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’सेल्समैन ऑफ़ दि ईयर’ के जयगान के बीच संशय का एकालाप

“प्यारे बार्नस्टीन, तुम जानते तो हो कि इस मुल्क़ में गुलामी दरअसल कभी ख़्त्म ही नहीं हुई थी. उसे बस एक दूसरा नाम दे दिया गया था. मुलाज़िमत.” --'द असैसिनेशन ऑफ़ रिचर्ड निक्सन’ से उद्धृत. एक तसवीर जिसमें बैठे लोग वापस लौट जाते हैं. एक लैटर बॉक्स जिसमें कभी मनचाही चिठ्ठी नहीं ...

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November 21, 2009

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ओशियंस में गुलज़ार और विशाल की जुगलबन्दी

ओशियंस में गुलज़ार और विशाल भारद्वाज साथ थे. बात तो ’कमीने’ पर होनी थी लेकिन शुरुआत में कुछ बातें संगीत को लेकर भी हुईं. बातों से सब समझ आता है इसलिए हर बात के साथ उसे कहने वाले का नाम जोड़ना ज़रूरी नहीं लगता. सम्बोधन से ही सब साफ़ हो जाता ...

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November 13, 2009

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भोलेपन के बियाबान में भटके: अजब प्रेम की गजब कहानी

स्याह व्यंग्य वाली समझदार फ़िल्मों के दौर में (पढ़ें ’डार्क कॉमेडी’ जैसे 'संकट सिटी', 'ओये लक्की लक्की ओये') ’अजब प्रेम की गजब कहानी’ एक पुराने ज़माने की भोली और भली कॉमेडी है. इतनी भली कि कई बार आपको उसका नायक मंदबुद्धि लगने लगता है. माना रणवीर कपूर में एक चार्म ...

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November 10, 2009