बदहवास शहर में फंसी जिन्दगियों की कहानी : कमीने

kaminey-21उस शाम सराय में रविकांत और मैं मुम्बई की पहचान पर ही तो भिड़े थे. ’मुम्बई की आत्मा महानगरीय है लेकिन दिल्ली की नहीं’ कहकर मैंने एक सच्चे दिल्लीवाले को उकसा दिया था शायद. ’और इसी महानगरीय आत्मा वाले शहर में शिवसेना से लेकर मनसे तक के मराठी मानुस वाले तांडव होते हैं?’ रविकांत भी सही थे अपनी जगह. मैं मुम्बई का खुलापन और आज़ादी देखता था और वो बढ़ते दक्षिणपंथी राजनीति के उभार चिह्नित कर रहे थे. हम ’मेट्रोपॉलिटन’ और ’कॉस्मोपॉलिटन’ के भेद वाली पारिभाषिक बहसों में उलझे थे. हमारे सामने एक विरोधाभासी पहचानों वाला शहर था. हम दोनों सही थे. मुम्बई के असल चेहरे में ही एक फांक है. यह शहर ऐसी बहुत सारी पहचानों से मिलकर बनता है जो अब एक-दूसरे को इसके भीतर शामिल नहीं होने देना चाहती. हाँ यह कॉस्मोपॉलिटन है. लेकिन अब कॉस्मोपॉलिटन शहर की परिभाषा बदल रही है. दुनिया के हर कॉस्मोपॉलिटन शहर में एक धारा ऐसी भी मिलती है जो उस रंग-बिरंगी कॉस्मोपॉलिटन पहचान को उलट देना चाहती है. दरअसल इस धारा से मिलकर ही शहर का ’मेल्टिंग पॉट’ पूरा होता है.

’मेल्टिंग पॉट’. विशाल भारद्वाज की ’कमीने’ ऐसे ही ’मेल्टिंग पॉट’ मुम्बई की कहानी है जहां सब गड्ड-मड्ड है. सिर्फ़ चौबीस घंटे की कहानी. यह दो भाइयों (शाहिद कपूर दोहरी भूमिका में) की कहानी है जो एक-दूसरे की शक्ल से भी नफ़रत करते हैं और इस नफ़रत की वजह उनके अतीत में दफ़्न है. चार्ली तेज़ है, उसके सपने बड़े हैं. वह रेसकोर्स का बड़ा खिलाड़ी बनना चाहता है. गुड्डू छोटी इच्छाओं वाला जीव है जिसकी ज़िन्दगी का ख़ाका पॉलीटेक्नीक में डिप्लोमा, नौकरी, तरक्की, शादी से मिलकर बनता है. लेकिन इस सबके बीच एक प्रेम कहानी है. गुड्डू की ज़िन्दगी में स्वीटी (प्रियंका चोपड़ा) है जो माँ बनने वाली है और बदकिस्मती से वो लोकल माफिया डॉन भोपे भाऊ (अमोल गुप्ते) की बहन है. पूरी फ़िल्म धोखे और फरेब से भरी है लेकिन अंत में आपको महसूस होगा कि असल में यह फ़िल्म अच्छाई के बारे में है. यह इंसान के भीतर छिपी अच्छाई की तलाश है. यह कबूतर के भीतर छिपे मोर की तलाश है. ’कमीने’ को लिकप्रिय हिन्दी सिनेमा की सर्वकालिक महानतम क्लासिक ’शोले’ का आधुनिक संस्करण कह सकते हैं. और इस आधुनिक संस्करण के मूल सूत्र ’शोले’ से ही उठाए गए हैं.

इस मुम्बई में अन्डरवर्ल्ड माफिया के तीन अलग अलग तंत्र एक साथ काम कर रहे हैं और जिस ’क़त्ल की रात’ की यह कहानी है उस रात यह तीनों माफिया तंत्र आपस में बुरी तरह उलझ गए हैं. अपने सपनों के पीछे भागता एक भाई चार्ली ज़िन्दगी में शॉर्टकट लेने के चक्कर में ऐसे चक्कर में फंसा है कि अब जान बचानी मुश्किल है और दूसरा भाई गुड्डू न चाहते हुए भी अब भोपे भाऊ के निशाने पर है. मराठी अस्मिता के नाम पर अपनी राजनीति चमकाने वाले भोपे भाऊ के लिए एक उत्तर भारतीय दामाद उनकी राजनीतिक महत्वाकाक्षाओं का अंत है. और इसी सबके बीच उस बरसाती रात उनकी ज़िन्दगियां आपस में टकरा जाती हैं. जैसे एक-दूसरे का रास्ता काट जाती हैं. तेज़ बरसात है. गुप्प अंधेरा है. एक गिटार है जिसमें दस करोड़ रु. बन्द हैं. उस गिटार के आस-पास खून है, गोलियां हैं, लालच है, विश्वासघात है, मौत है. एक तरफ शादी की शहनाई बज रही है और दूसरी तरफ अंधाधुंध गोलियों की बौछार है. इस सारे मकडजाल से भाग जाने की इच्छा लिए हुए हमारे दोनों नायक हैं और चीज़ों को और जटिल बनाने के लिए इन दोनों नायकों की शक्लें भी एक हैं. इसी सबके बीच पुलिस के भेस में माफिया के गुर्गे हैं, बाराबंकी से मुम्बई रोज़ी की तलाश में होते विस्थापन के किस्से हैं, रिज़वानुर्रहमान से तहलका तक के उल्लेख हैं और सबसे ऊपर आर.डी बर्मन के गीत हैं. ’सत्या’ के साथ हिन्दी सिनेमा ने मुम्बई अन्डरवर्ल्ड का जो यथार्थवादी स्वरूप हमारे सामने प्रस्तुत किया है उसे अनुराग कश्यप और विशाल भारद्वाज अपने सिनेमा में नए आयाम दे रहे हैं.

गुड्डू की भूमिका में शाहिद कपूर हकलाते हैं और चार्ली की भूमिका में उनका उच्चारण गलत है (मैं ’फ़’ को ’फ़’ बोलता हूँ! आपने सुना ही होगा.) लेकिन इन शारिरिक भेदों से अलग शाहिद ने अपनी अदाकारी से दो अलग व्यक्तित्वों को जीवित किया है. स्वीटी के किरदार की आक्रामकता उसे आकर्षक बनाती है और एक मराठी लड़की के किरदार में प्रियंका बेहतर लगी हैं. भाइयों की कहानियां देखने की अभ्यस्त हिन्दुस्तानी जनता को विशाल ने खूब पकड़ा है. अब तक देखे मुख्यधारा के बॉलीवुड सिनेमा से आपकी जो भी समझ बनी है उसे साथ लेकर थियेटर में जाइएगा, वो सारे फॉर्मूले आपको बहुत काम आयेंगे इस फ़िल्म का आनंद उठाने में. वही बॉलीवुडीय परंपरा कभी आपको खास सूत्र देगी फ़िल्म को समझने के और वही कई बार आपको उस क्षण तक भी पहुंचाएगी जिसके आगे आपने जो सोचा होगा वो उलट जाएगा. श्रीराम राघवन की ही तरह विशाल भारद्वाज ने भी एक थ्रिलर को अमली जामा पहनाने के लिए हमारी साझा फ़िल्मी स्मृतियों का खूब सहारा लिया है. इस फ़िल्म की बड़ी खासियत इसके सह-कलाकारों का सही चयन और अभिनय है. कमाल किया है भोपे भाऊ की भूमिका में अमोल गुप्ते ने एवं मिखाइल की भूमिका में चंदन रॉय सान्याल ने. चंदन तो इस फ़िल्म की खोज कहे जा सकते हैं. अपने किरदार में वो कुछ इस तरह प्रविष्ठ हुए हैं कि उन्हें उससे अलगाना असंभव हो गया है.

विशाल का पुराना काम देखें तो यह सवाल उठना लाज़मी है कि ’कमीने’ सबके बीच कहां ठहरती है? क्या इसे शेक्सपियर की रचनाओं के विशाल द्वारा किए तर्जुमे ’मक़बूल’ और ’ओमकारा’ के आगे की कड़ी माना जाए? बेशक ’कमीने’ विशाल की पिछली ’ओमकारा’ और ’मक़बूल’ से अलग है. इसमें शेक्सपियर की कहानियों का मृत्युबोध नहीं है, इसमें संसार की निस्सारता और नश्वरता का अलौकिक बोध नहीं है. इस मायने में यह फ़िल्म अपने अनुभव में ज़्यादा सांसारिक फ़िल्म है. ज़्यादा आमफ़हम. शायद इसमें मृत्यु भी एक आमफ़हम चीज़ बन गई है. और यहीं यह फ़िल्म क्वेन्टीन टेरेन्टीनो की फ़िल्मों के सबसे नज़दीक ठहरती है.

इस फ़िल्म की सबसे बड़ी खूबी है कि एक बेहतरीन थ्रिलर की तरह यह पूरे समय अपना तनाव बरकरार रखती है. और यह तनाव बनाने के लिए विशाल ने किसी तकनीकी सहारे का उपयोग नहीं किया है बल्कि यह तनाव किरदारों के आपसी संबंधों से निकल कर आता है. ’कमीने’ कसी पटकथा और सटीक संवादों से रची फ़िल्म है जिसमें बेवजह कुछ भी नहीं है. हाँ इस कहानी में ’मक़बूल’ जितने गहरे अर्थ नहीं मिलेंगे लेकिन ’कमीने’ एक रोचक फ़िल्म है. और यह रोचक फ़िल्म अपना आकर्षण बनाए रखने के लिए हमेशा सही रास्ता चुनती है, कोई ’फॉर्टकट’ नहीं. यही मुंबई का ‘मेल्टिंग पॉट’ है।

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जनसत्ता के लिए लिखी गई थी. पहली बार मोहल्ला लाइव पर प्रकाशित.

’तुम जो कह दो तो आज की रात चाँद डूबेगा नहीं’, कमीने संगीत समीक्षा.

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मैं झमाझम बारिश से भीगती बस में था. यह शाम का वही वक़्त था जिसके लिये एक गीतों भरी प्रेम कहानी में कभी गुलज़ार ने लिखा था कि सूरज डूबते डूबते गरम कोयले की तरह डूब गया… और बुझ गया! गुड़गांव से थोड़ा पहले महिपालपुर क्रॉसिंग पर जहाँ मेट्रो की नई बनी लाइन घुमावदार उलझे फ्लाईओवरों के ऊपर से पच्चीस डिग्री के कोण पर उन्हें नीचा दिखाती हुई सीधा चाँद की ओर निकल जाती है वहीं, बस वहीं. दूर बादलों के बीच से निकलता एक हवाईजहाज़ था जिसकी बत्ती किसी डूबते सितारे की तरह दूर जाती लग रही थी. खिड़की के शीशे पर अटकी बारिश की बूंदें थीं जिन्हें सामने से आती ट्रक की हेडलाइट रह-रहकर सुनहरे मोती में बदल देती थी. रह-रहकर पानी, रह-रहकर मोती. चमकता सा पानी, बहते से मोती. खिड़की से दीखते सामने टंगे चाँद को देखकर ये ख्याल आया था कि क्या हमारी तरह चांद भी बारिश में भीग जाता होगा? क्या घुटने जोड़कर, दोनों हाथों के बीच सर छिपाकर वो भी इस ठिठुरन भरे मौसम में अपनी जान बचाता होगा? मैंने खिड़की से ऐसा ही एक भीगा हुआ चाँद देखा. तेज़ बौछार में उसके कपड़े जब टपकते होंगे तो क्या वो उन्हें सुखाने के लिए दो उजले तारों के बीच फैलाकर लटका देता होगा? वहीं, बस वहीं मुझे अधूरेपन का अहसास हुआ. वहीं, बस वहीं मैंने एक कहानी लिखने का फ़ैसला किया. वहीं, बस वहीं मैंने भाग जाने की सोची. वहीं, बस वहीं मैंने ’कमीने’ के गीत सुने. जैसे पहली बार सुने, जैसे आखिरी बार सुने.

“ढैन टे णे टेणे नेणे” 4:45 (सुखविंदर सिंह, विशाल डडलानी, रॉबर्ट बॉब)

“आजा आजा दिल निचोड़े,
रात की मटकी तोड़े.
कोई गुडलक निकालें,
आज गुल्लक तो फोड़े.”

विशाल को शायद शेक्सपियर के साथ लम्बी संगत का यह गुण मिला है कि वे आदिम मनोभावों को सबसे बेहतर पहचानने लगे हैं. इसी संगत का असर है कि विशाल मुम्बइया सिनेमा की सबसे आदिम धुन खोज लाए हैं. ढैन टै णे टेणे टेणे ….. हमेशा से मौजूद हमारे बॉलीवुडीय मसाला सिनेमाई मनोभावों को अभिव्यक्त करने वाली सबसे आदिम धुन. इस धुन का बॉलीवुड के लिए वही महत्व है जो हॉलीवुड के लिए ’द गुड, द बैड एंड द अगली’ की शीर्षक धुन का था. मुझे लगता है मैं इस धुन को सालों से जानता हूँ. इस धुन के साथ सत्तर के दशक के अमिताभीय सिनेमा से अस्सी के दशक के मिथुन चक्रवर्तीय सिनेमा तक सिनेमा की एक पूरी किस्म अपने सारे फॉर्मूलों के साथ जी उठती है. यह महा (खल) नायक के दौर से आई आदिम धुन है. मारक असर वाली. सुखविंदर की हमलावर आवाज़ के साथ. हमेशा की तरह गुलज़ार बेहतर प्रयोग करते हैं. हालांकि इस गीत में कोई चमत्कारिक प्रयोग नहीं है लेकिन संगीत की बुलन्दी उसे ढक लेती है.

कहते हैं मुम्बई शहर कभी सोता नहीं. कहते हैं मुम्बई शहर रात का शहर है. यह गीत मुम्बई में ही होना था. यह सड़क का गाना है. रात में जागती सड़क का गाना. इसमें बहुत साल पहले जावेद अख़्तर के लिखे ’सो गया ये जहाँ’ का आवारापन घुला है. विनोद कुमार शुक्ल ने ’नौकर की कमीज़’ में लिखा था, “घर बाहर जाने के लिए उतना नहीं होता जितना लौटने के लिए होता है. लौटने के लिए खुद का घर ज़रूरी होता है.” ओये लक्की लक्की ओये से कमीने तक, क्या हम नष्ट/छूटे घर की तलाश में अनवरत भटकते नायकों की कथायें रच रहे हैं.

“रात आई तो वो जिनके घर थे
वो घर को गए सो गए
रात आई तो हम जैसे आवारा
फिर निकले राहों में और खो गए
इस गली, उस गली
इस नगर उस नगर
जाएँ भी तो कहाँ
जाना चाहें अगर
सो गई हैं सारी मंज़िलें
सो गया है रस्ता”

“पहली बार मोहब्बत” 5:24 (मोहित चौहान)

“याद है पीपल के जिसके घने साये थे,
हमने गिलहरी के झूठे मटर खाये थे.
ये बरक़त उन हज़रत की है,
पहली बार मोहब्बत की है.
आखिरी बार मोहब्बत की है.”

यह दूर पहाड़ों का गीत है. यह गाना पानी वाला गाना है. ठंडे पानी वाला गाना. रसोई के पीछे अलावघर से बुलाती उसकी आवाज़. बर्फीले पानी वाला गाना. कुड़कुड़ी वाले सर्द मौसम के बीच मिट्टी के कुल्हड़ में गरमागरम धुआँ उड़ाती चाय. कुछ है जो बहता हुआ है. नम. जैसे सुनो और भीग जाओ. देवदार. इस गाने की फ़ितरत में ठिठुरन है. कोयले की सिगड़ी जिसमें फूँक मारते ही कोयले का रँग स्याह से बदल कर सुनहरा हो जाता है. ऊना, चोप्ता, लद्दाख, दार्जिलिंग. कहते हैं कि अगर दार्जिलिंग में एड़ी के बल उचककर ऊपर को देखो तो दूर कंचनजघा दीख पड़ता है. मैं बस इस गाने को सुनने के लिये पहली बार पहाड़ों पर जाऊँ, आखिरी बार पहाड़ों पर जाऊँ.

मोहित चौहान को मैंने ’गुँचा कोई मेरे नाम कर दिया’ के साथ खोजा था, दुनिया ने ’तुमसे ही दिन होता है’ के साथ पाया. अब उन्हीं के लिये गीत रचे जा रहे हैं. सुनियेगा, जब ’पहली बार… मोहब्बत की है’ के साथ गीत ऊपर जाता है तो किसी चीड़ या देवदार की सी ऊँचाई का अहसास होता है. गुलज़ार फिर एकबार ’सोये वोये भी तो कम हैं’ जैसे प्रयोगों से साथ दिल जीत लेते हैं. एक सच्चे प्रेम-गीत की तरह यह भी ढेर सारी पुरानी यादों से गुँथा हुआ गीत है. घने साये वाले पीपल के नीचे खाये गिलहरी के झूठे मटर वाला किस्सा इस गीत की जान है. इस गीत का नशा धीरे धीरे चढ़ता है. ’रात के ढाई बजे’ से उलट यह गीत पहली नज़र का प्यार नहीं, साहचर्य का प्रेम है. आप पर आता ही जाता है, आता ही जाता है, आता ही जाता है.

“रात के ढाई बजे” 4:31 (सुरेश वाडकर, रेखा भारद्वाज, सुनिधि चौहान, कुणाल गाँजावाला, अर्ल इ.डी.)

“एक ही लट सुलझाने में
सारी रात गुज़ारी है
चाँद की गठरी सर पे ले ली
आपने कैसी ज़हमत की है”

यह पहली नज़र का प्यार है.

शुरु में ही शहनाई की बदमाश आवाज़ नोटिस करें. रैप का प्रयोग इतना उम्दा है कि हम यह भूल ही जाते हैं कि विशाल के लिये यह बिलकुल नया प्रयोग है. हमारे समय के कुछ सबसे बेहतरीन गायकों की गायकी के बीच रैप कुछ इस तरह पिरोया गया है कि अटखेली को एक और रूप तो मिलता है लेकिन गीत की तन्मयता टूटने नहीं पाती है. यह विशाल की वैरायटी है ’सपने में मिलती है’ की मासूम बदमाशी से ’कल्लू मामा’ के उज्जड्पन तक और ’छोड़ आए हम वो गलियाँ’ के नॉस्टेल्जिया से ’तुम गए सब गया’ के मृत्युबोध तक.

इस गीत की गायकी के बारे में कुछ बात विस्तार से. रेखा भारद्वाज और सुनिधि चैहान इस वक़्त हमारी सबसे वर्सटाइल गायिकाओं में से हैं. दोनों की आवाज़ की बदमाशी अब तो जगज़ाहिर है. अगर आप आवाज़ों की मूल प्रकृति पहचानते हैं तो जान जायेंगे कि इस गीत में सुरेश वाडकर की आवाज़ का क्या महत्व है. इस सांसारिक मोह माया में फंसे साधारण इच्छाओं के गीत को सुरेश वाडकर की आवाज़ अचानक एक ’पवित्रताबोध’ देती है, जैसे उसे कुछ ऊँचा उठा देती है. गौर करें कैसे कुणाल गाँजावाला अपनी चार लाइनों में कुछ अटखेलियाँ करते हैं और आखिर में टाऊ णाऊ भी लेकिन उन्हीं पंक्तियों को गाते हुए सुरेश वाडकर कितने सटीक हैं. सुरेश की आवाज़ चीनी घुली आवाज़ों के बीच गुड़ की मिठास है. और विशाल इसे बखूबी पहचानते हैं. तभी तो दूसरे अंतरे में पहली तीन लाइनें तो कुणाल की आवाज़ में हैं लेकिन ’भोले भाले बन्दे’ में अचानक सुरेश वाडकर की आवाज़ आती हैं और उसे कितना, कितना विश्वसनीय बनाती है. मैं कुणाल और सुनिधि का भी बड़ा पंखा हूँ लेकिन मुझे कहीं गहरे यह लगता है कि इस गीत पर पूरा हक रेखा भारद्वाज और सुरेश वाडकर का ही होना था. मैं पूरे गीत में उनकी आवाज़ का इंतज़ार करता हूँ. शायद उनके हिस्से का असल गीत अभी बाकी है. विशाल सुन रहे हैं न?

“फटक” 5:03 (सुखविंदर सिंह, कैलाश खेर)

“ये इश्क नहीं आसाँ,
अजी एड्स का खतरा है.
पतवार पहन जाना,
ये आग का दरिया है.”

आक्रामक गाना है. हमला करता हुआ. वैसे भी सुखविंदर और कैलाश हमारी सबसे बुलन्द आवाज़ें हैं. थीम बैकग्राउंड बीट है ’फटाक’, किसी वाद्ययंत्र से नहीं कोरस आवाज़ में. टिपिकल विशाल का अंदाज़. सत्या के ’कल्लू मामा’ में भी ’ढिशक्याऊँ’ की धुन इसी अन्दाज़ में आती थी. यह यथार्थवाद का विशाल का अपना तर्जुमा है. बीच में ढोल का प्रयोग एम एम करीम से रहमान तक बहुत से और लोगों के काम की याद दिला जाता है. बहुत ही लिरिकल है, सीधे ज़बान और दिमाग़ पर चढ़ने वाला. इंस्टैंट असर के लिए. गुलज़ार के प्रयोग भी अपनी पूरी बुलन्दी पर हैं. इस बार तो सामाजिक संदेश भी साथ है. ’रात का जाया रे’ जैसे प्रयोग फिर गीत को सतह से थोड़ा गहरे ले जाते हैं.

“कमीने” 5:57 (विशाल भारद्वाज)

“जिसका भी चेहरा छीला, अन्दर से और निकला.
मासूम सा कबूतर, नाचा तो मोर निकला.
कभी हम कमीने निकले, कभी दूसरे कमीने.”

सोल ऑफ़ द एलबम. पूरी तरह विशाल छाप गाना जिसमें इस बार आवाज़ भी खुद विशाल की है. इस गीत में कुल बीस बार कमीने शब्द आता है फिर भी मैं कहना चाहूँगा कि यह इस दशक का सबसे मासूम गीत है. सबसे ईमानदार गीत. ऐसी ईमानदारी जो शायद आपके भीतर की उस सच्चाई को जगा दे जिसका सामना करने से आप खुद भी डरते हैं. इस गीत की प्रकृति कुछ-कुछ ’सच का सामना’ की कुर्सी पर बैठने जैसी है. यह गीत डायरी लिखने जैसा ईमानदार काम है. यह अपने ही भीतर के स्याह हिस्से की उजली तलाश है. यह गीत न्यू वेव हिन्दी सिनेमा का थीम साँग हो सकता है. यह वो सारे भाव अपने भीतर समेटे है जिसकी तलाश दिबाकर बनर्जी से अनुराग कश्यप तक अपने सिनेमा में करते रहे हैं. यह सही समय है कि एक ’पल्प फिक्शन’ हमारे यहाँ भी आए, कोई टैरेन्टीनो हमारे यहाँ भी जिन्दगी के उन स्याह हिस्सों की तलाश में निकले जिन्हें शेक्सपियर के ओथेलो से ओमकारा तक और मैकबैथ से मक़बूल तक खोजा ही जाता रहा है. विशाल, अब हम आपके इंतज़ार में है.

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