फ़िराक के शहर में सिनेमा का मेला : गोरखपुर फ़िल्म उत्सव
"हो जिन्हें शक, वो करें और खुदाओं की तलाश, हम तो इंसान को दुनिया का खुदा कहते हैं." -फ़िराक़ गोरखपुरी. गोरखपुर फ़िल्म महोत्सव इस बरस अपने चौथे साल में प्रवेश कर रहा था. ’प्रतिरोध का सिनेमा’ की थीम लेकर शुरु हुआ यह सिनेमा का मेला अब सिर्फ़ सार्थक सिनेमा के प्रदर्शन तक ...
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April 12, 2009
नौकर की कमीज पढ़ते हुए…
विनोद कुमार शुक्ल का ’नौकर की कमीज’ पढ़ते हुए... यदि मैं किसी काम से बाहर जाऊँ, जैसे पान खाने, तो यह घर से खास बाहर निकलना नहीं था. क्योंकि मुझे वापस लौटकर आना था. और इस बात की पूरी कोशिश करके कि काम पूरा हो, यानी पान खाकर. घर बाहर जाने ...
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April 8, 2009
ख़ामोशी के उस पार : विदेश
मूलत: तहलका समाचार के फ़िल्म समीक्षा खंड ’पिक्चर हॉल’ में प्रकाशित ********** दीपा मेहता की ’विदेश’ परेशान करती है, बेचैन करती है. यह देखने वाले के लिए एक मुश्किल अनुभव है. कई जगहों पर यंत्रणादायक. इतना असहनीय कि आसान रास्ता है इसे एक ’बे-सिर-पैर’ की कहानी कहकर नकार देना. यह ज़िन्दगी की ...
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April 4, 2009


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