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	<title>Comments on: ऑस्कर 2010 : क्या ’डिस्ट्रिक्ट 9&#8242; सर्वश्रेष्ठ फ़िल्म कहलाने की हक़दार नहीं है?</title>
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	<link>http://mihirpandya.com/2010/03/oscar-2010/</link>
	<description>सिनेमा, साहित्य, खेल, संगीत, एक युवा शहर धड़कता है यहाँ...</description>
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		<title>By: rani</title>
		<link>http://mihirpandya.com/2010/03/oscar-2010/comment-page-1/#comment-9063</link>
		<dc:creator>rani</dc:creator>
		<pubDate>Sat, 25 Sep 2010 06:02:21 +0000</pubDate>
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		<description>dost kis angle se tumhe terminator 2 ki kahani saral lagi, prakash daliye kripya.</description>
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		<title>By: मिहिर</title>
		<link>http://mihirpandya.com/2010/03/oscar-2010/comment-page-1/#comment-8948</link>
		<dc:creator>मिहिर</dc:creator>
		<pubDate>Wed, 10 Mar 2010 19:30:48 +0000</pubDate>
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		<description>@ Ashutosh.
कुछ तो दिल्ली में रहने का फ़ायदा है जो यहाँ कई महत्वपूर्ण (लेकिन रेयर) फ़िल्में सिनेमाघरों में प्रदर्शित होती हैं. और कुछ दोस्ताना लेन-देन (पब्लिक शेयरिंग) की मेहरबानी है जिसे दुनिया टॉरेन्ट के नाम से जानती है. अगर फ़िल्म थोड़ी भी चर्चित हुई है विदेशों में तो इस ज़रिए आसानी से मिल जाती है.

@Apoorva. 
तुमने तो पूरा लेख ही लिख डाला भाई जवाब में! अच्छा है. तुम्हारी कही ज़्यादातर बातों से तो मैं भी सहमत ही हूँ. और जहाँ असहमतियाँ हैं भी वो शायद अलग नज़रिए की निशानी हैं. सो बनी रहनी चाहिये. हाँ ’पब्लिक एनिमी’ की तारीफ़ मैंने सुनी है, देखी नहीं. अब कोशिश करूँगा कि देखना संभव हो पाए.</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>@ Ashutosh.<br />
कुछ तो दिल्ली में रहने का फ़ायदा है जो यहाँ कई महत्वपूर्ण (लेकिन रेयर) फ़िल्में सिनेमाघरों में प्रदर्शित होती हैं. और कुछ दोस्ताना लेन-देन (पब्लिक शेयरिंग) की मेहरबानी है जिसे दुनिया टॉरेन्ट के नाम से जानती है. अगर फ़िल्म थोड़ी भी चर्चित हुई है विदेशों में तो इस ज़रिए आसानी से मिल जाती है.</p>
<p>@Apoorva.<br />
तुमने तो पूरा लेख ही लिख डाला भाई जवाब में! अच्छा है. तुम्हारी कही ज़्यादातर बातों से तो मैं भी सहमत ही हूँ. और जहाँ असहमतियाँ हैं भी वो शायद अलग नज़रिए की निशानी हैं. सो बनी रहनी चाहिये. हाँ ’पब्लिक एनिमी’ की तारीफ़ मैंने सुनी है, देखी नहीं. अब कोशिश करूँगा कि देखना संभव हो पाए.</p>
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		<title>By: अपूर्व</title>
		<link>http://mihirpandya.com/2010/03/oscar-2010/comment-page-1/#comment-8947</link>
		<dc:creator>अपूर्व</dc:creator>
		<pubDate>Tue, 09 Mar 2010 19:43:47 +0000</pubDate>
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		<description>सागर के ब्लॉग-रोल के बहाने पहली बार आपके ब्लॉग पर आने का सुअवसर मिला..और इतना गहन और रोचक विश्लेषण पढ़ कर आनंद आया...कि खुद को कुछ कहने से रोक नही पाया..
अब जबकि अकैडमी अवार्ड्स की घोषणा हो चुकी है और कतिपय परिणामों को छोड़ कर (जैसे मेरे ख्याल से बेस्ट फ़ारेन फ़िल्म) सभी पूर्वप्रत्याशित विजेता ही रहे हैं..पिछले कुछ सालों मे से सबसे ’प्रेडिक्टेबल’ विनर्स-लिस्ट..मगर आपकी इस पोस्ट की सामयिकता कायम है और सार्थकता भी....कुछ बातों पर मैं भी अपनी राय रखूँगा.
अवतार व डिस्ट्रिक्ट 9: डिस्ट्रिक्ट 9 के बारे मे आपकी राय से पूर्णतः सहमत हूँ...साइंस-फ़िक्शन होने के बावजूद जिस अविश्वसनीय ईमानदारी से यह फ़िल्म हमारे सामाजिक यथार्थ की नब्ज पक़ड़ लेती है वह अद्भुत है..कुछ-कुछ वृत्तचित्रात्मक ’नोट’ पर शुरू हो कर फिर  अपने ’पेस’ व ’टेंशन’ द्वारा कथ्य पर मजबूत पकड़ से जहाँ यह फ़िल्म आगे बढ़ते हुए एक ’एजी थ्रिलर’ मे तब्दील हो जाती है..वहीं एक जबर्दस्त क्लाइमेक्स के द्वारा एक ’शॉक’ के साथ खत्म होती फ़िल्म ढेर सारे सवाल दे कर जाती है जो फिर दर्शक के जेहन मे देर तक घंटियों से बजते रहते हैं...जोहांस्बर्ग को केंद्र बनाने के बहाने ’फ़र्स्ट-वर्ल्ड कंट्रीज्‌’ की सत्ता पर प्रहार करने की आपकी निष्पत्ति पसंद आयी..वहीं यह भी ध्यान देने की बात है कि जोहानेसबर्ग मे ही अपना बचपन व्यतीत करने वाले इस फ़िल्म के डायरेक्टर नील ब्लॉकैम्प ने इस फ़िल्म मे अपनी ही एक पूर्ववर्ती शॉर्ट-फ़िल्म ’अलाइव इन जोबर्ग’ को ही विस्तार दिया है...जिसकी पृष्ठभूमि भी यही शहर है...इस फ़िल्म के नायक के रूप मे शार्लटो ने इस साल की सबसे बेहतरीन प्रफ़ार्मेंसेज्‌ मे से एक भूमिका दी है कि यह स्वीकार करना मुश्किल होता है कि  यह उनका प्रथम अंतर्राष्ट्रीय असाइनमेंट है..उनका नोमिनेट न होना आश्चर्यजनक रहा....यहाँ एक बात अवतार और ’ड्स्ट्रिक्ट 9 ’ दोनो फ़िल्मों के बीच की कुछ ’स्ट्राइकिंग सिमिलैरिटीज’ का भी जिक्र करना चाहूँगा..दोनो ही सांइस-फ़िक्शन्स हैं जो मानवों के एलियन्स से संघर्ष की कहानी कहते हैं..मगर पूर्ववर्ती एलियन फ़िल्मों की लीक से हटते हुए दोनों फ़िल्में मनुष्य जाति को शोषक और हानिरहित एलियन्स को ’विक्टिम्स’ के रूप मे चित्रित करती हैं..दोनो फ़िल्मे मानवों के कमर्शियल हितों के लिये एलियन्स को उनके स्थान से विस्थापित करने की साजिशों को कथा की आधारभूमि बनाती हैं..दोनो के नायक श्वेत मनुष्य हैं जो अपने निजी हितों के चलते एलियन्स से मध्यस्थता (या विश्वासघात?) का काम स्वीकार करते हैं..और इसके लिये झूठ को अपना आधार बनाते हैं..मगर अंततः दोनो ही फ़िल्मों मे नायक अपनी ही जाति के विरुद्ध हो जाते हैं..दोनो ही फ़िल्मों की एलियन प्रजाति सरल, शांतिप्रिय,  बेवकूफ़ और आपसी-संबंधों को तरजीह देने वाली हैं..और दोनों ही फ़िल्मों के अंत मे नायक स्वयं एलियन प्रजाति के सदस्य हो जाते हैं..इतने संयोग एक साथ चकित करते हैं..यह जानते हुए कि अवतार की कहानी जेम्स कमेरॉन ने १५ साल पहले ही लिख ली थी और डिस्ट्रिक्ट ९ के निर्देशक इसी कन्सेप्ट को अपनी पिछली शार्ट फ़िल्म मे कुछ वर्ष पहले दोहरा चुके थे..बहरहाल दोनो फ़िल्में पूँजीवाद के स्वार्थी व निजी फ़ायदे के लिये ’स्टॉप एट नथिंग’  एट्टीट्यूड को उघाड़ती हैं..यहाँ डिस्ट्रिक्ट 9 का स्लम व एलियन्स के साथ सामाजिक भेदभाव अफ़्रीका के ’अपार्थेड’ के लंबे व कुरूप इतिहास का नतीजा भी लगता है....अवतार के बारे मे आपने सही कहा है कि फ़िल्म का अस्ल चमत्कार उसका तकनीकी पक्ष है..दरअस्ल यह फ़िल्म अपने महाभव्य सेट्स, जादुई साज-सज्जा और इतर-लोकीय ट्रीटमेंट के द्वारा दर्शक पर जादुई प्रभाव डालती है और अपनी ’विजुअल भव्यता’ के द्वारा आपके संसेज्‌ को कैप्चर कर के रखती है..कि कथ्य स्तर की कमियाँ या नाटकीयता उपेक्षणीय हो जाती हैं..मगर उस जादू से बाहर आ कर फ़िल्म के कथ्य का डिटेल्ड निरीक्षण करने पर फ़िल्म उतनी प्रभावित करती नही लगती..मगर जो भी हो यह फ़िल्म कम से कम तकनीक के क्षेत्र मे एक नयी क्रांति जरूर करती है..और इसे पसंद करने के लिये किसी को इंटेलेक्टुअल होने की जरूरत भी नही होती..जो कैमेरॉन की फ़िल्मों की एक बड़ी सफ़लता है..

द हर्ट-लॉकर: मुझे लगता है कि स्रर्वश्रेष्ट फ़िल्मों मे नामांकित फ़िल्मों मे से इसे पुरस्कार मिलना एक सही निर्णय है (कम से कम जितनी मैने देखी हैं उनमे)..मैं इसकी तुलना ’सेविंग प्राइवेट रायन’ से नही करूंगा....इस फ़िल्म की सार्थकता और ’यूनीकनेस’ का अंदाजा ऐसे भी कर सकते हैं कि मेरा एक मित्र जो ’वार-फ़िल्म्स’ का बेहद शौकीन है, इस फ़िल्म को ऊँची उम्मीदों के साथ देखने के बाद निराश हुआ, कि इसमे युद्ध संबंधी फ़िल्मों के टिपिकल मसाले नही मिले..वैसे भी मैं ’वार-मूवीज्‌’ उनको मानता हूँ जो युद्ध का और युद्धवीरता का गुणगान करें व उसे ग्लैमरस रूप मे प्रस्तुत करें (’इंग्लॉरियस बास्टर्ड्स’ और काफ़ी हद तक ’सेविंग प्रायवेट रायन’ को इस कैटेगरी मे रख सकते हैं!..इन्ग्लॉरियस बास्टर्ड्स फ़िल्म के अंदर की फ़िल्म जिसकी स्क्रीनिंग हिटलर के लिये की जाती है शूरवीरता के इस ग्लैमर को अच्छे से सामने रखती है) ज्यादा संवेदनशील ’एंटी-वार मूवीज्‌’ होती हैं जो युद्ध के प्रति वितृष्णा पैदा करें और युध्दों की प्रासंगिकता जैसे मूलभूत सवाल का जवाब खोजने की कोशिश करें..इस सिलसिले मे मुझे ’अपोकैलिप्स नाउ’, ’कम ऐंड सी’ (रशियन) और ’ताइगुक्गी’ (कोरियन) जैसी फ़िल्मे याद आती हैं..’हर्ट-लॉकर’ मुझे इन कैटेगरीज्‌ से इतर अपना एक ’सब-जेनर’ स्थापित करती लगती है..जो मेरे ख्याल से युद्ध-भूमि को अपनी पृष्ठभूमि बनाती हुई सबसे विषम, ’अन्प्रेसेडेंटेड’ और ’एक्स्ट्रीम’ परिस्थितियों मे मानवों की ’रिएक्शन्स’ की जाँच-पड़ताल करती है, और यह वे रिएक्शन्स हैं जो देश-काल-समाज से अर्जित ज्ञान/अनुभव आधारित नही वरन्‌ मानवीय स्वभाव का मूलभूत और ’नेचुरल’ हिस्सा हैं..और इस बहाने सभ्यता के आवरण के बीच छिपे हमारे आदिम संस्कार और जिजीविषा उघड़ कर सामने आती है..यह एक रोचक सवाल हो सकता है कि फ़िल्म का ’प्रोटैगनिस्ट’ जो खतरे के मुँह मे हँसते हुए घुस जाता है तो अपने सीनियर्स की अवज्ञा करके बेवजह जान का जोखिम लेने की उसकी यह आदत उसके देश-प्रेम, मरीन-ट्रेंनिंग अथवा साथियों के प्रति अतिशय अनुराग की उपज है या खतरों से खेलने की उसकी ’नेचुरल इंस्टिक्ट’?..अगर यही नायक इराकी उपद्रवकर्ताओँ की तरफ़ से होता तो भी क्या उसमे अमेरिकन्स के खिलाफ़ भी यही दुर्दम्य साहस नही होता?...इसे देख कर सवाल आता है कि मानव-स्वभाव मे मूलभूत क्या है..जातीय/धार्मिक/राष्ट्रीय भावनाएं या खालिस ’थ्रिल’ और ’इगो’ की आकांक्षा वाली यह ’बेसिक-इंस्टिक्ट’? और समझ भी आता है कि वर्ल्ड-ट्रेड-सेंटर से प्लेन को टकराने वाले ’सुइसाइड-बॉंम्बर्स’ को क्या चीज प्रेरित करती रही होगी....फ़िल्म पाइरेटेड फ़िल्में बेचने वाले इराकी बच्चे के बहाने युद्ध के सार्वत्रिक प्रभाव और उसके बीच पनपती, सब कुछ पुनः सामान्य होने की कामना करती जिजीविषा तथा अंततः उसकी ’कैजुअलिटी’ भी बहुत संप्रेषणीय बनी है..यह फ़िल्म कोई विजुअल संतुष्टि नही देती वरन्‌ बेचैन करती है और हमारी समझ के लिये सवाल खड़े करती है..

अप इन द एयर: सच कहा आपने कि यह फ़िल्म पूरी तरह से जार्ज क्लूनी के ’चार्म’ और उनके दमदार अभिनय को भुनाती है..साथ ही ’रिसेशन’ के समय मे फ़िल्म का ’कार्पोरेटीय-हाइपोक्रिसी’ का व्यंगात्मक चित्रण भी फ़िल्म का सबल पक्ष है..हालांकि मुझे लगता है फ़िल्म शुरुआत मे जितनी मजबूती और ’सैटायरिकल’ तरीके से मंदी के दौर मे एक ओर नायक के व्यावसायिक दायित्वों के बहाने कारपोरेट वर्ल्ड की निष्ठुरता और दूसरी ओर ’फ़्लाइंग-माइल्स’ के बहाने नायक की अपनी अशमनीय लालसाओं को पेश करती है...मध्यांतर आते आते फ़िल्म रिलेशनशिप की गुत्थियों मे उलझ कर अपने प्रमख पक्ष को नजरंदाज कर देती..मगर जैसे वीडियोकॉन्फ़्रेंस के जरिये कर्मचारियों को ’फ़ायर’ करने का मितव्यतितापूर्ण तरीका देने वाली सहनायिका का एस एम एस के द्वारा ’ब्रेक-अप’ होने के बहाने कमर्शियल-रिलेशनशिप्स के साथ मे व्यक्तिगत रिलेशन्शिप्स की समानता का संदेश इस समय के लिये बहुत जरूरी भी है..और शायद फ़िल्म का निहितार्थ भी...

इन्ग्लॉरियस बास्टर्ड्स: टैरेंटीनों अब फ़िल्म मेकिंग का स्व्वयं मे एक स्कूल बन चुके हैं..और ’रिजर्वायर डॉग्स’ एवं ’पल्प-फ़िक्शन’ आदि के द्वारा ’स्टाइल’ के सामने कथ्य को गैरजरूरी बना देना फ़िल्म-निर्माण मे एक क्रांति की तरह रहा...मगर यह फ़िल्म उनकी पिछली कुछ फ़िल्मो से कोसों पीछे रह जाती है..कम-स-कम मेरी नजरों मे...फ़िल्म जितने प्रभावकारी और रूह ठंडा कर देने वाले दृश्य के साथ शुरू होती है..आगे बढ्ने के साथ शनै-शनैः अपने उस प्रभाव को खोने लगती है और चिर-प्रचिलित फ़ार्मूलों की शरण मे जाने लगती है..अवास्तविक क्लाइमेक्स अंत मे फ़िल्म की इंटेंसिटी को पूरी तरह ठंडा कर देता है...उनकी ही ’रिजर्वायर डाग्स’ के सामने यह फ़िल्म मुझे वैसी ही लगी जैसी कि विशाल की ’मकबूल के सामने ’कमीने’..दोनो ही फ़िल्में प्रभावी नोट पर शुरू होती हैं..और घटनाओं की द्रुत-गति को अपना आधार बनाती हैं...दोनों ही फ़िल्में दो अलग-अलग कहानियों को ले कर चलती हैं और कथ्य-प्रवाह के द्वारा ’टेंशन-बिल्डअप’ पर आश्रित रहती हैं..अंत मे दोनो कहानियों को एक साथ जोड़ कर एक अतिशय नाटकीय और पूर्णतः अविश्वसनीय ’क्लाइमेक्स’ के अंत मे ’दुष्टों’ का सर्वनाश होता है और नायक (ब्रड पिट व शाहिद कपूर) की परिणिति ’हैपी एवर आफ़्टर’ की ओर अग्रसर होती है..दोनो ही ’क्राउड-प्लीजिंग फ़ार्मूलों ’ व अतिरेकी मगर ग्लैमरस हिंसा से भरपूर हैं..और दोनों के अंत मे दर्शक किसी नैतिक दुविधा को दिमाग मे लिये बिना ’पैसा-वसूलने’ के संतोष के साथ घर जाता है..हालाँकि इस फ़िल्म के इंटर्टेन्मेंट-वल्यू’ के बारे मे कोई शक नही है... मगर सबसे उल्लेखनीय पक्ष रहा ऑस्ट्रियन कलाकार क्रिस्टॉफ़ वाल्ट्‍ज का दमदार अभिनय..एक निर्मम मगर बेहद इंटेलीजेंट नाजी अफ़सर की ’स्पाइन-चिलिंग’ भूमिका निभाकर वो ’साइलेंस ऑव द लैंब्स’ के अंथनी हॉपकिंस, ’नो कंट्री फ़ॉर ओल्ड मैन’ के जेवियर बार्डीन और ’द डार्क नाइट’ के हेथ लेजर से बस कुछ कदम पीछे ही खड़े हैं..
अप: कोई शक नही कि फ़िल्म प्रभावित करती है और इस साल की सर्वश्रेष्ठ एनिमेशन की हकदार भी....मगर पिक्सर का एनिमेशन फ़िल्म के कथ्य व उसके ट्रीटमेंट का एक फ़ार्मेट सा बनता जा रहा है जो कुछ रिपिटेशन का अहसास देता है..वैसे भी ’रतातुई’ और पिछ्ले साल की ’वाल-ई’ के द्वारा पिक्सर/डिस्ने ने खुद के लिये इतनी बड़ी लकीर खींच दी है कि उसे पार करना सहज नहीं..हाँ ’नाइन’ को नामांकन भी न मिलना आश्चर्यचकित करने वाला रहा... 
इसके अतिरिक्त भी कुछ फ़िल्में रही जिनका नामांकन सूची मे जिक्र न होना बड़ा अजीब लगा...एक तो जैक श्नाइडर की ’वाचमेन’ का जिक्र करूंगा..जो मेरे लिये तो पिछले वर्ष की सबसे पसंदीदा हालीवुड फ़िल्म रही... ’द डार्क नाइट’ के बहाने जिस दार्शनिक बहस की शुरुआत का आपने जिक्र किया है..यह बेहद ’इंटेंस’ फ़िल्म उस बहस को अगले लेवल तक ले जाती है..और सुपरहीरोज्‌ के बहाने स्वाभाविक मानवीय प्रवृत्तियों पर तीखा दृष्टिपात करती है..इसकी पूर्ण उपेक्षा चकित करने वाली रही..दूसरी जिस जरूरी फ़िल्म को नजरंदाज किया गया वह थी ’पब्लिक एनिमीज’..बेहद शक्तिशाली और कसावट भरे निर्देशन मे बनी यह फ़िल्म भी दिमाग मे अपना प्रभाव छोड़ती है..और खासकर जॉनी डेप को एक बार फिर नजरंदाज करना ऐकेडमी की एक कमी ही रही है..

माफ़ करना दोस्त आपकी पोस्ट पढ़ कर काफ़ी कुछ फ़ालतू बकवास कर गया..और फिर भी कितना कुछ छूट गया...एक अच्छे और रोचक लेख के लिये शुक्रिया!!!</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>सागर के ब्लॉग-रोल के बहाने पहली बार आपके ब्लॉग पर आने का सुअवसर मिला..और इतना गहन और रोचक विश्लेषण पढ़ कर आनंद आया&#8230;कि खुद को कुछ कहने से रोक नही पाया..<br />
अब जबकि अकैडमी अवार्ड्स की घोषणा हो चुकी है और कतिपय परिणामों को छोड़ कर (जैसे मेरे ख्याल से बेस्ट फ़ारेन फ़िल्म) सभी पूर्वप्रत्याशित विजेता ही रहे हैं..पिछले कुछ सालों मे से सबसे ’प्रेडिक्टेबल’ विनर्स-लिस्ट..मगर आपकी इस पोस्ट की सामयिकता कायम है और सार्थकता भी&#8230;.कुछ बातों पर मैं भी अपनी राय रखूँगा.<br />
अवतार व डिस्ट्रिक्ट 9: डिस्ट्रिक्ट 9 के बारे मे आपकी राय से पूर्णतः सहमत हूँ&#8230;साइंस-फ़िक्शन होने के बावजूद जिस अविश्वसनीय ईमानदारी से यह फ़िल्म हमारे सामाजिक यथार्थ की नब्ज पक़ड़ लेती है वह अद्भुत है..कुछ-कुछ वृत्तचित्रात्मक ’नोट’ पर शुरू हो कर फिर  अपने ’पेस’ व ’टेंशन’ द्वारा कथ्य पर मजबूत पकड़ से जहाँ यह फ़िल्म आगे बढ़ते हुए एक ’एजी थ्रिलर’ मे तब्दील हो जाती है..वहीं एक जबर्दस्त क्लाइमेक्स के द्वारा एक ’शॉक’ के साथ खत्म होती फ़िल्म ढेर सारे सवाल दे कर जाती है जो फिर दर्शक के जेहन मे देर तक घंटियों से बजते रहते हैं&#8230;जोहांस्बर्ग को केंद्र बनाने के बहाने ’फ़र्स्ट-वर्ल्ड कंट्रीज्‌’ की सत्ता पर प्रहार करने की आपकी निष्पत्ति पसंद आयी..वहीं यह भी ध्यान देने की बात है कि जोहानेसबर्ग मे ही अपना बचपन व्यतीत करने वाले इस फ़िल्म के डायरेक्टर नील ब्लॉकैम्प ने इस फ़िल्म मे अपनी ही एक पूर्ववर्ती शॉर्ट-फ़िल्म ’अलाइव इन जोबर्ग’ को ही विस्तार दिया है&#8230;जिसकी पृष्ठभूमि भी यही शहर है&#8230;इस फ़िल्म के नायक के रूप मे शार्लटो ने इस साल की सबसे बेहतरीन प्रफ़ार्मेंसेज्‌ मे से एक भूमिका दी है कि यह स्वीकार करना मुश्किल होता है कि  यह उनका प्रथम अंतर्राष्ट्रीय असाइनमेंट है..उनका नोमिनेट न होना आश्चर्यजनक रहा&#8230;.यहाँ एक बात अवतार और ’ड्स्ट्रिक्ट 9 ’ दोनो फ़िल्मों के बीच की कुछ ’स्ट्राइकिंग सिमिलैरिटीज’ का भी जिक्र करना चाहूँगा..दोनो ही सांइस-फ़िक्शन्स हैं जो मानवों के एलियन्स से संघर्ष की कहानी कहते हैं..मगर पूर्ववर्ती एलियन फ़िल्मों की लीक से हटते हुए दोनों फ़िल्में मनुष्य जाति को शोषक और हानिरहित एलियन्स को ’विक्टिम्स’ के रूप मे चित्रित करती हैं..दोनो फ़िल्मे मानवों के कमर्शियल हितों के लिये एलियन्स को उनके स्थान से विस्थापित करने की साजिशों को कथा की आधारभूमि बनाती हैं..दोनो के नायक श्वेत मनुष्य हैं जो अपने निजी हितों के चलते एलियन्स से मध्यस्थता (या विश्वासघात?) का काम स्वीकार करते हैं..और इसके लिये झूठ को अपना आधार बनाते हैं..मगर अंततः दोनो ही फ़िल्मों मे नायक अपनी ही जाति के विरुद्ध हो जाते हैं..दोनो ही फ़िल्मों की एलियन प्रजाति सरल, शांतिप्रिय,  बेवकूफ़ और आपसी-संबंधों को तरजीह देने वाली हैं..और दोनों ही फ़िल्मों के अंत मे नायक स्वयं एलियन प्रजाति के सदस्य हो जाते हैं..इतने संयोग एक साथ चकित करते हैं..यह जानते हुए कि अवतार की कहानी जेम्स कमेरॉन ने १५ साल पहले ही लिख ली थी और डिस्ट्रिक्ट ९ के निर्देशक इसी कन्सेप्ट को अपनी पिछली शार्ट फ़िल्म मे कुछ वर्ष पहले दोहरा चुके थे..बहरहाल दोनो फ़िल्में पूँजीवाद के स्वार्थी व निजी फ़ायदे के लिये ’स्टॉप एट नथिंग’  एट्टीट्यूड को उघाड़ती हैं..यहाँ डिस्ट्रिक्ट 9 का स्लम व एलियन्स के साथ सामाजिक भेदभाव अफ़्रीका के ’अपार्थेड’ के लंबे व कुरूप इतिहास का नतीजा भी लगता है&#8230;.अवतार के बारे मे आपने सही कहा है कि फ़िल्म का अस्ल चमत्कार उसका तकनीकी पक्ष है..दरअस्ल यह फ़िल्म अपने महाभव्य सेट्स, जादुई साज-सज्जा और इतर-लोकीय ट्रीटमेंट के द्वारा दर्शक पर जादुई प्रभाव डालती है और अपनी ’विजुअल भव्यता’ के द्वारा आपके संसेज्‌ को कैप्चर कर के रखती है..कि कथ्य स्तर की कमियाँ या नाटकीयता उपेक्षणीय हो जाती हैं..मगर उस जादू से बाहर आ कर फ़िल्म के कथ्य का डिटेल्ड निरीक्षण करने पर फ़िल्म उतनी प्रभावित करती नही लगती..मगर जो भी हो यह फ़िल्म कम से कम तकनीक के क्षेत्र मे एक नयी क्रांति जरूर करती है..और इसे पसंद करने के लिये किसी को इंटेलेक्टुअल होने की जरूरत भी नही होती..जो कैमेरॉन की फ़िल्मों की एक बड़ी सफ़लता है..</p>
<p>द हर्ट-लॉकर: मुझे लगता है कि स्रर्वश्रेष्ट फ़िल्मों मे नामांकित फ़िल्मों मे से इसे पुरस्कार मिलना एक सही निर्णय है (कम से कम जितनी मैने देखी हैं उनमे)..मैं इसकी तुलना ’सेविंग प्राइवेट रायन’ से नही करूंगा&#8230;.इस फ़िल्म की सार्थकता और ’यूनीकनेस’ का अंदाजा ऐसे भी कर सकते हैं कि मेरा एक मित्र जो ’वार-फ़िल्म्स’ का बेहद शौकीन है, इस फ़िल्म को ऊँची उम्मीदों के साथ देखने के बाद निराश हुआ, कि इसमे युद्ध संबंधी फ़िल्मों के टिपिकल मसाले नही मिले..वैसे भी मैं ’वार-मूवीज्‌’ उनको मानता हूँ जो युद्ध का और युद्धवीरता का गुणगान करें व उसे ग्लैमरस रूप मे प्रस्तुत करें (’इंग्लॉरियस बास्टर्ड्स’ और काफ़ी हद तक ’सेविंग प्रायवेट रायन’ को इस कैटेगरी मे रख सकते हैं!..इन्ग्लॉरियस बास्टर्ड्स फ़िल्म के अंदर की फ़िल्म जिसकी स्क्रीनिंग हिटलर के लिये की जाती है शूरवीरता के इस ग्लैमर को अच्छे से सामने रखती है) ज्यादा संवेदनशील ’एंटी-वार मूवीज्‌’ होती हैं जो युद्ध के प्रति वितृष्णा पैदा करें और युध्दों की प्रासंगिकता जैसे मूलभूत सवाल का जवाब खोजने की कोशिश करें..इस सिलसिले मे मुझे ’अपोकैलिप्स नाउ’, ’कम ऐंड सी’ (रशियन) और ’ताइगुक्गी’ (कोरियन) जैसी फ़िल्मे याद आती हैं..’हर्ट-लॉकर’ मुझे इन कैटेगरीज्‌ से इतर अपना एक ’सब-जेनर’ स्थापित करती लगती है..जो मेरे ख्याल से युद्ध-भूमि को अपनी पृष्ठभूमि बनाती हुई सबसे विषम, ’अन्प्रेसेडेंटेड’ और ’एक्स्ट्रीम’ परिस्थितियों मे मानवों की ’रिएक्शन्स’ की जाँच-पड़ताल करती है, और यह वे रिएक्शन्स हैं जो देश-काल-समाज से अर्जित ज्ञान/अनुभव आधारित नही वरन्‌ मानवीय स्वभाव का मूलभूत और ’नेचुरल’ हिस्सा हैं..और इस बहाने सभ्यता के आवरण के बीच छिपे हमारे आदिम संस्कार और जिजीविषा उघड़ कर सामने आती है..यह एक रोचक सवाल हो सकता है कि फ़िल्म का ’प्रोटैगनिस्ट’ जो खतरे के मुँह मे हँसते हुए घुस जाता है तो अपने सीनियर्स की अवज्ञा करके बेवजह जान का जोखिम लेने की उसकी यह आदत उसके देश-प्रेम, मरीन-ट्रेंनिंग अथवा साथियों के प्रति अतिशय अनुराग की उपज है या खतरों से खेलने की उसकी ’नेचुरल इंस्टिक्ट’?..अगर यही नायक इराकी उपद्रवकर्ताओँ की तरफ़ से होता तो भी क्या उसमे अमेरिकन्स के खिलाफ़ भी यही दुर्दम्य साहस नही होता?&#8230;इसे देख कर सवाल आता है कि मानव-स्वभाव मे मूलभूत क्या है..जातीय/धार्मिक/राष्ट्रीय भावनाएं या खालिस ’थ्रिल’ और ’इगो’ की आकांक्षा वाली यह ’बेसिक-इंस्टिक्ट’? और समझ भी आता है कि वर्ल्ड-ट्रेड-सेंटर से प्लेन को टकराने वाले ’सुइसाइड-बॉंम्बर्स’ को क्या चीज प्रेरित करती रही होगी&#8230;.फ़िल्म पाइरेटेड फ़िल्में बेचने वाले इराकी बच्चे के बहाने युद्ध के सार्वत्रिक प्रभाव और उसके बीच पनपती, सब कुछ पुनः सामान्य होने की कामना करती जिजीविषा तथा अंततः उसकी ’कैजुअलिटी’ भी बहुत संप्रेषणीय बनी है..यह फ़िल्म कोई विजुअल संतुष्टि नही देती वरन्‌ बेचैन करती है और हमारी समझ के लिये सवाल खड़े करती है..</p>
<p>अप इन द एयर: सच कहा आपने कि यह फ़िल्म पूरी तरह से जार्ज क्लूनी के ’चार्म’ और उनके दमदार अभिनय को भुनाती है..साथ ही ’रिसेशन’ के समय मे फ़िल्म का ’कार्पोरेटीय-हाइपोक्रिसी’ का व्यंगात्मक चित्रण भी फ़िल्म का सबल पक्ष है..हालांकि मुझे लगता है फ़िल्म शुरुआत मे जितनी मजबूती और ’सैटायरिकल’ तरीके से मंदी के दौर मे एक ओर नायक के व्यावसायिक दायित्वों के बहाने कारपोरेट वर्ल्ड की निष्ठुरता और दूसरी ओर ’फ़्लाइंग-माइल्स’ के बहाने नायक की अपनी अशमनीय लालसाओं को पेश करती है&#8230;मध्यांतर आते आते फ़िल्म रिलेशनशिप की गुत्थियों मे उलझ कर अपने प्रमख पक्ष को नजरंदाज कर देती..मगर जैसे वीडियोकॉन्फ़्रेंस के जरिये कर्मचारियों को ’फ़ायर’ करने का मितव्यतितापूर्ण तरीका देने वाली सहनायिका का एस एम एस के द्वारा ’ब्रेक-अप’ होने के बहाने कमर्शियल-रिलेशनशिप्स के साथ मे व्यक्तिगत रिलेशन्शिप्स की समानता का संदेश इस समय के लिये बहुत जरूरी भी है..और शायद फ़िल्म का निहितार्थ भी&#8230;</p>
<p>इन्ग्लॉरियस बास्टर्ड्स: टैरेंटीनों अब फ़िल्म मेकिंग का स्व्वयं मे एक स्कूल बन चुके हैं..और ’रिजर्वायर डॉग्स’ एवं ’पल्प-फ़िक्शन’ आदि के द्वारा ’स्टाइल’ के सामने कथ्य को गैरजरूरी बना देना फ़िल्म-निर्माण मे एक क्रांति की तरह रहा&#8230;मगर यह फ़िल्म उनकी पिछली कुछ फ़िल्मो से कोसों पीछे रह जाती है..कम-स-कम मेरी नजरों मे&#8230;फ़िल्म जितने प्रभावकारी और रूह ठंडा कर देने वाले दृश्य के साथ शुरू होती है..आगे बढ्ने के साथ शनै-शनैः अपने उस प्रभाव को खोने लगती है और चिर-प्रचिलित फ़ार्मूलों की शरण मे जाने लगती है..अवास्तविक क्लाइमेक्स अंत मे फ़िल्म की इंटेंसिटी को पूरी तरह ठंडा कर देता है&#8230;उनकी ही ’रिजर्वायर डाग्स’ के सामने यह फ़िल्म मुझे वैसी ही लगी जैसी कि विशाल की ’मकबूल के सामने ’कमीने’..दोनो ही फ़िल्में प्रभावी नोट पर शुरू होती हैं..और घटनाओं की द्रुत-गति को अपना आधार बनाती हैं&#8230;दोनों ही फ़िल्में दो अलग-अलग कहानियों को ले कर चलती हैं और कथ्य-प्रवाह के द्वारा ’टेंशन-बिल्डअप’ पर आश्रित रहती हैं..अंत मे दोनो कहानियों को एक साथ जोड़ कर एक अतिशय नाटकीय और पूर्णतः अविश्वसनीय ’क्लाइमेक्स’ के अंत मे ’दुष्टों’ का सर्वनाश होता है और नायक (ब्रड पिट व शाहिद कपूर) की परिणिति ’हैपी एवर आफ़्टर’ की ओर अग्रसर होती है..दोनो ही ’क्राउड-प्लीजिंग फ़ार्मूलों ’ व अतिरेकी मगर ग्लैमरस हिंसा से भरपूर हैं..और दोनों के अंत मे दर्शक किसी नैतिक दुविधा को दिमाग मे लिये बिना ’पैसा-वसूलने’ के संतोष के साथ घर जाता है..हालाँकि इस फ़िल्म के इंटर्टेन्मेंट-वल्यू’ के बारे मे कोई शक नही है&#8230; मगर सबसे उल्लेखनीय पक्ष रहा ऑस्ट्रियन कलाकार क्रिस्टॉफ़ वाल्ट्‍ज का दमदार अभिनय..एक निर्मम मगर बेहद इंटेलीजेंट नाजी अफ़सर की ’स्पाइन-चिलिंग’ भूमिका निभाकर वो ’साइलेंस ऑव द लैंब्स’ के अंथनी हॉपकिंस, ’नो कंट्री फ़ॉर ओल्ड मैन’ के जेवियर बार्डीन और ’द डार्क नाइट’ के हेथ लेजर से बस कुछ कदम पीछे ही खड़े हैं..<br />
अप: कोई शक नही कि फ़िल्म प्रभावित करती है और इस साल की सर्वश्रेष्ठ एनिमेशन की हकदार भी&#8230;.मगर पिक्सर का एनिमेशन फ़िल्म के कथ्य व उसके ट्रीटमेंट का एक फ़ार्मेट सा बनता जा रहा है जो कुछ रिपिटेशन का अहसास देता है..वैसे भी ’रतातुई’ और पिछ्ले साल की ’वाल-ई’ के द्वारा पिक्सर/डिस्ने ने खुद के लिये इतनी बड़ी लकीर खींच दी है कि उसे पार करना सहज नहीं..हाँ ’नाइन’ को नामांकन भी न मिलना आश्चर्यचकित करने वाला रहा&#8230;<br />
इसके अतिरिक्त भी कुछ फ़िल्में रही जिनका नामांकन सूची मे जिक्र न होना बड़ा अजीब लगा&#8230;एक तो जैक श्नाइडर की ’वाचमेन’ का जिक्र करूंगा..जो मेरे लिये तो पिछले वर्ष की सबसे पसंदीदा हालीवुड फ़िल्म रही&#8230; ’द डार्क नाइट’ के बहाने जिस दार्शनिक बहस की शुरुआत का आपने जिक्र किया है..यह बेहद ’इंटेंस’ फ़िल्म उस बहस को अगले लेवल तक ले जाती है..और सुपरहीरोज्‌ के बहाने स्वाभाविक मानवीय प्रवृत्तियों पर तीखा दृष्टिपात करती है..इसकी पूर्ण उपेक्षा चकित करने वाली रही..दूसरी जिस जरूरी फ़िल्म को नजरंदाज किया गया वह थी ’पब्लिक एनिमीज’..बेहद शक्तिशाली और कसावट भरे निर्देशन मे बनी यह फ़िल्म भी दिमाग मे अपना प्रभाव छोड़ती है..और खासकर जॉनी डेप को एक बार फिर नजरंदाज करना ऐकेडमी की एक कमी ही रही है..</p>
<p>माफ़ करना दोस्त आपकी पोस्ट पढ़ कर काफ़ी कुछ फ़ालतू बकवास कर गया..और फिर भी कितना कुछ छूट गया&#8230;एक अच्छे और रोचक लेख के लिये शुक्रिया!!!</p>
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		<title>By: ashutosh</title>
		<link>http://mihirpandya.com/2010/03/oscar-2010/comment-page-1/#comment-8946</link>
		<dc:creator>ashutosh</dc:creator>
		<pubDate>Tue, 09 Mar 2010 10:34:35 +0000</pubDate>
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		<description>i can`t comment on these comments cause i haven`t any of these films.
but  your critic is becoming valuable for me due to it`s reachness,seriousness,deepness and cause you includes technical aspects of films also.
   I want to know now that where do you see these films .
   please tell me the source. I am also very keen of films.</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>i can`t comment on these comments cause i haven`t any of these films.<br />
but  your critic is becoming valuable for me due to it`s reachness,seriousness,deepness and cause you includes technical aspects of films also.<br />
   I want to know now that where do you see these films .<br />
   please tell me the source. I am also very keen of films.</p>
]]></content:encoded>
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	<item>
		<title>By: Saagar</title>
		<link>http://mihirpandya.com/2010/03/oscar-2010/comment-page-1/#comment-8945</link>
		<dc:creator>Saagar</dc:creator>
		<pubDate>Mon, 08 Mar 2010 11:15:01 +0000</pubDate>
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		<description>http://www.bbc.co.uk/hindi/news/2010/03/100308_oscar_va.shtml</description>
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		<title>By: shreesh</title>
		<link>http://mihirpandya.com/2010/03/oscar-2010/comment-page-1/#comment-8944</link>
		<dc:creator>shreesh</dc:creator>
		<pubDate>Mon, 08 Mar 2010 05:37:20 +0000</pubDate>
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		<description>ओह क्या शानदार ढंग है आपका...और शत-प्रतिशत सहमत हूँ, आपसे....आपका फीड संजो रहा हूँ...!</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>ओह क्या शानदार ढंग है आपका&#8230;और शत-प्रतिशत सहमत हूँ, आपसे&#8230;.आपका फीड संजो रहा हूँ&#8230;!</p>
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