<?xml version="1.0" encoding="UTF-8"?>
<rss version="2.0"
	xmlns:content="http://purl.org/rss/1.0/modules/content/"
	xmlns:wfw="http://wellformedweb.org/CommentAPI/"
	xmlns:dc="http://purl.org/dc/elements/1.1/"
	xmlns:atom="http://www.w3.org/2005/Atom"
	xmlns:sy="http://purl.org/rss/1.0/modules/syndication/"
	xmlns:slash="http://purl.org/rss/1.0/modules/slash/"
	>

<channel>
	<title>आवारा हूँ... &#187; cricket</title>
	<atom:link href="http://mihirpandya.com/category/cricket/feed/" rel="self" type="application/rss+xml" />
	<link>http://mihirpandya.com</link>
	<description>सिनेमा, साहित्य, खेल, संगीत, एक युवा शहर धड़कता है यहाँ...</description>
	<lastBuildDate>Tue, 24 Aug 2010 15:57:28 +0000</lastBuildDate>
	<generator>http://wordpress.org/?v=2.8.4</generator>
	<language>en</language>
	<sy:updatePeriod>hourly</sy:updatePeriod>
	<sy:updateFrequency>1</sy:updateFrequency>
			<item>
		<title>बदहवास शहर में फंसी जिन्दगियों की कहानी : कमीने</title>
		<link>http://mihirpandya.com/2009/08/kaminey-film-review/</link>
		<comments>http://mihirpandya.com/2009/08/kaminey-film-review/#comments</comments>
		<pubDate>Thu, 20 Aug 2009 20:44:22 +0000</pubDate>
		<dc:creator>मिहिर</dc:creator>
				<category><![CDATA[cricket]]></category>
		<category><![CDATA[films]]></category>
		<category><![CDATA[music]]></category>
		<category><![CDATA[गुलज़ार]]></category>
		<category><![CDATA[नया सिनेमा]]></category>
		<category><![CDATA[फ़िल्म समीक्षा]]></category>
		<category><![CDATA[सिनेमा]]></category>

		<guid isPermaLink="false">http://mihirpandya.com/?p=174</guid>
		<description><![CDATA[
उस शाम सराय में रविकांत और मैं मुम्बई की पहचान पर ही तो भिड़े थे. ’मुम्बई की आत्मा महानगरीय है लेकिन दिल्ली की नहीं’ कहकर मैंने एक सच्चे दिल्लीवाले को उकसा दिया था शायद. ’और इसी महानगरीय आत्मा वाले शहर में शिवसेना से लेकर मनसे तक के मराठी मानुस वाले तांडव होते हैं?’ रविकांत भी [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<div>
<p><a href="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2009/08/kaminey-21.jpg"><img class="alignleft size-medium wp-image-175" title="kaminey-21" src="http://mihirpandya.com/blog/wp-content/uploads/2009/08/kaminey-21-207x300.jpg" alt="kaminey-21" width="207" height="300" /></a>उस शाम सराय में रविकांत और मैं मुम्बई की पहचान पर ही तो भिड़े थे. ’मुम्बई की आत्मा महानगरीय है लेकिन दिल्ली की नहीं’ कहकर मैंने एक सच्चे दिल्लीवाले को उकसा दिया था शायद. ’और इसी महानगरीय आत्मा वाले शहर में शिवसेना से लेकर मनसे तक के मराठी मानुस वाले तांडव होते हैं?’ रविकांत भी सही थे अपनी जगह. मैं मुम्बई का खुलापन और आज़ादी देखता था और वो बढ़ते दक्षिणपंथी राजनीति के उभार चिह्नित कर रहे थे. हम ’मेट्रोपॉलिटन’ और ’कॉस्मोपॉलिटन’ के भेद वाली पारिभाषिक बहसों में उलझे थे. हमारे सामने एक विरोधाभासी पहचानों वाला शहर था. हम दोनों सही थे. मुम्बई के असल चेहरे में ही एक फांक है. यह शहर ऐसी बहुत सारी पहचानों से मिलकर बनता है जो अब एक-दूसरे को इसके भीतर शामिल नहीं होने देना चाहती. हाँ यह कॉस्मोपॉलिटन है. लेकिन अब कॉस्मोपॉलिटन शहर की परिभाषा बदल रही है. दुनिया के हर कॉस्मोपॉलिटन शहर में एक धारा ऐसी भी मिलती है जो उस रंग-बिरंगी कॉस्मोपॉलिटन पहचान को उलट देना चाहती है. दरअसल इस धारा से मिलकर ही शहर का ’मेल्टिंग पॉट’ पूरा होता है.</div>
<p>’मेल्टिंग पॉट’. <a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Vishal_Bhardwaj" target="_blank"><strong>विशाल भारद्वाज </strong></a>की <a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Kaminey" target="_blank"><strong>’कमीने’</strong></a> ऐसे ही ’मेल्टिंग पॉट’ मुम्बई की कहानी है जहां सब गड्ड-मड्ड है. सिर्फ़ चौबीस घंटे की कहानी. यह दो भाइयों (शाहिद कपूर दोहरी भूमिका में) की कहानी है जो एक-दूसरे की शक्ल से भी नफ़रत करते हैं और इस नफ़रत की वजह उनके अतीत में दफ़्न है. चार्ली तेज़ है, उसके सपने बड़े हैं. वह रेसकोर्स का बड़ा खिलाड़ी बनना चाहता है. गुड्डू छोटी इच्छाओं वाला जीव है जिसकी ज़िन्दगी का ख़ाका पॉलीटेक्नीक में डिप्लोमा, नौकरी, तरक्की, शादी से मिलकर बनता है. लेकिन इस सबके बीच एक प्रेम कहानी है. गुड्डू की ज़िन्दगी में स्वीटी (प्रियंका चोपड़ा) है जो माँ बनने वाली है और बदकिस्मती से वो लोकल माफिया डॉन भोपे भाऊ (अमोल गुप्ते) की बहन है. पूरी फ़िल्म धोखे और फरेब से भरी है लेकिन अंत में आपको महसूस होगा कि असल में यह फ़िल्म अच्छाई के बारे में है. यह इंसान के भीतर छिपी अच्छाई की तलाश है. यह कबूतर के भीतर छिपे मोर की तलाश है. ’कमीने’ को लिकप्रिय हिन्दी सिनेमा की सर्वकालिक महानतम क्लासिक <a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Sholay" target="_blank"><strong>’शोले’</strong></a> का आधुनिक संस्करण कह सकते हैं. और इस आधुनिक संस्करण के मूल सूत्र ’शोले’ से ही उठाए गए हैं.</p>
<div>
<p>इस मुम्बई में अन्डरवर्ल्ड माफिया के तीन अलग अलग तंत्र एक साथ काम कर रहे हैं और जिस ’क़त्ल की रात’ की यह कहानी है उस रात यह तीनों माफिया तंत्र आपस में बुरी तरह उलझ गए हैं. अपने सपनों के पीछे भागता एक भाई चार्ली ज़िन्दगी में शॉर्टकट लेने के चक्कर में ऐसे चक्कर में फंसा है कि अब जान बचानी मुश्किल है और दूसरा भाई गुड्डू न चाहते हुए भी अब भोपे भाऊ के निशाने पर है. मराठी अस्मिता के नाम पर अपनी राजनीति चमकाने वाले भोपे भाऊ के लिए एक उत्तर भारतीय दामाद उनकी राजनीतिक महत्वाकाक्षाओं का अंत है. और इसी सबके बीच उस बरसाती रात उनकी ज़िन्दगियां आपस में टकरा जाती हैं. जैसे एक-दूसरे का रास्ता काट जाती हैं. तेज़ बरसात है. गुप्प अंधेरा है. एक गिटार है जिसमें दस करोड़ रु. बन्द हैं. उस गिटार के आस-पास खून है, गोलियां हैं, लालच है, विश्वासघात है, मौत है. एक तरफ शादी की शहनाई बज रही है और दूसरी तरफ अंधाधुंध गोलियों की बौछार है. इस सारे मकडजाल से भाग जाने की इच्छा लिए हुए हमारे दोनों नायक हैं और चीज़ों को और जटिल बनाने के लिए इन दोनों नायकों की शक्लें भी एक हैं. इसी सबके बीच पुलिस के भेस में माफिया के गुर्गे हैं, बाराबंकी से मुम्बई रोज़ी की तलाश में होते विस्थापन के किस्से हैं, रिज़वानुर्रहमान से तहलका तक के उल्लेख हैं और सबसे ऊपर आर.डी बर्मन के गीत हैं. <a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Satya_(film)" target="_blank"><strong>’सत्या’</strong></a> के साथ हिन्दी सिनेमा ने मुम्बई अन्डरवर्ल्ड का जो यथार्थवादी स्वरूप हमारे सामने प्रस्तुत किया है उसे <a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Anurag_Kashyap_(director)" target="_blank"><strong>अनुराग कश्यप</strong></a> और <strong>विशाल भारद्वाज</strong> अपने सिनेमा में नए आयाम दे रहे हैं.</div>
<div>
<p>गुड्डू की भूमिका में शाहिद कपूर हकलाते हैं और चार्ली की भूमिका में उनका उच्चारण गलत है (मैं ’फ़’ को ’फ़’ बोलता हूँ! आपने सुना ही होगा.) लेकिन इन शारिरिक भेदों से अलग शाहिद ने अपनी अदाकारी से दो अलग व्यक्तित्वों को जीवित किया है. स्वीटी के किरदार की आक्रामकता उसे आकर्षक बनाती है और एक मराठी लड़की के किरदार में प्रियंका बेहतर लगी हैं. भाइयों की कहानियां देखने की अभ्यस्त हिन्दुस्तानी जनता को विशाल ने खूब पकड़ा है. अब तक देखे मुख्यधारा के बॉलीवुड सिनेमा से आपकी जो भी समझ बनी है उसे साथ लेकर थियेटर में जाइएगा, वो सारे फॉर्मूले आपको बहुत काम आयेंगे इस फ़िल्म का आनंद उठाने में. वही बॉलीवुडीय परंपरा कभी आपको खास सूत्र देगी फ़िल्म को समझने के और वही कई बार आपको उस क्षण तक भी पहुंचाएगी जिसके आगे आपने जो सोचा होगा वो उलट जाएगा. <a href="http://www.imdb.com/name/nm1437189/" target="_blank"><strong>श्रीराम राघवन</strong></a> की ही तरह विशाल भारद्वाज ने भी एक थ्रिलर को अमली जामा पहनाने के लिए हमारी साझा फ़िल्मी स्मृतियों का खूब सहारा लिया है. इस फ़िल्म की बड़ी खासियत इसके सह-कलाकारों का सही चयन और अभिनय है. कमाल किया है भोपे भाऊ की भूमिका में अमोल गुप्ते ने एवं मिखाइल की भूमिका में चंदन रॉय सान्याल ने. चंदन तो इस फ़िल्म की खोज कहे जा सकते हैं. अपने किरदार में वो कुछ इस तरह प्रविष्ठ हुए हैं कि उन्हें उससे अलगाना असंभव हो गया है.</div>
<div>
<p>विशाल का पुराना काम देखें तो यह सवाल उठना लाज़मी है कि ’कमीने’ सबके बीच कहां ठहरती है? क्या इसे शेक्सपियर की रचनाओं के विशाल द्वारा किए तर्जुमे <a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Maqbool" target="_blank"><strong>’मक़बूल’</strong></a> और <a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Omkara_(film)" target="_blank"><strong>’ओमकारा’ </strong></a>के आगे की कड़ी माना जाए? बेशक ’कमीने’ विशाल की पिछली ’ओमकारा’ और ’मक़बूल’ से अलग है. इसमें शेक्सपियर की कहानियों का मृत्युबोध नहीं है, इसमें संसार की निस्सारता और नश्वरता का अलौकिक बोध नहीं है. इस मायने में यह फ़िल्म अपने अनुभव में ज़्यादा सांसारिक फ़िल्म है. ज़्यादा आमफ़हम. शायद इसमें मृत्यु भी एक आमफ़हम चीज़ बन गई है. और यहीं यह फ़िल्म <a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Quentin_Tarantino" target="_blank"><strong>क्वेन्टीन टेरेन्टीनो</strong></a> की फ़िल्मों के सबसे नज़दीक ठहरती है.</div>
<div>
<p>इस फ़िल्म की सबसे बड़ी खूबी है कि एक बेहतरीन थ्रिलर की तरह यह पूरे समय अपना तनाव बरकरार रखती है. और यह तनाव बनाने के लिए विशाल ने किसी तकनीकी सहारे का उपयोग नहीं किया है बल्कि यह तनाव किरदारों के आपसी संबंधों से निकल कर आता है. ’कमीने’ कसी पटकथा और सटीक संवादों से रची फ़िल्म है जिसमें बेवजह कुछ भी नहीं है. हाँ इस कहानी में ’मक़बूल’ जितने गहरे अर्थ नहीं मिलेंगे लेकिन ’कमीने’ एक रोचक फ़िल्म है. और यह रोचक फ़िल्म अपना आकर्षण बनाए रखने के लिए हमेशा सही रास्ता चुनती है, कोई ’फॉर्टकट’ नहीं. यही मुंबई का &#8216;मेल्टिंग पॉट&#8217; है।</p></div>
<div>
<p>*****</p></div>
<div>
<p><strong>जनसत्ता</strong> के लिए लिखी गई थी. पहली बार <strong><a href="http://mohallalive.com/2009/08/17/kaminey-review-by-mihir-pandya/" target="_blank">मोहल्ला लाइव</a></strong> पर प्रकाशित.</div>
]]></content:encoded>
			<wfw:commentRss>http://mihirpandya.com/2009/08/kaminey-film-review/feed/</wfw:commentRss>
		<slash:comments>6</slash:comments>
		</item>
		<item>
		<title>हम बड़े हुए, शहर बदल गए&#8230;</title>
		<link>http://mihirpandya.com/2008/11/kumble-retirement/</link>
		<comments>http://mihirpandya.com/2008/11/kumble-retirement/#comments</comments>
		<pubDate>Wed, 05 Nov 2008 10:04:17 +0000</pubDate>
		<dc:creator>मिहिर</dc:creator>
				<category><![CDATA[Memoir]]></category>
		<category><![CDATA[cricket]]></category>
		<category><![CDATA[अकेलापन]]></category>
		<category><![CDATA[अनिल कुंबले]]></category>
		<category><![CDATA[पहचान]]></category>

		<guid isPermaLink="false">http://www.mihirpandya.com/?p=30</guid>
		<description><![CDATA[तुम अपने अकेलेपन की कहानियाँ कहो. तुम अपने डर को बयान करो. तुम अपने दुःख को किस्सों में गढ़ कर पेश करो. दुनिया यूँ सुनेगी जैसे ये उनकी ही कहानी है. हर लेखक हरबार अपनी ही कहानी कहता है. कथा और इतर-कथा तो बस बात कहने के अलग अलग रूप हैं. कहानी तो इस रूप [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<blockquote><p><img class="alignright" style="float: right;" src="http://pratilipi.in/wp-content/uploads/2008/10/bio-pic-varun-150x150.jpg" alt="" width="100" height="100" /><img class="alignleft" style="float: left;" src="http://img2.orkut.com/images/milieu/1202650053/1202675342753/2076248/Z39qbxp.jpg?sig=4ovux1" alt="" width="80" height="110" />तुम अपने अकेलेपन की कहानियाँ कहो. तुम अपने डर को बयान करो. तुम अपने दुःख को किस्सों में गढ़ कर पेश करो. दुनिया यूँ सुनेगी जैसे ये उनकी ही कहानी है. हर लेखक हरबार अपनी ही कहानी कहता है. कथा और इतर-कथा तो बस बात कहने के अलग अलग रूप हैं. कहानी तो इस रूप के भीतर कहीं छुपी है. अपना microcosm खोजो और फिर देखो इस भरमाती दुनिया को. ये बातें करती है.</p>
<p><a href="http://en.bloguru.com/index.php?ID=02052&amp;CNT=ON">वरुण</a> और मेरे लिए बहुत से मामलों में &#8216;एक-सा संगीत&#8217; है. हम दुनिया को देखने के लिए एक चश्मे का इस्तेमाल करते हैं शायद. क्रिकेट, सिनेमा और राजनीति.. हमारे लिए एक complex society को समझने का जरिया बनते हैं.  एक दूसरे की scrapbook में लिखकर अपनी उलझनें सुलझाना हमारा पुराना शगल है! वैसे भी Orkut  हमारे लिए ख़ास है क्योंकि हमारी मुलाकात यहीं हुई थी. वरुण के लेखन का मैं तब से फैन रहा हूँ जब वो<a href="http://en.wikipedia.org/wiki/The_Great_Indian_Comedy_Show"> &#8216;ग्रेट इंडियन कॉमेडी शो&#8217; </a>लिखा करता था. हाल ही में उसमे अपनी पहली हिन्दी कहानी के प्रकाशन के साथ हिन्दी साहित्य जगत में भी धमाकेदार एंट्री ली है. आप <a href="http://pratilipi.in/2008/10/danube-ke-patthar-varun/">&#8216;डेन्यूब के पत्थर&#8217;</a> में ना जाने कितनी समकालीन परिस्थितियों की गूँज सुन सकते हैं.</p>
<p><a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Anil_Kumble">अनिल कुंबले</a> के जाने से शायद हम दोनों अनमने से थे और ऐसे में ये Orkut की skrapbook वार्ता आई. आज पढ़ा तो मुझे लगा कि एक लेख लिखने से ज़्यादा खूबसूरत ख़याल इसे blog पर डाल देना होगा. कुंबले हमारे जीवन में क्या जगह रखता था इसे देखना ज़रूरी है.</p></blockquote>
<p><img class="alignright" style="float: right;" src="http://www.dancewithshadows.com/ipl/wp-content/uploads/2008/03/anil-kumble.jpg" alt="" width="100" height="120" /><strong>मिहिर:~</strong> अरे यार.. मेरे हीरो ने आज यूँ अचानक अलविदा कह दिया. कुछ अच्छा नहीं लग रहा है&#8230;<br />
मालूम था कि एक दिन ये होगा लेकिन क्या करुँ यार.. मैं कुंबले के बिना जिंदगी की कल्पना नहीं कर सकता&#8230;<br />
He is my childhood hero. my first cricket memory coincides with his first coming-of-age performance. 1993 Hero cup final where he took 6-12&#8230; is there a life after kumble&#8230;?</p>
<p><strong>वरुण:~</strong> यार&#8230;सच में&#8230; दोपहर से बड़ा ख़ाली-ख़ाली लग रहा है. कुंबले को जाना था, यह कब से मालूम था&#8230; लेकिन फिर भी, एक्सेप्ट करना मुश्किल ही होता है. मुझे भी हीरो कप का वो फाइनल हमेशा याद रहेगा. शायद दिवाली के एक-दो दिन बाद ही था&#8230; हमारे पास बहुत सारे पटाखे बचे हुए थे और हमने जम के फोड़े थे. कुंबले उस दिन ख़ुदा लग रहा था&#8230; और हमेशा ही लगा है जब उसकी फ्लिपर्स लोअर-आर्डर बल्लेबाजों को खड़े-खड़े उड़ा देती हैं.</p>
<p>एक बार साउथ अफ्रीका में शायद 89 रन भी बनाए थे और उस दिन मुझे बड़ा बुरा लगा था कि सेंचुरी नहीं हुई.</p>
<p><img class="alignright" style="float: right;" src="http://www.funmunch.com/celebrities/athletes/anil_kumble/enlarge/anil_kumble_09.jpg" alt="" width="100" height="130" />आज अचानक से यह ख़याल आया कि जब सचिन भी चला जायेगा और राहुल भी&#8230; तब हम क्रिकेट क्यूँ देखेंगे? शायद उनके साथ साथ हमें भी रिटायर हो जाना चाहिए. हम भी बूढे हो चले हैं शायद. ऐसा ही होता है &#8211; एक आइकन के गुज़र जाने से साथ में वो era, उस era की values/memories/motivations सब गुज़र जाती हैं. अपनी गुज़रती उम्र का एहसास करा जाती हैं.</p>
<p>यह बात वैसे हर दौर के लोग बोलते होंगे&#8230; (और बोलते हैं, यह जानते हुए भी, मैं कहूँगा) कि क्रिकेट अब वैसा नहीं रहा. और कुछ दिन बाद इस बात का भरम भी खत्म हो जायेगा &#8211; जब हम सचिन, राहुल, लक्ष्मण को भी अलविदा कह देंगे.</p>
<p>एक मज़ेदार बात याद आई. जब दुनिया में शायद किसी ने भी कुंबले का नाम &#8216;जम्बो&#8217; नहीं रखा था, तब भी मैं और मेरा छोटा भाई उसे &#8216;हाथी&#8217; ही बोलते थे. उसके बड़े पैरों की वजह से नहीं (जो कि शायद उसके निकनेम की असली वजह है) बल्कि इसलिए कि बॉलिंग एक्शन के वक्त उसके हाथ किसी हाथी की सूंड जैसे लहराते थे&#8230; मानो हाथी नारियल उठा के नमस्कार कर रहा हो.</p>
<p>फिर बाद में जब हमें पता चला कि टीम ने उसका नाम जम्बो रख दिया है तो हमें बड़ी खुशी हुई&#8230;</p>
<p><strong>मिहिर:~</strong> अगर मुझे सही याद है तो 88.. उसी पारी में अज़हर ने सेंचुरी बनायी थी और कुंबले ने उसके साथ एक लम्बी पार्टनरशिप की थी. अज़हर के आउट होते ही मुझे डर लगा था कि देखना अब कुंबले की सेंचुरी रह जायेगी और वही हुआ था. 90s की क्रिकेट तो मुझे (हमें!) ज़बानी रटी हुई है!</p>
<p><img class="alignright" style="float: right;" src="http://bp0.blogger.com/_MuOF0Z25zBA/R4em8fE-oeI/AAAAAAAAASg/iibVMSFZ6sM/s400/Anil+Kumble+Wallpaper.jpg" alt="" width="150" height="100" />एक दौर था जब मैं कुंबले के एक-एक विकेट को गिना करता था. मैं उसकी ही वजह से स्पिनर बना (अपनी गली क्रिकेट का ऑफ़ कोर्स!) और उसके होने से मुझे दुनिया कुछ ज्यादा आसान लगती थी. क्लास में बिना होमवर्क किए जाने के डर से कुंबले की बॉलिंग निजात दिलाती थी. संजय जी की डांट से कुंबले बचाता था (मुझे ऐसा लगता था). एक self-confidence आता था मेरे भीतर जो ये अनिल कुंबले नाम का शक़्स देता था. चाहे कुछ हो जाए.. चाहे मैच में स्कोर 200-1 हो लेकिन इसकी बॉलिंग में फर्क नहीं देखा कभी&#8230;</p>
<p>कभी कभी लगता है कि ये दौर आज नही ख़त्म हुआ है, ये दौर तो बहुत पहले जा चुका. लेकिन एक भरम हम बनाकर रखते हैं जैसा तुमने कहा. आज वो टूट गया&#8230;</p>
<p>टाईटन कप.. सहारा कप.. Independence cup.. टाईटन कप में कुंबले और श्रीनाथ की वो लास्ट पार्टनरशिप याद है! उस मैच में सचिन को मैन-ऑफ़-दी-मैच मिला था लेकिन बाद में सचिन ने कहा था कि मैं तो मैच को बिना जिताए आउट होकर आ गया था, मैच तो इन दोनों ने जिताया है. मैन-ऑफ़-दी-मैच तो इन्हें मिलना चाहिए. और सबने कहा था, मैच बंगलौर में था ना.. आख़िर शहर के लड़के ही स्टार बने हैं! और फिर वो फाइनल.. क्या दिन थे यार!</p>
<p>आज लगता है मैं बड़ा हो गया यार. बचपन ख़त्म हुआ&#8230;</p>
<p><img class="alignright" style="float: right;" src="http://www.hinduonnet.com/thehindu/2006/03/12/images/2006031203591901.jpg" alt="" width="100" height="160" /><strong>वरुण:~</strong> हाँ&#8230;मैं बचपन में बहुत मोटा था और तेज़ बॉलिंग तो कर ही नहीं सकता था. ऐसे वक्त में मुझे मेरा हीरो मिल गया था &#8211; कुंबले. दो लम्बी डींगें भरो, हाथ को हवा में ऊँचा ले जाओ, और गेंद छोड़ते समय ऊँगली से हल्का सा झटका या ट्विस्ट दो&#8230;लेग-स्पिन नहीं तो ऑफ़-स्पिन तो हो ही जाती थी.</p>
<p>और गेंद करने से पहले, हाथ में गेंद को घुमाते हुए उछालना&#8230; उस वक्त लगता था हम भी कुंबले हैं. लगता था बैट्समैन अब हमसे भी डर रहा होगा. मुझे आज तक हाथ में वैसे गेंद घुमाने का शौक है&#8230; और एक अजीब सा confidence आता है अपने अन्दर.</p>
<p>और सही कहते हो- वो वाला दौर कब का जा चुका. हम बस उसके illusion में जी रहे हैं&#8230; और वो भी टूटता जाता है.</p>
]]></content:encoded>
			<wfw:commentRss>http://mihirpandya.com/2008/11/kumble-retirement/feed/</wfw:commentRss>
		<slash:comments>15</slash:comments>
		</item>
		<item>
		<title>सचिन नामक मिथक की खोज उर्फ़ सुनहरे गरुड़ की तलाश में.</title>
		<link>http://mihirpandya.com/2008/05/%e0%a4%b8%e0%a4%9a%e0%a4%bf%e0%a4%a8-%e0%a4%a8%e0%a4%be%e0%a4%ae%e0%a4%95-%e0%a4%ae%e0%a4%bf%e0%a4%a5%e0%a4%95-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%96%e0%a5%8b%e0%a4%9c-%e0%a4%89%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%ab/</link>
		<comments>http://mihirpandya.com/2008/05/%e0%a4%b8%e0%a4%9a%e0%a4%bf%e0%a4%a8-%e0%a4%a8%e0%a4%be%e0%a4%ae%e0%a4%95-%e0%a4%ae%e0%a4%bf%e0%a4%a5%e0%a4%95-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%96%e0%a5%8b%e0%a4%9c-%e0%a4%89%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%ab/#comments</comments>
		<pubDate>Fri, 30 May 2008 02:34:00 +0000</pubDate>
		<dc:creator>मिहिर</dc:creator>
				<category><![CDATA[Memoir]]></category>
		<category><![CDATA[cricket]]></category>
		<category><![CDATA[IPL]]></category>
		<category><![CDATA[सचिन]]></category>

		<guid isPermaLink="false">http://www.mihirpandya.com/blog/?p=18</guid>
		<description><![CDATA[
सचिन हमारी आदत में शुमार हैं. रविकांत मुझसे पूछते हैं कि क्या सचिन एक मिथक हैं? हमारे तमाम भगवान मिथकों की ही पैदाइश हैं. क्रिकेट हमारा धर्म है और सचिन हमारे भगवान. यह सराय में शाम की चाय का वक्त है. रविकांत और संजय बताते हैं कि वे चौबीस तारीख़ को फिरोजशाह कोटला में IPL [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p><a href="http://bp1.blogger.com/_oWd-c4uUHz4/SD_05sF-duI/AAAAAAAAAEo/BU6lxK3NTfo/s1600-h/best_86312a.jpg" onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}"><img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5206148966189528802" style="margin: 0pt 10px 10px 0pt; float: left; cursor: pointer;" src="http://bp1.blogger.com/_oWd-c4uUHz4/SD_05sF-duI/AAAAAAAAAEo/BU6lxK3NTfo/s320/best_86312a.jpg" border="0" alt="" /></a><br />
<a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Sachin_Tendulkar"><span><span>सचिन</span></span></a> हमारी <span>आदत</span> में शुमार हैं. रविकांत मुझसे पूछते हैं कि क्या सचिन एक मिथक हैं? हमारे तमाम भगवान मिथकों की ही पैदाइश हैं. क्रिकेट हमारा धर्म है और सचिन हमारे भगवान. यह सराय में शाम की चाय का वक्त है. रविकांत और <span>संजय</span> बताते हैं कि वे चौबीस तारीख़ को फिरोजशाह कोटला में <a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Indian_Premier_League">IPL</a> का मैच देखने जा रहे हैं. रविकांत चाहते हैं कि मुम्बई आज मोहाली से हार जाए. यह दिल्ली के सेमी में <span><span><span>पहुँच</span></span></span>ने के लिए ज़रूरी है. दिल्ली नए खिलाड़ियों की टीम है और उसे सेमी में होना ही चाहिए. आशीष को सहवाग का उजड्डपन पसंद नहीं है. संजय जानना चाहते हैं कि क्या मैदान में सेलफोन ले जाना मना है? मैं <span>उन्हें</span> बताता हूँ कि मैं भी जयपुर में छब्बीस तारीख़ को होनेवाला आखिरी मैच देखने की कोशिश करूंगा. यह राजस्थान और मुम्बई के बीच है. चाय के प्याले और बारिश के शोर के बीच हम सचिन को बल्लेबाज़ी करते देखते हैं. रविकांत मुझसे पूछते हैं कि क्या सचिन एक खिलाड़ी नहीं मिथक का नाम है? वे चौबीस तारीख़ को दिल्ली-मुम्बई मैच देखने जा रहे हैं और मैं छब्बीस तारीख़ को राजस्थान-मुम्बई. चाय के प्याले और बारिश के शोर के बीच मैं अपने आप से पूछता हूँ&#8230;</p>
<p>कहते हैं सचिन अपने बोर्ड एग्जाम्स में सिर्फ़ 6 अंकों से मैच हार गए थे. उनका तमाम क्रिकेटीय जीवन इसी अधूरे 6 रन की भर<span><span><span>पाई</span></span></span> है. क्रिकेट के आदि पुरूष <a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Donald_Bradman"><span>डॉन</span> <span>ब्रेडमैन</span></a> से उनके अवतार में यही मूल अंतर है. सचिन क्रिकेट के एकदिवसीय युग की पैदाइश हैं. डॉन के पूरे टेस्ट जीवन में छक्कों की संख्या का कुल जोड़ इकाई में है. उनका अवतार अपनी एक पारी में इससे अधिक छक्के मारता है. सचिन हमें ऊपर खड़े होकर नीचे देखने का मौका देते हैं. शिखर पर होने का अहसास. सर्वश्रेष्ठ होने का अहसास.</p>
<p>सचिन टेस्ट क्रिकेट के सबसे महान बल्लेबाज़ नहीं हैं. <a href="http://www.cricinfo.com/almanack/almanack-splash.html"><span>विज्डन</span></a> ने <a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Wisden_Cricketers_of_the_Century">सदी का महानतम क्रिकेटर</a> चुनते हुए उन्हें बारहवें स्थान पर रखा था. एकदिवसीय के महानतम बल्लेबाज़ ने भारत को कभी विश्वकप नहीं जिताया है. वे एक असफल कप्तान रहे और उनके नाम लगातार पांच टेस्ट हार का रिकॉर्ड दर्ज है. माना जाता है कि उनकी तकनीक अचूक नहीं है और वह बांयें हाथ के स्विंग गेंदबाजों के सामने परेशानी महसूस करते हैं. उनके बैट और पैड के बीच में गैप रह जाता है और इसीलिए उनके आउट होने के तरीकों में बोल्ड और IBW का प्रतिशत सामान्य से ज़्यादा है. तो आख़िर यह सचिन का मिथक है क्या?</p>
<p><a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Shahrukh_Khan"><span>शाहरुख़</span></a> और सचिन वैश्वीकरण की नई राह पकड़ते भारत का प्रतिनिधि चेहरा हैं. यह 1992 विश्वकप से पहले की बात है. <a href="http://en.wikipedia.org/wiki/India_Today">&#8216;इंडिया टुडे&#8217;</a>, जिसकी खामियाँ और खूबियाँ उसे भारतीय मध्यवर्ग की प्रतिनिधि पत्रिका बनाती हैं, को आनेवाले विश्वकप की तैयारी में क्रिकेट पर कवर स्टोरी करनी थी. उसने इस कवर स्टोरी के लिए खेल के बजाए इस खेल<a href="http://bp1.blogger.com/_oWd-c4uUHz4/SD_1MsF-dvI/AAAAAAAAAEw/a2FaJutmT8Q/s1600-h/tendulkarchildhoodyoung.jpg" onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}"><img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5206149292607043314" style="margin: 0pt 10px 10px 0pt; float: left; cursor: pointer; width: 130px; height: 202px;" src="http://bp1.blogger.com/_oWd-c4uUHz4/SD_1MsF-dvI/AAAAAAAAAEw/a2FaJutmT8Q/s320/tendulkarchildhoodyoung.jpg" border="0" alt="" /></a> के एक नए उभरते सितारे को चुना. गौर कीजिये यह उस दौर की बात है जब सचिन ने अपना पहला एकदिवसीय शतक भी नहीं बनाया था. एक ऐसी कहानी जिसमें कुछ भी नकारात्मक नहीं हो. भीतर स<span><span><span>चिन</span></span></span> के बचपन की लंबे घुंघराले बालों वाली मशहूर तस्वीर थी. वो बचपन में जॉन मैकैनरो का फैन था और उन्हीं की तरह हाथ में पट्टा बाँधता था. उसे दोस्तों के साथ कार में तेज़ संगीत बजाते हुए लांग ड्राइव पर जाना पसंद है. यह सचिन के मिथकीकरण की शुरुआत है. एक बड़ा और सफ़ल खिलाड़ी जिसके पास अरबों की दौलत है लेकिन जिसके लिए आज भी सबसे कीमती वो तेरह एक रूपये के सिक्के हैं जो उसने अपने गुरु रमाकांत अचरेकर से पूरा दिन बिना आउट हुए बल्लेबाज़ी करने पर इनाम में पाए थे. एक मराठी कवि का बेटा जो अचानक मायानगरी <a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Mumbai">मुम्बई </a>का, जवान होती नई पीढ़ी और उसके अनंत ऊँचाइयों में पंख पसारकर उड़ते सपनों का, नई करवट लेते देश का प्रतीक बन जाता है. और यह सिर्फ़ युवा पीढ़ी की बात नहीं है. जैसा मुकुल केसवन उनके आगमन को यादकर लिखते हैं कि बत्तीस साल की उमर में उस सोलह साल के लड़के के माध्यम से मैं वो उन्मुक्त जवानी फ़िर जीना चाहता था जो मैंने अपने जीवन में नहीं पाई.</p>
<p>सचिन की बल्लेबाज़ी में उन्मुक्तता रही है. उनकी महानतम एकदिवसीय पारियाँ इसी बेधड़क बल्लेबाज़ी का नमूना हैं. हिंसक तूफ़ान जो रास्ते में आनेवाली तमाम चीजों को नष्ट कर देता है. 1998 में आस्ट्रेलिया के विरुद्ध शारजाह में उनके बेहतरीन शतक के दौरान तो वास्तव में रेत का तूफ़ान आया था. लेकिन बाद में देखने वालों ने माना कि सचिन के बल्ले से निकले तूफ़ान के मुकाबले वो तूफ़ा<span><span><span>न</span></span></span> फ़ीका था. यही वह श्रृंखला है जिसके बाद रिची बेनो ने उन्हें विश्व का सर्वश्रेष्ठ बल्लेबाज़ कहा था. यहाँ तक आते-आते सचिन नामक मिथक स्थापित होने लगता है. लेकिन सचिन नामक यह मिथक उनकी बल्लेबाज़ी की उन्मुक्तता में नहीं है. वह उनके व्यक्तित्व की साधारणता में छिपा है. उनके समकालीन महान<a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Brian_Lara"> <span>ब्रायन</span> <span>लारा</span></a> अपने घर में बैट की शक्ल का स्विमिंग पूल बनवाते हैं. सचिन सफलता के बाद भी लंबे समय तक अपना पुराना साहित्य सहवास सोसायटी का घर नहीं छोड़ते. एक और समकालीन महान <a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Shane_Warne"><span>शेन</span> <span>वॉर्न</span></a> की तरह उनके व्यक्तिगत जीवन में कुछ भी मसालेदार और विवादास्पद नहीं है. वे एक आदर्श नायक हैं. मर्यादा पुरुषोत्तम राम की तरह. लेकिन जब वह बल्लेबाज़ी करने मैदान पर आते हैं तो कृष्ण की तरह लीलाएं दिखाते हैं. शेन वॉर्न का कहना है कि सचिन उनके सपनों में आते हैं और उ<span><span><span>नकी</span></span></span> गेंदों पर आगे बढ़कर छक्के लगाते हैं.</p>
<p>सचिन नब्बे के दशक <span><span><span>के</span></span></span> हिंदुस्तान की सबसे सुपरहिट फ़िल्म हैं. इसमें ड्रामा है, इमोशन है, ट्रेजेडी है, संगीत है और सबसे बढ़कर &#8216;फीलगुड&#8217; है. एक बेटा है जो पिता की मौत के ठीक बाद अपने कर्मक्षेत्र में वापिस आता है और अपना कर्तव्य बख़ूबी पूरा <a href="http://bp0.blogger.com/_oWd-c4uUHz4/SD_9kcF-dwI/AAAAAAAAAE4/fuE4d7MJb00/s1600-h/2281831206_d29335bbeb_m.jpg" onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}"><img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5206158496721958658" style="margin: 0pt 10px 10px 0pt; float: left; cursor: pointer;" src="http://bp0.blogger.com/_oWd-c4uUHz4/SD_9kcF-dwI/AAAAAAAAAE4/fuE4d7MJb00/s320/2281831206_d29335bbeb_m.jpg" border="0" alt="" /></a><span><span><span>करता</span></span></span> है. एक दोस्त है जो सफलता की बुलंदियों पर पहुँचकर भी अपने <a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Vinod_Kambli">दोस्त </a>को नहीं भूलता और उसकी नाकामयाबी <span>की</span> टीस सदा  अपने दिल में रखता है. एक ऐसा आदर्श नायक है जो मैच फिक्सिंग के दलदल से भी बेदाग़ बाहर निकल <span><span><span>आता</span></span></span> है. नब्बे का दशक भारतीय मध्यवर्ग के लिए अकल्पित सफलता का दौर तो है लेकिन अनियंत्रित विलासिता का नहीं. सचिन इसका प्रतिनिधि चेहरा बनते हैं. और हमेशा की तरह एक सफलता की गाथा को मिथक में तब्दील कर उसके पीछे हजारों बरबाद जिंदगियों की <span><span><span>कहानी</span></span></span> को दफ़नाया जाता है.</p>
<p>सचिन मेरे सामने हैं. पहली बार आंखों के सामने, साक्षात्! मैं उन्हें खेलते देखता हूँ. वे थके से लगते हैं. वे लगातार अपनी ऊर्जा बचा रहे हैं. उस आनेवाले रन के लिए जो उन्हें फ़ुर्ती से दौड़ना होगा. अबतक वे एक हज़ार से ज़्यादा दिन की अन्तरराष्ट्रीय क्रिकेट खेल चुके हैं. अगले साल उन्हें इस दुनिया में बीस साल पूरे हो जायेंगे. और फ़िर अचानक वे शेन वाटसन का कैच लपकने को एक अविश्वसनीय सी छलाँग लगाते हैं और बच्चों की तरह खुशी से उछल पड़ते हैं. मिथक फ़िर से जी उठता है.</p>
<p>सचिन की टीम मैच हार जाती है. जैसे ऊपर बैठकर कोई इस <a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Indian_Premier_League">IPL</a> की स्क्रिप्ट लिख रहा है. चारों पुराने सेनानायकों द्रविड़, सचिन, गाँगुली और लक्ष्मण की सेनाएँ सेमीफाइनल से बाहर हैं. इक्कीसवीं सदी ने अपने नए मिथक गढ़ने शुरू कर दिए हैं और इसका <a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Mahendra_Singh_Dhoni">नायक</a> मुम्बई से नहीं राँची से आता है. यह बल्लेबाज़ी ही नहीं जीवन में भी उन्मुक्तता का ज़माना है और इस दौर के नायक घर में बन रहे स्विमिंग पूल, पार्टियों में दोस्तों से झड़प और फिल्मी तारिकाओं से इश्क के चर्चों की वजह से सुर्खियाँ बटोरते हैं. राँची के इस नए नायक के लिए सर्वश्रेष्ठ होना महत्त्वपूर्ण नहीं है, जीतना महत्त्वपूर्ण है.</p>
<p>सितारा बुझकर ब्लैक होल में बदल जाने से पहले कुछ समय तक तेज़ रौशनी देता है. सचिन के प्रसंशकों का मानना है कि वो आँखें चौंधिया देने वाली चमक अभी आनी बाकी है. लेकिन मिथकों को पहले से जानने वाले लोगों को पता है कि देवताओं की मौत हमेशा साधारण होती है. कृष्ण भी एक बहेलिये के तीर से मारे गए थे. एक अनजान बहेलिये के शब्दभेदी बाण से मारा जाना हर भगवान् की और जलते-जलते अंत में बुझकर ब्लैक होल में बदल जाना हर सितारे की आखि़री नियति है.</p>
]]></content:encoded>
			<wfw:commentRss>http://mihirpandya.com/2008/05/%e0%a4%b8%e0%a4%9a%e0%a4%bf%e0%a4%a8-%e0%a4%a8%e0%a4%be%e0%a4%ae%e0%a4%95-%e0%a4%ae%e0%a4%bf%e0%a4%a5%e0%a4%95-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%96%e0%a5%8b%e0%a4%9c-%e0%a4%89%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%ab/feed/</wfw:commentRss>
		<slash:comments>7</slash:comments>
		</item>
		<item>
		<title>पधारो म्हारे देस!</title>
		<link>http://mihirpandya.com/2008/05/%e0%a4%aa%e0%a4%a7%e0%a4%be%e0%a4%b0%e0%a5%8b-%e0%a4%ae%e0%a5%8d%e0%a4%b9%e0%a4%be%e0%a4%b0%e0%a5%87-%e0%a4%a6%e0%a5%87%e0%a4%b8/</link>
		<comments>http://mihirpandya.com/2008/05/%e0%a4%aa%e0%a4%a7%e0%a4%be%e0%a4%b0%e0%a5%8b-%e0%a4%ae%e0%a5%8d%e0%a4%b9%e0%a4%be%e0%a4%b0%e0%a5%87-%e0%a4%a6%e0%a5%87%e0%a4%b8/#comments</comments>
		<pubDate>Wed, 07 May 2008 21:22:00 +0000</pubDate>
		<dc:creator>मिहिर</dc:creator>
				<category><![CDATA[cricket]]></category>
		<category><![CDATA[IPL]]></category>
		<category><![CDATA[शेन वार्न]]></category>

		<guid isPermaLink="false">http://www.mihirpandya.com/blog/?p=17</guid>
		<description><![CDATA[ कहाँ रंगीन मिजाज़ शेन वार्न और कहाँ पारंपरिक राजस्थान. जनता शंका में थी जी&#8230; सच्ची!

कुछ शहर के बारे में&#8230;
जयपुर के पुराने शहर में घरों का गुलाबी रंग कुछ उड़ा-उड़ा सा है लेकिन अब भी बाकी है. और इसके साथ ही जयपुर ने अपना ठेठ हिन्दुस्तानी अंदाज अब भी बचा कर रखा है. राजनीति में [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p><a href="http://bp2.blogger.com/_oWd-c4uUHz4/SCIcXttYdiI/AAAAAAAAAEg/j6KUWzCDzSM/s1600-h/shane1600x1200.jpg"><img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5197748113671484962" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; CURSOR: hand" src="http://bp2.blogger.com/_oWd-c4uUHz4/SCIcXttYdiI/AAAAAAAAAEg/j6KUWzCDzSM/s320/shane1600x1200.jpg" border="0" alt="" /></a> <span>कहाँ</span> रंगीन मिजाज़ <a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Shane_Warne">शेन वार्न</a> और कहाँ पारंपरिक राजस्थान. जनता शंका में थी जी&#8230; सच्ची!</p>
<p><strong></strong><br />
<strong><span>कुछ शहर</span> के बारे में&#8230;</strong><br />
जयपुर के पुराने शहर में घरों का गुलाबी रंग कुछ उड़ा-उड़ा सा है लेकिन अब भी बाकी है. और इसके साथ ही जयपुर ने अपना ठेठ हिन्दुस्तानी अंदाज अब भी बचा कर रखा है. राजनीति में जयपुर भा.ज.पा. का गढ़ माना जाता है. गिरधारीलाल भार्गव यहाँ से सांसद हैं और पुरानी बस्ती में उनके बारे में मशहूर है कि शहर में अपनी पैठ उन्होंने लोगों की अर्थियों को कांधा देकर बनाई है. वो रोज़ सुबह उठकर अखबार पढ़ते हैं. देखते हैं कि श्रद्धांजलि वाले कॉलम में किसकी मौत की सूचना है और फिर पहुँच जाते हैं उनके घर. और इसी प्रतिष्ठा के दम पर वो एक चुनाव में जयपुर के राजा भवानी सिंह को भी हरा चुके हैं. कहते हैं कि यहाँ भा.ज.पा. पत्थर की मूरत को भी चुनाव में खड़ा कर दे तो वो भी जीत जाए. समय-समय पर प्रमोद महाजन, अटल बिहारी वाजपेयी जैसे नेताओं के लिए सुरक्षित सीट की तलाश में उन्हें जयपुर से लोकसभा का चुनाव लड़वाने का प्रस्ताव आता रहा है. लोकसभा चुनावों में यहाँ शहर में हर तरफ़ एक ही गीत बजता है&#8230; &#8220;शावा नी गिरधारीलाल! बल्ले नी गिरधारीलाल!&#8221;</p>
<p><strong>जीत के पहले&#8230;</strong><br />
16 तारीख को मैं जयपुर पहुँचा. कुछ इस तरह की खबरों ने मेरा स्वागत किया :-</p>
<p>अरे भाई वॉर्न आया है. कोई ना कोई कांड तो करेगा ही! जनता इसी आशंका (पढ़ें उम्मीद) में थी.</p>
<p>सुना है शहर की नर्सों को ख़ास हिदायत दी गई है कि किसी भी अनजान नंबर से SMS आने पर तुरंत IPL के अधिकारियों को सूचित करें. और अगर SMS में गुगली या फ्लिपर जैसे शब्दों का प्रयोग हो तो सीधा ललित मोदी को रिपोर्ट करें.</p>
<p>कुछ लोग यह भी ख़बर लाये थे कि वॉर्न को ख़ास नोकिया 2100 दिया गया है उसके घातक SMS पर नियंत्रण के लिए और उसके फ़ोन को विशेष निगरानी में रखा गया है.</p>
<p>शेन वॉर्न के शहर में आगमन के साथ ही सिगरेट की बिक्री में भारी इजाफा दर्ज किया गया है.</p>
<p>रोहित का कहना था कि हर टीम के पास स्टार है. किसी के साथ शाहरुख़ है तो किसी के साथ प्रिटी जिंटा. इसपर भास्कर का कहना था कि हमारे पास भी तो स्टार है, रोहित राय! और इला अरुण और मिला लो तो फिर और कौन टिकता है हमारे सामने! ऐसा भी सुना गया कि ललित मोदी ने जयपुर में पहले मैच में रोहित राय के पोस्टर बेचे. उसमें रोहित राय शर्ट-लेस अपनी सिक्स पैक ऐब्स दिखा रहा था! क्या बात है, तुम्हारे पास शाहरुख़ तो हमारे पास रोहित राय! वाह क्या मुकाबला है!</p>
<p>पहला मैच देखने आए लोगों को जब पता चला कि समीरा रेड्डी का नाच मैच के पहले ही हो चुका तो उन्होंने अपने पैसे वापिस लौटाने की मांग की. बाकि लोगों ने चीयरलीडर्स से तसल्ली की.</p>
<p><strong>जीत के बाद&#8230;<br />
</strong>लगातार 5 जीत और IPL टेबल में सबसे ऊपर आने के बाद शेन वॉर्न अब राजस्थान का अपना छोरा है. आने वाले समय में आप कुछ ऐसी चीजों के लिए तैयार रहें&#8230;</p>
<p>इस महान वीर कर्म के लिए वॉर्न को तेजाजी,पाबूजी और रामदेव जी की तरह लोकदेवता का दर्जा मिल सकता है. आपकी जानकारी के लिए हम बता दें कि ये सभी लोकदेवता साधारण मनुष्य ही थे जो आमतौर पर गाय या अन्य पशुओं की रक्षा में मारे गए. वैसे ही उसके मन्दिर बन सकते हैं जहाँ परसाद में सिगरेट चढ़ा करेंगी. बोलो शेन वॉर्न महाराज की जय!</p>
<p>अगले RAS के पेपर में राजस्थान के सामान्य ज्ञान में एक सवाल होगा, &#8220;राजस्थान के दो वीर योद्धा जिनका एक ही नाम हैं और जिनके पराक्रम के किस्से बच्चे-बच्चे की ज़बान पर हैं.&#8221; और जवाब होगा, &#8220;शेन वॉर्न और शेन वाटसन.&#8221;</p>
<p>राजकुमार संतोषी अपना सर पीट रहा होगा. कह रहा होगा कि अब अपनी फ़िल्म &#8216;हल्ला बोल&#8217; रिलीज़ करता तो राजस्थान रोयल्स के हल्ला बोल में वो भी चल जाती.</p>
<p>इला अरुण को एक संगीत कम्पनी फिर से प्राइवेट अल्बम का कांट्रेक्ट देगी. वीडियो में रखी सावंत को लिया जाएगा (और कौन!) बाद में दोनों में कौन ज्यादा पैसे लेगा इसको लेकर झगड़ा होगा और दोनों एक-दूसरे से ज्यादा बड़ी आईटम होने का दावा करेंगी. राखी हाल ही में आए &#8216;देखता है तू क्या&#8217; का हवाला देंगी और इला अरुण &#8216;दिल्ली शहर में म्हारो घाघरो जो घूम्यो&#8217; को सबूत के तौर पर पेश करेंगी. फिर इस मुद्दे <span>पर राष्ट्रीय मीडिया द्वारा </span>एक देशव्यापी SMS अभियान चलेगा. नतीजे का हमें भी इंतज़ार है.<br />
&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;</p>
<p>यहाँ सबकुछ मिलेगा सिवाय क्रिकेट के. निवेदन है कि उसकी तलाश ना करें. अगर क्रिकेट देखनी है तो इंग्लैंड- न्यूजीलैंड टेस्ट सीरीज़ (15 मई) और ऑस्ट्रेलिया- वेस्ट इंडीज़ टेस्ट सीरीज़ (22 मई) का इंतज़ार करें. चाहें तो 11 मई को मैनचेस्टर यूनाइटेड को खिताब जीतते देखें जैसी उम्मीद है.</p>
]]></content:encoded>
			<wfw:commentRss>http://mihirpandya.com/2008/05/%e0%a4%aa%e0%a4%a7%e0%a4%be%e0%a4%b0%e0%a5%8b-%e0%a4%ae%e0%a5%8d%e0%a4%b9%e0%a4%be%e0%a4%b0%e0%a5%87-%e0%a4%a6%e0%a5%87%e0%a4%b8/feed/</wfw:commentRss>
		<slash:comments>8</slash:comments>
		</item>
		<item>
		<title>उदय भारतीय क्रिकेट के युवराज का</title>
		<link>http://mihirpandya.com/2007/09/%e0%a4%89%e0%a4%a6%e0%a4%af-%e0%a4%ad%e0%a4%be%e0%a4%b0%e0%a4%a4%e0%a5%80%e0%a4%af-%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%bf%e0%a4%95%e0%a5%87%e0%a4%9f-%e0%a4%95%e0%a5%87-%e0%a4%af%e0%a5%81%e0%a4%b5/</link>
		<comments>http://mihirpandya.com/2007/09/%e0%a4%89%e0%a4%a6%e0%a4%af-%e0%a4%ad%e0%a4%be%e0%a4%b0%e0%a4%a4%e0%a5%80%e0%a4%af-%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%bf%e0%a4%95%e0%a5%87%e0%a4%9f-%e0%a4%95%e0%a5%87-%e0%a4%af%e0%a5%81%e0%a4%b5/#comments</comments>
		<pubDate>Sun, 23 Sep 2007 11:08:00 +0000</pubDate>
		<dc:creator>मिहिर</dc:creator>
				<category><![CDATA[cricket]]></category>

		<guid isPermaLink="false">http://www.mihirpandya.com/blog/?p=5</guid>
		<description><![CDATA[
इंडिया-इंग्लैंड मैच मे देखी गई उस स्वर्गिक पारी के बाद जिसे युवराज ने कंगारुओं के ख़िलाफ़ दोहरा दिया. खेल में देखे गए सबसे शुद्ध बल्लेबाजो में से एक के लिए&#8230;

&#8220;दिनों, महिनों, साल लोग इंतज़ार करते हैं। आसमाँ की ओर सर करके दुआएँ करते हैं। उस एक शाम का जब उनकी दुआ कुबूल होगी. और फ़िर [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p><a href="http://img85.imageshack.us/img85/8716/620077pv.jpg"><img style="margin: 0px 10px 10px 0px; float: left; width: 200px;" src="http://img85.imageshack.us/img85/8716/620077pv.jpg" border="0" alt="" /></a></p>
<div>इंडिया-इंग्लैंड मैच मे देखी गई उस स्वर्गिक पारी के बाद जिसे युवराज ने कंगारुओं के ख़िलाफ़ दोहरा दिया. खेल में देखे गए सबसे शुद्ध बल्लेबाजो में से एक के लिए&#8230;<br />
<em><br />
<span>&#8220;दिनों</span>, महिनों, साल लोग इंतज़ार करते हैं। आसमाँ की ओर सर करके दुआएँ करते हैं। उस एक शाम का जब उनकी दुआ कुबूल होगी. और फ़िर एक दिन आसमान से नूर बरसता है. उस दिन उनकी दुआ कुबूल होती है और <strong>युवराज</strong> आता है।&#8221;</em><br />
<em></em><br />
<em>&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;..</em><br />
कहा गया था कि युवराज में ग्रीम पोलक और गैरी सोबर्स के बीच का क्रॉस दिखाई देता है। मुझसे जब भी पूछा गया कि अपना पसन्दीदा बल्लेबाज बताओ तो हमेशा गिब्स के बाद मैं युवराज का ही नाम लेना चाहता था। मेहनत और लगन में स्टीव वॉ से लेकर राहुल द्रविड तक का नाम आयेगा लेकिन दर्शनीयता में लारा और गिब्स के बाद युवराज का उदय हुआ है। यहाँ बल्लेबाजी में पानी सी तरलता है. शफ़क-शुद्धता. लेकिन मेरी ज़ुबाँ रुक जाती थी. युवराज का नाम लेने के लिये मुझे एक ज़मीन चहिये थी. मेरी हिचक आज गयी है. मुझे मेरी ज़मीन मिल गयी. ये २०-२० विश्व कप की पारियाँ पहली नहीं हैं युवराज को जानने के लिये लेकिन अब लग रहा है की भारतीय क्रिकेट का ये बिगडा बच्चा वपिस अपने काम पर है!</div>
]]></content:encoded>
			<wfw:commentRss>http://mihirpandya.com/2007/09/%e0%a4%89%e0%a4%a6%e0%a4%af-%e0%a4%ad%e0%a4%be%e0%a4%b0%e0%a4%a4%e0%a5%80%e0%a4%af-%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%bf%e0%a4%95%e0%a5%87%e0%a4%9f-%e0%a4%95%e0%a5%87-%e0%a4%af%e0%a5%81%e0%a4%b5/feed/</wfw:commentRss>
		<slash:comments>1</slash:comments>
		</item>
	</channel>
</rss>
