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राँझा राँझा
प्रायद्वीपीय भारत को पछाड़ती, दक्षिण से उत्तर की ओर भागती एक रेलगाड़ी में गुलज़ार द्वारा फ़िल्म ’रावण’ के लिए लिखा गीत ’राँझा राँझा’ सुनते हुए…
शुरुआती आलाप में कहीं गहरे महिला स्वर की गूँज है. और बहती हवाओं की सनसनाहट भी जैसे स्त्री रूपा है. रेखा अपनी आवाज़ को बह जाने देती हैं. बियाबान में भटकने देती हैं. उसे अब फ़िकर नहीं ज़माने की, परवाह नहीं रुसवाइयों की. कहना है हीर का कि उस राँझा का नाम लेते-लेते अब मैं खुद राँझा हो गई हूँ. अरे ओ ज़माने, अब मुझे हीर नहीं, राँझा कहकर ही बुलाया कर…
राँझा राँझा करदी वे मैं…
जावेद अली की आवाज़ साफ़ है, खड़ी एकदम. जैसे उसे ज़माने की परवाह हो, किसी की नज़रों में आने से दिल धड़कता हो. पुरुष स्वर थोड़ी ज़्यादा व्यावहारिकता समझता है. ’दिल अगर आ भी गया, वो तेरा शहर नहीं’. नदी होना बस स्त्री के ही हिस्से है. वे दूसरी तरफ़ इसके सिरे को सम्भाले रखते हैं. रोक लो इस उफनते समन्दर को नहीं तो ये अपने साथ हम दोनों को भी बहा ले जायेगा..
राँझा राँझा ना कर हीरे जग बदनामी होए,
पत्ती पत्ती झर जावे पर खुशबू चुप न होए.
गुलज़ार की दुनिया में खुशबू ’कम न होने’ की बजाय ’चुप नहीं होती’ है. बड़ा मज़ेदार है ये देखना कि कैसे आवाज़ की ये खूबियाँ बोल के भावों से मिल जाती हैं और अद्भुत तालमेल पैदा करती हैं. स्त्री स्वर उसकी चोरी पकड़ लेता है, “देखना पकड़ा गया, इश्क़ में जकड़ा गया” और पुरुष स्वर अपनी प्यारी सी बेचारगी कुछ यूँ बताता है, “आँख से हटती नहीं, अरे हटती नहीं, अरे हटती नहीं…”
शुरुआत में पुरुष बोल सीख वाले, देख, संभल कर चल, वाले हैं. और जहाँ पुरुष स्वर के बोलों के भाव भटकने लगते हैं, ठीक वहीं पुरुष स्वर धीरे-धीरे ये ओढ़ी हुई गम्भीरता छोड़ता है.
बिना तेरे रातें, अरे रातें, क्यों लम्बी लगती हैं,
कभी तेरा गुस्सा, तेरी बातें, क्यों अच्छी लगती हैं.
“ये ढलते कोयले, अरे कोयले, अब रखना मुश्किल है…” और अंत में इन बोलों के साथ वो भी उसी नदी की धारा में बह जाता है जिसे स्त्री रूपा हवाओं की सनसनाहट, अनुराधा का रगड़ खाता हुआ आलाप और रेखा का स्त्री स्वर इस गीत के शुरु में अपने साथ लेकर आए थे.



आनन्द आया पढ़कर.
बहुत बढ़िया ,ऊपर वाली टिप्पणी दोहराना चाहूँगा :आनंद आया पढकर
Bahut Khuub.. Waise Gulzar sahab ke to kehene hi kya,,,,
बेहतरीन है ये! सचमुच बहुत प्यारा सा गाना है और
मिहिर तुम्हारा विश्लेषण इस खूबसूरती को प्यार से
बयां करता है…
geet suna tha sureela bhi laga gungunaya bhi.apka sangeetmay vishleshan padkar lagta hai dekhna bhi padega.
यक़ीनन गुलज़ार किसी पुरानी वाइन की माफिक है .जित्ते पुराने……. उतना अधिक नशा
mujhe lagta hai ki maniratnam ne Gulzar aur Rahman ko ek aadat sa bana liya hai.Aisa hi kuch Vishal bhardwaj aur gulzar ke saath hai. Rahman aur Gulzar to puraane hain hi lekin inke saath dikkat hain ki ye waqt ke saath khud ko dhaal nahin paa rahe hain. rahman ka sangeet ab din-b-din lagbhag ek jaisa hota dikhta hai, gulzar to Ishqiya ke baad se nazar se neeche ja rahe hain. Gulzar to nahin…. lekin rahman se kaafi ummeedein abhi bhi baaki hain.
bahut accha likha jenab……..
roz apki ek post read karti hu muje achhi lagti h ye post bi achi lagi
गुलज़ार अपने समकालीन ल्य्रिक्स लेखको में से सबसे महान हैं | आपके व्हाखन की प्रशंशा करता हूँ
Mihir Jee ke udgar padh kar mujhe laga ki main ek sapneele sansar mein pahuch gaya hoon. Maa Vani ki kripa hai inpar. Asha hai ki inkee lekhani kee ye dhaar samay ke saath aur bhi teevra hoo… Dhanyavad.
गुलज़ार की दुनिया में खुशबू ’कम न होने’ की बजाय ’चुप नहीं होती’ है.
yahi baat is geet main ne bhi note ki thi..”’ki khushbu chup na hoye”….likha gya hai.
……….
is geet ka sangeet bhi bahut achcha laga mujhe.
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soofiyana andaaz mein freshness liye hue rahmaan-gulzaar ka sundar geet.
bahut achcha sir …………..
बहुत बढ़िया मज़ेदार| धन्यवाद|