर दौड़ेगा.” </em>और समझ खुश होता हूँ कि यह स्टीपलचेज़ जैसी दौड़ के लिए एक सुन्दर मुहावरा है. लेकिन दूसरी बार सिनेमाहाल में फ़िल्म देखते हुए अचानक समझ आता है कि इस वाक्य के कितने गहरे निहितार्थ हैं. यह संवाद पान सिंह तोमर की पूरी ज़िन्दगी की कहानी है. ज़िन्दगी भर वो बीहड़ में चम्बल के पानी पर ही तो दौड़ता रहा. सन्दीप चौटा का पार्श्वसंगीत फ़िल्म को विहंगम भाव प्रदान करता है और बेदाग़ सिनेमैटोग्राफ़ी महाकाव्य सी ऊँचाई. तिग्मांशु की अन्य फ़िल्मों की तरह ही यहाँ भी संवाद फ़िल्म की जान हैं, लेकिन सबसे विस्मयकारी वे दृश्य हैं जहाँ इरफ़ान बिना किसी संवाद वो कह देते हैं जिसे शब्दों में कहना सम्भव नहीं. मेरा पसन्दीदा दृश्य फ़िल्म के बाद के हिस्से में आया वो शॉट है जहाँ सेना के कंटोनमेंट एरिया में अपने जवान हो चुके बेटे से मिलने आए अधेड़ पान सिंह पीछे से अपने वर्दी पहने बेटे को जाता हुआ देख रहे हैं. आप सिर्फ़ उन आँखों को देखने भर के लिए यह फ़िल्म देखने जाएं. ऐसा विस्मयकारी दृश्य लोकप्रिय हिन्दी सिनेमा के लिए दुर्लभ है.</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">’पान सिंह तोमर’ जैसी फ़िल्में हिन्दी सिनेमा में दुर्लभ हैं और मुश्किल से नसीब होती हैं. हम इस राष्ट्र की किसी एक उपकथा के माध्यम से इस बिखरी तस्वीर के सिरे आपस में जोड़ पाते हैं. ’पान सिंह तोमर’ वह उपकथा है जिसमें आधुनिक राज्य अपना किया वादा पूरा नहीं करता और निर्णायक क्षण अपने हाथ वापस खींच लेता है. एक सामान्य नागरिक बन्दूक उठाने के लिए इसलिए मजबूर होता है क्योंकि उसके लिए दो ही विकल्प छोड़े गए हैं, पहला कि बन्दूक उठाओ या फिर दूसरा कि मारे जाओ. मरना दोनों विकल्पों में बदा है. वर्तमान में इसी राज्य द्वारा पोषित कथित ’विकास’ के अश्वमेधी घोड़े के रथचक्र में पिस रहे असहाय नागरिक द्वारा विरोध में उठाए जाते विद्रोह के झंडे को भी इसी संदर्भ में पढ़ने की कोशिश करें. देखें कि आखिर उसके लिए हमारी राज्य व्यवस्था ने कौन से विकल्प छोड़े हैं? और यह भी कि अगर निर्वाह के लिए वही विकल्प आपके या मेरे सामने होते तो हमारा चयन क्या होता?</p>
<p style="text-align: justify;">*****</p>
<p style="text-align: justify;">साहित्यिक पत्रिका <strong>’कथादेश’</strong> के अप्रैल अंक में प्रकाशित.</p>
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		<title>सिनेमाई संगीत में प्रामाणिकता की तलाश</title>
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		<pubDate>Mon, 12 Mar 2012 13:45:21 +0000</pubDate>
		<dc:creator>मिहिर</dc:creator>
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		<description><![CDATA[
“हिन्दी सिनेमा के संगीत से मेलोडी चली गई. आजकल की फ़िल्मों के गीत वाहियात होते जा रहे हैं. पहले के गीतों की तरह फ़िल्म से अलग वे याद भी नहीं रहते. जैसे उनका जीवन फ़िल्म के भीतर ही रह गया है, बाहर नहीं.”

पिछले दिनों सिनेमाई संगीत से जुड़ी कुछ चर्चाओं में हिस्सेदारी करते हुए यह [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<blockquote>
<p style="text-align: justify;">“हिन्दी सिनेमा के संगीत से मेलोडी चली गई. आजकल की फ़िल्मों के गीत वाहियात होते जा रहे हैं. पहले के गीतों की तरह फ़िल्म से अलग वे याद भी नहीं रहते. जैसे उनका जीवन फ़िल्म के भीतर ही रह गया है, बाहर नहीं.”</p>
</blockquote>
<p style="text-align: justify;">पिछले दिनों सिनेमाई संगीत से जुड़ी कुछ चर्चाओं में हिस्सेदारी करते हुए यह मैंने आम सुना. इसे आलोचना की तरह से सुनाया जाता था और इस आलोचना के समर्थन में सर हिलाने वाले दोस्त भी बहुत थे.</p>
<p style="text-align: justify;"><a href="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2012/03/aitbaar.jpg"><img class="alignleft size-medium wp-image-1032" title="aitbaar" src="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2012/03/aitbaar-300x135.jpg" alt="aitbaar" width="300" height="135" /></a>हिन्दी सिनेमा और सिनेमाई संगीत के बारे में दो भिन्न तरह की बातें पिछले दिनों मैंने अलग-अलग मंचों से कही जाती सुनीं, जिनका यूं तो आपस में सीधा कोई लेना-देना नहीं दिखता लेकिन दोनों को साथ रखकर पढ़ने से उनके गहरे निहितार्थ खुलते हैं. पहली बात को हमने ऊपर उद्धृत किया. लेकिन इससे बिल्कुल इतर दूसरी बात समकालीन सिनेमा और नए निर्देशकों के बारे में है जिनके सिनेमा बारे में आम समझ यह बन रही है कि यह अपने परिवेश की प्रामाणिकता पर गुरुतर ध्यान देता है और इसे फ़िल्म की मूल कथा के संप्रेषण के मुख्य साधन के बतौर चिह्नित करता है. दिबाकर बनर्जी, अनुराग कश्यप, चंदन अरोड़ा और कुछ हद तक इम्तियाज़ अली जैसे निर्देशक अपने सिनेमा में इस ओर विशेष ध्यान देते पाए गए हैं.</p>
<p style="text-align: justify;">अगर मैं कहूँ कि इस आलेख के सबसे पहले जो कथन मैंने उद्धृत किया, खुद मैं भी उससे काफ़ी हद तक सहमत हूँ, तो? लेकिन साथ ही यह भी कि मैं उसे आलोचना नहीं मानता. हम दरअसल इन दो भिन्न लगती बातों को साथ रखकर नहीं देख पा रहे हैं. देखें तो समझ आएगा कि पहली बात के सूत्र दूसरे सकारात्मक बदलाव में छिपे हैं.</p>
<p style="text-align: justify;">इसे कुछ बड़े परिप्रेक्ष्य में समझें. माना जाता है कि उदारीकरण के बाद हिन्दुस्तान के बाज़ार खुलने की प्रक्रिया में हिन्दी सिनेमा के लिए ’हॉलीवुड’ की चुनौती दिन दूनी रात चौगुनी बड़ी होती गई है. बात सही भी है. लेकिन मेरा मानना है कि ’हॉलीवुड’ की चुनौती जितनी बड़ी समूचे हिन्दी सिनेमा के लिए है, उससे कहीं ज़्यादा हिन्दी सिनेमा में सदा से एक अभिन्न अंग के रूप में मौजूद रहे गीतों के लिए हैं. जिस तरह समाज पर मुख्यधारा ’हॉलीवुड’ सिनेमा का प्रभाव बढ़ रहा है, हिन्दी सिनेमा में उससे मुकाबला करने की, उसे पछाड़ने की जुगत बढ़ती जा रही है. और ऐसे में सबसे बड़ा संकट, शायद अस्तित्व का संकट सिनेमा के गीत-संगीत के लिए उत्पन्न होता है.</p>
<p style="text-align: justify;">हिन्दी सिनेमा में नब्बे के दशक में सबसे बड़ा बदलाव लेकर आने वाले व्यक्ति का नाम है रामगोपाल वर्मा. आज सिनेमा में देखी जा रही तकनीक समर्थित नवयथार्थवादी धारा को स्थापित करने का श्रेय उन्हें ही जाता है. और आपको याद होगा कि उन्होंने एक समय संगीत को अपने सिनेमा से एक गैर-ज़रूरी अवयव की तरह से निकाल बाहर किया था. यह संक्रमण काल था और इस दौर में हिन्दी सिनेमा का संगीत अपनी अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहा था. यहाँ दो रास्ते थे उसके सामने, एक &#8211; अपनी पुरानी प्रतिष्ठा का इस्तेमाल करते हुए वैसा ही बने रहना, लेकिन बदलते सिनेमा के रंग में लगातार अप्रासंगिक होते चले जाना. और दूसरा – स्वयं का पुन: अविष्कार करने की कोशिश, याने सिनेमा की बदलती भाषा के अनुसार बदलना और सबसे ऊपर फ़िल्म के भीतर अपनी प्रासंगिकता स्थापित करना.</p>
<p style="text-align: justify;"><a href="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2012/03/dev-d.jpg"><img class="alignleft size-medium wp-image-1027" title="dev d" src="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2012/03/dev-d-300x225.jpg" alt="dev d" width="300" height="225" /></a>मुझे खुशी है कि कुछ निर्देशकों ने बाज़ार की परवाह न करते हुए दूसरा रास्ता चुना. और यहाँ बाज़ार की परवाह न करने जैसे वाक्य का मैं जान-बूझकर प्रयोग कर रहा हूँ. क्योंकि फ़िल्म संगीत आज अपने आप में एक वृहत उद्योग है और ऐसे में अपनी फ़िल्म में ’फ़िल्म से बाहर’ पहचाने जाने वाले गीतों का न होना एक बड़ा दुर्गुण है. ऐसे में निर्देशकों ने अपने सिनेमा में संगीत को एक किरदार के बतौर पेश किया और उससे वह काम लेने लगे जिन्हें अभिव्यक्ति के सीमित साधनों के चलते या परिस्थिति के चलते फ़िल्म में मौजूद किरदार अभिव्यक्त नहीं कर पा रहे थे. अनुराग कश्यप की ’देव डी’ का ही उदाहरण लें. किरदारों की व्यक्तिगत अभिव्यक्तियाँ जहाँ अपनी सीमाएं तलाशने लगती हैं, फ़िल्म में संगीत आता है और संभावनाओं के असंख्य आकाश सामने उपस्थित कर देता है.</p>
<p style="text-align: justify;">अनुराग द्वारा निर्मित और राजकुमार गुप्ता द्वारा निर्देशित ’आमिर’ का ही उदाहरण लें. फ़िल्म जो कथा कहती है वह अत्यन्त भावुक हो सकती थी, लेकिन यहीं अमित त्रिवेदी का संगीत उसे एक नितान्त ही भिन्न आयाम पर ले जाता है. उनके संगीत में एक फक्कड़पना है जिसके चलने ’आमिर’ का स्वाद अपनी पूर्ववर्ती मैलोड्रैमेटिक फ़िल्मों से बिल्कुल बदल जाता है. अमिताभ भट्टाचार्या द्वारा लिखा गीत ’चक्कर घूम्यो’ को शायद आप फ़िल्म से बाहर याद न करें, लेकिन याद करें कि फ़िल्म में एक घोर तनावपूर्ण स्थिति में आकर वही गीत कैसे आपको सोच का एक नया नज़रिया देता है. घटना को देखने का एक नया दृष्टिकोण जिसके चलने ’आमिर’ अन्य थ्रिलर फ़िल्मों से भिन्न और एक अद्वितीय स्वाद पाती है.</p>
<p style="text-align: justify;">राजकुमार गुप्ता की ही अगली फ़िल्म ’नो वन किल्ड जेसिका’ के गीतों को देखें. क्या आपने हिन्दी सिनेमाई संगीत की कोमलकान्त पदावली में ऐसे खुरदुरे शब्द पहले सुने हैं,</p>
<p style="text-align: justify;">“डर का शिकार हुआ ऐतबार<br />
दिल में दरार हुआ ऐतबार<br />
करे चीत्कार बाहें पसारकर के</p>
<p style="text-align: justify;">नश्तर की धार हुआ ऐतबार<br />
पसली के पार हुआ ऐतबार<br />
चूसे है खून बड़ा खूँखार बनके</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">झुलसी हुई इस रूह के चिथड़े पड़े बिखरे हुए<br />
उधड़ी हुई उम्मीद है<br />
रौंदे जिन्हें कदमों तले बड़ी बेशरम रफ़्तार ये</p>
<p style="text-align: justify;"><a href="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2012/03/no_one_killed_jessica.jpg"><img class="alignright size-medium wp-image-1028" title="no_one_killed_jessica" src="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2012/03/no_one_killed_jessica-300x208.jpg" alt="no_one_killed_jessica" width="300" height="208" /></a>जल भुन के राख हुआ ऐतबार<br />
गन्दा मज़ाक हुआ ऐतबार<br />
चिढ़ता है, कुढ़ता है, सड़ता है रातों में”</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">गीत की यह उदंडता अभिव्यक्त करती है उस बेबसी को जिसे फ़िल्म अभिव्यक्त करना चाहती है. ठीक वैसे ही जैसे ’उड़ान’ के कोमल बोल उन्हें अभिव्यक्त करनेवाले सोलह साल के तरुण कवि की कल्पना से जन्म लेते हैं, ’नो वन किल्ड जेसिका’ के ’ऐतबार’ और ’काट कलेजा दिल्ली’ जैसे गीत अपने भीतर वह पूरा सभ्यता विमर्श समेट लाते हैं जिन्हें फ़िल्म अपना मूल विचार बनाती है.</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">मुझे याद आता है जो गुलज़ार कहते हैं, कि मेरे गीत मेरी भाषा नहीं, मेरे किरदारों की भाषा बोलते हैं. और वह मेरी अभिव्यक्तियाँ नहीं है, उन फ़िल्मी परिस्थितियों की अभिव्यक्तियाँ हैं जिनके लिए उन्हें लिखा जा रहा है. ऐसे में समझना यह होगा कि अगर सिनेमाई गीतों में अराजकता बढ़ रही है तो यह हमारे सिनेमा में पाए जाने वाले किरदारों और परिवेश के विविधरंगी होने का संकेत है और इसका स्वागत किया जाना चाहिए.</p>
<p style="text-align: justify;">’पीपली लाइव’ का संगीत इसलिए ख़ास है क्योंकि इंडियन ओशन, भदवई गांव की गीत मंडली, राम संपत, रघुवीर यादव, नगीन तनवीर और नूर मीम राशिद जैसे नामों से मिलकर बनता उनका सांगितिक संसार इस समाज की इंद्रधनुषी तस्वीर अपने भीतर समेटे है. सच है कि उस संगीत में अराजकता है और सम्पूर्ण ’एलबम’ मिलकर कोई एक ठोस स्वाद नहीं बनाता. शायद इसीलिए ’पीपली लाइव’ संगीत के बड़े पुरस्कार नहीं जीतती. लेकिन इकसार की चाह क्या ऐसी चाह है जिसके पीछे अराजकता का यह इंद्रधनुषी संसार खो दिया जाए.</p>
<p style="text-align: justify;"><a href="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2012/03/dibakar.jpg"><img class="alignleft size-full wp-image-1036" title="dibakar" src="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2012/03/dibakar.jpg" alt="dibakar" width="155" height="226" /></a>दिबाकर की फ़िल्मों का संगीत कभी खबर नहीं बनता. न कभी साल के अन्त में बननेवाली ’सर्वश्रेष्ठ’ की सूचियों में ही आ पाता है. वे हमेशा कुछ अनदेखे, अनसुने नामों को अपनी फ़िल्म के संगीत का ज़िम्मा सौंपते हैं और कई बार फ़िल्म के गीत खुद ही लिख लेते हैं. शायद यह बात &#8211; ’फ़िल्म का संगीत फ़िल्म के बाहर नहीं’ उनकी फ़िल्मों के संगीत पर सटीक बैठती है.</p>
<p style="text-align: justify;">फिर भी मैं दिबाकर की फ़िल्मों के संगीत को हिन्दी सिनेमा में बीते सालों में हुआ सबसे सनसनीखेज़ काम मानता हूँ. क्योंकि उनकी फ़िल्मों का संगीत उनकी फ़िल्मों का सबसे महत्वपूर्ण किरदार होने से भी आगे कहीं चला जाता है. ’ओये लक्की लक्की ओये’ में स्नेहा खानवलकर और दिबाकर शुरुआत में ही ’तू राजा की राजदुलारी’ लेकर आते हैं. हरियाणवी रागिनी जिसका कथातत्व भगवान शिव और पार्वती के आपसी संवाद से निर्मित होता है. देखिए कि किस तरह तरुण गायक राजबीर द्वारा गाया गया यह गीत एक पौराणिक कथाबिम्ब के माध्यम से समकालीन शहरी समाज में मौजूद class के नफ़ासत भरे भेद को उजागर कर देता है. मुझे फिर याद आते हैं आचार्य हज़ारीप्रसाद द्विवेदी के निबंध जिनमें वह तमाम ’सूटेड-बूटेड’ आर्य देवताओं के मध्य अकेले लेकिन दृढ़ता से खड़े दिखते फ़क्कड़, भभूतधारी और मस्तमौला अनार्य देवता शिव की भिन्नता को स्पष्ट करते हैं.</p>
<p style="text-align: justify;">इसी क्रम में फ़िल्म के दूसरे गीत की यह शुरुआती पंक्तियाँ देखें,</p>
<p style="text-align: justify;">“जुगणी चढदी एसी कार<br />
जुगणी रहंदी शीशे पार<br />
जुगणी मनमोहनी नार<br />
ओहदी कोठी सेक्टर चार”</p>
<p style="text-align: justify;">यह जिस &#8216;शीशे पार’ का उल्लेख फ़िल्म का यह गीत करता है, यही वो सीमा है जिसे पार कर जाने की जुगत &#8216;लक्की’ पूरी फ़िल्म में भिड़ाता रहता है. यह class का ऐसा भेद है जिसे सिर्फ़ पैसे के बल पर नहीं पाटा जा सकता. यहाँ फ़िल्म में संगीत किरदार भर नहीं, वो उस फ़िल्म के मूल विचार की अभिव्यक्ति का सबसे प्राथमिक स्रोत बनकर उभरता है. दिबाकर की ही अगली फ़िल्म &#8216;लव, सेक्स और धोखा’ का घोर दर्जे की हद तक उपेक्षित किया गया संगीत भी इसी संदर्भ में पुन: पढ़ा जाना चाहिए.</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">पिछले साल आई फ़िल्म &#8216;डेल्ही बेली’ में एक गीत था &#8216;स्वीट्टी स्वीट्टी स्वीट्टी तेरा प्यार चाईंदा’. जब मैंने दोस्तों को बोला कि यह मेरी लिस्ट में पिछले साल के सबसे शानदार गीतों में से एक है, तो मुझे जवाबी आश्चर्य का सामना करना पड़ा. मेरी इस राय की वजह क्या है? वजह है इस गीत की फ़िल्म के भीतर भूमिका. फ़िल्म इस गीत के साथ हमारा परिचय दिल्ली के उस उजड्ड से करवाती है जिसकी सबसे बड़ी अभिव्यक्ति उसके हाथ में मौजूद उसकी पिस्तौल है. इस अभिव्यक्ति के लिहाज से गीत मुकम्मल है और इसीलिए महत्वपूर्ण है. यहाँ फ़िल्म का दूसरा गीत &#8216;बेदर्दी राजा’ भी देखें जो उस लंपट किरदार से आपका परिचय करवाता है जिसकी लंपटता फ़िल्म के कथासूत्र में आगे जाकर महत्वपूर्ण भूमिका अदा करती है.</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">बेशक हिन्दी सिनेमा का संगीत बदला है. लेकिन समय सिर्फ़ उसकी आलोचना का नहीं, ज़रूरत उसमें निहित सकारात्मक बदलाव देखे जाने की भी है. हम लोकप्रिय लेकिन अपनी फ़िल्म से ही पूरी तरह अप्रासंगिक हो जाने वाले इकसार संगीत के मुकाबले ऐसा, कुछ नया अविष्कार करने की ज़ुर्रत करने वाला संगीत हमेशा ज़्यादा सराहेंगे.</p>
<p style="text-align: justify;">*****</p>
<p style="text-align: justify;">साहित्यिक पत्रिका <strong>&#8216;कथादेश’</strong> के मार्च अंक में प्रकाशित</p>
]]></content:encoded>
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		<title>अधूरेपन में प्रामाणिकता की तलाश</title>
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		<pubDate>Mon, 13 Feb 2012 03:31:42 +0000</pubDate>
		<dc:creator>मिहिर</dc:creator>
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		<description><![CDATA[साल ख़त्म होता है और आप अपने झोले में बेहतर फ़िल्में जुटाने फिर हालिया इतिहास में बह निकलते हैं. लेकिन हिन्दी सिनेमा के साथ होता यह है कि सम्भाले जाने लायक अनुभव तमाम फ़िल्मों में बिखरे मिलते हैं. आप ’स्टेनली का डब्बा’ के पार्थो को सहेजकर रखना चाहते हैं, लेकिन हद दर्जे की स्टीरियोटाइप भूमिकाओं [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;"><a href="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2012/02/Shaitan-large-1.jpg"><img class="alignleft size-medium wp-image-1015" title="Shaitan " src="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2012/02/Shaitan-large-1-300x181.jpg" alt="Shaitan " width="300" height="181" /></a>साल ख़त्म होता है और आप अपने झोले में बेहतर फ़िल्में जुटाने फिर हालिया इतिहास में बह निकलते हैं. लेकिन हिन्दी सिनेमा के साथ होता यह है कि सम्भाले जाने लायक अनुभव तमाम फ़िल्मों में बिखरे मिलते हैं. आप <strong>’स्टेनली का डब्बा’</strong> के पार्थो को सहेजकर रखना चाहते हैं, लेकिन हद दर्जे की स्टीरियोटाइप भूमिकाओं में हिन्दी और अंग्रेज़ी के अध्यापक, अध्यापिकाओं को देखकर आपका माथा ठनक जाता है. आप <strong>’लेडीज़ वर्सेस रिक्की बहल’</strong> की डिम्पल चढ्ढा (परिणिति चोपड़ा) को सराहते हैं लेकिन पिछले साल जिस जोड़े पर आप मर मिटे थे, उसका ऐसा भ्रष्ट ’बॉलीवुडीकरण’ होते देखना दर्द देता है. <strong>’शैतान’</strong> अपने चमत्कार से विस्मित करती है. लेकिन उसके भीतर कुरेदने पर हाथ कुछ नहीं आता. अनुराग को मालूम हो, मैं आज भी उस असल स्याह शैतान <strong>’पांच’</strong> के सार्वजनिक प्रदर्शन का इन्तज़ार करता हूँ. मुझे <strong>’साहिब, बीवी और गैंगस्टर’</strong> पसन्द आती है. क्योंकि यह फ़िल्म छोटे वादे करती है और उन्हें पूरा करती है.</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">लेकिन अगर आप मुझसे पूछें कि हमें कौनसी फ़िल्म देखनी चाहिए, तो मैं आपको <strong>’अरण्य काण्डम’</strong> देखने की सलाह दूंगा. पिछले साल की शुरुआत में आई यह तमिल फ़िल्म उन तमाम चमत्कारों को समेटे है जिन्हें आपने ’शैतान’ में देख सराहा, और उस बदलाव को भी जिसे ’साहिब, बीवी और गैंगस्टर’ में माही गिल ने अपनी नष्ट अदाकारी से बरबाद कर दिया. और इसके ऊपर ’अरण्य काण्डम’ कहीं और भी है. बेशक इसमें वीभत्स हिंसा है, लेकिन इसकी सबसे डरावनी और भयावह कहानियाँ वे हैं जिन्हें किसी सड़क किनारे के ढाबे पर चाय के प्यालों के बीच सुनाया जा रहा है. चकित करती है, हैरत में डालती है. अगर आप कोरियन सिनेमा के प्रशंसक हैं, तो ’अरण्य काण्डम’ आपके ही लिए है. और अगर आपने हालिया कोरियन सिनेमा नहीं देखा तो ज़रूरत नहीं, सीधे ’अरण्य काण्डम’ देखिए.</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;"><a href="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2012/02/Aaranya-kaandam.jpg"><img class="alignright size-medium wp-image-1017" title="Aaranya kaandam" src="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2012/02/Aaranya-kaandam-191x300.jpg" alt="Aaranya kaandam" width="191" height="300" /></a>दोस्तों की बनाई <strong>’जो डूबा सो पार’</strong> में ठीक पहलेपहल यह हीरा मिलता है. फ़िल्म का पहला दृश्य. बिहार के एक सरकारी स्कूल में अर्धवार्षिक परीक्षाओं का समय. चारों ओर आनेवाले हिन्दी के पर्चे की दहशत. और ठीक कैमरे के सामने एक विद्यार्थी आदिम कारक सूत्रवाक्य रटता हुआ दिखाई देता है,</p>
<p style="text-align: justify;">“कर्ता ने, कर्म को, करण से, सम्प्रदान के लिए, अपादान से संबंध का के की, अधिकरण…”</p>
<p style="text-align: justify;">मेरे भीतर बैठा बच्चा अचानक मचलकर जाग जाता है. उन गलियारों की याद आती है जिन्हें मैं बहुत पीछे कहीं अपने भूत में छोड़ आया हूँ. करीने से सजाए हुए महानगर में भुला दिए गए कस्बे के उजाड़ याद आते हैं. परचूने की दुकान चलाता वो दोस्त याद आता है जो आठवीं में सामने आए जीवन के पहले बोर्ड का टॉपर था. उसी बोर्ड में जहाँ मुझे पहला दर्जा भी किसी परियों का ख़्वाब लगता था.</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">साल दो हज़ार ग्यारह का यथार्थ <strong>’शोर इन द सिटी’</strong> और <strong>’धोबी घाट’</strong> जैसी फ़िल्में गढ़ती हैं. कैसे? क्योंकि मेरा वो दोस्त जो आठवीं क्लास का टॉपर था और आज परचूने की दुकान चलाता है, उसके पिता भी वही परचूने की दुकान चलाते थे. और मैं आठवीं क्लास का एक औसत से कम विद्यार्थी, जिसे गणित के सूत्रों में मृत्यु के अक्षर दिखाई देते थे आज विश्वविद्यालय में पढ़ता-पढ़ाता हूँ. तो इसमें मेरा क्या योग है, मेरे पिता भी अपनी पूरी ज़िन्दगी एक विश्वविद्यालय में पढ़ाया करते थे. हमारे समाज में तय दायरे तोड़ना आज भी मुश्किल है. चाहे वह वर्ग हो, चाहे जाति. मुम्बई जैसे शहर में आकर उन चुनौतियों के रूप-रंग-चेहरे बदल जाते हैं. अब वो प्रत्यक्ष नहीं, नकाब ओढ़कर बड़ी नफ़ासत से शिकार करती हैं. ऊपर उल्लिखित दोनों फ़िल्में इसीलिए महत्वपूर्ण हैं कि वे इस खामोश सच्चाई की ओर इशारा करती हैं.</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">लेकिन उम्मीदों भरी फ़िल्म <strong>’आई एम कलाम’</strong> में यही कोशिश है. वैसे मैं ’आई एम कलाम’ को इसलिए भी याद रखता हूँ कि यह हमें एक सामान्य वार्तालाप के माध्यम से ’आरक्षण’ जैसी प्रक्रिया का औचित्य समझा देती है.</p>
<blockquote>
<p style="text-align: justify;">“इतनी सारी किताबें! काए की हैं?”<br />
“आपको अंग्रेजी नहीं आती क्या?”<br />
“तेरेको पेड़ पर चढ़ना आता है?”<br />
“हमें घोड़े पर चढ़ना आता है. आपको घुड़सवारी आती है?”<br />
“मेरेको ऊंट पर चढ़ना आता है. तेरेको क्या ऊंट की दवा करनी आती है?”</p></blockquote>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">लेकिन अफ़सोस कि हमारे स्कूलों में, हमारी परीक्षाओं में ’पेड़ पर चढ़ना’ या ’ऊंट की दवा करना’ कभी नहीं पूछा जाता. यह संवाद कुछ यूं ही आगे बढ़ता है और अंत में कलाम और कुंवर रणविजय के बीच घुड़सवारी सीखने और पेड़ पर चढ़ना सिखाने के लेन-देन का समझौता हो जाता है. ऐसे साल में जब एक फ़िल्म सिर्फ़ ’आरक्षण’ का नाम ज़ोर-ज़ोर से पुकारकर ही बॉक्स ऑफ़िस की वैतरणी पार कर जाना चाहती हो, ’आई एम कलाम’ का यह दृश्य बड़ी ही नफ़ासत से हमें ’मेरिट’ की वकालत में खड़े तर्कों का असल पेंच और आरक्षण की व्यवस्था का असल मतलब समझाता है. यह कथा वहाँ ख़त्म होती है जहाँ कलाम दिल्ली पहुँचता है. लेकिन अब सिनेमाकार को भी मालूम है कि परिवर्तन दिल्ली से नहीं होता. अब यूं परिवर्तन ही नहीं होता.</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">यह दूसरी बार देखने पर होता है कि मैं <strong>’तनु वेड्स मनु’</strong> की प्रामाणिक खूबसूरती की सबसे आधारभूत वजह चिह्नित कर पाता हूँ. इस तथ्य से इतर कि कानपुर से शुरु होकर दिल्ली, कपूरथला और फिर लौटकर कानपुर जैसे लोकेल में घूमती यह फ़िल्म अपने शुरुआती बीस मिनट में हिन्दी सिनेमा को पिछले साल का सबसे प्रामाणिक शुरुआती प्रसंग देती है और अपनी भाषा, व्यवहार एवं ’मन्नु भैया’ जैसे अपनी माटी में गहरे रचे-बसे गीत के माध्यम से बाकायदा किसी उत्तर भारतीय शहर का सामुदायिक जीवन खड़ा करती है, चिह्नित यह किया जाना चाहिए कि ’तनु वेड्स मनु’ फ़िल्म के विभिन्न निर्णायक क्षणों में घर की छत का एक घटनास्थल के तौर पर किस तल्लीनता से इस्तेमाल करती है.</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">इतिहास में हमसे पैंतालीस साल की दूरी पर खड़े श्रीलाल शुक्ल के अविश्वसनीयता की हद तक प्रामाणिक उपन्यास <strong>’राग दरबारी’</strong> का शिवपालगंज याद कीजिए. कल्पना कीजिए कि इस शिवपालगंज में से अगर छतों पर घटित होने वाले प्रसंग निकाल दिए जाएं तो शेष क्या बचेगा. वो अद्वितीय प्रसंग जिसमें छत पर सोये रंगनाथ को भूलवश कन्या द्वारा कोई ’और’ समझ लिया जाता है और गलती समझ आने पर कन्या “हाय, मेरी मैया!” कहकर भाग छूटती हैं. बताते चलें कि यही वह प्रसंग है जिसमें से होकर हमारी लोकप्रिय संस्कृति के बतौर वाहक मौजूद सबसे प्रामाणिक प्रेम-पत्र का सूत्र निकलता है. वही प्रेम पत्र जिसके उद्धरण से <strong>’लव इन साउथ एशिया’</strong> पुस्तक में <strong>फ्रेंचस्का ऑरसीनी</strong> अपने शोध लेख <strong>’लव लेटर्स’</strong> की शुरुआत करती हैं.</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;"><a href="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2012/02/tanu-weds-manu-400.jpg"><img class="alignleft size-full wp-image-1021" title="tanu weds manu 400" src="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2012/02/tanu-weds-manu-400.jpg" alt="tanu weds manu 400" width="400" height="170" /></a>चौक और बरामदे तो हम इस इकसार होती जाती आधुनिक शहरी भवन निर्माण कला के हाथों पहले ही नष्ट करवा चुके थे. मकान से फ़्लैट संस्कृति में संचरण के साथ हमने अपने घर में जिस सबसे महत्वपूर्ण चीज़ को खोया है वह है छत. मेरे बचपन की यादों के सबसे महत्वपूर्ण हिस्से अपने घर की छत पर उगते हमनाम के साए में मोरनियों के झुंड को गेंहूँ खिलाते हुए बनते हैं. लेकिन मुझसे दस साल बाद पैदा हुई पीढ़ी की यादों से यह अनुभव सिरे से गायब है.</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">बड़ी सी पोल वाले घर की ऊंचे खंबों पर टिकी छत पर बने ’चे गुवेरा’ की तस्वीर वाले उस बाग़ी लड़की के कमरे से शुरु होकर, जहाँ मनोज शर्मा उर्फ़ मन्नू तनुजा त्रिवेदी उर्फ़ तनु को देखने आए हैं, ’तनु वेड्स मनु’ में विभिन्न प्रसंगों में कुल-मिलाकर अठ्ठारह बार छतों का पृष्ठभूमि के तौर पर इस्तेमाल है. और अगर आप पीछे जाकर देखें तो बीते दशक में आई ’मैं, मेरी पत्नी और वो’ और ’दिल्ली 6’ से लेकर ’गुलाल’ और ’देव डी’ तक, उन तमाम फ़िल्मों में जहाँ आपको शहरों के अन्दरूनी जीवन का प्रामाणिक चित्रण मिलता है, इस ज़िन्दगी में गुंथे एक घटनाप्रधान space के बतौर छत / अटरिया / छज्जे का इस्तेमाल मिलता है. यहाँ <strong>राजशेखर</strong> के लिखे गीत ’मन्नू भैया’ की वह पंक्तियाँ भी देखी जानी चाहियें जो कहीं हाथ से निकलते कस्बाई जीवन के अवशेषों को बड़े प्रेम से समेटती चलती हैं,</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">“अंबिया इलाइची दालचीनी और केसर,<br />
सुखाएगी तन्नु करोल बाग़ के छत पर,<br />
फिर पोस्ता पिसेगा, कलोंजी कुटेगी,<br />
मर्तबान से अफ़वाह उठेगी.</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">पतंग पीछे बच्चे जब आयेंगे छत पर<br />
तन्नु की सारी बरनी जायेंगे चट चट चट चट चट चटकर<br />
तब मन्नु भइया क्या करिहें, मन्नु भइया क्या करिहें.”</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">’तनु वेड्स मनु’ एक सम्पूर्ण सिनेमा अनुभव नहीं है और यह बुरी बात है कि इस फ़िल्म में भी अंतत: एक बग़ावती तेवर वाली लड़की को वृहत समुदाय द्वारा बड़ी नफ़ासत से कायदे से रहना और कायदे से ’सही’ फ़ैसले करना सिखा ही दिया जाता है, लेकिन इस फ़िल्म को उत्तर भारत के कस्बाती जीवन के अपने तीक्ष्ण निरीक्षण के लिए याद रखा जाना चाहिए.</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;"><a href="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2012/02/delhi-belly-resize.jpg"><img class="alignright size-full wp-image-1022" title="delhi belly resize" src="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2012/02/delhi-belly-resize.jpg" alt="delhi belly resize" width="367" height="210" /></a>ठीक वैसे ही जैसे <strong>पूर्णा जगन्नाथन</strong> को याद रखा जाना चाहिए. करीने से सजाई गई नायिकाओं की अन्तहीन श्रंखला के बीच, जिन्हें ज़्यादातर उस विश्व सुंदरी प्रतियोगिताओं की ज़ीरॉक्स मशीन से निकाला जाता है, हिन्दी सिनेमा में मुख्य नायिका के बतौर अपनी शुरुआत कर रहीं चालीस वर्षीय पूर्णा अविश्वस्नीय लगता सकारात्मक बदलाव हैं. नायिका जो नायक द्वारा पूर्व पति के बारे में पूछे जाने पर कहती है, “वही पुरानी कहानी. जबरदस्ती शादी करा दी.” और जब नायक चिंता में पड़कर कहता है, “सच?” तो जवाब मिलता है, “नहीं. स्कूल में मेरा बॉयफ्रेंड था. भागकर शादी की थी हम दोनों ने. अपने माँ-बाप से लड़कर.” आश्चर्य यह नहीं कि यही लड़कपन का प्यार आज उनके ऊपर बीच सड़क गोलियाँ बरसा रहा है. आश्चर्य यह भी नहीं कि अलग हो जाने के बाद भी इस ’पति’ को अपनी पत्नी का किसी ’पराए मर्द’ के साथ दिखना पसन्द नहीं. सुखद आश्चर्य यह है कि इतना सब होने के बाद भी <strong>’डेल्ही बेल्ली’</strong> की नायिका मेनका के चेहरे पर अफ़सोस की एक लकीर नहीं.</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">अपनी मर्ज़ी से, परिवार और समाज से लड़कर लिए फ़ैसले के सिरे से गलत साबित हो जाने के बावजूद यहाँ एक लड़की है जो अपनी ज़िन्दगी अपनी शर्तों पर जीना छोड़ने के लिए तैयार नहीं. समाज के प्रति, सलीके के प्रति, व्यवस्था के प्रति झुकने को तैयार नहीं. जिसके बेपरवाह अन्दाज़ को ’वक़्त के थपेड़े’ बदल नहीं पाए हैं. वो अपनी ज़िन्दगी खुद जीना चाहती है और अपने हिस्से की गलतियाँ भी खुद करना चाहती है. यह नायिका लम्बे समय से हमारे सिनेमा से अनुपस्थित रही है. इसे सम्भालिए.</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">उद्दंडता जनार्दन जाखड़ उर्फ़ जॉर्डन में भी है. वो खुद कभी गहरे दिल से चाही अपनी सफ़लता को क़तरा-क़तरा उड़ाता चला जाता है. लेकिन नायक में ऐसी उद्दंडता देखा जाना कम स कम हिन्दी सिनेमा के लिए नया नहीं, और बहुत सारी अन्य वजहों में एक वजह यह भी है कि मैं <strong>’रॉकस्टार’</strong> को एक पाथब्रेकिंग फ़िल्म नहीं मानता. लेकिन फिर भी, फ़िल्म का वह दृश्य मुझे हमेशा याद रहेगा जहाँ इस राष्ट्र-राज्य की शतकवीर राजधानी के हृदयस्थल पर खड़ा होकर एक शायर बियाबान को पुकारता है,</p>
<p style="text-align: justify;">
<blockquote>
<p style="text-align: justify;">“पता है, बहुत साल पहले यहाँ एक जंगल होता था. घना, भयानक जंगल. फिर यहाँ एक शहर बन गया. साफ़-सुधरे मकान, सीधे रास्ते. सबकुछ तरीके से होने लगा. पर जिस दिन जंगल कटा, उस दिन परिन्दों का एक झुंड यहाँ से हमेशा के लिए उड़ गया. कभी नहीं लौटा. मैं उन परिन्दों को ढूंढ रहा हूँ. किसी ने देखा है उन्हें? देखा है?”</p>
</blockquote>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">जॉर्डन में बचपना है. उद्दाम बचपना. लेकिन फ़िल्म ने उसे निभाने वाली नज़र नहीं पाई है. ठीक वैसे जैसे <strong>’चिल्लर पार्टी’</strong> टाइटल रोल के साथ की उस धमाकेदार शुरुआत को आगे नहीं निभा पाती है. जब हम कहते हैं कि बच्चों की एक अलग दुनिया होती है, तो क्या हम यह समझते हैं कि इसी दुनिया में रहते हुए आखिर वो कौनसे औज़ार हैं जिनसे बच्चे अपनी यह ’अलग दुनिया’ बना पाते हैं? सौभाग्यशाली हैं वो जिन्हें ’चिल्लर पार्टी’ की शुरुआत में इन्हीं में से एक औज़ार साक्षात देखना नसीब हुआ. पुकारने के भिन्न नामों से बनी यह खालिस बच्चों की दुनिया है. इसमें बच्चे अपने लिए भूमिकाएं खुद चुनते हैं और खुद ही उन पर खरा उतरने की कोशिश करते हैं.</p>
<p style="text-align: justify;">
<blockquote>
<p style="text-align: justify;">“अकरम, ओये अकरम&#8230;”<br />
“ओए चुप, चुप. क्या अकरम, अकरम? खबरदार जो इसको अकरम कहके बुलाया तो. नईं भेजेगा मे खेलने को.”<br />
“वो टीम का लेफ़्ट आर्म फ़ास्ट बॉलर है ना इसीलिए…”<br />
“तो? रुद्र प्रताप सिंह बुलाओ. आशीष नेहरा बुलाओ. कोई हिन्दू लेफ़्ट आर्म फ़ास्ट बॉलर की कमी है क्या इंडिया में? इसको राइट हैंड से बॉलिंग करना सिखाएगा मैं.”</p>
<p style="text-align: justify;">
</blockquote>
<p style="text-align: justify;"><a href="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2012/02/shala.jpg"><img class="alignleft size-medium wp-image-1023" title="shala" src="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2012/02/shala-300x199.jpg" alt="shala" width="300" height="199" /></a>यह चर्चा वापस लौटकर आई है कि आखिर वो कौनसी उमर है जिससे हम हमारे सिनेमा में सदा क़तराकर निकल जाते हैं. हाँ, वो लड़कपन से ठीक पहले का समय है जिसे हिन्दी सिनेमा ने अपने व्याकरण में सबसे ज़्यादा उपेक्षित रखा है. मराठी सिनेमा ने बीते साल में <strong>’विहिर’</strong> जैसी अन्न्तिम सवालों के जवाब तलाशती, अनन्त संभावनाओं को समेटे फ़िल्म देखी और इस साल दोस्त अभी से <strong>’शाला’</strong> की बात कर रहे हैं. हिन्दी के पास अपनी <strong>’खरगोश’</strong> हो सकती थी लेकिन उस फ़िल्म से खुद उसके अपने समाज ने सौतेला व्यवहार किया. वैसे यहाँ सूचना यह भी है कि अब यह फ़िल्म सिनेमा हाल के अभेद्य बियाबान से निकलकर वैधानिक रूप से बाज़ार में खरीदे जाने के लिए उपलब्ध है. और मेरा यह दृढ़ता से मानना है कि हमारा वृहत्तर हिन्दी समाज अगर इस रंग और स्वाद की फ़िल्मों को सराहेगा, तो भविष्य में अपने लिए नई संभावनाओं के द्वार खोलेगा.</p>
<p style="text-align: justify;">*****</p>
<p style="text-align: justify;">साहित्यिक पत्रिका <strong>’कथादेश’</strong> के फ़रवरी अंक में प्रकाशित.</p>
]]></content:encoded>
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		<title>नर्तकियाँ और पृथ्वियाँ</title>
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		<pubDate>Sun, 08 Jan 2012 20:43:27 +0000</pubDate>
		<dc:creator>मिहिर</dc:creator>
				<category><![CDATA[films]]></category>
		<category><![CDATA[MAMI]]></category>
		<category><![CDATA[कथादेश]]></category>
		<category><![CDATA[विश्व सिनेमा]]></category>
		<category><![CDATA[सिनेमा]]></category>

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		<description><![CDATA[और फिर हमने ’पीना’ देखी. जैसे उमंग को टखनों के बल उचककर छू दिया हो. धरती का सीना फाड़कर बाहर निकलने की बीजरूपी अकुलाहट. ज़िन्दगी की आतुरता. जैसे किसी ने सतरंगी नृत्यधनुष हमारी चकराई आँखों के सामने बिखेर दिया हो. उसी रात मैंने जागी आँखों से तकते यह लिखा,

Pina (3D)
Wim Wenders, Germany, 2011.


“रस भी अर्थ [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;">और फिर हमने ’पीना’ देखी. जैसे उमंग को टखनों के बल उचककर छू दिया हो. धरती का सीना फाड़कर बाहर निकलने की बीजरूपी अकुलाहट. ज़िन्दगी की आतुरता. जैसे किसी ने सतरंगी नृत्यधनुष हमारी चकराई आँखों के सामने बिखेर दिया हो. उसी रात मैंने जागी आँखों से तकते यह लिखा,</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;"><a href="http://www.imdb.com/title/tt1440266/" target="_blank"><strong>Pina (3D)</strong></a><br />
<strong>Wim Wenders, Germany, 2011.</strong></p>
<p style="text-align: justify;">
<blockquote>
<p style="text-align: justify;"><a href="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2012/01/pina-image.jpg"><img class="alignleft size-medium wp-image-1008" title="pina image" src="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2012/01/pina-image-235x300.jpg" alt="pina image" width="235" height="300" /></a>“रस भी अर्थ है, भाव भी अर्थ है, परन्तु ताण्डव ऐसा नाच है जिसमें रस भी नहीं, भाव भी नहीं. नाचनेवाले का कोई उद्देश्य नहीं, मतलब नहीं, ’अर्थ’ नहीं. केवल जड़ता के दुर्वार आकर्षण को छिन्न करके एकमात्र चैतन्य की अनुभूति का उल्लास!” – ’देवदारु’ से.</p>
<p style="text-align: justify;">जब Pina Bausch के नर्तकों की टोली रंगमंच की तय चौहद्दी से बाहर निकल शीशे की बनी ख़ाली इमारतों, फुटपाथों, सार्वजनिक परिवहन, कॉफ़ी हाउस और औद्योगिक इकाइयों को अपनी काया के छंद की गिरफ़्त में ले लेती है, मुझे आचार्य हज़ारीप्रसाद द्विवेदी का निबंध ’देवदारु’ याद आता है. यह जीवन रस का नृत्य रूप है. आचार्य द्विवेदी के शब्दों में, यह नृत्य ’जड़ता के दुर्वार आकर्षण को छिन्न’ करता है. निरंतर एक मशीनी लय से बंधे इस समय में किताबों की याद, कविताओं की बात, कला का आग्रह.</p>
<p style="text-align: justify;">कॉफ़ी हाउस की अनगिनत कुर्सियों के बीच अकेले खड़े दो प्रेमी एक-दूसरे को बांहों में भर लेते हैं. लेकिन व्यवस्था का आग्रह है कि उनका मिलन तय सांचों में हो. उनके प्रतिकार में छंद है, ताल है, लय है. यहाँ नृत्य जन्म लेता है. पीना बाउश के रचे नृत्यों में विचारों का विहंगम कोलाहल है. उनके रचना संसार में मनुष्य प्रकृति का विस्तार है. इसलिए उनके नृत्यों में यह दर्ज़ कर पाना बहुत मुश्किल है कि कहाँ स्त्री की सीमा ख़त्म होती है और कहाँ प्रकृति का असीमित वितान शुरु होता है.</p>
<p style="text-align: justify;">वे नाचते हैं. नदियों में, पर्बतों पर, झरनों के साथ. वे नाचते हैं. शहर के बीचोंबीच. जैसे शहर के कोलाहल में राग तलाशते हैं. यह रंगमंच की चौहद्दी से बाहर निकल शहर के बीचोंबीच कला का आग्रह आज के इस एकायामी बाज़ार में खड़े होकर विचारों के बहुवचन की मांग है. विम वेंडर्स का वृत्तचित्र ’पीना’ सिनेमाई कविता है. किसी तरुण मन स्त्री की कविता. उग्र, उद्दाम, उमंगों से भरी.”</p>
</blockquote>
<p style="text-align: justify;"><a href="http://www.imdb.com/title/tt1440266/" target="_blank"><strong>’पीना’</strong></a> पहली बार हमें थ्री-डी में छिपी असल संभावनाओं और उसके सही रचनात्मक इस्तेमाल का रास्ता भी दिखाती है. बे-सिर-पैर की फ़िल्मों पर अंधाधुंध हो रहे इसके इस्तेमाल ने बीते दिनों में मुख्यधारा सिनेमा का वही हाल किया है जो आई.पी.एल. नामक असाध्य रोग ने मेरे प्रिय खेल क्रिकेट का किया. इसके उलट ’पीना’ ने थ्री-डी तकनीक के माध्यम से रंगमंच द्वारा सिनेमा की ओर सदा उठाए जाते उस आदिम सवाल का मुकम्मल जवाब दिया है. रंगमंच वाले सदा कहते आए कि हमारे पास तीसरा आयाम है, गहराई है, depth of field. जबकि सिनेमा का परदा सपाट है और चाहकर भी वो गहराई पाना उसके लिए संभव नहीं. यहीं सिनेमा पिछड़ जाता था. लेकिन अब विम वेंडर्स ने ’पीना’ में थ्री-डी तकनीक के माध्यम से वही रंगमंच की गहराई को सिनेमा के परदे पर जीवित कर दिया है. यह थ्री-डी के माध्यम से पैदा किया गया कोई ’गिमिक’ नहीं, बल्कि सिनेमा से छूटे हुए जीवन यथार्थ को फिर से पाने सरीखा है. यही थ्री-डी तकनीक के लिए भविष्य की राह भी है, अगर हमारी मुख्यधारा समझना चाहे.</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">&#8212;&#8212;&#8212;-</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">इस बीच एक मज़ेदार घटना हुई. पता हो कि अब कोरियन थ्रिलर में कल्ट का दर्जा पा चुकी 2008 की फ़िल्म <a href="http://www.imdb.com/title/tt1190539/" target="_blank"><strong>’द चेज़र’</strong></a> के निर्देशक Hong-Jin-Na इस साल फ़ेस्टिवल जूरी में थे और उनके प्रेमी हमारे कई दोस्त उद्घाटन वाले दिन ही उनसे बात-मुलाकात कर चुके थे. इस बीच इस तथ्य को जानकर सबमें कोफ़्त का भाव भी था कि उनकी क्लासिक फ़िल्म की एक घटिया नकल <a href="http://www.imdb.com/title/tt1918965/" target="_blank"><strong>’मर्डर 2’</strong></a> नाम से बनाने वाले हमारे मुकेश भट्ट साहब भी समारोह की एक समांतर जूरी में मौजूद थे.</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">उनकी नई फ़िल्म <a href="http://www.imdb.com/title/tt1230385/" target="_blank"><strong>’द येलो सी’</strong></a> की स्क्रीनिंग वाले दिन उन्हें सीढ़ियों से उतरता देख हमारे दो मित्रों सुधीश कामत और मेरे ’नेमसेक’ मिहिर फड़नवीस ने एक पुण्य कार्य करने का मन बनाया. उन्होंने बड़ी इज़्ज़त से जाकर Hong-Jin-Na साहब से पहले पूछा कि क्या उन्हें अपनी फ़िल्म की हिन्दुस्तान में बनी भौंडी नकल ’मर्डर 2’ के बारे में खबर है. जैसी उम्मीद थी, निर्देशक साहब ने अनभिज्ञता जताई. जानकर सुधीश और मिहिर ने तुरंत यह महती कार्य किया कि सामने वाली डीवीडी शॉप से ’मर्डर 2’ की नई डीवीडी खरीदकर लाए और उसे निर्देशक साहब को गिफ़्ट कर दिया. आखिर हमारे ’बॉलीवुड’ के यह अजब कारनामे दुनिया भी तो जाने. इस पुण्य कार्य के बाद मुख्यधारा फॉर्म्यूला हिन्दी सिनेमा की ख्याति सात समन्दर पार फ़ैलाने में उनका योगदान सुनहरे अक्षरों में दर्ज किया जाएगा!</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">&#8212;&#8212;&#8212;-</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;"><a href="http://www.imdb.com/title/tt1549572/" target="_blank"><strong>Another Earth</strong></a><br />
<strong>Mike Cahill, USA, 2011.</strong></p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;"><a href="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2012/01/another-earth.jpg"><img class="alignleft size-full wp-image-1007" title="another earth" src="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2012/01/another-earth.jpg" alt="another earth" width="180" height="269" /></a>अमेरिका से आई स्वतंत्र फ़िल्मों की परम्परा में एक और नया नाम <a href="http://www.imdb.com/title/tt1549572/" target="_blank"><strong>’अनॉदर अर्थ’</strong></a> बीते सालों में आई ’प्राइमर’, ’मून’, ’द डार्क नाइट’ और मेरी पसन्दीदा ’डिस्ट्रिक्ट नाइन’ जैसी फ़िल्मों की परम्परा को आगे बढ़ाती फ़िल्म है. दूसरी पीढ़ी की ये साइंस फ़िक्शन फ़िल्में अन्य मुख्यधारा sci-fi फ़िल्मों की तरह तकनीकी चमत्कार पर कम, दार्शनिकता की ओर जाते अनन्तिम सवालों की खोज पर ज़्यादा केन्द्रित होती हैं. कहने को साइंस फ़िक्शन, लेकिन किसी हार्डकोर ड्रामा की तरह कहानी कहना. ठीक इसी वक़्त दूसरी स्क्रीन पर लार्स वॉन ट्रायर की ’मैलेंकॉलिया’ दिखाई जा रही थी जो इसी परम्परा की एक ज़्यादा जटिल और थोड़ी ज़्यादा दार्शनिक फ़िल्म है.  कहना न होगा कि यह मेरा लगातार आती इन फ़िल्मों के साथ पसन्दीदा जॉनर बनता जा रहा है. ’अनॉदर अर्थ’ में भी स्पेशल इफ़ेक्ट के नाम पर बस आकाश में सदा टंगी दिखाई देती एक और हूबहू पृथ्वी है, अनॉदर अर्थ.</p>
<p style="text-align: justify;">एक और खूबसूरत कथा आधारित साइंस फ़िक्शन फ़िल्म ’द मैन फ्रॉम अर्थ’ की तरह ’अनॉदर अर्थ’ भी अनेक विस्मयकारी किस्से अपने भीतर समेटे है और वही किस्से इस फ़िल्म के सबसे खूबसूरत हिस्से हैं. जैसे उस पहले रूसी अंतरिक्षयात्री का किस्सा कौन भूल सकता है जिसे व्योम में निरंतर होती ’ठक-ठक’ ने पागल कर दिया था. अपनी ही तरह की अन्य फ़िल्मों की तरह ’अनॉदर अर्थ’ भी उसी पल बड़ी फ़िल्म बनती है जहाँ इसकी फंतासी यथार्थ के लिए रचे गए एक प्रतीक में बदल जाती है. एक झटके में अचानक समझ आता है कि कोई दूसरी हूबहू पृथ्वी नहीं, यह अपना ही अक्स है जिसे पहचानना लगातार असंभव हुआ जाता है.</p>
<blockquote>
<p style="text-align: justify;">“इस बात की कल्पना करना भी मुश्किल है कि ’मैं वहाँ हूँ’. क्या मैं वहाँ जाकर उस ’मैं’ से मिल सकता हूँ. और क्या वो ’मैं’, इस मैं से बेहतर होगा. क्या मैं उस दूसरे ’मैं’ से सीख सकता हूँ. क्या उस दूसरे ’मैं’ ने भी वही गलतियाँ की होंगी जो मैंने की हैं. क्या मैं उस दूसरे ’मैं’ के साथ बैठकर तसल्ली से बातें कर सकता हूँ? क्या यह मज़ेदार होगा? वैसे एक और सच्चाई यह है कि हम यह रोज़ करते हैं. लोग बस इसे समझते नहीं या स्वीकार नहीं करना चाहते. सच यह है कि लोग रोज़-ब-रोज़ खुद से बातें करते हैं. &#8220;देखो वो क्या कर रहा है”, “उसने ऐसा क्यों किया”, “वो मेरे बारे में क्या सोचती है”, “क्या मैंने सही कहा” जैसे सवाल. इस मामले में बस एक और ’मैं’ आपके पीछे है.”</p>
</blockquote>
<p style="text-align: justify;">और किसी भी अच्छी विज्ञान फंतासी की तरह यह फ़िल्म भी अपने अंत को सकारात्मक और नकारात्मक दोनों तरह की व्याख्याओं के लिए खुला छोड़ती है.</p>
<p style="text-align: justify;">समारोह अपने अंत की ओर बढ़ रहा था और हमने तमाम विदेशी फ़िल्मों की छटाओं के बीच बुद्धवार दो पुरानी हिन्दुस्तानी फ़िल्मों को देना तय किया. सुधीर मिश्रा की पहली फ़िल्म <a href="http://www.imdb.com/title/tt0369063/" target="_blank"><strong>’ये वो मंज़िल तो नहीं’</strong></a> और शाजी करुण की <a href="http://www.imdb.com/title/tt0095872/" target="_blank"><strong>’पिरावी’</strong></a> दो ऐसी कलाकृतियाँ हैं जिनको असली 35mm प्रिंट पर सिनेमा हाल के अंधेरे में देख पाना दुर्लभ ही कहा जाएगा. अनुराग कश्यप ने अगले ही दिन रात के खाने पर बताया था कि उनके मुताबिक ’ये वो मंज़िल तो नहीं’ आज भी सुधीर मिश्रा की सबसे ईमानदार फ़िल्म है. कथा संरचना के स्तर पर यही वो फ़िल्म है जिससे आगे चलकर ’रंग दे बसन्ती’ और ’लव आजकल’ जैसी फ़िल्मों ने प्रेरणा पाई. अस्सी के दशक का मोहभंग जिसे हम ’जाने भी दो यारों’ से लेकर ’न्यू डेल्ही टाइम्स’ तक उस दौर की तमाम फ़िल्मों में देखते हैं, वही सुधीर की इस पदार्पण फ़िल्म का मूल स्वर है. दिल किसी दिन इस फ़िल्म और साथ उस पूरे दौर पर लम्बी चर्चा करने का होता है, करूँगा किसी अगले अंक में. हाँ, ’पिरावी’ देखते हुए रह रहकर गोविन्द निहलाणी की महाश्वेता देवी के उपन्यास पर बनी फ़िल्म ’हज़ार चौरासी की माँ’ याद आती रही. वहाँ माँ थीं, यहाँ पिता हैं. एक जवान पीढ़ी है जिसका अस्तित्व सत्ता मिटा देती है और रह जाती है कुछ बूढ़ी आँखें, इंतज़ार करती हुईं.</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;"><a href="http://www.imdb.com/title/tt1827487/" target="_blank"><strong>Once Upon a Time In Antolia</strong></a><br />
<strong>Nuri Bilge Ceylan, Turkey, 2011</strong>.</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">समारोह समाप्ति पर था और हम फिर एक लम्बी लाइन में थे. यह लाइन थी ’थ्री मंकीज़’ के निर्देशक की नई फ़िल्म देखने के लिए जिसने इस साल कान फ़िल्म समारोह का प्रतिष्ठित ’ग्रैंड-प्रिक्स’ सम्मान हासिल किया है. और अगर आपको केयलान का सिनेमा पसन्द है तो फिर यह फ़िल्म आपके ही लिए है. लम्बे पसरे बियाबान में एक अपराधी जोड़े को लेकर घूमती पुलिस और सरकारी अधिकारियों की एक टोली के साथ जैसे आप भी सशरीर एंटोलिया पहुँचा दिए जाते हैं. केयलान की फ़िल्मों का सबसे बड़ा कारक है उनका माहौल. यह माहौल की सही स्थापना और फिर उनमें कुछ चुने हुए किरदारों के साथ कुछ दुर्लभ से दिखते क्षणों की पहचान के सहारे ही अपनी कथा कहती हैं. किरदारों की कथाएं आपस में टकराती हैं. आत्म-स्वीकार हैं और आत्म साक्षात्कार भी हैं. जैसा हमारे दोस्त और केयलान की फ़िल्मों के अनन्य प्रशंसक नीरज घायवन ने कहा, ’वन्स अपॉन ए टाइम इन एंटोलिया’ सिनेमाई संचरण है. एक ऐसा अनुभव जिसे बोलकर नहीं बताया जा सकता, सिर्फ़ स्वयं अनुभव किया जा सकता है. या जैसा मेरे पिता मुहावरे में कहते हैं, “आप मरे से ही स्वर्ग दीखता है.”</p>
<p style="text-align: justify;">वैसे क्या यह किसी भी अच्छे सिनेमा की पहली पहचान नहीं कि उसे पूर्णत: पाने के लिए खुद ही ’मरना’ पड़ता है!</p>
<p style="text-align: justify;">*****</p>
<p style="text-align: justify;">साहित्यिक पत्रिका <strong>’कथादेश’</strong> के जनवरी अंक में प्रकाशित</p>
]]></content:encoded>
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		<title>2011 : सिनेमा</title>
		<link>http://mihirpandya.com/2011/12/2011-review/</link>
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		<pubDate>Sat, 31 Dec 2011 18:21:59 +0000</pubDate>
		<dc:creator>मिहिर</dc:creator>
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		<category><![CDATA[सिनेमा]]></category>

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		<description><![CDATA[“आज हम दार पे खींचे गए जिन बातों पर
क्या अजब कल वो ज़माने को निसाबों में मिलें” &#8211; फ़राज़

 


’जा चुके परिंदों को बुलाता कोई’
फ़िल्म – ’रॉकस्टार’

“पता है, बहुत साल पहले यहाँ एक जंगल होता था. घना, भयानक जंगल. फिर यहाँ एक शहर बन गया. साफ़-सुधरे मकान, सीधे रास्ते. सबकुछ तरीके से होने लगा. पर [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: center;"><em>“आज हम दार पे खींचे गए जिन बातों पर</em><em><br />
क्या अजब कल वो ज़माने को निसाबों में मिलें” &#8211; फ़राज़<br />
</em></p>
<p style="text-align: justify;"><strong> </strong></p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;"><strong>’जा चुके परिंदों को बुलाता कोई’</strong></p>
<p style="text-align: justify;">फ़िल्म – <strong>’रॉकस्टार’</strong></p>
<blockquote>
<p style="text-align: justify;">“पता है, बहुत साल पहले यहाँ एक जंगल होता था. घना, भयानक जंगल. फिर यहाँ एक शहर बन गया. साफ़-सुधरे मकान, सीधे रास्ते. सबकुछ तरीके से होने लगा. पर जिस दिन जंगल कटा, उस दिन परिन्दों का एक झुंड यहाँ से हमेशा के लिए उड़ गया. कभी नहीं लौटा. मैं उन परिन्दों को ढूंढ रहा हूँ. किसी ने देखा है उन्हें? देखा है?”</p>
</blockquote>
<p style="text-align: justify;"><strong> </strong></p>
<p style="text-align: justify;">राष्ट्र-राज्य की शतकवीर राजधानी के हृदयस्थल पर खड़ा होकर एक शायर बियाबान को पुकारता है. मुझे बहुत साल पहले प्रसून जोशी की ’फिर मिलेंगे’ के लिए लिखी पंक्तियाँ याद आती हैं. यहाँ अस्वीकार का साहस है. उस मासूमियत को बचाने की तड़प जिसे आप epic बन जाने को बेचैन इस पूरी फ़िल्म के दौरान सिर्फ़ रनबीर कपूर की उदंड आँखों में पढ़ पाते हैं.</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;"><strong>’भूमिकाओं का बदलाव’</strong></p>
<p style="text-align: justify;">फ़िल्म – <strong>&#8216;डेल्ही बेली&#8217;</strong></p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">मैंने इस दृश्य की तुलना सत्यजित राय की ’चारुलता’ से की और साल की सबसे ज़्यादा गालियाँ यहीं खाईं. भूमिकाओं का यह बदलाव विस्मित करने वाला था. और इसे भूलकर भी नायक के ’नायकत्व’ का हास न समझें. सिंघमों और बॉडीगार्डों के दौर में ’डेल्ही बेली’ का ताशी दोरज़ी लहाटू लोकप्रिय हिन्दी सिनेमा में देखा गया सबसे मज़बूत नायकीय चरित्र है. नैतिक, ईमानदार और सच्चा. ऐसा नायक जिसका यकीन बोलने से ज़्यादा कर दिखाने में है.</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;"><strong>’मेरिट बनाम आरक्षण’</strong></p>
<p style="text-align: justify;">फ़िल्म – <strong>’आई एम कलाम’</strong></p>
<p style="text-align: justify;">
<blockquote>
<p style="text-align: justify;">“इतनी सारी किताबें! काए की हैं?”</p>
<p style="text-align: justify;">“आपको अंग्रेजी नहीं आती क्या?”</p>
<p style="text-align: justify;">“तेरेको पेड़ पर चढ़ना आता है?”</p>
<p style="text-align: justify;">“हमें घोड़े पर चढ़ना आता है. आपको घुड़सवारी आती है?”</p>
<p style="text-align: justify;">“मेरेको ऊंट पर चढ़ना आता है. तेरेको क्या ऊंट की दवा करनी आती है?”</p>
</blockquote>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">लेकिन अफ़सोस कि हमारे स्कूलों में, हमारी परीक्षाओं में ’पेड़ पर चढ़ना’ या ’ऊंट की दवा करना’ कभी नहीं पूछा जाता. यह संवाद कुछ यूं ही आगे बढ़ता है और अंत में कलाम और कुंवर रणविजय के बीच घुड़सवारी सीखने और पेड़ पर चढ़ना सिखाने के लेन-देन का समझौता हो जाता है. ऐसे साल में जब एक फ़िल्म सिर्फ़ ’आरक्षण’ का नाम ज़ोर-ज़ोर से पुकारकर ही बॉक्स ऑफ़िस की वैतरणी पार कर जाना चाहती हो, ’आई एम कलाम’ का यह दृश्य बड़ी ही नफ़ासत से हमें ’मेरिट’ की वकालत में खड़े तर्कों का असल पेंच और आरक्षण की व्यवस्था का असल मतलब समझाता है.</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;"><strong>’कर्ता ने, कर्म को&#8230;’</strong></p>
<p style="text-align: justify;">फ़िल्म – <strong>’जो डूबा सो पार’</strong></p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">फ़िल्म का पहला दृश्य. बिहार के एक सरकारी स्कूल में अर्धवार्षिक परीक्षाओं का समय. चारों ओर आनेवाले हिन्दी के पर्चे की दहशत. और ठीक कैमरे के सामने एक विद्यार्थी आदिम कारक सूत्रवाक्य रटता हुआ,</p>
<blockquote>
<p style="text-align: justify;">“कर्ता ने, कर्म को, करण से, सम्प्रदान के लिए, अपादान से संबंध का के की, अधिकरण&#8230;”</p>
</blockquote>
<p style="text-align: justify;">मेरे भीतर बैठा बच्चा अचानक मचलकर जाग जाता है. उन गलियारों की याद आती है जिन्हें मैं बहुत पीछे कहीं अपने भूत में छोड़ आया हूँ.  करीने से सजाए हुए महानगर में भुला दिए गए कस्बे के उजाड़ याद आते हैं. परचूने की दुकान चलाता वो दोस्त याद आता है जो आठवीं में सामने आए जीवन के पहले बोर्ड का टॉपर था. उसी बोर्ड में जहाँ मुझे पहला दर्जा भी किसी परियों का ख़्वाब लगता था. दो हज़ार ग्यारह में यहीं मेरे लिए हिन्दी सिनेमा यथार्थ के सबसे निकट आया था.</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;"><strong>“अकरम, ओए अकरम&#8230;”</strong></p>
<p style="text-align: justify;">फ़िल्म – <strong>’चिल्लर पार्टी’</strong></p>
<p style="text-align: justify;">
<blockquote>
<p style="text-align: justify;">“ओए चुप, चुप. क्या अकरम, अकरम? खबरदार जो इसको अकरम कहके बुलाया तो. नईं भेजेगा मे खेलने को.”</p>
<p style="text-align: justify;">“वो टीम का लेफ़्ट आर्म फ़ास्ट बॉलर है ना इसीलिए&#8230;”</p>
<p style="text-align: justify;">“तो? रुद्र प्रताप सिंह बुलाओ. आशीष नेहरा बुलाओ. कोई हिन्दू लेफ़्ट आर्म फ़ास्ट बॉलर की कमी है क्या इंडिया में? इसको राइट हैंड से बॉलिंग करना सिखाएगा मैं.”</p>
</blockquote>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">साल की सर्वश्रेष्ठ ओपनिंग. सीधे बच्चों की दुनिया की नब्ज़ पकड़ लेती है फ़िल्म. निकनेम्स से बनी दुनिया जहाँ बड़ों की दुनिया से धकिआया हुआ बच्चा अपनी असल पहचान पाता है. वो अनजान बच्चों की दुनिया जहाँ वे अपने लिए खुद भूमिकाएं चुनते हैं और उनमें खरे उतरने के लिए बड़ों से ज़्यादा गंभीरता से प्रयासरत होते हैं.</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: center;">
<p style="text-align: center;"><strong>दो हज़ार ग्यारह के नवरस : किरदार जिनकी छाप गहरी पड़ी </strong></p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;"><strong><a href="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2011/12/shor_in_the_city.jpg"><img class="alignright size-medium wp-image-997" title="shor_in_the_city" src="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2011/12/shor_in_the_city-207x300.jpg" alt="shor_in_the_city" width="207" height="300" /></a>पूर्णा जगन्नाथन</strong> – ’मेनका’ | फ़िल्म -<strong> ’डेल्ही बेली’</strong></p>
<p style="text-align: justify;"><strong> </strong></p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;"><strong>रनवीर हुड्डा</strong> – ’ललित/बबलू’ | फ़िल्म &#8211; <strong>’साहिब, बीवी और गैंगस्टर’</strong></p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;"><strong>परिणिति चोपड़ा</strong> – ’डिम्पल चड्ढ़ा’ | फ़िल्म -<strong> ’लेडीज़ वर्सेस रिकी बहल’</strong></p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;"><strong>पित्तोबाश</strong> – ’मंडूक’ | फ़िल्म &#8211; <strong>’शोर इन द सिटी’</strong></p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;"><strong>नमन जैन</strong> – ’जांघिया’ | फ़िल्म &#8211; <strong>’चिल्लर पार्टी’</strong></p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;"><strong>राहुल बोस</strong> – ’जय’ | फ़िल्म &#8211; <strong>’आई एम’</strong></p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;"><strong>रनबीर कपूर</strong> – ’जनार्दन जाखड़/जॉर्डन’ | फ़िल्म &#8211; <strong>’रॉकस्टार’</strong></p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;"><strong>जिमी शेरगिल</strong> – ’आदित्य प्रताप सिंह’ | फ़िल्म &#8211; <strong>’साहिब, बीवी और गैंगस्टर’</strong></p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;"><strong>दीपक डोबरियाल</strong> – ’पप्पी’ | फ़िल्म &#8211; <strong>’तनु वेड्स मनु’</strong></p>
<p style="text-align: justify;"><strong><br />
</strong></p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: center;">
<p style="text-align: center;">
<p style="text-align: center;"><strong>सर्वश्रेष्ठ पांच : 2011</strong></p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;"><strong>’डेल्ही बेली’</strong> – फ़िल्म देखते हुए मैं बार-बार सोचता हूँ कि क्या पटकथा में यह भी लिखा गया होगा कि कौनसे दृश्य में किस पुरुष किरदार की टीशर्ट पर क्या चित्रकला होनी है. यह फ़िल्म उसी बारीकी से बनाई गई है जिस बारीकी से मेरे प्रिय योगेन्द्र यादव चुनाव नतीजों का असल मतलब समझाते हैं. ठीक वहाँ जहाँ नायक नायक अपने फांसी से लटके दोस्त को मुक्त करवाने के लिए पिस्तौल का प्रयोग करता है और फिर शायद जैसा उसने फ़िल्मों में देखा होगा, पिस्तौल को अपनी पैंट में घुसेड़ता है. हाँ, ठीक वहाँ जहाँ उसे एक अभी-अभी चली पिस्तौल की तपती नली का झटका लगता है. ठीक वहीं यह फ़िल्म अपने साथ की अन्य औसत फ़िल्मों से आगे निकल जाती है.</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;"><strong>’शोर इन द सिटी’</strong> – साल की सबसे उम्मीदों भरी फ़िल्म. गुरु-गंभीरता के सघन दौर में रूहानी सच्चाइयों को रागदरबारी सी बेपरवाही से कहने का साहस रखने वाली. शहर की विभिन्न लयों को अपने में समेटे, और उन तमाम ख़रोचों को भी जिन्हें हम अक्सर रूबरू देखने से बचते हैं. साथ ही ’शोर इन द सिटी’ साल का सबसे संभावनाओं से भरा किरदार अपने भीतर समेटे है. बेस्टसेलर किताबों की पाइरेसी करता ’तिलक’ जिसे अचानक ’एलकेमिस्ट’ पढ़कर लगता है कि उसके हाथ किसी खज़ाने की चाबी लग गई है. यह किरदार जैसे दो दुनियाओं को आपस में जोड़ता है. ठीक संचरण की अवस्था में इसे पढ़ना जैसे सम्पूर्ण लोकप्रिय संस्कृति को किसी इंसान में पढ़ना है. इस किरदार के द्वारा हम कामकाजी वर्ग में अदृश्य से दृश्य होने की आकांक्षा का पहला बीज अंकुरित होते देखते हैं. दुर्लभ.</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;"><strong>’साहिब, बीवी और गैंगस्टर’ </strong>– कई मायनों में एक सम्पूर्ण फ़िल्म जो कुछ बड़ा कहने से बचती है. ’साहिब, बीवी और गैंगस्टर’ पूरी तरह अपने दोनों मुख्य पुरुष किरदारों के कांधों पर खड़ी है जो ’बीवी’ की भूमिका में माही गिल के अत्यन्त बचकाने अभिनय के बावजूद इसे बखूबी किनारे निकाल ले जाते हैं. काफ़ी हद तक एक प्रदर्शन आधारित फ़िल्म जिसकी ताक़त रणवीर हुड्डा और जिम्मी शेरगिल की दमदार संवाद अदायगी और अभिनय है. फ़िल्म छोटे वादे करती है लेकिन उन्हें पूरा करती है.</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;"><strong>‘धोबी घाट’</strong> – अगर ’शोर इन द सिटी’ मुम्बई का रागदरबारी तर्जुमा है तो ’धोबी घाट’ में शहर शास्त्रीयता पाता है. जैसे-जैसे इस महानगर में जगह कम होती जाती है, कहानियों को भी आपस में सटकर बैठना पड़ता है. चार कहानियों में चार भिन्न ज़िन्दगियाँ आपस में रगड़ खाती हैं. लेकिन बड़ी बात यह है कि फ़िल्म हमें चारों कहानियों के उन अंधेरे कोनों तक लेकर जाती है जहाँ इस शहर की तमाम शास्त्रीयता का मुलम्मा छूट जाता है. बड़ी बात यह है कि उन अंधेरे कोनों में भी फ़िल्म शहर को नकारती नहीं, बल्कि एक साथी की तरह कांधे पर हाथ रख कहती है कि आज भी एक रास्ता अच्छाई की ओर जाता है.</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;"><strong>’आई एम’</strong> – क्योंकि यह फ़िल्म एक आत्मस्वीकार है. क्योंकि यह फ़िल्म एक अनुभव है. क्योंकि खुद के साथ हुई हर नाइंसाफ़ी से जो सीख मिलती है वो यही है कि फिर कहीं किसी और काल, किसी और दुनिया में जब हम ताक़तवर हों तो अनजाने में वो ही नाइंसाफ़ी न कर बैठें. क्योंकि यह फ़िल्म गांधी की याद दिलाती है, जिन्होंने कहा था कि आँख के बदले आँख का सिद्धांत अंतत: सबको अंधा कर देगा. क्योंकि अंतत: खलनायक बाहर नहीं, खुद हमारे भीतर है जिसका मुकाबला एक निरंतर चलती प्रक्रिया है.</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: center;">
<p style="text-align: center;"><strong>छोटा है लेकिन तलवार है</strong></p>
<p style="text-align: justify;"><strong> </strong></p>
<p style="text-align: justify;"><strong><a href="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2011/12/delhi-belly-vijay-raaz.jpg"><img class="alignright size-medium wp-image-1001" title="delhi belly vijay raaz" src="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2011/12/delhi-belly-vijay-raaz-300x128.jpg" alt="delhi belly vijay raaz" width="300" height="128" /></a>पूजा स्वरूप</strong> – ’माया’ aka फ़ोन वाली रिसेप्शनिस्ट</p>
<p style="text-align: justify;">फ़िल्म – “दैट गर्ल इन येलो बूट्स”</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;"><strong>कुमुद मिश्रा</strong> – ’खटाना’ aka कैंटीनवाले अंकल</p>
<p style="text-align: justify;">फ़िल्म – “रॉकस्टार”</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;"><strong>विजयराज</strong> – ’सोमयाज़ुलु’ aka दार्शनिक डॉन</p>
<p style="text-align: justify;">फ़िल्म – “डेल्ही बेली”</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;"><strong><a href="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2011/12/delhi-belly-rahul-singh.jpg"><img class="alignright size-medium wp-image-1004" title="delhi belly rahul singh" src="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2011/12/delhi-belly-rahul-singh-300x128.jpg" alt="delhi belly rahul singh" width="300" height="128" /></a>स्वरा भास्कर</strong> – ’पायल’</p>
<p style="text-align: justify;">फ़िल्म – “तनु वेड्स मनु”</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;"><strong>राहुल सिंह </strong>– ’राजीव खन्ना’ aka Delhi boy with a gun</p>
<p style="text-align: justify;">फ़िल्म – “डेल्ही बेली”</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;"><strong>राजेश शर्मा</strong> – ’एन. के.’ aka दिल्ली पुलिस</p>
<p style="text-align: justify;">फ़िल्म – “नो वन किल्ड जेसिका”</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">साल दो हज़ार ग्यारह का विश्व सिनेमा का सबसे विलक्षण अनुभव था <strong>’द ट्री ऑफ़ लाइफ़’ </strong>जिसे कोरी फ़िल्म भर कहना मुश्किल है. वह दुर्लभ क्षण, जहाँ मनुष्य के भीतर पहली बार ईर्ष्याभाव जन्म लेता है. वह दुर्लभ क्षण, जहाँ पहली बार जीवन ’देना’ सीखता है. यह मनोभावों के जन्म की कथा है. इस फ़िल्म ने वही किया जो साल दो हज़ार ग्यारह में मेरे प्रिय राहुल द्रविड़ ने किया. साल की सबसे बेहतरीन लेखनियाँ इन्हीं दो मानसरोवरों से निकलीं. मेरे तीन सबसे पसन्दीदा ब्लॉगकार अपनी दुनियाओं में वापस गए और यह मोती निकालकर लाए –यहाँ &#8211; <strong><a href="http://thesinglescreen.wordpress.com/2011/08/01/%E0%A4%AA%E0%A5%87%E0%A4%A1%E0%A4%BC-%E0%A4%94%E0%A4%B0-%E0%A4%95%E0%A5%81%E0%A4%86%E0%A4%81/" target="_blank">वरुण ग्रोवर</a></strong>, यहाँ &#8211; <strong><a href="http://positivelybright.blogspot.com/2011/08/of-irretrievable-memories-and-tree-of.html" target="_blank">अपराजिता सरकार</a></strong>, यहाँ &#8211; <strong><a href="http://moifightclub.wordpress.com/2011/07/31/tree-of-life-we-live-in-deeds-and-meditate-in-grief/" target="_blank">फ़ाइट क्लब</a></strong>.</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">क्या यह व्यक्तिगत कहानियाँ भर हैं? नहीं, क्योंकि ठीक उस जगह जहाँ व्यक्तिगत राजनैतिक से मिलता है, रचना का जन्म होता है. मैं हमेशा से मानता हूँ कि गल्प और कथेतर सिर्फ़ कथा कहने के भिन्न रूप भर हैं. हमारी सच्चाईयाँ सदा इन तय खांचों से आगे निकल जाती हैं. सिनेमा हो या उपन्यास, यही चाबी है. फन्तासियों में सदा सत्य पैठा होता है. आपबीतियों से सदा सर्वोत्तम कथाएं जन्म लेती हैं.</p>
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		<title>एक बुढ़ाता सेल्समैन और हक़ मांगती सत्रह लड़कियाँ</title>
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		<pubDate>Mon, 12 Dec 2011 03:07:31 +0000</pubDate>
		<dc:creator>मिहिर</dc:creator>
				<category><![CDATA[films]]></category>
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		<category><![CDATA[डॉक्यूमेंट्री फ़िल्म]]></category>
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		<description><![CDATA[फ़िल्म महोत्सवों में सदा विचारणीय आदिम प्रश्न यह है कि आखिर पांच समांतर परदों पर रोज़ दिन में पांच की रफ़्तार से चलती दो सौ से ज़्यादा फ़िल्मों में ’कौनसी फ़िल्म देखनी है’ यह तय करने का फ़ॉर्म्यूला आख़िर क्या हो? अनदेखी फ़िल्मों के बारे में देखने और चुनाव करने से पहले अधिक जानकारी जुटाना [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;">फ़िल्म महोत्सवों में सदा विचारणीय आदिम प्रश्न यह है कि आखिर पांच समांतर परदों पर रोज़ दिन में पांच की रफ़्तार से चलती दो सौ से ज़्यादा फ़िल्मों में ’कौनसी फ़िल्म देखनी है’ यह तय करने का फ़ॉर्म्यूला आख़िर क्या हो? अनदेखी फ़िल्मों के बारे में देखने और चुनाव करने से पहले अधिक जानकारी जुटाना एक समझदारी भरा उपाय लगता है लेकिन व्यावहारिकता में देखो तो इसमें काफ़ी पेंच हैं. जैसे आमतौर पर अमेरिकी और यूरोपीय मुख्यधारा से इतर सिनेमा के बारे में जानकारियाँ हम तक पहली दुनिया के चश्मे से छनकर आती हैं. इन जानकारियों पर अति-निर्भरता नज़रिया सीमित कर सकती है. फ़ेस्टिवल कैटेलॉग पर भी ज़्यादा भरोसा नहीं किया जा सकता, कई बार तो यही दस्तावेज़ सबसे भ्रामक साबित होता है. इन्हें तैयार करने वाले बहुधा ऐसे प्रशिक्षु सिनेमा विद्यार्थी होते हैं जिन्होंने खुद भी इनमें से कम ही फ़िल्में देखी हैं.</p>
<p style="text-align: justify;">बड़े नामों या निर्देशकों के पीछे अपना पैसा लगाने वाले हमेशा उस खूबसूरत सिनेमा अनुभव को खो बैठते हैं जिसकी सुंदरता अभी वृहत्तर सिने-समाज द्वारा रेखांकित की जानी बाक़ी है. और फिर प्रतिष्ठित सिनेमा महोत्सव में, जहाँ सिनेमा का स्तर इस क़दर ऊँचा हो कि हर देखी फ़िल्म के साथ समांतर चलती और हाथ से छूटने वाली फ़िल्मों के लिए अफ़सोस गहराता ही चला जाए, किसी फ़िल्म का ’प्लॉट’ भर जान लेना आख़िर कहाँ पहुँचाएगा?</p>
<p style="text-align: justify;">सबसे ऊपर और सबसे महत्वपूर्ण यह कि एक अनजाने से देश से आई किसी नई फ़िल्म को देखने से जुड़ा वो अनछुआ अहसास इन तमाम जानकारियों की भीड़ में कुचल जाता है. हमारे नज़रिए का कोरापन पहले ही नष्ट हो चुका होता है और सिनेमा अपना इत्र खो देता है. सूचना विस्फोट के इस अराजक समय में बिना किसी पूर्व निर्मित कठोर छवि के एक नई, कोरी फ़िल्म को देखने का विकल्प तो जैसे हमसे छीन ही लिया गया है.</p>
<p style="text-align: justify;">हमारे दोस्त वरुण ग्रोवर इस मान्य विचार को चुनौती देने का प्रण करते हैं. वो अपनी बनते किसी फ़िल्म के बारे में कोई पूर्व जानकारी हासिल नहीं करते और उनके synopsis तो भूलकर भी नहीं पढ़ते. कुछ भरोसेमंद दोस्तों की सलाह पर हम किसी अनदेखी फ़िल्म के लिए थिएटर में घुस जाते हैं. और तभी हाल में अंधेरा होने से ठीक पहले परदे के सामने एक कमउमर लड़का आता है और पहले अपने सिनेमा अध्ययन करवाने वाले संस्थान का नाम ऊंचे स्वर में बताकर बतौर परिचय फ़िल्म की कहानी सुनाने लगता है. मैं वरुण की ओर देखता हूँ. वरुण अपने कानों में उंगलियाँ दिए बैठे हैं और माइक पर आती उसकी बुलन्द आवाज़ को अनसुना करने की भरसक, लेकिन असफ़ल कोशिश कर रहे हैं. मेरे सामने फिर एक बार यह साबित होता है कि इस सूचना विस्फोट के युग में जहाँ अनचाही सूचना का अथाह समन्दर सामने हिलोरें मारता है, हमारे भविष्यों में सिर्फ़ डूबना ही बदा है.</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;"><strong><a href="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2011/12/The_Turin_Horse1.jpg"><img class="alignleft size-full wp-image-987" title="The_Turin_Horse" src="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2011/12/The_Turin_Horse1.jpg" alt="The_Turin_Horse" width="137" height="195" /></a><a href="http://www.imdb.com/title/tt1316540/" target="_blank">The Turin Horse</a></strong><br />
<strong>Bela Tarr, Hungary, 2011.</strong></p>
<p style="text-align: justify;">भागते हुए सिनेमा हाल के गलियारों में पहुँचे और हम सीधे धकेल दिए जाते हैं बेला टार के विज़ुअल मास्टरपीस ’द तुरिन हॉर्स’ के सामने. सिर्फ़ विज़ुअल, क्योंकि परदे पर आवाज़ तो है लेकिन सबटाइटल्स गायब हैं. लेकिन बिना शब्दों का ठीक-ठीक अर्थ जाने भी यह अनुभव विस्मयकारी है. एक तक़रीबन घटना विरल कथा में परदा श्वेत-श्याम दृश्य गढ़ रहा है. मैं देखने लगता हूँ. अन्दर तक भर जाता हूँ, साँस फूलने लगती है, लेकिन दृश्य में ’कट’ नहीं होता. धीरे-धीरे इन फ्रेम दर फ्रेम चलते अनन्त के साधक, सघन दृश्यों के ज़रिए वह सारा वातावरण और उसकी सारी ऊब, थकान मेरे भीतर भरती जाती है. मैंने अपने सम्पूर्ण जीवन में सिनेमा के उस विशाल परदे पर ऐसा विस्मयकारी कुछ होता कम ही देखा है.</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">लेकिन ठीक वहीं, हमें अभिभूत अवस्था में छोड़ फ़िल्म दोबारा न शुरु होने के लिए रोक दी जाती है. वादा किया जाता है रात का, लेकिन रात आती है उसी फ़िल्म के किसी घटिया डीवीडी प्रिंट के साथ. मैं पहले पन्द्रह मिनट की फ़िल्म देखकर उठ जाता हूँ. वह सुबह का उजला अनुभव अब भी मेरे पास है, मैं उसे यूं मैला नहीं होने दे सकता.</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;"><a href="http://www.youtube.com/watch?v=hPXY2-A04qU" target="_blank"><strong>The Salesman</strong></a><br />
<strong>Sebastien Pilote, Canada, 2011.</strong></p>
<p style="text-align: justify;">यह हमारे वक़्तों का सिनेमा है. एक कस्बा है और उसके केन्द्र में उसकी तमाम अर्थव्यवस्था का सूत्र संचालक एक संयंत्र है. एक संयंत्र जो मंदी की ताज़ा मार में घायल है और अपनी अंतिम सांसे गिन रहा है. यह उस संयंत्र की तालेबन्दी के बाद के कुछ निरुद्देश्य असंगत दिनों की कथा है. लेकिन यहाँ एक पेंच है. यहाँ कथा जिस व्यक्ति के द्वारा कही जाती है वह एक बुढ़ाता कार सेल्समैन है जिन्हें बीते खुशहाल सालों में अपने काम में सर्वश्रेष्ठ होने के कई तमगे मिले हैं. लेकिन आज कस्बे में मरघट सा सन्नाटा है और संयंत्र बंद होने के बाद अब उससे जुड़ी तमाम उम्मीदें भी धीरे-धीरे कर दम तोड़ रही हैं. संकट यह है कि सेल्समैन को आज भी अपना काम करना है. सच-झूठ कैसे भी हो, उस शोरूम में खड़ी नई-नवेली कार का सौदा पटाना है.</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">मुझे सीन पेन की क्लासिक फ़िल्म ’दि असैसिनेशन ऑफ़ रिचर्ड निक्सन’ याद आती है. यह एक ऐसी पूंजीवादी व्यवस्था के बारे में बयान है जिसमें इंसान का दोगलापन उसका तमगा और उसकी ईमानदारी उसके करियर के लिए बाधा समान है. यहाँ इंसान को आगे बढ़ने के लिए पहले अपने भीतर की इंसानियत को मारना पड़ता है. व्यवस्था बदली नहीं है, बस हुआ यह है कि इस वैश्विक महामंदी ने इस व्यवस्था के दोगले मुखौटे को उतार दिया है. अगर आप सुनने की चाहत रखते हों तो इस फ़िल्म के मंदीमय बर्फ़ीले सन्नाटे में भविष्य में होनेवाले ’ऑक्यूपाई वॉल स्ट्रीट’ की आहटें सुन सकते हैं.</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;"><a href="http://www.imdb.com/title/tt1906426/" target="_blank"><strong><strong> </strong></strong></a><strong><strong><a href="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2011/12/michael.jpg"><img class="alignright size-full wp-image-984" title="michael" src="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2011/12/michael.jpg" alt="michael" width="240" height="139" /></a></strong>Michael</strong><br />
<strong>Markus Schleinzer, Austria, 2011.</strong></p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">पहले ही बता दिया गया था कि यह फ़िल्म इस समारोह की बहुप्रतिक्षित ’डार्क हॉर्स’ है. निर्देशक मार्कस तोप जर्मन निर्देशक माइकल हेनेके के लम्बे समय तक कास्टिंग डाइरेक्टर रहे हैं और ’दि व्हाइट रिबन’ के लिए तमाम बच्चों की चमत्कारिक लगती कास्टिंग उन्हीं का करिश्मा थी. ’माइकल’ का प्लॉट विध्वंसक है. यह फ़िल्म घर के तहखाने में कैद किए एक बच्चे और उसके यौन शोषक नियंता की दैनंदिन जीवनी को किसी रिसर्च जर्नल की तरह निरपेक्ष भाव से दर्ज करती अंत तक चली जाती है.</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">’माइकल’ का चमत्कार उसकी निर्लिप्त भाव कहन में है. फ़िल्म कहीं भी निर्णय नहीं देती. कहीं भी फ़ैसला सुनाने की मुद्रा में नहीं आती और यथार्थ को इस हद तक निचोड़ देती है कि परिस्थिति का ठंडापन भीतर भर जाता है. असहज करती है, लेकिन किसी ग्राफ़िकल दृश्य से नहीं, बल्कि अपने कथानक के ठंडेपन से. घुटन महसूस करता हूँ, मेरा अचानक बीच में खड़े होकर चिल्लाने का मन करता है. कहीं यह हेनेके की शैली का ही विस्तार है. ’माइकल’ एक सामान्य आदमी है. नौकरीपेशा, छुट्टियों में दोस्तों के साथ हिल-स्टेशन घूमने का शौकीन, त्योंहार मनाने वाला. दरअसल उसका ’सामान्य’ होना ही सबसे बड़ा झटका है, क्योंकि हम ऐसे अपराधियों की कल्पना किसी विक्षिप्त मनुष्य के रूप में करने के आदी हो गए हैं. निर्देशक मार्कस उसे यह सामान्य चेहरा देकर जैसे हमारे बीच खड़ा कर देते हैं. सच है, यह यथार्थ है. और यह भयभीत करता है.</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;"><a href="http://www.imdb.com/title/tt1658851/" target="_blank"><strong><strong><a href="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2011/12/Toast1.jpg"><img class="alignleft size-full wp-image-991" title="Toast" src="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2011/12/Toast1.jpg" alt="Toast" width="158" height="160" /></a></strong>Toast</strong><strong> </strong></a><br />
<strong>J S Clarkson, UK, 2011.</strong></p>
<p style="text-align: justify;"><strong> </strong></p>
<p style="text-align: justify;">ब्रिटिश फ़िल्म ’टोस्ट’ की शुरुआत मुझे रादुँगा प्रकाशन, मास्को से आई हमारे घर के बच्चों की खानदानी किताब ’पापा जब बच्चे थे’ की किसी कहानी की याद दिलाती है. लेकिन अंत में नीति कथा बन जाती उन स्वभाव से उद्दंड रूसी बाल-कथाओं से उलट ’टोस्ट’ सदा उस बच्चे के नज़रिए से कही गई कथा ही बनी रहती है. इसे देखते हुए लगातार विक्रमादित्य मोटवाने की ’उड़ान’ याद आती है और मैंने इसे कुछ सोचकर ’फ़ीलगुड’ उड़ान का नाम दिया. कहानी में कायदा सिखाने वाले, बाहर से सख़्त, भीतर से नर्म पिता हैं. ममता की प्रतिमूर्ति साए सी माँ हैं, और हमारा कथानायक आठ-दस साल का नाइज़ेल है. और सबसे महत्वपूर्ण यह कि रोज़ नाइज़ेल के सामने घर का डब्बाबंद खाना है जिसे अधूरा छोड़ वह असली, लजीज़ पकवानों के ख्वाब देखा करता है.</p>
<p style="text-align: justify;">आगे कहानी में माँ की मौत से लेकर सौतेली माँ तक के तमाम ट्विस्ट हैं. स्त्रियों का वही परम्परा से चला आया स्टीरियोटाइप चित्रण है जो खड़ूस सौतेली माँ की भूमिका में हेलेना कार्टर की अद्भुत अदाकारी की वजह से और उभरकर सामने आता है. ’टोस्ट’ कथा धारा के परम्परागत ढांचे को तोड़ती नहीं है. लेकिन उसे एक मुकम्मल कथा की तरह ज़रूर कहती है. हाँ, बचपन में नाइज़ेल के उस दोस्त का किरदार कमाल का है जो उसे हमेशा ज्ञान देता रहता है. सच कहूँ, यह भी एक स्टीरियोटाइप ही है लेकिन ऐसा जिसका सच्चाई से सीधा वास्ता है. मुझे अपने बचपन का साथी दीपू याद आता है जो मुझसे एक साल सीनियर हुआ करता था और मुझे हर आनेवाली क्लास के साथ अगली क्लास की अभेद्य चुनौतियों के बारे में बताया करता था. यहाँ भी उसका दोस्त वक़्त-बेवक़्त ’नॉर्मल फ़ैमिलीज़ आर टोटली ओवररेटेड’ जैसे वेद-वाक्य सुनाता चलता है. कथा का अंत फिर इसे ’उड़ान’ से कहीं गहरे जोड़ता जाता है.</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;"><a href="http://www.imdb.com/title/tt1124035/" target="_blank"><strong><strong> </strong></strong></a><a href="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2011/12/ides-of-march-movie.jpg"><img class="alignright size-medium wp-image-968" title="ides-of-march-movie" src="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2011/12/ides-of-march-movie-202x300.jpg" alt="ides-of-march-movie" width="202" height="300" /></a><a href="http://www.imdb.com/title/tt1124035/" target="_blank"><strong>The Ides of March</strong></a><br />
<strong>George Clooney, USA, 2011.</strong></p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">यह वो महत्वाकांक्षी हॉलीवुड थ्रिलर है जिसके लिए स्क्रीन के बाहर लम्बी लाइनें लगीं और संभवत: जिस फ़िल्म की गूंज आप आनेवाले ऑस्कर पुरस्कारों में सुनेंगे. सत्ता है, हत्या है, महत्वाकांक्षाएं हैं, फ़रेब है, ऊपर दिखती खूबसूरती है, बदनुमा अतीत है. लेकिन जॉर्ज क्लूनी निर्देशित ’द आइड्स ऑफ़ मार्च’ की जान फ़िल्म के नायक रेयान गॉसलिंग हैं. पता हो, यह लड़का पिछले साल ’ब्लू वेलेंटाइन’ जैसी घातक रूप से अच्छी फ़िल्म दे चुका है. जॉर्ज क्लूनी और मेरे पसन्दीदा फ़िलिप सिमोर हॉफ़मैन जैसे खेले-खाए अदाकारों के सामने इस तीस साल के लड़के की धमक सुनने लायक है. अमेरिकी राष्ट्रपति चुनावों से ठीक पहले डेमोक्रेटिक उम्मीदवार के चुनाव के लिए मतदान के दौरान की इस कथा में हमारे समय के हालिया वर्तमान से निकले अनेक स्वर सुनाई देते हैं. किसी पर्फ़ेक्ट राजनैतिक थ्रिलर की तरह कथा आपको बांधे रखती है और जहाँ होना चाहिए वहाँ मोहभंग भी होता है, लेकिन परेशानी यही है कि फ़िल्म जहाँ बनती है ठीक वहीं ख़त्म हो जाती है.<strong> </strong></p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">इस बीच दोस्तों की चर्चाओं में लौट-लौटकर <a href="http://www.imdb.com/title/tt1906426/" target="_blank"><strong>’माइकल’</strong></a> आती रही. एक दोस्त ने कहा कि वह अपराधी का मानवीकरण है. मुझे याद आया कि ’सत्या’ के बाद उसे भी स्थापित करते हुए आलोचकों ने यही कहा था कि यहाँ पहली बार एक ’डॉन’ का मानवीकरण होता है, उसके भी बीवी-बच्चे हैं. वो दोस्त की शादी की बरात में नाचता है. वो भी चाहता है कि उसकी बच्ची स्कूल में अंग्रेज़ी पोएम सीखे. तो क्या ’माइकल’ भी ’सत्या’ की तरह अपराधी का मानवीकरण करती है? यह भी एक नज़रिया है जिससे मैं असहमत हूँ. उसकी निर्पेक्षता मेरे भीतर और ज़्यादा सिहरन भर देती है. यह अहसास कि एक भयानक अपराधी भी कितने ही मामलों में ठीक हमारे जैसा है, उसके और हमारे बीच की दूरी एकदम कम कर देता है. और सच्चाई यह है कि इस दूरी के मिटने से ज़्यादा डरावना किसी भी ’सभ्य समाज’ के नागरिक के लिए कुछ और नहीं हो सकता.</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;"><a href="http://www.imdb.com/title/tt1704619/" target="_blank"><strong><strong> </strong></strong></a><strong><strong><a href="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2011/12/Tabloid1.jpg"><img class="alignleft size-full wp-image-980" title="Tabloid" src="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2011/12/Tabloid1.jpg" alt="Tabloid" width="250" height="132" /></a></strong>Tabloid</strong><br />
<strong>Errol Morris, USA, 2010.</strong></p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">यह संयोग ही था कि हम एरॉल मोरिस की डॉक्यूमेंट्री फ़िल्म ’टैबलॉयड’ देखने घुसे. और यह फ़िल्म तुरंत इस साल देखे गए कुछ दुर्लभ वृत्तचित्रों की लम्बी होती लिस्ट में शामिल हो गई. बहुत की रोचक अंदाज़ और आर्ट डिज़ाइन के साथ बनाई गई इस फ़िल्म की असल तारीफ़ इस बात में छिपी है कि निर्देशक ने कैसे मामूली से दिखते एक ’अखबारी कांड’ में इस गैर-मामूली फ़िल्म को देखा और बनाया. कैसे किसी की व्यक्तिगत ज़िन्दगी को मौका आने पर पीत-पत्रकारिता सरेराह उछालती है और खुद ही न्यायाधीश बन फ़ैसले करती है. और ब्रिटेन के टैबलॉयड जर्नलिज़्म को समझने के लिए यह फ़िल्म दस्तावेज़ सरीख़ी है. इसके तीस साल पुराने घटनाचक्र में आप आज बन्द हुए ’न्यूज़ ऑफ़ द वर्ल्ड’ की तमाम कारिस्तानियाँ सुन सकते हैं.</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;"><a href="http://www.imdb.com/title/tt1860152/" target="_blank"><strong>17 Girls</strong></a><br />
<strong>Muriel Coulin and Delphine Coulin, France, 2011.</strong></p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">ये कुछ ऐसा था जैसे सत्रह लड़कियाँ आकर हमारे समाज से अपना शरीर, उस पर उनका अपना हक़ हमसे वापस मांगे. दोनों निर्देशक बहनों ने फ़िल्म से पहले आकर बताया था कि यह घटना भले ही कहीं और घटी और उन्होंने इसका ज़िक्र उड़ता हुआ अखबार के किसी पिछले पन्ने पर पढ़ा था, लेकिन कहानियाँ वे अपने घर, अपने कस्बे की ही सुनाती हैं. कैसे खुद उनके लड़कपन उन सीखों से भरे हुए थे जो लड़कियों को हमारे इन ’सभ्य’ समाजों में विरासत में मिलती हैं और कैसे वे नया जानने की, कुछ कर गुज़रने की बेचैनी से भरी थीं.</p>
<p style="text-align: justify;"><a href="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2011/12/17_fillesA.jpg"><img class="alignright size-full wp-image-978" title="17_fillesA" src="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2011/12/17_fillesA.jpg" alt="17_fillesA" width="162" height="220" /></a>मेरी राय में ’17 गर्ल्स’ के कथाकेन्द्र में मौजूद ’गर्भधारण’ सिर्फ़ एक कथायुक्ति भर है. इसकी जगह कोई और युक्ति भी होती, अगर इतनी ही कारगर तो भी यह कथा संभव थी. क्योंकि यह मातृत्व के बारे में नहीं है. न ही यह सेक्स लिबरेशन जैसे किसी विचार के बारे में है. दरअसल यह कथा सामूहिकता के बारे में है. उस युवता के बारे में है जो जब साथ होती है तो दुनिया बदलने की बातों वाले किस्से अच्छे लगते हैं, सच्चे लगते हैं. आकाश के सितारे कुछ और पास लगते हैं. हमउमर साथ खड़े होते हैं, बाहें फ़ैलाते हैं और एक दूसरे को अपनी बाहों में समेट लेते हैं. बस, फिर किसी और पीढ़ी की, उनकी सीखों की, उनकी समझदारियों की ज़रूरत नहीं रहती. अजीब लगेगा, लेकिन इस फ़िल्म को देखते हुए मुझे भगतसिंह और उनके साथी याद आते हैं. उनकी तरुणाई और उनके अदम्य स्वप्न याद आते हैं. आज यह ’व्यक्तिगत ही राजनैतिक’ है वाला ज़माना है और इन लड़कियों की आँखों में भी मुझे वही सुनहले सपने दिखाई देते हैं.</p>
<p style="text-align: justify;">दर्जन से ज़्यादा किशोरवय लड़कियों का सामुहिक गर्भधारण का यह फ़ैसला उनके घरवालों को, स्कूल को हिला देता है. उनके लिए इसे समझ पाना मुश्किल है. वाजिब है, उन्हें ’नैतिकता’ खतरे में दिखाई देती है. लेकिन उन लड़कियों के लिए यह मृत्यु ज्यों शान्ति से भरे उस कस्बे के ठंडे पानी में एक पत्थर मारने सरीख़ा है. यह उन तमाम परम्पराओं का अस्वीकार है जिन्हें हमारे स्कूलों में बड़े होते नागरिकों पर एक अलिखित ’नैतिक शिक्षा’ के नाम पर थोपा जाता है. एक पिता के झिड़ककर कहने पर कि “तुम्हें क्या लगता है तुम दुनिया बदल सकती हो?” उसकी बेटी जवाब में कहती है, “कम से कम हम कोशिश तो कर ही सकती हैं.”</p>
<p style="text-align: justify;">*****</p>
<p style="text-align: justify;">साहित्यिक पत्रिका <strong>’कथादेश’</strong> के दिसम्बर अंक में प्रकाशित</p>
]]></content:encoded>
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		<title>द आर्टिस्ट : ज़िन्दगी का गीत</title>
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		<pubDate>Sat, 19 Nov 2011 13:50:29 +0000</pubDate>
		<dc:creator>मिहिर</dc:creator>
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		<description><![CDATA[कई दफ़े फ़िल्म के सिर्फ़ किसी एक दृश्य में इतना चमत्कार भरा होता है कि वो सम्पूर्ण फ़िल्म से बड़ा हो जाए. तक़रीबन दो घंटे लम्बी निर्देशक Michel Hazanavicius की फ्रांसीसी फ़िल्म ’द आर्टिस्ट’ जिसकी कहानी सन 1927 से शुरु होती है, में ध्वनियां और संवाद नहीं हैं ठीक उन्नीस सौ बीस के दशक की [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;"><a href="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2011/11/The-Artist-movie-poster.jpg"><img class="alignright size-medium wp-image-962" title="The Artist movie poster" src="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2011/11/The-Artist-movie-poster-300x199.jpg" alt="The Artist movie poster" width="300" height="199" /></a>कई दफ़े फ़िल्म के सिर्फ़ किसी एक दृश्य में इतना चमत्कार भरा होता है कि वो सम्पूर्ण फ़िल्म से बड़ा हो जाए. तक़रीबन दो घंटे लम्बी निर्देशक Michel Hazanavicius की फ्रांसीसी फ़िल्म <a href="http://www.imdb.com/title/tt1655442/" target="_blank"><strong>’द आर्टिस्ट’</strong></a> जिसकी कहानी सन 1927 से शुरु होती है, में ध्वनियां और संवाद नहीं हैं ठीक उन्नीस सौ बीस के दशक की किसी फ़िल्म की तरह. प्रामाणिकता का आग्रह ऐसा कि फ़िल्म उन्हीं संवादपट्टों द्वारा बात करती है जिन्हें आप <a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Charlie_Chaplin" target="_blank"><strong>चार्ली चैप्लिन</strong></a> की फ़िल्मों में देखते थे. वो सिर्फ़ एक वाकया है जहां फ़िल्म में ध्वनि आपको सुनाई देती है, और मैं वादा करता हूँ कि वो क्षण आपको सालों याद रहने वाला है. किसी कविता की हद को छूता यह प्रसंग एक ख़त्म होते हुए दौर को आपके नंगा कर रख देता है और अचानक यह समझ आता है कि उस बीते कल की तमाम खूबियां, खूबसूरती और मासूमियत उस दौर के साथ ही चली गई हैं और अब कभी वापिस नहीं आयेंगी.</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;"><a href="http://www.imdb.com/title/tt1655442/" target="_blank"><strong>’द आर्टिस्ट’</strong></a> का चमत्कार शायद उसकी कहानी में नहीं. यह मूक फ़िल्मों के दौर के एक ऐसे महानायक की कहानी है जिसे सवाक फ़िल्मों का नया दौर अचानक अप्रासंगिक बना देता है. साथ ही यह एक ऐसी प्रेम कहानी भी है जिसे सिनेमा में कई बार दोहराया गया है. लेकिन ’द आर्टिस्ट’ दरअसल हमें उस मासूमियत की याद दिलाती है जिसे हम मूक फ़िल्मों की तरह अपने विगत में कहीं भूल आए हैं. यह सिनेमा से प्रेम की कहानी है. ’सनसेट बुलिवार्ड’ का फ़ीलगुड वर्ज़न जिसे देखकर आपका मन चार्ली चैप्लिन की वो तमाम फ़िल्में फिर से देखने का करता है जिन्हें आपने ख़रीदने के बाद अपनी दराज़ के किसी निचले ख़ाने में धीरे से सरका दिया था.</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">और यह संयोग नहीं है कि <a href="http://www.imdb.com/title/tt1655442/" target="_blank"><strong>’द आर्टिस्ट’</strong></a> देखते हुए चार्ली याद आते हैं. याद कीजिए उनकी आत्मकथा में आया <a href="http://en.wikipedia.org/wiki/City_Lights" target="_blank"><strong>’सिटी लाइट्स’</strong></a> वाला प्रसंग,</p>
<p style="text-align: justify;">
<blockquote>
<p style="text-align: justify;">“किसी भी अच्छी मूक फ़िल्म में विश्वव्यापी अपील होती थी जो बुद्धिजीवी वर्ग और आम जनता को एक जैसे पसन्द आती थीं. अब ये सब खो जाने वाला था. लेकिन मैं इस बात पर अड़ा हुआ था कि मैं मूक फ़िल्में ही बनाता रहूंगा क्योंकि मेरा ये मानना था कि सभी तरह के मनोरंजन के लिए हमेशा गुंजाइश रहती है. इसके अलावा, मैं मूक अभिनेता, पेंटोमाइमिस्ट था और उस माध्यम में मैं विरल था और अगर इसे मेरी खुद की तारीफ़ न माना जाये तो मैं इस कला में सर्वश्रेष्ठ था. इसलिए मैंने एक और मूक फ़िल्म द सिटी लाइट्स के लिए काम करना शुरु कर दिया.”</p>
</blockquote>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">लेकिन चार्ली चैप्लिन को <a href="http://en.wikipedia.org/wiki/City_Lights" target="_blank"><strong>’सिटी लाइट्स’</strong></a> बनाने के दौरान सवाक फ़िल्मों की कठिन चुनौती का सामना करना पड़ा. उनकी आत्मकथा में उस दौरान हुए कई मज़ेदार अनुभवों की चर्चा है. सवाक फ़िल्में उस दौर का चढ़ता हुआ सूरज थीं और चार्ली धारा के विपरीत तैरने की कोशिश कर रहे थे. फ़िल्म के पहले प्रिव्यू शो को याद करते हुए चार्ली उसके लिए ’भयानक’ जैसा शब्द काम में लेते हैं. वे लिखते भी हैं कि वजह फ़िल्म खराब होना नहीं बल्कि देखनेवालों का ओरियंटेशन बदल जाना है. अब वे सिनेमा के परदे पर ड्रामा देखने आते हैं और मूक कॉमेडी उन्हें असहज कर देती है.</p>
<p style="text-align: justify;"><a href="http://www.imdb.com/title/tt1655442/" target="_blank"><strong><br />
</strong></a></p>
<p style="text-align: justify;"><a href="http://www.imdb.com/title/tt1655442/" target="_blank"><strong>’द आर्टिस्ट’</strong></a> में ऐसी तमाम रेखाएं हैं जो लौटकर आती हैं और अपना घेरा पूरा करती हैं. फ़िल्म के बीच में कहीं अचानक आपको उसका पहला दृश्य याद आता है और आप उसमें छिपे उस अद्भुत प्रतीक को समझ मन ही मन खिलखिलाते हैं. मूक फ़िल्मों का नायक हमेशा सीढ़ियां उतरता हुआ दिखाई देता है और सवाक फ़िल्मों की सितारा नायिका हमेशा सीढ़ियां चढ़ती हुई. और साथ में मौजूद कुत्ता अपनी सिर्फ़ एक अदा से आपको सितारों के अभिनय की तमाम ऊँचाइयाँ भुला देता है. ’द आर्टिस्ट’ ज़िन्दगी से प्यार की कहानी है और यहां आकर सिनेमा और ज़िन्दगी में फर्क बहुत कम रह जाता है.</p>
<p style="text-align: justify;">*****</p>
<p style="text-align: justify;">साहित्यिक पत्रिका <strong>&#8216;कथादेश</strong>&#8216; के नवम्बर अंक में आया.</p>
]]></content:encoded>
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		<title>रॉकस्टार : सिनेमा जो कोलाज हो जाना चाहता था</title>
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		<pubDate>Fri, 11 Nov 2011 11:27:17 +0000</pubDate>
		<dc:creator>मिहिर</dc:creator>
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		<description><![CDATA[पहले जुम्मे की टिप्पणी है. इसलिए अपनी बनते पूरी कोशिश है कि बात इशारों में हो और spoilers  न हों. फिर भी अगर आपने फ़िल्म नहीं देखी है तो मेरी सलाह यही है कि इसे ना पढ़ें. किसी बाह्य आश्वासन की दरकार लगती है तो एक पंक्ति में बताया जा सकता है कि फ़िल्म बेशक [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;"><em>पहले जुम्मे की टिप्पणी है. इसलिए अपनी बनते पूरी कोशिश है कि बात इशारों में हो और spoilers  न हों. फिर भी अगर आपने फ़िल्म नहीं देखी है तो मेरी सलाह यही है कि इसे ना पढ़ें. किसी बाह्य आश्वासन की दरकार लगती है तो एक पंक्ति में बताया जा सकता है कि फ़िल्म बेशक एक बार देखे जाने लायक है, देख आएं. फिर साथ मिल चर्चा-ए-आम होगी.</em></p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">*****</p>
<p style="text-align: justify;"><a href="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2011/11/Rockstar2011.jpg"><img class="alignleft size-medium wp-image-953" title="Rockstar2011" src="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2011/11/Rockstar2011-225x300.jpg" alt="Rockstar2011" width="225" height="300" /></a>बीस के सालों में जब अंग्रेज़ी रियासत द्वारा स्थापित ’नई दिल्ली योजना समिति’ के सदस्य जॉन निकोल्स ने पहली बार एक सर्पिलाकार कुंडली मारे बैठे शॉपिंग प्लाज़ा ’कनॉट प्लेस’ का प्रस्ताव सरकार के समक्ष रखा था, उस वक़्त वह पूरा इलाका कीकर के पेड़ों से भरा बियाबान जंगल था. ’कनॉट सर्कस’ के वास्तुकार रॉबर्ट रसैल ने इन्हीं विलायती बबूल के पेड़ों की समाधि पर अपना भड़कीला शाहकार गढ़ा.</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">इम्तियाज़ अली की <a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Rockstar_(2011_film)" target="_blank"><strong>’रॉकस्टार’</strong></a> में इसी कनॉट प्लेस के हृदयस्थल पर खड़े होकर जनार्दन जाखड़ उर्फ़ ’जॉर्डन’ जब कहता है,</p>
<p style="text-align: justify;">
<blockquote>
<p style="text-align: justify;">“जहाँ तुम आज खड़े हो, कभी वहाँ एक जंगल था. फिर एक दिन वहाँ शहर घुस आया. सब कुछ करीने से, सलीके से. कुछ पंछी थे जो उस जंगल के उजड़ने के साथ ही उड़ गए. वो फिर कभी वापस लौटकर नहीं आए. मैं उन्हीं पंछियों को पुकारता हूँ. बोलो, तुमने देखा है उन्हें कहीं?”</p>
</blockquote>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">तो मेरे लिए वो फ़िल्म का सबसे खूबसूरत पल है. एक संवाद जिसके सिरहाने न जाने कितनी कहानियाँ अधलेटी सी दिखाई देती हैं. तारीख़ को लेकर वो सलाहियत जिसकी जिसके बिना न कोई युद्ध पूरा हुआ है, न प्यार. लेकिन ऐसे पल फिर फ़िल्म में कम हैं. क्यों, क्योंकि फ़िल्म दिक-काल से परे जाकर कविता हो जाना चाहती है. जब आप सिनेमा में कहानी कहना छोड़कर कोलाज बनाने लगते हैं तो कई बार सिनेमा का दामन आपके हाथ से छूट जाता है. यही वो अंधेरा मोड़ है, मेरा पसन्दीदा निर्देशक शायद यहीं मात खाता है.</p>
<p style="text-align: justify;">आगे की कथा आने से पहले ही उसके अंश दिखाई देते हैं, किरदार दिखाई देते हैं. और जहाँ से फ़िल्म शुरु होती है वापस लौटकर उस पल को समझाने की कभी कोशिश नहीं करती. रॉकस्टार में ऐसे कई घेरे हैं जो अपना वृत्त पूरा नहीं करते. मैं इन्हें संपादन की गलतियाँ नहीं मानता. ख़ासकर तब जब शम्मी कपूर जैसी हस्ती अपने किरदार के विधिवत आगमन से मीलों पहले ही एक गाने में भीड़ के साथ खड़े ऑडियो सीडी का विमोचन करती दिखाई दे, यह अनायास नहीं हो सकता. ’रॉकस्टार’ यह तय ही नहीं कर पाई है कि उसे क्या होना है. वह एक कलाकार का आत्मसाक्षात्कार है, लेकिन बाहर इतना शोर है कि आवाज़ कभी रूह तक पहुँच ही नहीं पाती. वह एक साथ एक कलाकृति और एक सफ़ल बॉलीवुड फ़िल्म होने की चाह करती है और दोनों जहाँ से जाती है.</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">ऐसा नहीं है कि फ़िल्म में ईमानदारी नहीं दिखाई देती. कैंटीन वाले खटाना भाई के रोल में कुमुद मिश्रा ने जैसे एक पूरे समय को जीवित कर दिया है. जब वो इंटरव्यू के लिए कैमरे के सामने खड़े होते हैं तो उस मासूमियत की याद दिलाते हैं जिसे हम अपने बीए पास के दिनों में जिया करते थे और वहीं अपने कॉलेज की कैंटीन में छोड़ आए हैं. अदिति राव हैदरी कहानी में आती हैं और ठीक वहीं लगता है कि इस बिखरी हुई, असंबद्ध कोलाजनुमा कहानी को एक सही पटरी मिल गई है. लेकिन अफ़सोस कि वो सिर्फ़ हाशिए पर खड़ी एक अदाकारा हैं, और जिसे इस कहानी की मुख्य नायिका के तौर चुना गया है उन्हें जितनी बार देखिए यह अफ़सोस बढ़ता ही जाता है.</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">ढाई-ढाई इंच लम्बे तीन संवादों के सहारे लव आजकल की ’हरलीन कौर’ फ़िल्म किसी तरह निकाल ले गई थीं, लेकिन फ़िल्म की मुख्य नायिका के तौर गैर हिन्दीभाषी नर्गिस फ़ाखरी का चयन ऐसा फ़ैसला है जो इम्तियाज़ पर बूमरैंग हो गया है. शायद उन्होंने अपनी खोज ’हरलीन कौर’ को मुख्य भूमिका में लेकर बनी ’आलवेज़ कभी कभी’ का हश्र नहीं देखा. फिर ऊपर से उनकी डबिंग इतनी लाउड है कि फ़िल्म जिस एकांत और शांति की तलाश में है वो उसे कभी नहीं मिल पाती. बेशक उनके मुकाबले रणबीर मीलों आगे हैं लेकिन फिर अचानक आता, अचानक जाता उनका हरियाणवी अंदाज़ खटकता है. फिर भी, ऐसे कितने ही दृश्य हैं फ़िल्म में जहाँ उनका भोलापन और ईमानदारी उनके चेहरे से छलकते हैं. ठीक उस पल जहाँ जनार्दन हीर को बताता है कि उसने कभी दारू नहीं पी और दोस्तों के सामने बस वो दिखाने के लिए अपने मुंह और कपड़ों पर लगाकर चला जाता है, ठीक वहीं रणबीर के भीतर बैठा बच्चा फ़िल्म को कुछ और ऊपर उठा देता है. ’वेक अप सिड’ और ’रॉकेट सिंह’ के बाद यह एक और मोती है जिसे समुद्र मंथन से बहुत सारे विषवमन के बीच रनबीर अपने लिए सलामत निकाल लाए हैं.</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;"><a href="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2011/11/rockstar_hindi_movie.jpg"><img class="alignright size-full wp-image-955" title="rockstar_hindi_movie" src="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2011/11/rockstar_hindi_movie.jpg" alt="rockstar_hindi_movie" width="300" height="225" /></a>फ़िल्म के कुछ सबसे खूबसूरत हिस्से इम्तियाज़ ने नहीं बल्कि ए आर रहमान, मोहित चौहान और इरशाद कामिल ने रचे हैं. तुलसी के मानस की तरह जहाँ चार चौपाइयों की आभा को समेटता पीछे-पीछे आप में सम्पूर्ण एक दोहा चला आता है, यहाँ रहमान के रूहानी संगीत में इरशाद की लिखी मानस के हंस सी चौपाइयाँ आती हैं.</p>
<p style="text-align: justify;">
<p>’कुन फ़ाया कुन’ में&#8230;</p>
<p>“सजरा सवेरा मेरे तन बरसे, कजरा अँधेरा तेरी जलती लौ,<br />
क़तरा मिला जो तेरे दर बरसे &#8230; ओ मौला.”</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">’नादान परिंदे’ में&#8230;<br />
कागा रे कागा रे, मोरी इतनी अरज़ तोसे, चुन चुन खाइयो मांस,<br />
खाइयो न तू नैना मोरे, खाइयो न तू नैना मोरे, पिया के मिलन की आस.”</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">यही वो क्षण हैं जहाँ रणबीर सीधे मुझसे संवाद स्थापित करते हैं, यही वो क्षण हैं जहाँ फ़िल्म जादुई होती है. लेकिन कोई फ़िल्म सिर्फ़ गानों के दम पर खड़ी नहीं रह सकती. अचानक लगता है कि मेरे पसन्दीदा निर्देशक ने अपनी सबसे बड़ी नेमत खो दी है और जैसे उनके संवादों का जावेद अख़्तरीकरण हो गया है. और इस ’प्रेम कहानी’ में से प्रेम जाने कब उड़ जाता है पता ही नहीं चलता.</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">सच कहूँ, इम्तियाज़ की सारी गलतियाँ माफ़ होतीं अगर वे अपने सिनेमा की सबसे बड़ी ख़ासियत को बचा पाए होते. मेरी नज़र में इम्तियाज़ की फ़िल्में उसके महिला किरदारों की वजह से बड़ी फ़िल्में बनती हैं. नायिकाएं जिनकी अपनी सोच है, अपनी मर्ज़ी और अपनी गलतियाँ. और गलतियाँ हैं तो उन पर अफ़सोस नहीं है. उन्हें लेकर ’जिन्दगी भर जलने’ वाला भाव नहीं है, और एक पल को ’जब वी मेट’ में वो दिखता भी है तो उस विचार का वाहियातपना फ़िल्म खुद बखूबी स्थापित करती है. उनकी प्रेम कहानियाँ देखकर मैं कहता था कि देखो, यह है समकालीन प्यार. जैसी लड़कियाँ मैं अपने दोस्तों में पाता हूँ. हाँ, वे दोस्त पहले हैं लड़कियाँ बाद में, और प्रेमिकाएं तो उसके भी कहीं बाद. और यही वो बिन्दु था जहाँ इम्तियाज़ अपने समकालीनों से मीलों आगे निकल जाते थे. लेकिन रॉकस्टार के पास न कोई अदिति है न मीरा. कोई ऐसी लड़की नहीं जिसके पास उसकी अपनी आवाज़ हो. अपने बोल हों. और यहाँ बात केवल तकनीकी नहीं, किरदार की है.</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">इम्तियाज़ की फ़िल्मों ने हमें ऐसी नायिकाएं दी हैं जो सच्चे प्रेम के लिए सिर्फ़ नायक पर निर्भर नहीं हैं. किसी भी और स्वतंत्र किरदार की तरह उनकी अपनी स्वतंत्र ज़िन्दगियाँ हैं जिन्हें नायक के न मिलने पर बरबाद नहीं हो जाना है. बेशक इन दुनियाओं में हमारे हमेशा कुछ कमअक़्ल नायक आते हैं और प्रेम कहानियाँ पूरी होती हैं, लेकिन फ़िल्म कभी दावे से यह नहीं कहती कि अगर यह नायक न आया होता तो इस नायिका की ज़िन्दगी अधूरी थी. इम्तियाज़ ने नायिकायों को सिर्फ़ नायक के लिए आलम्बन और उद्दीपन होने से बचाया और उन्हें खुद आगे बढ़कर अपनी दुनिया बनाने की, गलतियाँ करने की इजाज़त दी. इस संदर्भ को ध्यान रखते हुए ’रॉकस्टार’ में एक ऐसी नायिका को देखना जिसका जीवन सिर्फ़ हमारे नायक के इर्द गिर्द संचालित होने लगे, निराश करता है. और जैसे जैसे फ़िल्म अपने अंत की ओर बढ़ती है नायिका अपना समूचा व्यक्तित्व खोती चली जाती है, मेरी निराशा बढ़ती चली जाती है.</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">मैंने इम्तियाज़ की फ़िल्मों में हमेशा ऐसी लड़कियों को पाया है जिनकी ज़िन्दगी ’सच्चे प्यार’ के इंतज़ार में तमाम नहीं होती. वे सदा सक्रिय अपनी पेशेवर ज़िन्दगियाँ जीती हैं. कभी दुखी हैं, लेकिन हारी नहीं हैं और ज़्यादा महत्वपूर्ण ये कि अपनी लड़ाई फिर से लड़ने के लिए किसी नायक का इंतज़ार नहीं करतीं.</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">और हाँ, पहला मौका मिलते ही भाग जाती हैं.</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">मैं खुश होता अगर इस फ़िल्म में भी नायिका ऐसा ही करती. तब यह फ़िल्म सच्चे अर्थों में उस रास्ते जाती जिस रास्ते को इम्तियाज़ की पूर्ववर्ती फ़िल्मों ने बड़े करीने से बनाया है.</p>
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		<title>सभ्यता का मर्दवादी किला</title>
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		<pubDate>Wed, 09 Nov 2011 18:09:34 +0000</pubDate>
		<dc:creator>मिहिर</dc:creator>
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		<description><![CDATA[शी मंकीज़
लीज़ा अस्चान, स्वीडन, 2011.

दो घुड़सवार लड़कियों की आपसी प्रतिद्वंद्विता और आकर्षण के इर्द-गिर्द घूमती इस स्वीडिश फ़िल्म की असल जान इसके द्वितीयक कथा सूत्र में छिपी है. सारा, जिसकी उमर अभी मुश्किल से सात या आठ होगी, यह फ़िल्म उस बच्ची की कुछ नितांत व्यक्तिगत और उतनी ही दुर्लभ दुश्चिंताओं को अपने भीतर समेटे [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p><strong><a href="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2011/11/she_monkeys_alt.jpg"><img class="alignleft size-medium wp-image-940" title="she_monkeys" src="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2011/11/she_monkeys_alt-209x300.jpg" alt="she_monkeys" width="209" height="300" /></a><a href="http://www.imdb.com/title/tt1827358/" target="_blank">शी मंकीज़</a></strong></p>
<p><strong>लीज़ा अस्चान, स्वीडन, 2011.</strong></p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">दो घुड़सवार लड़कियों की आपसी प्रतिद्वंद्विता और आकर्षण के इर्द-गिर्द घूमती इस स्वीडिश फ़िल्म की असल जान इसके द्वितीयक कथा सूत्र में छिपी है. सारा, जिसकी उमर अभी मुश्किल से सात या आठ होगी, यह फ़िल्म उस बच्ची की कुछ नितांत व्यक्तिगत और उतनी ही दुर्लभ दुश्चिंताओं को अपने भीतर समेटे है. छोटी सी बच्ची जिसे स्विमिंग पूल पर यह समझाया जा रहा है कि उसे अब पूरे कपड़े पहन पूल में उतरना चाहिए. गौर से देखिए, यही वो क्षण है जहां एक बच्ची को उसके स्त्री होने और उससे जुड़े ’कर्तव्यों’ का पहला पाठ पढ़ाया जा रहा है.</p>
<p style="text-align: justify;">सबक बहुतेरे हैं. उसे मज़बूत होना है, दुनिया का सामना करना है. ठीक उस क्षण जब वह चीते से दिखने वाले अंत:वस्त्रों का जोड़ा पसन्द करती है और साथ में अपने चेहरे पर किसी चीते सी धारियां बना लेती है, ठीक उस क्षण हमारी सभ्यता का मर्दवादी किला भरभराकर ढह जाता है.</p>
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<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">साहित्यिक पत्रिका <strong>’कथादेश’</strong> के नवम्बर अंक में प्रकाशित.</p>
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