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	<title>Comments on: कितने आदमी थे! उर्फ़ हिन्दी सिनेमा का अजब-गजब संवाद लेखन</title>
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	<description>सिनेमा, साहित्य, खेल, संगीत, एक युवा शहर धड़कता है यहाँ...</description>
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		<title>By: Ssiddhant Mohan Tiwary</title>
		<link>http://mihirpandya.com/2009/09/hindi-cinema-dialogue-writing/comment-page-1/#comment-8919</link>
		<dc:creator>Ssiddhant Mohan Tiwary</dc:creator>
		<pubDate>Sun, 24 Jan 2010 12:24:48 +0000</pubDate>
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		<description>हिन्दी में सिनेमा पर इतना सधा ब्लॉग मैंने अभी तक नहीं देखा है, मिहिर जी के फिल्मों के बारे में लिखने में एक चुम्बकत्व है जो कही और नहीं दिखाई देता है..
बेहतरीन प्रस्तुति और उससे भी ज्यादा बेहतरीन सोच...

धन्यवाद
सिद्धान्त मोहन तिवारी
वाराणसी</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>हिन्दी में सिनेमा पर इतना सधा ब्लॉग मैंने अभी तक नहीं देखा है, मिहिर जी के फिल्मों के बारे में लिखने में एक चुम्बकत्व है जो कही और नहीं दिखाई देता है..<br />
बेहतरीन प्रस्तुति और उससे भी ज्यादा बेहतरीन सोच&#8230;</p>
<p>धन्यवाद<br />
सिद्धान्त मोहन तिवारी<br />
वाराणसी</p>
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		<title>By: मिहिर</title>
		<link>http://mihirpandya.com/2009/09/hindi-cinema-dialogue-writing/comment-page-1/#comment-1455</link>
		<dc:creator>मिहिर</dc:creator>
		<pubDate>Thu, 17 Sep 2009 14:13:59 +0000</pubDate>
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		<description>@ दीप्ति
अरे उस संवाद में तो सिनेमा की कहानी को पार कर असल व्यक्ति पर टिप्पणी बन जाने की कुव्वत है. उसे सुनकर तो ऐसा लगता है कि जैसे वो सीधा-सीधा आमिर खान के व्यक्तित्व पर टिप्पणी है!

और क्या फ़िल्म में आते किरदारों के अजीब-अजीब संबोधन संवाद लेखन का हिस्सा नहीं. अगर आप जावेद अख़्तर की किताब ’टाकिंग फ़िल्म्स’ देखें तो उसमें उन्होंने दीवार में आये एक किरदार (डावर सेठ) के नाम पर लम्बी चर्चा की है. उन्होंने बताया है कि कैसे उनके द्वारा रचे इस किरदार डावर का नाम ही हिन्दी सिनेमा के नकारात्मक किरदारों की श्रंखला में एक पैराडाइम शिफ़्ट लेकर आया. उस किरदार से पहले तक हम डाकुओं,मुनीमों,साहूकारों को विलेन के रूप में देखने के अभ्यस्त थे. लेकिन डावर के साथ अभिजात्य,नफ़ीस नकारात्मक किरदारों की शुरुआत होती है.

आखिर हमारे नायक ’विजय’ के शहर आने के साथ विलेन को भी तो शहर आना था.</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>@ दीप्ति<br />
अरे उस संवाद में तो सिनेमा की कहानी को पार कर असल व्यक्ति पर टिप्पणी बन जाने की कुव्वत है. उसे सुनकर तो ऐसा लगता है कि जैसे वो सीधा-सीधा आमिर खान के व्यक्तित्व पर टिप्पणी है!</p>
<p>और क्या फ़िल्म में आते किरदारों के अजीब-अजीब संबोधन संवाद लेखन का हिस्सा नहीं. अगर आप जावेद अख़्तर की किताब ’टाकिंग फ़िल्म्स’ देखें तो उसमें उन्होंने दीवार में आये एक किरदार (डावर सेठ) के नाम पर लम्बी चर्चा की है. उन्होंने बताया है कि कैसे उनके द्वारा रचे इस किरदार डावर का नाम ही हिन्दी सिनेमा के नकारात्मक किरदारों की श्रंखला में एक पैराडाइम शिफ़्ट लेकर आया. उस किरदार से पहले तक हम डाकुओं,मुनीमों,साहूकारों को विलेन के रूप में देखने के अभ्यस्त थे. लेकिन डावर के साथ अभिजात्य,नफ़ीस नकारात्मक किरदारों की शुरुआत होती है.</p>
<p>आखिर हमारे नायक ’विजय’ के शहर आने के साथ विलेन को भी तो शहर आना था.</p>
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	<item>
		<title>By: मिहिर</title>
		<link>http://mihirpandya.com/2009/09/hindi-cinema-dialogue-writing/comment-page-1/#comment-1454</link>
		<dc:creator>मिहिर</dc:creator>
		<pubDate>Thu, 17 Sep 2009 13:57:55 +0000</pubDate>
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		<description>@ तरुण

हम सबसे पहले सिनेमा के प्रेमी हैं, उसके बाद कुछ और. और बहुत बार यही शुद्ध प्रेम ऐसी चीज़ें दिखला देता है जिसे थ्योरी से समझना मुश्किल है. यहाँ यही प्रेम काम आया है सबसे ज़्यादा.

@ रंगनाथ

शुक्रिया बारास्ते विनीत यहाँ आने का (और इसके साथ ही विनीत बाबू को भी शुक्रिया पहुँचे.) आपको मोहल्ला पर पढ़ता रहा हूँ. आपकी तर्क क्षमता का कायल हूँ. पीयुष मिश्रा के उस एतिहासिक साक्षात्कार का ज़्यादा श्रेय मुझसे ज़्यादा वरुण को जाता है. तो ’बारास्ते मुझ’ आपका यह आभार उस तक भी पहुँच जायेगा. आप जैसे गंभीर पाठक मुझ जैसे अनियमित ब्लॉगर के लिए नेमत समान हैं. उम्मीद है यहाँ और सार्थक बात हो पाएगी.</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>@ तरुण</p>
<p>हम सबसे पहले सिनेमा के प्रेमी हैं, उसके बाद कुछ और. और बहुत बार यही शुद्ध प्रेम ऐसी चीज़ें दिखला देता है जिसे थ्योरी से समझना मुश्किल है. यहाँ यही प्रेम काम आया है सबसे ज़्यादा.</p>
<p>@ रंगनाथ</p>
<p>शुक्रिया बारास्ते विनीत यहाँ आने का (और इसके साथ ही विनीत बाबू को भी शुक्रिया पहुँचे.) आपको मोहल्ला पर पढ़ता रहा हूँ. आपकी तर्क क्षमता का कायल हूँ. पीयुष मिश्रा के उस एतिहासिक साक्षात्कार का ज़्यादा श्रेय मुझसे ज़्यादा वरुण को जाता है. तो ’बारास्ते मुझ’ आपका यह आभार उस तक भी पहुँच जायेगा. आप जैसे गंभीर पाठक मुझ जैसे अनियमित ब्लॉगर के लिए नेमत समान हैं. उम्मीद है यहाँ और सार्थक बात हो पाएगी.</p>
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		<title>By: रंगनाथ सिंह</title>
		<link>http://mihirpandya.com/2009/09/hindi-cinema-dialogue-writing/comment-page-1/#comment-1447</link>
		<dc:creator>रंगनाथ सिंह</dc:creator>
		<pubDate>Mon, 14 Sep 2009 08:34:38 +0000</pubDate>
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		<description>कसम उड़ान झल्ले की.....
हिन्दी फिल्मों पर इतना शानदार ब्लाग होगा...सोचा न था.....मैं विनीत भाई के ब्लाग से तुम्हारे ब्लाग तक.... राज कपूर से मुहब्ब्त खींच लाई...

पियुष मिश्रा के उस शानदार इंटरव्यु के लिए आभार तब मैंने ध्यान नहीं दिया था कि उसे किसने लिया है !! 

तुम्हारा ब्लाग अपने ब्लाग लिस्ट में जोड़ दिया है...और इस तरह सूचित करने की रस्मअदायगी भी पूरी हुई समझो....अब तो मुझे अपना नियमित पाठक समझो....वो कहा बड़े उस्ताद ने कहा है ना...रोमांटिक बातें मुझे बोर करती हैं....सच मानो इंटलैक्चुअलइज्म और स्यूडो इंटलैक्चुअलइज्म के दो पाटों के बीच पीस रहे आदमी के लिए तुम्हारे ब्लाग से बेहतर रिलैक्सेशन रिडिंग कुछ और नहीं हो सकती।....</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>कसम उड़ान झल्ले की&#8230;..<br />
हिन्दी फिल्मों पर इतना शानदार ब्लाग होगा&#8230;सोचा न था&#8230;..मैं विनीत भाई के ब्लाग से तुम्हारे ब्लाग तक&#8230;. राज कपूर से मुहब्ब्त खींच लाई&#8230;</p>
<p>पियुष मिश्रा के उस शानदार इंटरव्यु के लिए आभार तब मैंने ध्यान नहीं दिया था कि उसे किसने लिया है !! </p>
<p>तुम्हारा ब्लाग अपने ब्लाग लिस्ट में जोड़ दिया है&#8230;और इस तरह सूचित करने की रस्मअदायगी भी पूरी हुई समझो&#8230;.अब तो मुझे अपना नियमित पाठक समझो&#8230;.वो कहा बड़े उस्ताद ने कहा है ना&#8230;रोमांटिक बातें मुझे बोर करती हैं&#8230;.सच मानो इंटलैक्चुअलइज्म और स्यूडो इंटलैक्चुअलइज्म के दो पाटों के बीच पीस रहे आदमी के लिए तुम्हारे ब्लाग से बेहतर रिलैक्सेशन रिडिंग कुछ और नहीं हो सकती।&#8230;.</p>
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		<title>By: तरुण गुप्ता</title>
		<link>http://mihirpandya.com/2009/09/hindi-cinema-dialogue-writing/comment-page-1/#comment-1446</link>
		<dc:creator>तरुण गुप्ता</dc:creator>
		<pubDate>Sun, 13 Sep 2009 04:13:07 +0000</pubDate>
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		<description>एक बार फिर बधाईl वाकई बहुत अच्छा लगा की तुमने इन बेहतरीन फिल्मो के संवादों की कन्डीशन में उस अंतर को खोज निकला जो बहुतो को दिखाई नहीं देताl बधाई दोस्त . 
जो  बात  तुमने फिल्म के संवादों के बारे में कही वस्तुत वही बात तो हम अब तक जिंदगी के फलसफे के बारे में अपने बुजुर्गों से सुनते आये है ये और बात है की फिल्मे भी तो जिंदगी की वास्तविकता को खोलने का., उसके संवादों को बोलने का एक और जरिया हमें मुहैया कराती है. गुलज़ार के बारे में तो मै जानता हूँ की वो संवादों की कंडिशनिंग के कारीगर हैl प्यार को प्यार ही रहने दो कोई नाम न दो. जैसी बात का मै आज भी कायल हूँ . राकेश ओमप्रकाश मेहरा, फरहान अख्तर और ऋषिकेश मुखर्जी की बात तुमने की बहुत अच्छा लगा. एक बार फिर......अबकी बधाई नहीं शुक्रिया कहूँगा . शुक्रिया मेरे दोस्त l</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>एक बार फिर बधाईl वाकई बहुत अच्छा लगा की तुमने इन बेहतरीन फिल्मो के संवादों की कन्डीशन में उस अंतर को खोज निकला जो बहुतो को दिखाई नहीं देताl बधाई दोस्त .<br />
जो  बात  तुमने फिल्म के संवादों के बारे में कही वस्तुत वही बात तो हम अब तक जिंदगी के फलसफे के बारे में अपने बुजुर्गों से सुनते आये है ये और बात है की फिल्मे भी तो जिंदगी की वास्तविकता को खोलने का., उसके संवादों को बोलने का एक और जरिया हमें मुहैया कराती है. गुलज़ार के बारे में तो मै जानता हूँ की वो संवादों की कंडिशनिंग के कारीगर हैl प्यार को प्यार ही रहने दो कोई नाम न दो. जैसी बात का मै आज भी कायल हूँ . राकेश ओमप्रकाश मेहरा, फरहान अख्तर और ऋषिकेश मुखर्जी की बात तुमने की बहुत अच्छा लगा. एक बार फिर&#8230;&#8230;अबकी बधाई नहीं शुक्रिया कहूँगा . शुक्रिया मेरे दोस्त l</p>
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		<title>By: विवेक रस्तोगी</title>
		<link>http://mihirpandya.com/2009/09/hindi-cinema-dialogue-writing/comment-page-1/#comment-1437</link>
		<dc:creator>विवेक रस्तोगी</dc:creator>
		<pubDate>Fri, 11 Sep 2009 14:31:12 +0000</pubDate>
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		<description>नौटंकी साला... :)</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>नौटंकी साला&#8230; <img src='http://mihirpandya.com/blog/wp-includes/images/smilies/icon_smile.gif' alt=':)' class='wp-smiley' /> </p>
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		<title>By: Dipti</title>
		<link>http://mihirpandya.com/2009/09/hindi-cinema-dialogue-writing/comment-page-1/#comment-1436</link>
		<dc:creator>Dipti</dc:creator>
		<pubDate>Fri, 11 Sep 2009 12:28:11 +0000</pubDate>
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		<description>आपके पसंदीदा संवादों का अच्छा विश्लेषण किया हैं आपने। मैं अपनी भी बात इसमें जोड़ना चाहूंगी। दिल चाहता है का संवाद कि पर्फ़ेक्शन को इम्प्रूव करना मुश्किल है। मेरा पसंदीदा है और मुझे लगता है नौटंकी साला संवाद नहीं नाम है...</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>आपके पसंदीदा संवादों का अच्छा विश्लेषण किया हैं आपने। मैं अपनी भी बात इसमें जोड़ना चाहूंगी। दिल चाहता है का संवाद कि पर्फ़ेक्शन को इम्प्रूव करना मुश्किल है। मेरा पसंदीदा है और मुझे लगता है नौटंकी साला संवाद नहीं नाम है&#8230;</p>
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	<item>
		<title>By: mukesh pandey</title>
		<link>http://mihirpandya.com/2009/09/hindi-cinema-dialogue-writing/comment-page-1/#comment-1434</link>
		<dc:creator>mukesh pandey</dc:creator>
		<pubDate>Fri, 11 Sep 2009 11:10:25 +0000</pubDate>
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		<description>वाह भाई  बहुत गहरी बात कह गये मियाँ !!
फिल्म देखना एक कला है , साबित कर दिया आपने !</description>
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फिल्म देखना एक कला है , साबित कर दिया आपने !</p>
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