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	<title>Comments on: एक फ़िल्म, एक उपन्यास और गांधीगिरी का अंत.</title>
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	<description>सिनेमा, साहित्य, खेल, संगीत, एक युवा शहर धड़कता है यहाँ...</description>
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		<title>By: ravindra vyas</title>
		<link>http://mihirpandya.com/2010/01/three-idiots-vs-chetan-bhagat/comment-page-1/#comment-8920</link>
		<dc:creator>ravindra vyas</dc:creator>
		<pubDate>Thu, 28 Jan 2010 13:03:37 +0000</pubDate>
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		<description>achha hai!</description>
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		<title>By: मिहिर</title>
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		<dc:creator>मिहिर</dc:creator>
		<pubDate>Fri, 15 Jan 2010 12:09:14 +0000</pubDate>
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		<description>@ Varun
बिलकुल. वैसे ही जैसे चेतन भगत मुझे पसंद है या नापसंद उससे इस मुद्दे पर मेरी राय पर कोई असर नहीं पड़ता.

@Tarun
सही बात है. गीतकार के साथ भी यही बात लागू होती है. वो एक लेखक होने की वजह से बच नहीं सकता. इस सवाल पर प्रसून जोशी भी उतने ही सवालों के घेरे में हैं. हमें पसंद हैं इसलिए और ज़्यादा मन खट्टा होता है. उनकी ईमानदारी भी कहीं न कहीं खोई है इस प्रसंग में.
लेकिन एक बात से मैं अभी भी असहमत हूँ. अपने लेखन को व्यवसाय बनाने वाले आदमी को भी अपने काम का क्रेडिट पाने का उतना ही हक़ है जितना किसी ’धर्मार्थ सेवा’ करने वाले को. अगर यह कहा जाने लग जाए कि लेखन को व्यवसाय बनाने वाले आदमी को फिर कोई ईमानदारी की उम्मीद नहीं करनी चाहिए तो फिर तो इस समाज में लेखकों का जीना मुश्किल हो जाएगा.</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>@ Varun<br />
बिलकुल. वैसे ही जैसे चेतन भगत मुझे पसंद है या नापसंद उससे इस मुद्दे पर मेरी राय पर कोई असर नहीं पड़ता.</p>
<p>@Tarun<br />
सही बात है. गीतकार के साथ भी यही बात लागू होती है. वो एक लेखक होने की वजह से बच नहीं सकता. इस सवाल पर प्रसून जोशी भी उतने ही सवालों के घेरे में हैं. हमें पसंद हैं इसलिए और ज़्यादा मन खट्टा होता है. उनकी ईमानदारी भी कहीं न कहीं खोई है इस प्रसंग में.<br />
लेकिन एक बात से मैं अभी भी असहमत हूँ. अपने लेखन को व्यवसाय बनाने वाले आदमी को भी अपने काम का क्रेडिट पाने का उतना ही हक़ है जितना किसी ’धर्मार्थ सेवा’ करने वाले को. अगर यह कहा जाने लग जाए कि लेखन को व्यवसाय बनाने वाले आदमी को फिर कोई ईमानदारी की उम्मीद नहीं करनी चाहिए तो फिर तो इस समाज में लेखकों का जीना मुश्किल हो जाएगा.</p>
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		<title>By: tarun gupta</title>
		<link>http://mihirpandya.com/2010/01/three-idiots-vs-chetan-bhagat/comment-page-1/#comment-8917</link>
		<dc:creator>tarun gupta</dc:creator>
		<pubDate>Fri, 15 Jan 2010 02:55:05 +0000</pubDate>
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		<description>तुमने बहुत मार्के की बात कही.   क्या बात कही है यार, बहुत दम है तुम्हारी बात में, वाकई  सवाल  सिर्फ सही गलत का ............इस तरह की बातें में भी कह सकता हूँ पर दोस्त सवाल तो ये है सवाल सिर्फ सही और गलत का  नहीं है इस प्रोफेशनलीटी के दौर में इसकी उम्मीद बेमानी जान पड़ती है. 3idiots और मुन्नाभाई ने एक नई तरह की नैतिकता(गांधीगिरी) को हमारे सामने रखा लेकिन ये नैतिकता गाँधी बाबा की नैतिकता नहीं थी ये प्रोफेश्नेलीटी की पैदाइश थी हमें ये बात समझनी होगी; तुम्हे याद है एक एक गाँधी हम सब के भीतर छिपा है लेकिन हमारे ही भीतर इसका विलोम है तुम्हे ये भी पता होगा;
 delhi ६ के गीतकार प्रसून जोशी जिसे हम सब समकालीन गीतकारों में एक आइकोन  की हैसियत देते है वे इससे पहले छत्तीसगढ़ की जोशी बहनों के साथ इस तरह की प्रोफेशनलीटी अपना चुके है वहाँ  सवाल सिर्फ ये बताने का था कि बेसिकली यह गीत(सास गारी देवे...) जोशी बहनों का है न की प्रसून का. वह नाम ऊपर दिया जाये या नीचे सवाल ये नहीं था;  जिसके एवेज में  उनका सवाली-जवाब ये था की नाम दिया ही क्यों जाए? रही बात चेतन भगत की तो अगर सही और गलत के एंगल से  देखें तो जिस तरह से प्रसून(राकेश ओमप्रकाश महरा) गलत थे राजकुमार हिरानी भी गलत ही ठहराएं जाएँगे. शायद दिल्ली-६ पर तुम्हारा कोई लेख नहीं आया लेकिन तुमने इस पर लिखा अच्छा लगा.. 
चेतन भगत को क्या ११ लाख लेते वक़्त वाकई पता नहीं था की उनका नाम फिल्म के अंत में न दिखाई देने वाले अक्षरों के तेहत आएगा( जहां तक मेरी जानकारी है इस सब का एग्रीमेंट तो पहले ही हो गया होगा)? इस प्रोफेशनल समय में प्रसून जोशी राजकुमार हिरानी,के साथ  चेतन वाकई ईमानदार बने हुए है? शंका होती है जब आप अपने लेखन को व्यवसाय बनाते है तो क्या वाकई सही और गलत या ईमानदारी जैसे शब्दों की गुंजाईश बाकी रह जाती है?</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>तुमने बहुत मार्के की बात कही.   क्या बात कही है यार, बहुत दम है तुम्हारी बात में, वाकई  सवाल  सिर्फ सही गलत का &#8230;&#8230;&#8230;&#8230;इस तरह की बातें में भी कह सकता हूँ पर दोस्त सवाल तो ये है सवाल सिर्फ सही और गलत का  नहीं है इस प्रोफेशनलीटी के दौर में इसकी उम्मीद बेमानी जान पड़ती है. 3idiots और मुन्नाभाई ने एक नई तरह की नैतिकता(गांधीगिरी) को हमारे सामने रखा लेकिन ये नैतिकता गाँधी बाबा की नैतिकता नहीं थी ये प्रोफेश्नेलीटी की पैदाइश थी हमें ये बात समझनी होगी; तुम्हे याद है एक एक गाँधी हम सब के भीतर छिपा है लेकिन हमारे ही भीतर इसका विलोम है तुम्हे ये भी पता होगा;<br />
 delhi ६ के गीतकार प्रसून जोशी जिसे हम सब समकालीन गीतकारों में एक आइकोन  की हैसियत देते है वे इससे पहले छत्तीसगढ़ की जोशी बहनों के साथ इस तरह की प्रोफेशनलीटी अपना चुके है वहाँ  सवाल सिर्फ ये बताने का था कि बेसिकली यह गीत(सास गारी देवे&#8230;) जोशी बहनों का है न की प्रसून का. वह नाम ऊपर दिया जाये या नीचे सवाल ये नहीं था;  जिसके एवेज में  उनका सवाली-जवाब ये था की नाम दिया ही क्यों जाए? रही बात चेतन भगत की तो अगर सही और गलत के एंगल से  देखें तो जिस तरह से प्रसून(राकेश ओमप्रकाश महरा) गलत थे राजकुमार हिरानी भी गलत ही ठहराएं जाएँगे. शायद दिल्ली-६ पर तुम्हारा कोई लेख नहीं आया लेकिन तुमने इस पर लिखा अच्छा लगा..<br />
चेतन भगत को क्या ११ लाख लेते वक़्त वाकई पता नहीं था की उनका नाम फिल्म के अंत में न दिखाई देने वाले अक्षरों के तेहत आएगा( जहां तक मेरी जानकारी है इस सब का एग्रीमेंट तो पहले ही हो गया होगा)? इस प्रोफेशनल समय में प्रसून जोशी राजकुमार हिरानी,के साथ  चेतन वाकई ईमानदार बने हुए है? शंका होती है जब आप अपने लेखन को व्यवसाय बनाते है तो क्या वाकई सही और गलत या ईमानदारी जैसे शब्दों की गुंजाईश बाकी रह जाती है?</p>
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		<title>By: varun</title>
		<link>http://mihirpandya.com/2010/01/three-idiots-vs-chetan-bhagat/comment-page-1/#comment-8916</link>
		<dc:creator>varun</dc:creator>
		<pubDate>Wed, 13 Jan 2010 20:43:14 +0000</pubDate>
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		<description>खरी बात! मुद्दा % का नही, काग़ज़-पत्तर का नहीं - मुद्दा सिर्फ़ ये है कि फिल्म किताब पर बनी थी और उसका नाम आना चाहिए था. अब बस यही एक सूरत है कि चेतन को पहले से मालूम था कि नाम अंत में ही आएगा और उसने इसकी इजाज़त जान समझ कर दी. उसके बावजूद किसी तमीज़ वाले इंसान ने ऐसे काम के लिए इजाज़त माँगी या चाल चली, यही बताता है कि हालात क्या हैं और छोटा-मोटा लेखक तो इन &#039;बापू के बंदरों&#039; के  सामूहिक &#039;चमत्कार&#039; का शिकार हो के रह जाए. 

बस एक ही बात मैं कहूँगा मेरे हिसाब से मायने नहीं रखती - वो ये कि हीरानी ने इससे पहले मुन्नाभाई बनाई थी इससे ये अपराध घट या बढ़ नहीं जाता. वो बड़े निर्देशक हैं और उनके साथ इस काम में चोपड़ा और आमिर जैसे &#039;इज़्ज़तदार&#039; लोग खड़े थे - यही सबसे दुख की बात है.</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>खरी बात! मुद्दा % का नही, काग़ज़-पत्तर का नहीं &#8211; मुद्दा सिर्फ़ ये है कि फिल्म किताब पर बनी थी और उसका नाम आना चाहिए था. अब बस यही एक सूरत है कि चेतन को पहले से मालूम था कि नाम अंत में ही आएगा और उसने इसकी इजाज़त जान समझ कर दी. उसके बावजूद किसी तमीज़ वाले इंसान ने ऐसे काम के लिए इजाज़त माँगी या चाल चली, यही बताता है कि हालात क्या हैं और छोटा-मोटा लेखक तो इन &#8216;बापू के बंदरों&#8217; के  सामूहिक &#8216;चमत्कार&#8217; का शिकार हो के रह जाए. </p>
<p>बस एक ही बात मैं कहूँगा मेरे हिसाब से मायने नहीं रखती &#8211; वो ये कि हीरानी ने इससे पहले मुन्नाभाई बनाई थी इससे ये अपराध घट या बढ़ नहीं जाता. वो बड़े निर्देशक हैं और उनके साथ इस काम में चोपड़ा और आमिर जैसे &#8216;इज़्ज़तदार&#8217; लोग खड़े थे &#8211; यही सबसे दुख की बात है.</p>
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		<title>By: Ravi ranjan kumar</title>
		<link>http://mihirpandya.com/2010/01/three-idiots-vs-chetan-bhagat/comment-page-1/#comment-8915</link>
		<dc:creator>Ravi ranjan kumar</dc:creator>
		<pubDate>Wed, 13 Jan 2010 11:59:15 +0000</pubDate>
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		<description>मार्केट के आदमी से नैतिकता कि उम्मीद क्यों। जो बिकता वही तो दीखता है। चेतन भगत के साथ हुए विवाद ने फिल्म को फायदा ही पहुँचाया। जो आमिर कहाँ प्रमोशन के लिए बनारस और कोलकाता जा सकते हैं, उन्हें भला यह विवाद बुडा क्यों लगेगा।http://raviranjankumar1983.blogspot.com/</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>मार्केट के आदमी से नैतिकता कि उम्मीद क्यों। जो बिकता वही तो दीखता है। चेतन भगत के साथ हुए विवाद ने फिल्म को फायदा ही पहुँचाया। जो आमिर कहाँ प्रमोशन के लिए बनारस और कोलकाता जा सकते हैं, उन्हें भला यह विवाद बुडा क्यों लगेगा।http://raviranjankumar1983.blogspot.com/</p>
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