मिथ्या: खोई हुई पहचान की तलाश में
"मैं जान जाता कि यह एक सपना है. लेकिन यह पता चल जाने के बावजूद मैं अच्छी तरह से जानता कि तब भी मैं अपनी इस मृत्यु से बच नहीं सकता. मृत्यु नहीं -तिरिछ द्वारा अपनी हत्या से- और ऐसे में मैं सपने में ही कोशिश करता कि किसी तरह ...
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February 27, 2008
अच्छर मन को छरै बहुरि अच्छर ही भावै
रवीश ने अपने ब्लॉग पर यह चर्चा शुरू की है कि किसने पुस्तक मेले से क्या खरीदा यह शेयर किया जाए. तो मुझे लगा कि 'सनद रहे और वक्त ज़रूरत काम आए' की परम्परा पर चलते हुए मुझे भी यह 'पुण्य कर्म' कर ही देना चाहिए! मेरे लिए यह ...
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February 19, 2008
बात निकलेगी तो फिर दूर तलक जायेगी
मीडियानगर 03 पर बातचीत फ़रवरी की शाम छ: बजे, ऑक्सफ़र्ड बुक स्टोर, कनॉट प्लेस, दिल्ली. फिज़ाओं में क्या था:- वक्ताओं के पीछे एक नारंगी रंग की दीवार थी जिसपर बहुत सारे शब्द बिखरे हुए थे. ये मुझे 'तारे ज़मीन पर' के शुरूआती दृश्य की याद दिला रहा था जिसमें हमारा कुल-ज़मा लिखा पढ़ा ...
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February 1, 2008


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