बीत चुके हैं अब युग शहरों के
पिछले दिनों अपने शोध के सिलसिले में फ़िल्म दर फ़िल्म दिल्ली शहर की संरचना को परखते हुए रिल्के की कविताओं से मुलाकात हुई. साहित्य अकादेमी से प्रकाशित अपने अनुवाद में अनामिका उन्हें ’औरतों की मेज़ का कवि’ कहती हैं. यहाँ दर्ज कविता अब मेरे शोध प्रबंध का हिस्सा है. रिल्के ...
1
February 27, 2009
बिल्लू: अब फिर से राज कपूर नहीं
मूलत: तहलका समाचार के फ़िल्म समीक्षा खंड ’पिक्चर हॉल’ में प्रकाशित ***** बहुत दिन हुए देखता हूँ कि हमारे मनमोहन सिंह जी की सरकार अपना हर काम किसी ’आम आदमी’ के लिए करती है. मैं देखता कि जब विदर्भ में किसान आत्महत्या कर रहे हैं, गुजरात से कर्नाटक तक अल्पसंख्यकों को छांट-छांट ...
3
February 18, 2009
लक बाय चांस: उड़ती तितली को पकड़ने की कोशिश
मूलत: तहलका हिन्दी के फ़िल्म समीक्षा खंड ’पिक्चर हॉल’ में प्रकाशित * * * * * * * * * * * * * "यह बॉलीवुड का असल चेहरा है. ’लक बाय चांस’ हिन्दी फ़िल्म इंडस्ट्री के लिए वही है जो ’सत्या’ मुम्बई अन्डरवर्ल्ड के लिए थी." - ’पैशन फ़ॉर सिनेमा’ ...
4
February 9, 2009


ताज़ी टिप्पणियाँ: